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भरे खजाना खूब ही-बड़ा करे आकार

संदीप कुमार सिंह 11 Jul 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाज हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 18288 0 Hindi :: हिंदी

(मुक्तक छंद)
पहले जैसे अब कहां,पानी हवा जुगार।
मिले मिलावट में सभी,छीने पर अधिकार।
चौधरी बनकर तब चले,और दिखाए रोब_
भरे खजाना खूब ही,बड़ा करे आकार।
(स्वरचित मौलिक)
संदीप कुमार सिंह✍️
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

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