Rani Devi 30 Nov 2024 कविताएँ समाजिक Hindi kavita, saanchi dhoop kavya 24595 0 Hindi :: हिंदी
झूल गए वो फांसी सीने पर गोलियां खाईं थी शहीद हुए वीर सपूत तब जब बजनी उनकी शहनाई थी। आंखों में सपना था भारत मां की आजादी का हर दौलत बेमायने थी वीर सपूत का सीना फौलादी था। दीवाना वो आजादी का मां को मुक्त करवाना चाहता था देख बेड़ियों में भारत मां को सिहर उठता था और कहराता था। उसकी मां ने भी सोचा था घोड़ी चढ़ेगा बेटा , मैं सेहरा बांधूंगी बहना सोचे बजेगी शहनाई और मैं ठुमक ठुमक कर नाचूंगी। लेकिन आजादी के शूरवीर थे भारत मां की गोद में सो गए झूल गए फांसी वो शान से मां के बेटे भारत मां के हो गए। आजादी का मोल उनसे पूछो वतन पे मर मिटे थे जो जात धर्म का भेद नहीं था हिन्दू मुस्लिम सिख भाई थे वो। न पाई शहादत नेताओं ने न गुलामी की पीड़ा को झेला है धर्म के नाम पे बांट दिया देश को आजादी के बाद ही खेला खेला है। लूट रहे देश को जात धर्म के नाम पे बांट रहे टुकड़े कर रहे वोट की खातिर शहीदों की चिताओं पे तुम नाच रहे। वतन के रखवाले फांसी झूल गए जे वो शूरवीर जग जाएंगे शहादत फिर किसकी होगी ये तो शूरवीर ही बतलाएंगे। देखो आज पर्व आजादी का आया है और आज ही भारत मां के जवानों ने तिरंगा शान से फहराया है।
Hindi Lecturer in Government school GSSS Karoa Himachal Pradesh....