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ईश्वरीय दोहे This post in Under Review

शरद भूषण मोंगरा 14 Jul 2026 कविताएँ धार्मिक प्रभु 159 0 Hindi :: हिंदी

मिट्टी से नर तन गढ़ा, मिट्टी से बर्तन 
पानी बर्तन में टिके, क्यों नहीं टिकता मन।

पक्षी चोंच उठाई के, क्यों करता फरियाद 
तुझको अपनी फिक्र है, उसको सब की याद।

मंदिर मंदिर ढूंढले, कहीं मिले ना राम
तुझमें गहरे है छिपा, दुनिया का भगवान।


मन को ऐसा ठोकले, की पत्थर हुई जाय 
माया कितना भी कहे, पर बाहर न जाय।

कारज जग का सब किया, किया नहीं इक काम 
सोती रूह जगाई ना, चढ़ती जो उल्टे धाम।

तन पापी रूह पाक है, कर्म की गठरी ढोय
चंचल मन बहरूपिया, कभी हंसे कभी रोय।

क्यों सिर को खुजलाता है, प्रीतम तुझ में खोज
जो तुझे लिए फिरे घूमता, तू ढूंढे उसे रोज।


मिट्टी से गारा बना, उसने गढ़ दी देह
अहं न तू मूरख दिखा, फिर मिट्टी कर देह।

शरद भूषण मोंगरा

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