महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कविताएँ प्यार-महोब्बत 1790 0 Hindi :: हिंदी
“आशा की एक किरण” ख्वाबों की पटरी पर अपनी गाड़ी चल रही है चार दिनों की ज़िन्दगी भी अब खल रही है आहिस्ता आहिस्ता अब ये शाम ढल रही है सुना है अगली सुबह अपनी किस्मत बदल रही है। कभी खुशी, कभी गमों के तराने गा रहा हॅू समेट कर खुद के आंसूआें से नहा रहा हॅू अभी बेसुध हॅू पर होश में आ रहा हॅू ठहरा हूॅ पर लगता है, कहीं जा रहा हूॅ। कभी पहाड़ कभी दरिया में बह रहा हॅू सहमी आवाज को बुलन्द करके कह रहा हॅू रहने दे मुझे जिस हाल में रह रहा हॅू यह तो बस मै अपने सुनहरे, कल की खातिर सह रहा हॅू। लड़खड़ा कर चला था मै जब फुटपाथों से डरा नहीं मै उन अन्धेरी रातों से भीगा तक नहीं मै सावन की बरसातों से क्योंकि, घर से तिलक करके निकला था मै अपनी मां के हाथों से।। रचनाकारः- महेश्वर उनियाल