Mohan pathak 30 Oct 2025 कहानियाँ धार्मिक 19433 0 Hindi :: हिंदी
शिखर मूलनारायण की कथा -- उत्तराखंड राज्य देश के पर्वतीय अंचल में स्थित है,जहाँ संस्कृति और लोकगाथाओं का संगम होता है। बागेश्वर और पिथौरागढ़ के सीमांत धरमघर फाट क्षेत्र में चार तीर्थों का एक लोकचेतना से रचा बसाया "चारधाम" है। शिखर में मूलनारायण,सनगाड़ में नौलिंग, भनार में बंजैण तथा पांखू में कोटगाड़ी। इन मंदिरों में ढोली (दास ) द्वारा सुनाए जाने वाले बर्म (लोकसंवेदना से उपजा वह मौखिक आख्यान है, जो केवल कथा नहीं, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपा गया जीवित इतिहास है।) बर्म सुनाकर डंगरी (देवता) जागृत करने की परंपरा पूरे उत्तराखंड में किसी न किसी रूप में प्रचलित है। इन्हें सुनाने की एक विशेष शैली होती है, जो रोमांच पैदा करती है।ढोल, दामाऊ और झाँझर का समन्वित स्वर देव भक्ति के प्रति आस्था पैदा करता है।जिस पर आज का विज्ञान भी नतमस्तक हो जाता है।धीरे धीरे अब यह कला विलुप्त हो रही है । इन चारों मंदिरों में से शिखर मन्दिर की महत्ता तथा वहाँ मूलनारायण के अवतरित होने की कहानी जो पीढ़ी दर पीढ़ी इस क्षेत्र के दास ( ढोली ) द्वारा सुनाई जाती रही है। कम रोमांचकारी नहीं है। बचपन में सुने ये बर्म बोल स्मृति के पटल में अब धुंधली सी छाया के रूप में मौजूद है। उसी कहानी को यहाँ प्रस्तुत करने की एक छोटी सी कोशिश है। मूलनारायण का जन्म मूल नक्षत्र में होने के कारण बालक को अशुभ मानकर घर से दूर कर दिया गया। पर नियति ने उन्हें ठुकराया नहीं—बुआ नंदा माई ने उन्हें गोद लिया, और अपने आँचल में पाला।बालक थोड़ा बड़ा हुआ तो बालक की जिद पर नंदा इन्हें लेकर हिमालय की तलहटी में उचित स्थान की तलाश में निकल पड़ी जहाँ बालक अपनी दिव्यता की चमक बिखेर सके। और तलहटी में बसे गाँवों से लीक सीक ग्रहण करता रहे। कई जगह घूमने पर नंदा माई बालक को लेकर शिखर की चोटी में पहुंची तो मूलनारायण ने वहीं रम जाने का निश्चय किया। यह स्थान धरमघर से दस, बारह मील दूर पर्वत की ऊँची चोटी पर स्थित है। समुद्र सतह से इसकी ऊंचाई नौ हजार फिट से भी अधिक है। यह स्थान अत्यंत रमणीक है। चारों ओर हरे भरे वन तथा हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं के अकूत सौन्दर्य को देख बालक ठहर गया।उसने नंदा से कहा, यही मेरी जगह है। ऐसे नैसर्गिक सौन्दर्य से भरपूर स्थल पर मूलनारायण ने अपना ठिकाना सोचा। कहते हैं कि यहाँ आकर मूलनारायण को प्यास लगी। नंदा माई पानी की तलाश में निकली किन्तु उस चोटी में कहीं पानी सुलभ नहीं हुआ। तब मूलनारायण ने एक फल उस चोटी से फेंका। जो दूर जहाँ आज बिंवर है, जाकर गिरा।तब वहाँ से पानी लेकर प्यास बुझाई। इस बीच नंदा माई के सात हिम तुमड़े ( जिनसे उस हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और औलावृष्टि हुआ करती थी।), में से छः तुमड़े बालक मूलनारायण ने खेल खेल में तोड़ डाले। एक ही बचा रह गया। नंदा माई ने यह सब देखा तो नाराज होने लगी। नंदा को नाराज होते देख मूलनारायण ने कहा एक ही तुमड़ा काफ़ी है। सात तुमड़े रहेंगे तो मुझे क्या मिलेगा। सारे गाँव में ओलावृष्टि हुई तो मैं यहाँ बैठकर किसकी लीक सीक पाऊंगा। नंदा के जाने के बाद मूलनारायण ने सोचा यहाँ रहना है तो कुछ चमत्कार करना होगा। उस समय वहाँ सुनपति शौका अपनी बकरियों संग पड़ाव डाले हुए था। बाल मूल नारायण ने कहा, यह जगह छोड़ दे। यहाँ अब मैं अपना आसन जमाऊंगा। सुनपति शौका ने इसे परिहास माना और वहीं डटे रहा। फलस्वरूप उसकी सारी बकरियां पत्थर हो गई और बकरियों के पीठ पर सामान ढोने के लिए रखे करबछ का ढेर भी पत्थर में बदल गया। तब सुनपति शौका ने क्षमा याचना की। सुनपति शौका के रुदन को देख बालक मूल नारायण ने कहा, सुनो, तुम अभी जोहार मुनस्यारी चले जाओ तुम्हे अपनी सारी बकरियां वहीं मिलेंगी। परन्तु करबछ का ढेर जिसमें सुनपति शौका की संपत्ति सोना चांदी कुछ नहीं मिला। आज भी शिखर में उसी करबछ से बने लिंग की पूजा की जाती है। @ मोहन पाठक