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देखा एक संसार अनोखा

महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कविताएँ समाजिक 2444 0 Hindi :: हिंदी

‘‘देखा एक संसार अनोखा’’ 

हाय ! मैने यह क्या देखा
रब्बा तेरा संसार अनोखा 
कहीं बाढ़ कहीं सूखा देखा
कहीं नंगा कहीं भूखा देखा।

जिसको बीज बोता देखा
और उसी को रोता देखा
जब सबको मैने सोता देखा
तब उसे जान खोता देखा।

रात में कुछ लोंगो को मिलते देखा
बाद पीने के उनको हिलते देखा
हिलते-हिलते ही गिरते देखा 
अस्पताल में फिर उनको सिलते देखा

किसी को प्यार करते देखा 
किसी को आंहे भरते देखा
किसी को इन्तेजार करते देखा
और उसी के नाम से मरते देखा

जिसे सियासी खेल में देखा
उसे ही कुर्सी और रेल में देखा 
गाय, भैंस का चारा खाकर 
उसी को मैने जेल में देखा।

एक भयानक मंजर देखा
हाथ में किसी के खंजर देखा 
दरिंदो को फलते देखा 
नारी को आग में जलते देखा।

मूर्खों को ज्ञान कहता देखा
विद्वानों को चुप रहता देखा
जनमानस को बस सहता देखा
एक दरिया में सबको बहता देखा।

धर्म के नाम पर जिनको बंटते देखा
आपस में उनको मैने कटते देखा
सेक्यूलरवाद जिनको रटते देखा
चालाकी से पीछे उनको हटते देखा।

किसी को साहूकार देखा
तो किसी को कर्जदार देखा
जाहिलों को चलाते सरकार देखा
पढ़े लिखों को बेरोजगार देखा।

 हाय ! मैने यह क्या देखा
रब्बा तेरा संसार अनोखा..........


रचनाकार-
महेश्वर उनियाल

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