Archana Singh 18 Aug 2024 कविताएँ समाजिक इंसानियत शर्मसार हुई.... 31863 0 Hindi :: हिंदी
नमस्ते दोस्तों आज फिर एक बार इंसानियत शर्मसार हुई .....! नारी की अस्मिता तार- तार हुई ...!! चीखें उसकी खामोश हुई...! खुद को बचाने की हर कोशिश नाकाम हुई...!! आज फिर एक बार .... मांँ- बाप के अरमान टूटें .... अपनों के भी साथ छूटें ....! कोई ना आया पास उसके ....! ना जाने मदद को कितने गुहार लगाई...!! आज फिर एक बार.... श्वास टूटा , साथ छूटा ....! विदाई में गले लग , बाबुल के वो ना रोई ...! लाल चुनरी ना भाई , सफेद चुनर ओढ़ ...! वो चिता पर सोई ....!! आज फिर एक बार .... गली-गली में नारेबाजी ....! कैंडल मार्च गुंजायमान हुआ ....! आंँखों से अश्रु धारा रुक ना पाई ...! आज फिर एक बार .... "बेटी बचाओ ,बेटी पढ़ाओ" का स्लोगन बताते हैं ...! जब न्याय की बारी आती है ....! फिर क्यों सब मौन हो जाते हैं ....! मन बड़ा विदीर्ण हुआ ....! आहत हर मांँ की आत्मा हुई....!! आज फिर एक बार इंसानियत संसार हुई ...! नारी की अस्मिता तार-तार हुई ...!! स्वरचित : अर्चना सिंह ✍🏻