Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक आम आदमी 74255 0 Hindi :: हिंदी
होगा कोई, होगा जैसा। मैं तो वही हूं, वैसा का वैसा। बनाता होगा कोई, बुर्ज -ए-खलीफ़ा। मैं तो प्रेम तृण से नीड़ बना, त्याग गारे से लीपा। जीतता होगा युद्ध कोई, खेल कपट गंजीफ़ा। मैं तो छल, कपट, हिंसा से, दे दिया जन्मजात इस्तीफ़ा। पहले भी ऐसा, अब भी हूं ऐसा का ऐसा। मैं तो वही हूं, वैसा का वैसा। उपजाता होगा, थार में कोई मोती। मैं तो पसीने से धान सींचता, वही बोई वही जोती। बनता होगा कोई, कालिदास, शेक्सपियर गोती। मेरा तो वही ककहरा, वही पढ़ाई, वही प्रेम- पोथी। बन गया होगा कोई, कैसे से कैसा। मैं तो वही हूं, वैसा का वैसा। होगा कोई दुनिया में, चमचमाता सितारा। मैं तो आज भी, वही बेचारा का बेचारा। बदल गया होगा, किसी का नज़र ए नज़ारा। मेरी तो वही नज़र, वही नज़ारा, वही आरा- प्यारा। होगा कोई भारी-भरकम, भैंसे का भैंसा। मैं तो वही हूं, वैसा का वैसा। होगा कोई, होगा जैसा। मैं तो वही हूं, वैसा का वैसा।