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"इरादों की गूँज"

Anilkumar Rathwa (Sameer) 05 Feb 2026 कविताएँ समाजिक "इरादों की गूँज" 11355 0 Hindi :: हिंदी

किस्मत के पन्नों पर क्यों आस लगाए बैठा है,
तू खुद अपनी लकीरों में प्यास जगाए बैठा है।
हवाओं के रुख से नौका पार नहीं होती,
पतवार थामने वालों की कभी हार नहीं होती।

​मंजिलें पत्थर की हैं तो क्या, तू छेनी बन जा,
अंधेरा गहरा है तो क्या, तू खुद की रोशनी बन जा।
जो झुक जाए तूफ़ान के आगे, वो इरादे कमजोर होते हैं,
मंजिलें तो उनके कदम चूमती हैं, जिनके हौसले बेजोड़ होते हैं।

​न पूछ कि रास्ता किधर जाता है,
तू चल, रास्ता खुद-ब-खुद बन जाता है।
थक कर बैठना मुसाफिर को शोभा नहीं देता,
संघर्ष के बिना वक्त भी किसी को मौका नहीं देता।

​तो उठ, कमर कस और हुंकार भर,
अपनी मेहनत से किस्मत का रुख मोड़ कर।
दुनिया कहेगी कि यह मुमकिन नहीं,
पर तू कह, कि मेरे हौसलों जैसी कोई जमीन नहीं।

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