महेश्वर उनियाल उत्तराखंडी 21 Jun 2026 कहानियाँ समाजिक #कर्ज में पिघलती #पीढ़ियां 3214 0 Hindi :: हिंदी
कहानी #कर्ज में पिघलती पीढ़ियां” दुनिया आज 21वीं सदी में प्रवेश कर चुकी हैं या यूं कहूं कि 21वीं सदी में चल रही है जिसका अर्थ है कि एक नए विश्व का जन्म हो चुका है जहां पर विज्ञान का एकछत्र राज कायम है और हो भी क्यों ना नई खोजों और आविष्कारों ने संपूर्ण विश्व को एक हथेली पर लाकर खड़ा कर दिया है इसको विकास के चरमोत्कर्ष का युग कहा जाए या फिर मानव सभ्यता के विनाश का निकटवर्ती रूप इस कहानी में इस प्रकार की भूमिका इसलिए बताई जा रही है कि जो विकास और उन्नति की तस्वीर हम मस्तिष्क में लिए बैठे हैं क्या वह वास्तविकता है अथवा क्या वही तस्वीर भारत के उन ग्रामीण व विकास रहित क्षेत्रों की भी है जहां आज भी जाति धर्म अंधविश्वास व दास प्रथा का युग प्रचलित हैl यद्यपि कहने को तो दुनिया में आज दास प्रथा का अंत हो चुका है किंतु जो कहानी मैं आपको बताने जा रहा हूं तो क्या यह दास प्रथा नहीं है या वर्ग भेद या यूं कहूं कि कार्ल मार्क्स के वर्ग संघर्ष का ही एक उदाहरण नहीं है l जी हां मैं एक छोटे से गांव का रहने वाला हूं जहां पर कई जाति व धर्मों के 100 परिवार निवास करते हैं कहने को तो गांव एक खुशहाल व संपन्न दिखता है किंतु कुछ ऐसी सामाजिक व आर्थिक असमानताएं हैं जिनके चलते लोग अलग-अलग वर्गों एवं मान्यताओं में बटे हुए हैं जब मैं थोड़ा समझदार होने लगा तभी मैंने अपने गांव के सबसे अमीर या गांव की भाषा में कहा जाए तो मालदार अथवा शक्तिशाली व्यक्ति के घर पर एक व्यक्ति को खेतों में हल चलाता व घर के अन्य काम करता हुआ देखा जो शायद कभी आराम तक नहीं करता था पहले तो मुझे लगा कि यह व्यक्ति सेठ जी के घर का ही कोई सदस्य होगा किंतु उसके कपड़े व रहन-सहन बहुत ही अजीब और सेठ जी के परिवार वालों से तो बिल्कुल अलग ही था और तो और यहां तक कि उसे आंगन में ही एक छप्पर के अंदर सोना पड़ता था घर के भीतर उसका आना जाना वर्जित था वो इसलिए कि शायद वह किसी दलित या निम्न जाति से ताल्लुक रखता था जो गांव में अमूमन देखने को मिलता है गधे की भांति रात दिन काम करने के बावजूद भी उस बेचारे व्यक्ति की कोई खबर तक नहीं लेता था यह सब चीजें मेरे सामने थी किंतु मेरे अंदर इतनी समझ नहीं थी कि मैं उससे पूछ सकूं कि आपका सेठ जी से क्या रिश्ता है पर हां हम बच्चे मजाक में कभी-कभी उसको कल्लू मौसा कहकर बुलाते थे क्योंकि वह भी हमसे, हमसे क्या सभी से हंसी मजाक किया करता था l कुछ समय बाद सेठ जी के घर एक कमजोर सा दिखने वाला लगभग 15 या 16 साल का लड़का कल्लू जी की जगह खेत में हल चलाता हुआ दिखाई दिया मुझे लगा कि शायद कोई बच्चा ऐसे ही मस्ती में काम कर रहा होगा किंतु कुछ देर बाद वही लड़का सेठ जी के घर पर उस छप्पर के नीचे से बाहर निकलता है जहां पर कल्लू जी रहते थे अब हर रोज वही 15-16 साल का लड़का जून-जुलाई की झुलसती हुई गर्मी में सेठ जी के घर का सब काम करता हुआ दिखाई देने लगा इस वक्त मैं भी शायद स्कूल की पढ़ाई पूरी कर कॉलेज जाने लगा था और गर्मियों की छुट्टी में गांव आया हुआ था फिर अचानक मैं एक दिन सेठ जी के घर के बगल से गुजर रहा था क्योंकि गांव के शिव मंदिर और खेल के मैदान का रास्ता सेठ जी के घर से ही होकर गुजरता था l अचानक मेरी नजर उस लड़के पर पड़ी जो गौशाला से गोबर बाहर निकाल रहा था I अब उसकी उम्र करीब 19 या 20 वर्ष की हो गई होगी जो मुझे अब पहले से और कमजोर और निराश दिखाई दे रहा था तभी एकाएक मेरे दिमाग में एक सवाल उछलने लगा, कि आज मैं इस लड़के से कुछ बातें कर लेता हूं जैसे यह कौन है और क्यों इतना निराश व हताश दिखाई दे रहा है मैंने उस लड़के की ओर चलना शुरू कर दिया जैसे ही मैं उसके नजदीक पहुंचा तो वह लड़का डरा हुआ सा महसूस करने लगा ऐसा लग रहा था कि मानो उसकी निगाहें सेठ जी के परिवार वालों से खुद को छुपा रही हो, मैं समझ तो गया कि वह असहज महसूस कर रहा है किंतु मैं भी हिम्मत करके उसके पास जाकर उसको, -दोस्त कैसे हो ? करके बोलना शुरू किया मेरे यह सब बोलने पर वह मेरी तरफ ऐसे देखने लगा कि मानो वह अपना बचपन मेरे अंदर महसूस कर रहा हो क्योंकि मैं स्वतंत्र रूप से घूम रहा था और उसी उम्र में वह दास्तां की जंजीरों में बंद था मैंने फिर पूछा, “भाई आपका क्या नाम है, तो उसने डरते हुए कहा – सुजल ll फिर मैंने उससे वहां काम करने का कारण पूछा तो उसकी आंखों से टिप टिप करके आंसू टपकने लगे जैसे तैसे खुद को संभालते हुए उसने जो बात कही उसको सुनते ही मेरे दिलो-दिमाग में मानो एक सुनामी सी आ गई उसने कहा- “मेरे दादाजी ने बहुत पहले सेठ जी के घर से ब्याज पर कुछ कर्ज लिया था जिसको वह समय पर लौटा नहीं पाए थे जिस कारण मेरे दादाजी को ब्याज का पैसा चुकाने के लिए सेठ के घर नौकरी करनी पड़ी जो हर वर्ष केवल ब्याज के बराबर की हमारी तनख्वाह बैठती है और मूलधन अभी भी शेष रह जाता है, मेरे दादाजी के बाद मेरे पिताजी ने भी इसी परंपरा के तहत नौकरी की किंतु मेरे पिताजी की अचानक मौत हो जाने के कारण सेठ जी के शेष पैसों को चुकाने के लिए मजबूरी वश मुझे भी नौकरी करनी पड़ रही है जबकि मेरे घर पर मेरी मां और दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है और अब न जाने कब तक मुझे यहां पर दास बनकर सेठ जी की नौकरी करनी पड़ेगी, जबकि यह हमारी तीसरी पीढ़ी है l उस लड़के की दर्द भरी दास्तां को सुनकर मैं भी अपने आंसू रोक न सका , तभी मैंने अपने एक दोस्त, जो इस क्षेत्र में एक एनजीओ चलाते हैं को फोन कर सूचना दी जिसकी मदद से वह लड़का उस गुलामी की जंजीरों से मुक्त हो सका और अपने परिवार के साथ स्वतंत्र रूप से जीवन जीने लगा l धन्यवाद l लेखक- महेश्वर उनियाल उत्तराखण्डी ।