संदीप कुमार सिंह 30 Oct 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 53725 0 Hindi :: हिंदी
#विधा:_दोहा छंद #"सृजन समीक्षार्थ प्रस्तुत" काटे कटी न रात अब,रहूं बड़ा बेचैन। जब से देखा हूं उसे,वही बसी है नैन।। काटे कटी न रात अब,रहती वह तस्वीर। आँखों के अब सामने,और भव्य तासीर।। काटे कटी न रात अब,मुझे हुआ है प्यार। महबूबा की याद में,आए अब उद्गार।। काटे कटी न रात अब,दिल में है तूफान। मंजिल पर अधिकार कर,कायम हो ईमान।। काटे कटी न रात अब,कुछ ऐसी है बात। सारी दुनिया पास हो,बांटू मैं खैरात।। (स्वरचित मौलिक) संदीप कुमार सिंह✍️ जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार
I am a writer and social worker.Poems are most likeble for me....