Anilkumar Rathwa (Sameer) 29 Sep 2025 कविताएँ समाजिक गाँव की मिट्टी का ऋण 15798 0 Hindi :: हिंदी
आबाद चाहे शहर रखिए, मगर गाँव में भी घर रखिए, ख़ानदान की है वो मिट्टी, ज़रा उसकी भी ख़बर रखिए। चमकते शीशे की इमारत, ऊँची-ऊँची इमारतें, पर मिट्टी की खुशबू देती, दिल को मीठी सौग़ातें। जहाँ दादी की कहानियाँ, छाँव तले पीपल की, जहाँ बुलाती थी हमें आवाज़ ढोल-नगाड़ों की। कुएँ का पानी मीठा था, रिश्तों का स्वाद निराला, शहर की दौड़ में छूटा, अपनापन वो मतवाला। गली में खेलते बच्चे, बैलगाड़ी की टनकार, गाँव के हर कोने में बसती है प्रेम की पुकार। शहर की चकाचौंध भली है, पर कुछ सच्चाई गाँव में, ममता, अपनापन, भाईचारा, बसता है उस छाँव में। तरक्की करना ज़रूरी है, आगे बढ़ना भी काम है, पर गाँव से रिश्ता रखना, सबसे बड़ा सम्मान है। आबाद चाहे शहर रखिए, मगर गाँव में भी घर रखिए, जड़ों को मत भूलिए, मिट्टी से जुड़कर ही अमर रखिए।