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बैसाखी पर This post in Under Review

संदीप कुमार सिंह 07 Jul 2026 कविताएँ समाजिक मेरी यह मुक्तक कविता आज के ज़माने में मौजूद अभिमानी लोगो पर है. जो काफी दिलचस्प है. 586 0 Hindi :: हिंदी

बैसाखी पर चलने वाले मद में झूम रहे हैं।
स्वारथ के ताने बाने बुन हर पग चूम रहे हैं।
नेपथ्यों से लक्ष्य साधते कंधे बदल बदल कर--
संबंधों की चादर ओढ़े छलिए घूम रहे हैं।।
(स्वरचित मौलिक)
संदीप कुमार सिंह*Author*

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