DINESH KUMAR KEER 08 May 2023 कहानियाँ समाजिक 43875 0 Hindi :: हिंदी
गाँव की छोरी पहली बार इन्हें गाँव से शहर लाया । ये शहर देख कर आष्चर्यचकित थीं और मैं इनकी ख़ुशी को देख कर एकदम चित । मैं ढाल रहा था इन्हें जीवन शैली में और ये ढल रहीं थी बिना किसी आर्गुमेंट के । पर हाँ , सवाल तो थे ही , ये क्या , वो क्यूँ , ऐसा क्यूँ ... हमारे गाँव मे तो..! इनकी सारी दुनिया इनके गाँव की चकबंदी के अंदर ही सिमट गई थी । मेरी बातों को ध्यान से सुनती तब एक हाथ अपने गाल पर टिका कर बैठ जाती और मैं दोनों डिंपल्स में जाता ...फंस । इन्हें गहनों से मोह था और मुझे उस मोह से । एक दिन पता नही क्यूँ , इन्होंने पूछा ," अपने सूरज के चारो तरफ कौन घूमता है !?". मैंने कहा .. हमारी धरती , मंगल , शनि , गुरु .. नौ ग्रह , वही जिनका शांति यज्ञ करवाते हैं तुम्हार गाँव मे ..! इनका अगला प्रश्न , " और पूरी दुनिया किसके चारो तरफ घूमती है ?".. अब मैं चकरा गया ये तो वाक़ई पता नही था मुझे भी । ये जोर जोर से हँसने लगीं , " आपको इत्ती सी बात नही पता ! " इनको हँसते देख मैं भी हँसने लगा पूछा " मुझे सच मे नही मालूम , बताओ ?" इन्होंने हाथ फैलाये और गोल गोल घूमते हुए बोलीं " अरे ये अपना घर ! " मैं देखता ही रह गया । कमाल है ! दुनिया कितनी ही बड़ी क्यूँ न हो उसका केंद्र , परिधि और उसकी हद क्या और कितनी ? एक वाक्य में मुझे सिखा गयी छोरी ।