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अफगानी बाला

Rani Devi 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक सांची धूप 52764 0 Hindi :: हिंदी

             अफगानी बाला

मृग सी चंचल लाचार निगाहों में
इक्कीसवीं सदी की बेबस माँ की बाँहों में
अफगानी हर बाला की अस्मत को
लुट ते देख। विश्व क्यों मौन है? 
                  मजहबी जिंदा लाशों मे मानवता को
                   ताश के पतों  सा     गिरता      देख
                    मातृभूमि को छोड़ अंजान धरा पे
        जन को भगता देख । विश्व क्यों मौन है  ? 
विश्व गुरु कहलाने वालों पर
देशद्रोही नेताओं के भग जाने        
छाती से लिपटी हर मलाला की
माँ की बहती जलधारा  देख। 
                         विश्व क्यों मौन? 
              उठ जाओ। ए अफगानी बाला
              घने कुहासे को दूर करो
               हिम्मत को न टुटने दो
               अस्मत को न लुटने दो
हथियार उठा कर ,नारित्व की रक्षा करती
तुम मर भी जाओगी, इतिहास गवाह है
कोमल होने पर भी, मर्दानी ही कहलाओगी
             अपनी रक्षा स्वयं करो
             मानवाअधिकार वाले न आएँगे
            कोमल बेटी की चितकरों को
            बहशी दरिंदो की लालकारों को
            भी देख। विश्व क्यों मौन है ? 

 

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