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आवाज़ नंबर 19 (भाग:1) This post in Under Review

Vinod 04 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 2652 0 Hindi :: हिंदी

भाग 1: वह आवाज़ जो मर चुकी थी

जब मीरा ने अपने पिता की आवाज़ पहली बार सुनी, तब उन्हें मरे हुए अठारह साल हो चुके थे।

कमरे में सिर्फ एक टेबल-लैंप जल रहा था। बाहर नोएडा की ऊँची इमारतों पर बारिश ऐसे गिर रही थी जैसे आसमान अपनी सारी पुरानी बातें एक साथ याद कर बैठा हो। लैपटॉप की स्क्रीन पर ऑडियो वेवफॉर्म नीली लकीरों की तरह काँप रही थी। हेडफोन मीरा के कानों पर कसकर चढ़े थे। उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर रुकी हुई थीं।

रिकॉर्डिंग में पहले खरखराहट आई।

फिर कोई साँस।

फिर एक आदमी की आवाज़।

“मीरा…”

उसका नाम इतना साफ़ बोला गया कि मीरा की रीढ़ में बर्फ उतर गई।

उसने झटके से हेडफोन उतार दिए।

कमरा फिर से चुप हो गया।

दीवार पर लगी घड़ी ने रात के दो बजाए। किचन में रखा फ्रिज हल्की घरघराहट कर रहा था। खिड़की के शीशे पर बारिश की बूँदें फिसल रही थीं। सब कुछ सामान्य था। बस मीरा सामान्य नहीं थी।

उसने काँपते हाथ से स्क्रीन पर फाइल का नाम देखा—
**VOICE_19_अंतिम_बयान.wav**

फाइल उसे शाम को मिली थी। एक पुराने भूरे लिफाफे में। लिफाफे पर कोई भेजने वाले का नाम नहीं था। बस मोटे काले मार्कर से लिखा था—

**मीरा अवस्थी के लिए। अकेले सुनना।**

नीचे छोटे अक्षरों में एक लाइन और थी—

**जिसे तुमने खोया है, वह शायद कभी मरा ही नहीं।**

मीरा ने उस लाइन को शाम से अब तक करीब सौ बार पढ़ा था। हर बार उसे लगा था कि किसी ने घटिया मज़ाक किया है। कोई ऐसा मज़ाक जो कानूनन अपराध होना चाहिए। कोई ऐसा मज़ाक जो इंसान की पसलियों के अंदर हाथ डालकर उसकी सबसे पुरानी चोट कुरेद दे।

क्योंकि मीरा अवस्थी ने अपने पिता को खोया नहीं था। उसने उन्हें जलते हुए देखा था।

वह पाँच साल की थी।

धुंधली-सी याद थी—बहुत सारे लोग, बहुत सारा धुआँ, माँ की चीख, और एक सफेद चादर के नीचे किसी का शरीर। लोग कह रहे थे, “बेचारी बच्ची… अब तो बाप का साया भी नहीं रहा।” किसी ने उसके सिर पर हाथ फेरा था। किसी ने लड्डू का डिब्बा पकड़ा दिया था, जैसे मौत के बाद घर में मिठाई का डिब्बा देना किसी परंपरा का हिस्सा हो।

मीरा को उस दिन बस इतना याद था कि माँ ने पहली बार उसे बहुत ज़ोर से सीने से लगाया था। इतना ज़ोर से कि उसे साँस लेने में दिक्कत हुई थी।

और अब अठारह साल बाद, कोई आवाज़ कह रही थी—मीरा।

बिल्कुल वैसे जैसे बचपन की एकमात्र बची हुई याद में उसके पिता उसे पुकारते थे।

“मी…रा… मेरी छोटी रेडियो।”

मीरा ने आँखें बंद कीं।

नहीं। यह संभव नहीं था।

उसके पिता, अरविंद अवस्थी, एक स्थानीय पत्रकार थे। कानपुर के पास के कस्बे मझगवाँ में उनका छोटा-सा अखबार था—**जन-खिड़की**। लोग कहते थे, बहुत ईमानदार आदमी थे। और ईमानदार आदमी छोटे कस्बों में ज्यादा दिन आराम से नहीं जीते। एक रात उनके ऑफिस में आग लगी। अगली सुबह उनकी जली हुई लाश मिली। पुलिस ने कहा—शॉर्ट सर्किट। माँ ने कहा—किस्मत। नानी ने कहा—चुप रहो, बच्ची है।

मीरा ने धीरे से हेडफोन फिर कानों पर लगाए।

कर्सर वहीं रुका था। आवाज़ के बाद लंबा सन्नाटा था। उसने प्ले दबाया।

खरखराहट।

फिर वही आदमी।

“मीरा… अगर यह आवाज़ तुम तक पहुँच गई है, तो इसका मतलब है कि किसी ने अपना वादा निभाया। और अगर तुम यह सुन रही हो… तो मेरी बच्ची, सबसे पहले मुझसे नफ़रत कर लेना। क्योंकि जो मैं बताने जा रहा हूँ, उसे सुनकर तुम मुझे माफ़ नहीं कर पाओगी।”

मीरा के होंठ खुल गए। पर आवाज़ नहीं निकली।

रिकॉर्डिंग में कागज़ हिलने की आवाज़ आई। जैसे कोई आदमी किसी बंद कमरे में बैठकर जल्दी-जल्दी कुछ पढ़ रहा हो। दूर कहीं पंखा घूम रहा था। बीच-बीच में हल्की खाँसी।

“तुम्हारी माँ को मत दोष देना। उसने जो किया, तुम्हें बचाने के लिए किया। मैंने जो किया… शायद सच बचाने के लिए किया। पर सच और परिवार में जब लड़ाई हो, तो जीत किसी की नहीं होती।”

मीरा ने टेबल का किनारा पकड़ लिया।

माँ?

क्यों माँ?

माँ तो इस समय लखनऊ में मौसी के घर थी। पिछले तीन महीने से उनका घुटने का इलाज चल रहा था। रोज़ रात को साढ़े नौ बजे फोन करती थीं। पूछती थीं, “खाना खाया?” और मीरा रोज़ झूठ बोलती थी, “हाँ माँ।” माँ को पता था कि वह झूठ बोल रही है। फिर भी दोनों यही खेल खेलती थीं, क्योंकि प्यार कई बार सच से ज्यादा दयालु झूठ होता है।

रिकॉर्डिंग में आवाज़ आगे बोली—

“उन्नीसवीं आवाज़… यही आखिरी रास्ता है। बाकी अठारह या तो गुम हो गईं, या गुम कर दी गईं। अगर तुम्हें सब जानना है तो मझगवाँ आना पड़ेगा। पुराने पोस्ट ऑफिस के पीछे जो नीम का पेड़ है, उसके नीचे…”

अचानक आवाज़ कट गई।

कान फाड़ देने वाली चीख जैसी इलेक्ट्रॉनिक खड़खड़ाहट आई।

मीरा ने दर्द से हेडफोन उतारकर टेबल पर फेंक दिए।

उसका दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे वह भागकर आई हो। उसने स्क्रीन पर फाइल की लंबाई देखी—दो मिनट चौवन सेकंड। पर प्लेयर पर रिकॉर्डिंग सिर्फ एक मिनट अड़तालीस सेकंड तक ही साफ़ थी। बाकी हिस्सा किसी ने जानबूझकर खराब किया था। या बहुत पुरानी टेप से रिकवर करते समय बिगड़ गया था।

मीरा ने कुर्सी पीछे खिसकाई और उठकर खिड़की तक गई। सत्रहवीं मंज़िल से नीचे शहर छोटा और नकली लगता था। सड़क पर पानी भरा था। एक डिलीवरी बॉय बारिश में भीगता हुआ गेट के बाहर गार्ड से बहस कर रहा था। सामने वाले टॉवर में किसी फ्लैट की बालकनी में कपड़े अभी तक टँगे थे। किसी के घर की लाइट जल रही थी। किसी के घर में रात अभी खत्म नहीं हुई थी।

मीरा ने हथेली खिड़की पर रखी। शीशा ठंडा था।

“पापा…” उसके मुँह से बहुत धीरे निकला।

यह शब्द उसने सालों से नहीं बोला था। बचपन में बोलती थी। फिर स्कूल में जब फादर्स डे कार्ड बनता था, तब चुप हो जाती थी। कॉलेज में जब दोस्त अपने पापा से पैसे माँगते हुए परेशान होते थे, तब उसे अजीब ईर्ष्या होती थी। नौकरी लगी तो पहला ऑफर लेटर माँ को भेजा, पर मन में कहीं लगा कि कोई आदमी होता जो कहता—“शाबाश, मेरी रेडियो।”

उसने तुरंत खुद को डाँटा।

नहीं। भावुक मत बन।

वह ऑडियो प्रोड्यूसर थी। आवाज़ों के साथ रोज़ काम करती थी। नकली आवाज़ें, एआई वॉइस क्लोन, पुरानी रिकॉर्डिंग, पॉडकास्ट, डॉक्यूमेंट्री—सब पहचानती थी। यह 2026 है। किसी की भी आवाज़ बनाई जा सकती है। किसी का भी चेहरा बोलता हुआ दिखाया जा सकता है। दुनिया सच की नहीं, एडिटिंग की हो चुकी है।

पर एक समस्या थी।

इस आवाज़ में जो टूटी हुई साँस थी, जो बीच में “मेरी बच्ची” कहते समय हल्का-सा गला भर आया था—वह नकली नहीं लग रही थी।

या शायद वह चाहती थी कि वह नकली न हो।

मोबाइल बजा।

स्क्रीन पर नाम चमका—**कबीर ऑफिस**।

मीरा ने फोन उठाया। “क्या है?”

उधर से नींद में डूबी, मगर फिर भी चुलबुली आवाज़ आई, “मैडम, इतनी मिठास? रात के दो बजे फोन किया और सामने से बरसात के साथ गाली नहीं आई। सब ठीक है?”

“तू सोया नहीं?”

“हम गरीब लोग हैं। फ्रीलांस एडिटर। नींद अमीरों के लिए होती है। तूने जो क्राइम-पॉडकास्ट वाला एपिसोड भेजा था, उसका बैकग्राउंड स्कोर फाइनल कर रहा था। लेकिन तू जाग क्यों रही है?”

मीरा ने जवाब नहीं दिया।

कबीर की आवाज़ थोड़ी गंभीर हुई। “मीरा?”

“मुझे एक फाइल मिली है।”

“ऑडियो?”

“हाँ।”

“भूत की है क्या?”

मीरा चुप रही।

कबीर हँसते-हँसते रुक गया। “अरे… सच में?”

“आवाज़ पापा की लग रही है।”

फोन के उस पार कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई। कबीर ऐसा लड़का था जो सन्नाटे से डरता था, इसलिए हर खाली जगह में मज़ाक भर देता था। पर इस बार उसने मज़ाक नहीं किया।

“तेरे पापा?” उसने धीरे से पूछा।

“हाँ।”

“लेकिन…”

“मुझे पता है।”

“तू अकेली है?”

“हाँ।”

“फाइल भेज।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“लिफाफे पर लिखा था अकेले सुनना।”

“और तूने मान लिया? वाह। किसी ने लिखा होता ‘छत से कूद जाओ’ तो वो भी मान लेती?”

“कबीर, प्लीज।”

कबीर ने गहरी साँस छोड़ी। “ठीक है। सुन—सबसे पहले फाइल का मेटाडेटा चेक कर। ओरिजिन, बिटरेट, डेट, जो भी मिले। अगर एआई क्लोन है तो कुछ न कुछ पकड़ में आएगा। और हाँ, फोन पर मत भेजना अगर कोई सीरियस मामला है। कल ऑफिस आ, मेरे सिस्टम पर देखते हैं।”

“कल रविवार है।”

“तो? सच रविवार को छुट्टी पर जाता है क्या?”

मीरा ने पहली बार हल्की-सी साँस छोड़ी, जो हँसी जैसी लग सकती थी। “तू इतनी रात को भी फ़िल्मी क्यों बोलता है?”

“क्योंकि मेरी जिंदगी में बजट नहीं है, पर डायलॉग हैं।” फिर वह रुका। “मीरा, एक बात बोलूँ?”

“हम्म।”

“माँ को अभी मत बताना।”

मीरा ने आँखें बंद कीं। “रिकॉर्डिंग में माँ का जिक्र है।”

“तभी तो मत बताना। पहले समझ लेते हैं। हो सकता है किसी ने तुम्हें टारगेट किया हो। तू अब छोटे-मोटे पॉडकास्ट नहीं करती। तुम्हारी कंपनी ने पिछले महीने जो अवैध खनन वाली सीरीज निकाली थी, उसके बाद धमकियाँ आई थीं न?”

“वो पर्सनल नहीं था।”

“इस देश में सच से ज्यादा पर्सनल कोई चीज़ नहीं होती, मैडम।”

कबीर की यह बात कमरे में रुक गई।

मीरा ने खिड़की से नीचे देखा। डिलीवरी बॉय जा चुका था। गार्ड अपनी कुर्सी पर बैठ गया था। शहर सोने का नाटक कर रहा था।

“कबीर,” उसने कहा, “रिकॉर्डिंग में मझगवाँ आने को कहा है।”

“कहाँ?”

“मझगवाँ। मेरा पुराना कस्बा।”

“जहाँ तेरे पापा…”

“हाँ।”

“तू जाएगी?”

मीरा ने जवाब देने में देर कर दी।

कबीर ने खुद ही कहा, “तू जाएगी। क्योंकि तू वही है जो ‘मत खोलो’ लिखा हो तो पहले वही दरवाजा खोलती है।”

मीरा ने फोन काटने से पहले बस इतना कहा, “कल सुबह मिल।”

“मीरा?”

“हाँ?”

“दरवाज़ा लॉक कर। और फाइल की कॉपी बना ले। तीन जगह। एक पेन ड्राइव, एक क्लाउड, एक ऑफलाइन ड्राइव। हॉरर फिल्म की हीरोइन मत बनना।”

“शट अप।”

“यही सुनना था। अब लग रहा है तू ठीक है।”

फोन कट गया।

मीरा ने लैपटॉप पर फाइल की तीन कॉपी बनाईं। फिर उसने लिफाफे को उठाकर दोबारा देखा। भूरे कागज़ पर बारिश की हल्की नमी आ गई थी। शायद कूरियर वाले के बैग में भीगा होगा। अंदर एक छोटी-सी पेन ड्राइव थी, काली। कोई ब्रांड नहीं। कोई निशान नहीं। बस सफेद नेलपॉलिश या पेंट से एक छोटा-सा अंक लिखा था—**19**।

मीरा ने पेन ड्राइव हथेली में घुमाई।

उन्नीसवीं आवाज़।

बाकी अठारह?

और “गुम कर दी गईं” का क्या मतलब?

अचानक दरवाज़े की घंटी बजी।

मीरा का शरीर जम गया।

रात के दो बजकर चौदह मिनट।

घंटी फिर बजी।

इस बार लंबी।

उसने धीरे से लैपटॉप बंद किया। कमरे की लाइट बंद कर दी। सिर्फ टेबल लैंप जल रहा था। वह नंगे पाँव दरवाज़े तक गई। लकड़ी के फर्श पर उसके कदमों की आवाज़ उसे बहुत तेज़ लग रही थी।

पीपहोल से बाहर देखा।

कोई नहीं था।

कॉरिडोर खाली था। सफेद ट्यूबलाइट झपक रही थी। सामने वाली दीवार पर फायर-एक्सटिंग्विशर लगा था। लिफ्ट के पास कैमरे की लाल बत्ती जल रही थी।

मीरा ने साँस रोके रखी।

तभी नीचे से कुछ सरकने की आवाज़ आई।

दरवाज़े के नीचे की पतली जगह से एक कागज़ अंदर धकेला गया था।

मीरा पीछे हट गई।

कागज़ आधा अंदर, आधा बाहर अटका था। कुछ सेकंड वह उसे देखती रही। फिर झुककर उठाया।

वह एक पुरानी फोटो थी।

ब्लैक-एंड-व्हाइट नहीं, पर रंग इतने उड़ चुके थे कि चेहरों पर वक्त की धूल जमा लगती थी। फोटो में पाँच आदमी खड़े थे। पीछे वही पुराना नीम का पेड़ था जिसके नीचे बचपन में मीरा ने कई बार झूला झूला था। एक आदमी को उसने तुरंत पहचान लिया—पापा। दुबला चेहरा, गहरी आँखें, हल्की मुस्कान। उनके बगल में एक औरत खड़ी थी।

मीरा का दिल अटक गया।

वह माँ थी।

पर माँ वैसी नहीं लग रही थी जैसी मीरा ने पुराने एल्बमों में देखी थी। यहाँ माँ के चेहरे पर डर था। जैसे फोटो खिंचवाते समय भी वह किसी को देख रही हो जो कैमरे के बाहर खड़ा है।

फोटो के पीछे नीली स्याही से लिखा था—

**अगर आवाज़ सुन ली है, तो सुबह तक यहाँ मत रुकना।**

नीचे एक और लाइन—

**तुम्हारे पिता अकेले नहीं मरे थे।**

मीरा को लगा, कमरे की हवा किसी ने खींच ली है।

वह तुरंत पीपहोल तक गई। कॉरिडोर अब भी खाली था। उसने दरवाज़ा खोलने की हिम्मत नहीं की। मोबाइल उठाकर सिक्योरिटी को फोन मिलाया। दो बार घंटी गई, तीसरी बार गार्ड ने उठाया।

“मैडम?”

“मेरे फ्लोर पर कोई आया था अभी?”

“नहीं मैडम। कोई एंट्री नहीं है।”

“सीसीटीवी चेक करो। अभी। मेरे दरवाज़े के बाहर कोई था।”

“मैडम, रात में सुपरवाइजर नहीं है। सुबह—”

“अभी चेक करो!” उसकी आवाज़ इतनी तेज़ निकली कि वह खुद चौंक गई।

गार्ड चुप हो गया। “ठीक है मैडम। देखता हूँ।”

मीरा ने फोन रखा और पीठ दरवाज़े से लगा ली। उसकी नज़र फोटो पर थी। पापा, माँ, तीन अनजान आदमी और नीम का पेड़।

पुराना पोस्ट ऑफिस।

मझगवाँ।

वह जगह जहाँ वह कभी वापस नहीं जाना चाहती थी।

उसने माँ को फोन लगाने के लिए मोबाइल उठाया, फिर रुक गई। कबीर की बात याद आई—माँ को अभी मत बताना।

पर रिकॉर्डिंग में पापा ने कहा था—माँ को दोष मत देना।

दोष किस बात का?

मीरा ने व्हाट्सऐप खोला। माँ की डीपी में वे तुलसी के पौधे के पास बैठी थीं। माथे पर हल्की बिंदी, बालों में सफेदी, चेहरे पर वही थकान जो भारतीय माँओं के चेहरे पर उम्र से पहले उतर आती है। मीरा की उँगली कॉल बटन पर रुकी रही।

फिर उसने फोन नीचे रख दिया।

कमरे में अचानक बहुत ठंड लगने लगी।

सुबह तक यहाँ मत रुकना।

वह इस चेतावनी को पागलपन मान सकती थी। पुलिस को फोन कर सकती थी। कबीर को बुला सकती थी। पर अंदर कहीं एक बच्ची थी जो अठारह साल से एक ही सवाल लेकर बैठी थी—पापा सच में कैसे मरे थे?

उस बच्ची ने पहली बार सिर उठाया।

मीरा ने अलमारी खोली। एक बैकपैक निकाला। दो जींस, तीन टी-शर्ट, लैपटॉप चार्जर, हार्ड ड्राइव, पेन ड्राइव, फोटो, लिफाफा। उसने पर्स से आधार कार्ड, कुछ कैश और माँ की पुरानी चाभियों का गुच्छा उठाया। गुच्छे में एक छोटी जंग लगी चाबी थी, जिसे माँ हमेशा संभालकर रखती थीं। कहती थीं, “पुराने घर की है। किसी दिन काम आ जाएगी।”

उस “किसी दिन” ने शायद दरवाज़ा खटखटा दिया था।

साढ़े तीन बजे तक मीरा नीचे पार्किंग में थी। बारिश धीमी हो गई थी। कार स्टार्ट करते समय उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने खुद को आईने में देखा। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे, बाल बेतरतीब, होंठ सूखे। पर आँखों में डर के साथ एक अजीब-सी जिद थी।

उसने कबीर को मैसेज किया—

**मझगवाँ जा रही हूँ। फाइल की कॉपी ड्राइव पर है। लिंक मेल में भेज दिया। अगर 24 घंटे तक मेरा फोन बंद मिले तो पुलिस नहीं, पहले माँ को कॉल करना।**

कुछ ही सेकंड में कबीर का कॉल आ गया।

मीरा ने नहीं उठाया।

दूसरी बार कॉल।

नहीं उठाया।

तीसरी बार मैसेज आया—

**पागल मत बन। लोकेशन ऑन रख। मैं भी आ रहा हूँ।**

मीरा ने कार गेट से बाहर निकाली। सड़क खाली थी। बारिश से धुली नोएडा की सड़कों पर स्ट्रीट लाइट के पीले घेरे तैर रहे थे। उसने नेविगेशन में लोकेशन डाली—**मझगवाँ पुराना पोस्ट ऑफिस**।

दूरी—चार सौ बयालीस किलोमीटर।

समय—आठ घंटे तीस मिनट।

मीरा ने इंजन की आवाज़ के ऊपर खुद से कहा, “बस जाकर देखना है। कुछ नहीं होगा।”

पर उसे पता था, कुछ न कुछ हो चुका था।

कई साल पहले।

और शायद आज फिर होने वाला था।

सुबह छह बजे, यमुना एक्सप्रेसवे पर आसमान हल्का नीला होने लगा। बादलों की लंबी कतार खेतों के ऊपर तनी थी। सड़क के दोनों ओर बारिश से भीगे पेड़ भागते हुए लग रहे थे। मीरा ने तीन कप कड़क चाय पी ली थी, फिर भी आँखें भारी थीं। उसने कार का शीशा थोड़ा नीचे किया। हवा अंदर आई, ठंडी और मिट्टी की गंध से भरी।

मोबाइल लगातार वाइब्रेट हो रहा था। कबीर। कबीर। कबीर।

फिर माँ का नाम चमका।

मीरा का दिल धक से हुआ।

उसने कॉल उठाया।

“हलो माँ।”

“तू ठीक है?” माँ की आवाज़ में नींद नहीं थी। डर था।

“हाँ। क्यों?”

“कहाँ है तू?”

मीरा ने झूठ बोलने से पहले एक सेकंड लिया। वही एक सेकंड माँ को सब बता गया।

“मीरा,” माँ की आवाज़ काँपी, “तू मझगवाँ जा रही है?”

कार हल्का-सा डगमगाई। मीरा ने स्टीयरिंग कसकर पकड़ा।

“आपको कैसे पता?”

फोन के उस पार माँ की साँस भारी हो गई। जैसे वे बैठ गई हों। या गिरते-गिरते बची हों।

“वापस आ जा।”

“क्यों?”

“बस वापस आ जा।”

“क्यों माँ?” मीरा की आवाज़ ऊँची हो गई। “मुझे एक रिकॉर्डिंग मिली है। पापा की आवाज़ है उसमें। फोटो मिली है। उसमें आप हैं। पापा हैं। और कोई लिखकर गया है कि पापा अकेले नहीं मरे थे। आप मुझे क्या छिपा रही हैं?”

माँ चुप।

“माँ!”

“जिसने तुझे वो रिकॉर्डिंग भेजी है,” माँ ने बहुत धीमे कहा, “वो चाहता है कि तू वही गलती करे जो तेरे पिता ने की थी।”

“कौन?”

“मैं नहीं बता सकती।”

“आप हमेशा यही कहती हैं—नहीं बता सकती। मैं बच्ची नहीं हूँ।”

“मेरे लिए तू अभी भी वही पाँच साल की बच्ची है जो आग के सामने खड़ी रो रही थी।”

मीरा की आँखें भर आईं, पर उसने आवाज़ कठोर रखी। “तो फिर सच बताइए।”

माँ की आवाज़ अब फुसफुसाहट थी। “सच जानना आसान है, मीरा। सच के बाद जीना मुश्किल है।”

“मैं आ रही हूँ।”

“नहीं!” माँ लगभग चीखीं। “मझगवाँ मत जाना। पुराने पोस्ट ऑफिस के पास तो बिल्कुल मत जाना।”

“क्यों?”

माँ ने जवाब नहीं दिया।

फिर धीरे से बोलीं, “तेरे पिता मरे नहीं थे उस रात।”

मीरा ने ब्रेक पर पैर रख दिया। कार सड़क किनारे चीखती हुई रुकी। पीछे से एक ट्रक हॉर्न बजाता हुआ निकला। उसकी तेज़ हवा से कार काँप गई।

मीरा की पकड़ मोबाइल पर ढीली हो गई।

“क्या?”

माँ रो रही थीं। पर उनकी रोने की आवाज़ भी दबाई हुई थी, जैसे आसपास कोई सुन लेगा।

“वो उस रात जिंदा थे। मैंने उन्हें देखा था।”

“तो… तो लाश किसकी थी?”

लंबा सन्नाटा।

इतना लंबा कि मीरा को लगा कॉल कट गया।

फिर माँ ने कहा—

“यही तो बात है, मीरा। हमें आज तक नहीं पता।”

मीरा की साँसें टूटने लगीं। सामने एक्सप्रेसवे लंबा और सुनसान था। सूरज बादलों के पीछे से निकलने की कोशिश कर रहा था। दुनिया में सुबह हो रही थी, पर मीरा के अंदर रात और गहरी हो गई थी।

“माँ, पापा कहाँ हैं?”

“पता नहीं।”

“झूठ।”

“काश झूठ होता।”

“आपने पुलिस को क्यों नहीं बताया?”

माँ हँसीं। वह हँसी नहीं थी, सूखी हुई चीख थी। “कौन-सी पुलिस? वही पुलिस जिसने कहा था शॉर्ट सर्किट? वही थाना जहाँ तेरे पिता ने आखिरी रिपोर्ट लिखी थी?”

“कौन-सी रिपोर्ट?”

“मीरा, वापस आ जा। मैं सब बताऊँगी। कसम से सब बताऊँगी। बस वहाँ मत जा।”

“अब तो वहीं जाऊँगी।”

“बेटा—”

“नहीं माँ। अठारह साल आपने मुझे अँधेरे में रखा। अब अगर रोशनी डरावनी है, तो भी देखनी पड़ेगी।”

उसने कॉल काट दिया।

कॉल कटते ही उसका फोन फिर बजा। माँ। उसने साइलेंट कर दिया।

कुछ मिनट तक वह कार में बैठी रही। हाथ स्टीयरिंग पर, आँखें सड़क पर, दिमाग रिकॉर्डिंग पर।

तुम्हारे पिता अकेले नहीं मरे थे।

तेरे पिता मरे नहीं थे उस रात।

लाश किसकी थी?

क्यों कोई अठारह साल बाद उसे बुला रहा था?

और सबसे बड़ा सवाल—अगर पापा जिंदा थे, तो कभी वापस क्यों नहीं आए?

दस बजे तक वह मझगवाँ की सीमा में दाखिल हुई।

कस्बा बदल चुका था, पर पूरी तरह नहीं। नई दुकानों के चमकीले बोर्ड पुराने मकानों की झुर्रियों पर चिपके थे। “मॉडर्न हेयर सैलून” के ठीक बगल में वही पान की दुकान थी जहाँ कभी पापा साइकिल रोकते थे। सड़क पर ई-रिक्शा, दूध वाले, स्कूल बस, भैंसें, मोबाइल रिपेयरिंग की दुकानें, और हर तीसरे खंभे पर किसी नेता की मुस्कुराती हुई फोटो।

मीरा ने कार धीमी कर दी।

उसे लगा, कस्बे ने उसे पहचान लिया है।

हर मोड़ से कोई पुरानी याद झाँक रही थी। यहाँ माँ ने उसे पहली बार गोलगप्पा खिलाया था। वहाँ पापा ने उसे रेडियो खरीदकर दिया था। सामने वाली गली में उनका पुराना घर था—शायद अब किसी और का। और सड़क के अंत में था पुराना पोस्ट ऑफिस।

पीली पपड़ी छूटी दीवारें। जंग लगा गेट। टूटी हुई नामपट्टी। उसके पीछे वही नीम का पेड़।

बहुत बड़ा। बहुत बूढ़ा। बहुत चुप।

मीरा ने कार सड़क किनारे रोकी। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे अपने कानों में आवाज़ सुनाई दे रही थी।

वह गेट के अंदर गई।

पोस्ट ऑफिस अब बंद पड़ा था। शायद नया भवन बाज़ार की तरफ बन गया था। बरामदे में धूल जमी थी। दीवारों पर पान की पीक के निशान थे। एक कोने में फटी हुई बोरी पड़ी थी। नीम के पेड़ के नीचे मिट्टी बारिश से गीली थी।

रिकॉर्डिंग में कहा गया था—नीम के पेड़ के नीचे।

क्या? कहाँ?

उसने चारों ओर देखा। कोई नहीं। बस दूर सड़क पर सब्ज़ी वाले की आवाज़ आ रही थी—“आलू ले लो…”

मीरा पेड़ के पास झुकी। जड़ों के बीच मिट्टी थोड़ी उभरी हुई थी। जैसे किसी ने हाल में खोदा हो और फिर दबा दिया हो।

उसने हाथ से मिट्टी हटानी शुरू की। नाखूनों में कीचड़ भर गया। मिट्टी ठंडी थी। दो मिनट बाद उसकी उँगलियाँ किसी धातु से टकराईं।

एक छोटा टिन का डिब्बा।

उसका ढक्कन जंग लगा था। उसने बैग से चाबी का गुच्छा निकाला, चाबी की नोक से ढक्कन उचकाया। अंदर प्लास्टिक में लिपटी एक पुरानी ऑडियो कैसेट थी।

उस पर हाथ से लिखा था—

**आवाज़ 1**

नीचे—

**अरविंद अवस्थी — बयान, तारीख 14 जुलाई 2008**

मीरा की धड़कन रुक गई।

यानी उन्नीसवीं आवाज़ के बाद पहली आवाज़।

यह कोई रिकॉर्डिंग नहीं, पूरी श्रृंखला थी।

उसने कैसेट उठाई ही थी कि पीछे से किसी ने कहा—

“बहुत देर कर दी बिटिया।”

मीरा घूमी।

बरामदे के अंधेरे में एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। सफेद कुर्ता, कंधे पर गमछा, हाथ में लकड़ी की छड़ी। उसकी दाहिनी आँख पर सफेद धुंध जमी थी, बाईं आँख सीधी मीरा पर टिकी थी।

“आप कौन हैं?”

बूढ़ा आगे आया। उसकी चाल धीमी थी, पर आवाज़ साफ़।

“नाम से क्या होगा। तुम्हारे बापू मुझे डाकिया कहते थे।”

मीरा का गला सूख गया। “आपने फाइल भेजी?”

बूढ़े ने सिर हिलाया। “नहीं। मैं तो बस इंतज़ार कर रहा था कि आवाज़ तुझे यहाँ तक खींच लाए।”

“किसने भेजी?”

बूढ़े ने नीम के पेड़ की तरफ देखा। “जिसने भेजी है, वो अब खुलकर खेल रहा है।”

“मुझे सच जानना है।”

“सच?” बूढ़ा हल्का-सा मुस्कुराया। “सच कोई कुएँ का पानी नहीं कि बाल्टी डाली और निकाल लिया। सच दलदल है। पैर रखा तो पूरा आदमी उतरता है।”

“मेरे पिता जिंदा हैं?”

बूढ़े की मुस्कान गायब हो गई।

उसने छड़ी मिट्टी में गाड़ दी। कुछ पल चुप रहा। फिर बोला—

“आखिरी बार जब मैंने अरविंद को देखा था, उसके सीने पर गोली लगी थी। लेकिन वह साँस ले रहा था।”

मीरा के हाथ से टिन का डिब्बा गिरते-गिरते बचा।

“कहाँ?”

बूढ़े ने जवाब देने से पहले चारों ओर देखा। फिर धीरे से कहा—

“यहीं नहीं बता सकता। दीवारों के भी कान होते हैं। और इस कस्बे की दीवारें अठारह साल से किराये पर लगी हैं।”

“किसके?”

बूढ़े ने उसकी आँखों में देखा।

“उन लोगों के, जिनका नाम लेने से लोग आज भी दरवाज़ा बंद कर लेते हैं।”

तभी दूर से मोटरसाइकिलों की आवाज़ आई।

एक नहीं। कई।

बूढ़े का चेहरा पीला पड़ गया। उसने तेजी से कहा, “कैसेट बैग में रख। अभी।”

“लेकिन—”

“अभी!”

मीरा ने कैसेट बैग में डाल ली।

तीन मोटरसाइकिलें पोस्ट ऑफिस के गेट पर आकर रुकीं। चार आदमी उतरे। उनमें से एक ने काला रेनकोट पहना था, जबकि बारिश बंद हो चुकी थी। दूसरे के हाथ में मोबाइल था, जिसमें वह किसी की फोटो देख रहा था।

फोटो शायद मीरा की थी।

बूढ़े ने फुसफुसाकर कहा, “पीछे की दीवार टूटी है। भाग।”

“आप?”

“मैं बूढ़ा हूँ। बूढ़ों को लोग बेकार समझते हैं। यही मेरी ताकत है।”

मीरा ने कदम पीछे किए, पर तभी रेनकोट वाला आदमी ऊँची आवाज़ में बोला—

“मीरा अवस्थी?”

मीरा जम गई।

आदमी मुस्कुराया। “इतनी दूर आ ही गई हो तो खाली हाथ क्यों जाओगी? चलो, कोई तुमसे मिलना चाहता है।”

“कौन?”

आदमी ने मोबाइल कान पर लगाया, फिर स्पीकर ऑन किया।

दूसरी तरफ कुछ सेकंड खरखराहट आई।

फिर वही आवाज़।

वही साँस।

वही आदमी।

“मीरा…”

उसका दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में दबा दिया।

आवाज़ बोली—

“इनके साथ आ जाओ, मेरी बच्ची।”

मीरा की आँखों के सामने नीम का पेड़, पोस्ट ऑफिस, बूढ़ा डाकिया और काले रेनकोट वाला आदमी सब धुँधला पड़ गया।

क्योंकि यह आवाज़ रिकॉर्डिंग नहीं थी।

यह लाइव कॉल थी।

और वह आवाज़ उसके पिता की थी।

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