Ajay kumar suraj 20 Dec 2024 कविताएँ समाजिक #बेरोजगारी_का_दर्द #बेरोजगारी #अजय_कुमार_सूरज 19539 0 Hindi :: हिंदी
बेरोजगारी का बोझ उठा थका हूं मैं, फूटी किस्मत की राहों में अटका हूं मैं। लोगों के ताने बनते हैं साये मेरे, सपनों की दुनिया से दूर भटका हूं मैं। हर सुबह उम्मीदें लेकर उठता हूं, शाम को फिर हार का घूंट पीता हूं। तानों की आग में झुलसता है मन, बेरोजगारी का जहर चुपचाप पीता हूं। फूटी किस्मत ने रास्ते बंद कर दिए, हौसले मेरे अरमानों संग मर दिए। लोगों के ताने आज़माते हैं सब्र मेरा, पर सपने अब भी मैंने ज़िंदा कर लिए। तानों के तीर सीने में चुभते रहे, सपनों के परिंदे पंख तजते रहे। बेरोजगारी की रातें सोने न दें, उजालों में भी अंधेरे बसते रहे। किस्मत की साजिश से हारता हूं रोज, चुपचाप तकदीर से करता हूं संजोज़। तानों का शोर अब संगीत बन गया, दर्द का साया है पर दिल में है जोश। खाली जेबों से हौसला तोलते हैं, गिर-गिरकर फिर से कदम खोलते हैं। कहने को किस्मत ने सब छीन लिया, पर सपनों को हर रोज हम बोलते हैं।