Vinod 06 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 1026 0 Hindi :: हिंदी
भाग 20: चौथा अंतरा माधवी की आवाज़ कट गई थी, लेकिन उसका आखिरी वाक्य हवा में अटका रहा— “नाम मत पूछना… गीत पूछना…” मौन सराय के आँगन में सब कुछ कुछ देर के लिए स्थिर हो गया। न गंगा की आवाज़ सुनाई दी। न दूर पुलिस की। न जलते गोदाम की बची हुई गंध। सिर्फ वह वाक्य, जैसे किसी ने अदृश्य चाक से हवा पर लिख दिया हो। नाम मत पूछना। गीत पूछना। अदिति राणा ने फोन को इतनी कसकर पकड़ा हुआ था कि उनकी उँगलियों के जोड़ सफेद पड़ गए। उनका चेहरा अधिकारी का भी था, बहन का भी, और उस इंसान का भी जिसने अभी-अभी उम्मीद को फिर से चोट खाते देखा हो। “वह जिंदा है,” उन्होंने धीरे से कहा। किसी ने तुरंत उन्हें रोका नहीं। कोई यह नहीं बोला कि आवाज़ नकली हो सकती है। कोई यह नहीं बोला कि ईशान जैसे आदमी माधवी की आवाज़ बना सकते हैं। क्योंकि उस आवाज़ में एक चीज़ थी जिसे नकली बनाना आसान नहीं था—साँस। वह हल्की अटकी हुई साँस। जिसके बारे में माधवी ने खुद कहा था—झूठ में मेरी साँस अटकती है। पर इस बार साँस अटकी नहीं थी। वह थकी थी। टूटी थी। दूर थी। मगर झूठ नहीं थी। कबीर ने रिकॉर्डिंग फिर से चलायी। “दीदी… तुम सच में पुलिस बन गई?” अदिति की आँखें भर आईं। उन्होंने तुरंत मुड़कर चेहरा छिपाया। शायद वह रोना चाहती थीं, लेकिन रोना अभी विलासिता था। कबीर ने ऑडियो रोका। “यह आवाज़ माधवी बेस से बनी नकली आवाज़ हो सकती है। लेकिन…” नयना ने पूछा, “लेकिन?” “लेकिन बैकग्राउंड में जो ट्रेन की आवाज़ है, वह असली है। और आखिरी में अंग्रेज़ी वाक्य—‘Move them before dawn.’ वह कमरे का लाइव ऑडियो लगता है। साफ़ रिकॉर्डेड पैच नहीं। यानी कॉल किसी वास्तविक जगह से आई थी।” मीरा नाथ ने कहा, “और उसने चौथा अंतरा कहा।” नयना ने जेब से पायल का सफेद धागा निकाला। धागा उसकी उँगली में लिपटा हुआ था। पायल ने कहा था—सुर दीदी ने दिया था। सुर ने कहा था—माधवी ने मुझे बचाया। माधवी ने कहा—गीत पूछना। यह गीत अब बच्चों का गीत नहीं रहा था। यह नक्शा था। कोड था। वह रास्ता था जिसे बच्चों ने शायद अपने बचाव के लिए बनाया था, या जिसे अपराधियों ने इस्तेमाल किया और फिर बच्चों ने पलट दिया। अदिति ने खुद को संभाला। “हमें पूरा गीत चाहिए। अभी।” “पायल,” नयना ने कहा। “और सुर,” मीरा नाथ ने जोड़ा। कबीर ने फोन निकाला। “दिल्ली अस्पताल से सुरक्षित वीडियो लाइन। पायल वहाँ है। सुर मेडिकल निगरानी में है। वह बोल नहीं सकती, लेकिन लिख सकती है।” अदिति ने कहा, “लाइन लगाओ।” मौन सराय के टूटे बरामदे में, जहाँ कभी बच्चों को चुप रहना सिखाया गया होगा, अब एक छोटा अस्थायी नियंत्रण-कक्ष बन गया। कबीर ने लैपटॉप खोला। बैटरी कम थी। उसने पावरबैंक जोड़ा। नयना ने फोन स्टैंड पर रखा। मीरा नाथ ने पायल के गीत की रिकॉर्डिंग खोली। अदिति ने माधवी वाली कॉल अलग फाइल में सेव की। राकेश ने दरवाज़े पर नज़र रखी। कुछ मिनट बाद स्क्रीन पर अस्पताल का कमरा आया। अर्चना दिखाई दीं। उनके चेहरे पर चिंता थी। पीछे सुजाता आरव को गोद में लिए बैठी थीं। आरव अभी भी लाल कार माँग रहा था, जो नयना के पास थी। दूसरी तरफ पायल बिस्तर पर बैठी थी। उसकी कलाई पर अस्पताल का बैंड था। वह डर के बावजूद स्क्रीन देखते ही थोड़ा सीधी बैठ गई। “दीदी?” उसने पूछा। “हाँ, पायल,” नयना ने नरम आवाज़ में कहा। “तुम सुरक्षित हो?” पायल ने सिर हिलाया। “सुर दीदी मिली?” नयना ने एक पल रुककर कहा, “हमें उनका संदेश मिला है। उन्हें ढूँढ़ना है। और माधवी दीदी का भी।” पायल की आँखों में समझ से ज्यादा भरोसा था। बच्चे कई बार पूरी बात नहीं समझते, लेकिन यह समझ लेते हैं कि सामने वाला सच बोल रहा है या झूठ। “पायल,” मीरा नाथ ने पूछा, “तुम्हें ‘आम के पेड़ तले’ गीत कितना याद है?” पायल ने घबराकर अर्चना की तरफ देखा। अर्चना ने उसका हाथ पकड़ा। “जितना याद हो, उतना बोलो। भूल जाओ तो कोई बात नहीं।” पायल ने धीरे-धीरे गुनगुनाना शुरू किया— “आम के पेड़ तले, नदिया बोले रे…” कबीर ने रिकॉर्डिंग चालू कर दी। पायल ने आगे गाया— “पीली दीवार पे, घंटी डोले रे…” नयना ने अदिति की तरफ देखा। पीली दीवार — नवस्वर। घंटी — घंटी घाट। नदिया — गंगा। पायल की आवाज़ काँप रही थी, पर वह आगे बढ़ी— “काली रेलिया रात में रोए रे, सोया बच्चा जागे तो खोए रे…” कबीर ने फुसफुसाया, “रेलवे यार्ड। लखनऊ।” तीन अंतरे। फिर पायल रुक गई। “आगे?” नयना ने पूछा। पायल ने सिर झुका लिया। “मुझे नहीं आता। सुर दीदी आगे नहीं गाने देती थीं।” “क्यों?” “कहती थीं, चौथा अंतरा उन बच्चों को गाना है जिन्हें रास्ता याद रखना है।” अदिति आगे झुकीं। “किस रास्ते का?” पायल ने धीरे से कहा, “जो वापस नहीं आते।” कमरे में सन्नाटा फैल गया। स्क्रीन पर अर्चना की आँखें भर आईं। सुजाता ने आरव को और कस लिया। कबीर ने बहुत धीरे कहा, “सुर को लाओ।” अस्पताल की तरफ से एक नर्स दिखी। कुछ देर बाद स्ट्रेचर जैसा नहीं, व्हीलचेयर में सुर लाई गई। उसका चेहरा अब भी पीला था। गले पर पट्टी। हाथ में स्लेट और चॉक। वह बोल नहीं सकती थी, पर उसकी आँखों में वह सतर्कता थी जो लंबे कैदखाने से निकलने के बाद भी जाती नहीं। नयना ने स्क्रीन की ओर झुककर कहा, “सुर, हमें चौथा अंतरा चाहिए। माधवी ने कहा—चौथा अंतरा। बच्चे सीमा पार भेजे जा रहे हैं।” सुर की आँखों में डर चमका। उसने स्लेट पर लिखा— **चौथा अंतरा गाना मना था।** कबीर बोला, “इसका मतलब वही महत्वपूर्ण है।” सुर ने फिर लिखा— **अगर गलत जगह गाओ तो वे पहचान जाते हैं।** अदिति ने पूछा, “कौन?” सुर ने लिखा— **रक्षक।** मीरा नाथ ने दाँत भींचे। “रक्षक नहीं, पहरेदार।” सुर ने स्लेट साफ़ की। हाथ काँप रहा था। उसने धीरे-धीरे लिखना शुरू किया— **चौथा अंतरा पूरा नहीं, टुकड़ों में याद है।** नयना ने कहा, “जितना याद है, उतना काफी होगा।” सुर ने चॉक रखा। आँखें बंद कीं। शायद आवाज़ उसके भीतर थी, पर गला उसे बाहर नहीं ला सकता था। उसने स्लेट पर पंक्तियाँ लिखीं— **चौथे मोड़ पे नीला धागा, सीमा की धूल उड़ाए रे। बिना नाम की छोटी चिरैया, पार नदी नहीं, सरहद जाए रे।** अदिति ने तुरंत नोट किया। कबीर ने कहा, “चौथा मोड़… नीला धागा… सीमा की धूल… चिरैया…” सुर ने फिर लिखा— **फिर एक पंक्ति है — ‘जहाँ नमक मीठा बोले’।** राकेश ने अचानक सिर उठाया। “नमक मीठा?” सबने उनकी तरफ देखा। “क्या जानते हैं?” अदिति ने पूछा। राकेश ने सोचा। “पुराने ड्राइवर कोड में ‘नमक’ सीमा चेकपोस्ट के लिए बोला जाता था। ‘मीठा’ मतलब रिश्वत या सुरक्षित पार। ‘नमक मीठा बोले’ शायद वह पोस्ट जहाँ चेकिंग खरीदी जा चुकी हो।” कबीर ने कहा, “सीमा की धूल… मतलब नेपाल बॉर्डर?” अदिति ने नक्शा खोला। “डेटा में सक्रिय रूट—नेपाल बॉर्डर। लेकिन कौन-सा पॉइंट? सोनौली, रुपईडीहा, बनबसा, या छोटा अनौपचारिक मार्ग?” सुर ने स्क्रीन पर उनकी बात देखी। उसने जल्दी-जल्दी लिखा— **बड़ी सड़क नहीं। मेला। पशु। लाल झंडा। लकड़ी का पुल।** राकेश की आँखें फैल गईं। “नरैनी मेला मार्ग…” “कहाँ?” नयना ने पूछा। राकेश बोले, “आधिकारिक बड़ा बॉर्डर नहीं। एक पुराना रास्ता, जहाँ साल में पशु-मेला लगता था। नदी छोटी है, बरसात छोड़कर पार की जा सकती है। लकड़ी का अस्थायी पुल। ट्रक नहीं, छोटी गाड़ियाँ। बच्चों को मेले की भीड़ में ले जाना आसान।” अदिति ने पूछा, “किस जिले में?” “बहराइच से ऊपर की तरफ, रुपईडीहा मुख्य रूट से हटकर। पहले मैंने वहाँ गाड़ी नहीं चलाई, लेकिन ड्राइवरों में नाम सुना है—‘नरैनी चौथा मोड़।’” कबीर ने तुरंत नक्शे में खोजा। “ऑफलाइन मैप में ‘नरैनी’ जैसा एक छोटा गाँव है। पास में सूखी नदी, मेला मैदान, और पुराना लकड़ी पुल मार्क है। नेटवर्क नहीं के बराबर।” मीरा नाथ ने कहा, “चौथा मोड़।” पायल स्क्रीन पर धीरे से बोली, “सुर दीदी कहती थीं—चौथा अंतरा गाने से रास्ता याद रहता है, लेकिन जोर से मत गाना, नहीं तो रक्षक सुन लेंगे।” अदिति ने निर्णय लिया। “बच्चे वहाँ जा रहे हैं।” कबीर ने कहा, “पर कॉल में अंग्रेज़ी आवाज़ थी—Move them before dawn. अभी सुबह हो चुकी है।” राकेश ने कहा, “अगर वे रात में निकले हैं, तो दोपहर तक सीमा के पास होंगे। बड़े रास्ते से नहीं गए तो समय लगेगा।” नयना ने पूछा, “हम पहुँच सकते हैं?” अदिति ने कहा, “अगर अभी निकलें तो शायद। लेकिन बिना आधिकारिक सीमा समन्वय जोखिम है। और मुझे अभी आदेश नहीं मिलेगा।” कबीर ने बहुत धीरे कहा, “तो?” अदिति ने फोन उठाया। “इस बार मैं आदेश माँगूँगी नहीं। सूचना दूँगी।” उन्होंने अपने वरिष्ठ को कॉल लगाया। आवाज़ स्पीकर पर नहीं थी, लेकिन उनका स्वर सब सुन रहे थे। “मैडम, नेपाल बॉर्डर रूट पर बच्चों का संभावित अवैध स्थानांतरण… नहीं, यह अनुमान नहीं, कोडेड गीत, कॉल ऑडियो, डेटा और ड्राइवर गवाही पर आधारित इनपुट है… जी, मैं फॉर्मल मेल भेज रही हूँ… नहीं, टीम रुकेगी नहीं… आप बाद में मुझे लिखित आदेश भेज दीजिएगा।” उन्होंने कॉल काट दिया। कबीर ने श्रद्धा से कहा, “आपने सरकारी भाषा में विद्रोह कर दिया।” अदिति ने कहा, “अब रिकॉर्ड बंद रखो।” “जी।” नयना ने स्क्रीन पर पायल और सुर को देखा। “तुम दोनों ने बहुत बड़ा काम किया है।” पायल ने पूछा, “वो बच्चे वापस आएँगे?” नयना ने कुछ कहना चाहा, पर फिर अरविंद की बात याद आई—वादा भारी होता है। “हम पूरी कोशिश करेंगे,” उसने कहा। सुर ने स्लेट पर एक आखिरी बात लिखी— **अगर रास्ते में कोई बच्चा गीत गाए, तो उसे रोकना मत। वह मदद माँग रहा होगा।** वीडियो कॉल बंद हुई। कुछ क्षण सभी चुप रहे। फिर कबीर ने कहा, “तो मिशन का नाम—चौथा अंतरा?” मीरा नाथ ने कहा, “नाम अच्छा है।” नयना ने पायल का धागा, आरव की कार और शून्य सिलिंडर के सुरक्षित केस की ओर देखा। “चलो,” उसने कहा। “गीत अधूरा है।” --- नरैनी सीमा मार्ग तक पहुँचने के लिए उन्हें दो राज्यों की पुलिस, एक आधिकारिक न चलने वाली सूचना, और कई अनौपचारिक फोन कॉलों के बीच से गुजरना पड़ा। VOICE_0 को सुरक्षित फोरेंसिक वाहन में फरहान के साथ भेज दिया गया। अदिति ने जाने से पहले तीन बार सील देखी। कबीर ने अतिरिक्त डिजिटल रिकॉर्डिंग्स अलग-अलग ड्राइव में रखीं—एक अदिति के पास, एक अपने पास, एक नयना के बैग में, एक राकेश की जैकेट में। “अगर हम सब पकड़े गए?” नयना ने पूछा। कबीर ने कहा, “तो कम से कम अपराधियों को डेटा खोजने में पसीना आएगा।” मीरा नाथ ने पूछा, “और अगर वे तुम्हारे मज़ाक से पहले ही हार मान गए?” “तो मैं अलग से माफी माँगूँगा।” यात्रा लंबी थी। पहले सड़क, फिर छोटी सड़क, फिर कच्चा रास्ता। दो गाड़ियाँ थीं—एक पुलिस की बिना पहचान वाली एसयूवी, दूसरी स्थानीय वाहन। टीम में अदिति, नयना, कबीर, मीरा नाथ, राकेश, दो भरोसेमंद अधिकारी और ड्राइवर। आधिकारिक बल दूर से आना था, ताकि नेटवर्क सतर्क न हो। दोपहर ढलने लगी। रास्ते में खेत थे। कहीं सरसों की बची हुई पीली झलक, कहीं गन्ना, कहीं धूल। गाँवों में बच्चे स्कूल से लौट रहे थे। कुछ ने पुलिस की गाड़ी देखी, हाथ हिलाया। नयना ने हर बच्चे को देखते हुए सोचा—इनमें से कितने सुरक्षित हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि अभी कोई उन्हें देख रहा है? और कितने किसी गीत में छिपे रास्ते पर चल रहे हैं? कबीर लगातार ऑडियो डिकोड कर रहा था। उसने पायल, सुर, माधवी और VOICE_0 की रिकॉर्डिंग्स मिलाईं। “गीत में पैटर्न है,” उसने कहा। “हर अंतरे में जगह का संकेत है—नदी, दीवार, रेल, सीमा। लेकिन ताल भी महत्वपूर्ण है। पहले अंतरे में 4/4, दूसरे में 3/2 जैसा, तीसरे में रेल की लय, चौथे में… रुको…” “क्या?” अदिति ने पूछा। “चौथे अंतरे की लय पशु-मेले की ढोलक जैसी है। बैकग्राउंड में जो पायल ने थपकी दी थी, वह दादरा नहीं, कुछ लोक-नृत्य ताल है। यानी बच्चों को मेले की आवाज़ में घुलने के लिए यह लय सिखाई गई होगी। अगर वे गाएँ, तो लगे मेला गीत है। अंदर कोड छिपा रहेगा।” मीरा नाथ ने कहा, “बच्चों को कोड सिखाने वालों में कोई उनका पक्ष भी था। सिर्फ अपराधी नहीं।” नयना ने कहा, “माधवी। सुर। शायद गौरीबाई। शायद कोई और।” राकेश बोले, “नेटवर्क में सब राक्षस नहीं थे। कुछ डरपोक थे। कुछ फँसे थे। कुछ देर से जागे। लेकिन देर से जागने वाले भी रास्ता छोड़ सकते हैं।” कबीर ने अपने पिता की ओर देखा। यह बात उनके लिए भी थी। राकेश ने बेटे की नजर पकड़ी। “मैं भी देर से जागा।” कबीर ने धीरे कहा, “लेकिन अब ड्राइव कर रहे हो।” राकेश हल्का मुस्कुराए। “हाँ।” यह छोटा संवाद बहुत बड़ा था। रास्ते में एक जगह अदिति ने गाड़ी रुकवाई। सामने स्थानीय चाय की दुकान थी। वहाँ दो ट्रक खड़े थे। एक ट्रक के पीछे लिखा था— **बाल सांस्कृतिक यात्रा दल** ट्रक खाली था। कबीर ने देखा। “यह संयोग नहीं।” अदिति ने दुकान वाले से साधारण यात्री की तरह पूछा, “भैया, यह सांस्कृतिक दल कहाँ गया?” दुकानदार ने पहले टालना चाहा। फिर अदिति ने सिर्फ अपनी नजर बदली। कभी-कभी पुलिस पहचान पत्र दिखाने से पहले ही दिख जाती है। दुकानदार बोला, “सुबह कुछ बच्चे गए थे। गाड़ी खराब बताकर रुके थे। फिर छोटी बस आई। उधर नरैनी मेले की तरफ।” “कितने बच्चे?” “दस-बारह होंगे। दो औरतें, तीन आदमी। बच्चे चुप थे। मैंने सोचा कार्यक्रम वाले होंगे।” “कोई बच्चा गा रहा था?” दुकानदार ने सोचा। “हाँ… एक लड़का धीरे-धीरे कुछ गा रहा था। औरत ने मुँह दबा दिया।” नयना आगे झुकी। “क्या गा रहा था?” दुकानदार ने माथा खुजाया। “कुछ आम के पेड़… नदिया… ऐसा।” सबने एक-दूसरे को देखा। रास्ता सही था। अदिति ने तुरंत दुकान वाले को आधिकारिक नंबर दिया। “अगर वह बस वापस आए, रोकना मत। सूचना देना। और अभी जो बात हुई, किसी से मत कहना।” दुकानदार घबरा गया। “बच्चों का मामला है क्या?” नयना ने कहा, “हाँ।” उसके चेहरे पर पछतावा आया। “मुझे समझना चाहिए था।” नयना ने नरम स्वर में कहा, “अब समझ गए। मदद कीजिए।” वह सिर हिलाता रह गया। गाड़ी फिर आगे बढ़ी। --- नरैनी मेला मैदान शाम ढलने से पहले दिखाई दिया। दूर से रंगीन झंडियाँ दिखती थीं। कुछ अस्थायी दुकानें। पशुओं के लिए बाँस के घेरे। गुड़, खिलौने, प्लास्टिक की बाल्टियाँ, लोकनृत्य का छोटा मंच, झूला, धूल और भीड़। यह कोई बहुत बड़ा मेला नहीं था, पर इतना बड़ा कि दस बच्चे उसमें खो जाएँ तो कोई तुरंत न पहचान सके। मेला मैदान से थोड़ी दूर एक पुराना लकड़ी का पुल था। नीचे छोटी नदी, जो बरसात में भरती होगी, अभी कम पानी में बह रही थी। पुल के उस पार कच्चा रास्ता झाड़ियों में जाता था। आगे शायद सीमा की ओर छोटे रास्ते। कबीर ने फुसफुसाया, “लकड़ी का पुल। लाल झंडा?” मीरा ने इशारा किया। पुल के पास सचमुच लाल झंडा था—शायद किसी छोटे देवस्थान का। “चौथा अंतरा,” नयना ने कहा। अदिति ने टीम को बाँटा। “सीधे हमला नहीं। पहले बच्चों की पुष्टि। भीड़ में गोली नहीं चलेगी। कबीर, तुम ऑडियो पर ध्यान। मीरा, बच्चों के व्यवहार पर। नयना, तुम मेरे साथ। राकेश, वाहन रूट देखो।” कबीर ने कहा, “और अगर बच्चे दिखे?” “सिग्नल—‘गीत शुरू’,” अदिति बोलीं। “उसके बाद टीम मूव।” मेला सामान्य दिख रहा था। यही सबसे डरावना था। बच्चे गुब्बारे खरीद रहे थे। महिलाएँ चूड़ियाँ देख रही थीं। एक बूढ़ा बीन बजा रहा था। दो आदमी बैलों की कीमत पर बहस कर रहे थे। मंच पर कोई लोकगायक ढोलक के साथ गा रहा था। धूल में शाम की रोशनी घुल रही थी। किसी को क्या पता कि इसी मेले से कुछ बच्चे सीमा पार भेजे जा सकते हैं? नयना ने भीड़ में देखा। हर बच्चा पायल, आरव, माधवी, नयना जैसा लगने लगा। उसने खुद को संयत किया। नाम मत पूछना। गीत पूछना। वे भीड़ में अलग-अलग फैल गए। कबीर ने फोन की ऑडियो रिकॉर्डिंग ऑन रखी। मीरा नाथ चूड़ी की दुकान के पास खड़ी होकर बच्चों को देख रही थी। अदिति साधारण दुपट्टा ओढ़े थी, लेकिन उसकी चाल अभी भी अधिकारी जैसी थी। नयना ने सिर पर दुपट्टा लिया। करीब दस मिनट तक कुछ नहीं मिला। फिर कबीर की आवाज़ ईयरपीस में आई—“बाईं तरफ, खिलौना दुकान के पास, नीली बस।” नयना ने देखा। एक छोटी बस खड़ी थी। उस पर लिखा था— **लोक बाल कला दल** खिड़कियों पर पर्दे। ड्राइवर सीट खाली। बस के पास दो आदमी खड़े। एक महिला बच्चों की तरह दिखने वाली छोटी टोली को इकट्ठा कर रही थी। बच्चे रंगीन कपड़ों में थे—जैसे लोकनृत्य दल। पर उनके चेहरे मेले वाले बच्चों जैसे नहीं थे। वे बहुत चुप थे। नयना का दिल तेज़ धड़कने लगा। एक बच्ची ने अपनी कलाई पर बँधा नीला धागा छिपाने की कोशिश की। एक लड़का बार-बार पीछे देख रहा था। सबसे छोटा बच्चा गुड़ की दुकान की तरफ देख रहा था, लेकिन माँग नहीं रहा था। जैसे उसे पता हो कि माँगना मना है। मीरा नाथ की आवाज़ आई—“ये प्रशिक्षित चुप्पी है।” अदिति ने धीमे कहा—“पुष्टि चाहिए।” नयना धीरे-धीरे खिलौना दुकान की ओर बढ़ी। उसने आरव की लाल कार जेब से निकाली और दुकान वाले के पास रखी खिलौना गाड़ियों में मिला दी। फिर बच्चों की ओर देखते हुए बहुत हल्के स्वर में गुनगुनाया— “आम के पेड़ तले…” बच्चों में हलचल हुई। एक लड़की ने सिर उठाया। एक लड़के की आँखें फैल गईं। महिला ने तुरंत उनकी तरफ देखा। नयना ने गाना बंद कर दिया और खिलौने देखने लगी। कबीर ने ईयरपीस में कहा, “रिएक्शन मिला।” अदिति ने कहा, “अभी नहीं। थोड़ा और।” तभी बस के अंदर से बहुत हल्की आवाज़ आई। शायद कोई बच्चा, जो भीतर बंद था। “चौथे मोड़ पे…” नयना जम गई। गीत बस के अंदर से आ रहा था। महिला ने तेज़ी से बस का दरवाज़ा बंद किया। अदिति बोलीं—“गीत शुरू।” सब कुछ अचानक तेज़ हो गया। कबीर बस की ओर बढ़ा। राकेश पीछे के रास्ते से। मीरा नाथ बच्चों के बीच पहुँची और एक आदमी के सामने खड़ी हो गई। अदिति ने अपना पहचान पत्र निकाला और कठोर स्वर में कहा— “पुलिस। बच्चों को वहीं रहने दो।” महिला ने पल भर में चेहरा बदल लिया। “कौन बच्चे? ये हमारे कला दल के—” “हाथ ऊपर,” अदिति ने कहा। दूसरा आदमी भागने लगा। राकेश ने उसे रोका। आदमी ने चाकू निकाला। राकेश पीछे हटे, लेकिन कबीर ने खिलौना दुकान से लकड़ी की बैट उठाकर उसके हाथ पर मारी। चाकू गिर गया। “मेरे पापा पर दूसरी बार कोई हथियार नहीं निकालेगा,” कबीर चिल्लाया। भीड़ में शोर फैल गया। लोग मुड़ने लगे। कुछ ने मोबाइल निकाले। कुछ समझ नहीं पाए। महिला ने बच्चों को धक्का देकर बस की ओर भेजना चाहा। मीरा नाथ ने उसका हाथ पकड़ लिया। “बच्चे पीछे।” उसकी आवाज़ में ऐसा आदेश था कि बच्चे सचमुच पीछे हट गए। बस के अंदर से एक लड़का चिल्लाया—“हमें बाहर निकालो!” अब भीड़ समझने लगी। “अरे बच्चे हैं!” “क्या हो रहा है?” “पुलिस है!” “बस बंद क्यों है?” अदिति ने स्थानीय टीम को संकेत दिया। दो पुलिसकर्मी भीड़ से निकले। शायद वे पहले से सिविल कपड़ों में थे। उन्होंने ड्राइवर को पकड़ा जो पुल की तरफ भाग रहा था। नयना बस के दरवाज़े तक पहुँची। दरवाज़ा बाहर से लॉक था। कबीर ने चाबी ढूँढ़ी, पर नहीं मिली। उसने कहा, “हटो।” “क्या कर रहे हो?” नयना ने पूछा। “इस बार आधिकारिक तोड़फोड़।” उसने लोहे की रॉड से लॉक पर चोट मारी। एक। दो। तीसरी चोट पर लॉक टूट गया। दरवाज़ा खुला। अंदर छह बच्चे थे। दो लड़कियाँ, चार लड़के। सबसे छोटी बच्ची सात साल से ज्यादा की नहीं थी। सबके मुँह पर टेप नहीं था, पर आँखों में वही टेप था—डर। एक लड़के ने उतरते ही कहा—“मेरा नाम मुझे नहीं पता।” नयना ने उसके सामने घुटनों के बल बैठकर कहा, “अभी मत बताओ। पहले बाहर आओ।” दूसरी बच्ची रोते हुए बोली—“अगर नाम पूछेंगे तो गलत बोलूँगी।” नयना ने उसका हाथ पकड़ा। “नाम नहीं पूछेंगे। गीत पूछेंगे।” बच्ची ने उसे देखा। फिर बहुत धीमे गाया— “चौथे मोड़ पे नीला धागा…” भीड़ चुप हो गई। मीरा नाथ ने आगे गाया— “सीमा की धूल उड़ाए रे…” दूसरे बच्चों ने धीरे-धीरे साथ देना शुरू किया। “बिना नाम की छोटी चिरैया…” एक लड़का रोते हुए बोला— “पार नदी नहीं, सरहद जाए रे…” नयना की आँखें भर आईं। चौथा अंतरा पूरा था। गीत ने बच्चों को एक-दूसरे से जोड़ दिया। अब वे कला दल नहीं थे। वे गवाह थे। जीवित, डरे हुए, लेकिन बोलते हुए। अदिति ने महिला और बाकी लोगों को हिरासत में लेने का आदेश दिया। भीड़ में से कुछ लोग गुस्से में उन्हें मारने दौड़े। अदिति ने माइक जैसी सख्त आवाज़ में कहा— “कोई हाथ नहीं लगाएगा! कानून से चलेगा!” कबीर ने धीरे से कहा, “मैडम की आवाज़ में सार्वजनिक व्यवस्था का बेस अच्छा है।” नयना बच्चों को बस से उतार रही थी। अचानक सबसे पीछे बैठे एक बच्चे ने उसका हाथ पकड़ लिया। “दीदी,” उसने कहा, “सब बच्चे यहाँ नहीं हैं।” नयना का दिल धड़का। “और कहाँ?” बच्चे ने पुल की तरफ इशारा किया। “दो को पहले ले गए। गाना नहीं गा रहे थे।” “कब?” “अभी। बस रुकने से पहले। एक आदमी उन्हें लाल झंडे के पास ले गया।” नयना ने पुल की ओर देखा। लकड़ी का पुल धूल में खड़ा था। उसके पार झाड़ियाँ। सूरज ढल रहा था। अगर दो बच्चे उस पार चले गए, तो वे सीमा के छोटे रास्ते पर हो सकते थे। अदिति ने ईयरपीस में कहा—“टीम दो, पुल की तरफ।” लेकिन जवाब नहीं आया। सिग्नल कमजोर। कबीर ने कहा, “नेटवर्क गया।” राकेश ने पुल की तरफ देखा। “अगर वे उस पार गए हैं तो छोटी नाव या बाइक होगी। पाँच मिनट में गायब।” नयना ने कहा, “चलो।” अदिति ने रोकना चाहा। “रुको—” पर इस बार वह खुद भी रुक नहीं सकती थीं। वे पुल की तरफ दौड़े—नयना, अदिति, कबीर, मीरा नाथ, राकेश और दो स्थानीय अधिकारी। पीछे मेला शोर से भर गया। बच्चों को सुरक्षित घेरे में लिया जा रहा था। महिला चिल्ला रही थी कि यह गलतफहमी है। भीड़ सवाल पूछ रही थी। पुल लकड़ी का था और चरमराता था। नीचे कम पानी, किनारे कीचड़। सूरज की आखिरी रोशनी लाल झंडे को आग जैसा बना रही थी। पुल के बीच पहुँचते ही दूर झाड़ियों में हलचल दिखी। एक आदमी दो बच्चों को मोटरसाइकिल के पास धकेल रहा था। एक लड़का, एक लड़की। दोनों के हाथ बँधे नहीं थे, पर आदमी की पकड़ ऐसी थी कि वे भाग नहीं पा रहे थे। नयना ने चिल्लाया—“रुको!” आदमी ने मुड़कर देखा। उसके चेहरे पर नकाब था। उसने बच्चों को आगे धकेला और बाइक स्टार्ट करने की कोशिश की। कबीर दौड़ा। “ओए!” राकेश ने पीछे से उसे पुकारा—“बाएँ से काट!” कबीर ने रास्ता बदला। मीरा नाथ दाईं तरफ से झाड़ियों में घुसी। अदिति ने पिस्तौल तानी, पर बच्चों के कारण गोली नहीं चला सकती थीं। नयना सीधे भागती रही। बाइक स्टार्ट हुई। आदमी ने लड़की को पीछे बैठाने की कोशिश की। लड़की अचानक जोर से गाने लगी— “नाम मत पूछो…” आदमी ने उसका मुँह दबाया। लड़का झटका खाकर छूटा और जमीन पर गिर गया। नयना ने लड़के को खींचकर अपनी तरफ किया। आदमी ने बाइक मोड़ी। लड़की अब भी उसके हाथ में थी। तभी मीरा नाथ झाड़ियों से निकलकर बाइक के सामने आई। उसने लाल रिबन उसकी आँखों पर फेंका। पल भर का भ्रम। बाइक डगमगाई। कबीर ने पीछे से धक्का दिया। बाइक गिरी। आदमी और लड़की दोनों जमीन पर गिरे। अदिति ने उसे दबोच लिया। “हाथ पीछे!” आदमी संघर्ष कर रहा था। राकेश ने लड़की को उठाया। वह काँप रही थी, पर सुरक्षित थी। नयना लड़के को संभाल रही थी। वह बार-बार कह रहा था—“मैंने नहीं गाया। इसलिए मुझे ले गए।” “अब गाने की जरूरत नहीं,” नयना ने कहा। “तुम सुरक्षित हो।” लड़के ने उसका हाथ पकड़ा। “नहीं। गाना जरूरी है। नहीं तो बाकी रास्ता नहीं खुलेगा।” नयना ठिठक गई। “कौन-सा बाकी रास्ता?” लड़के ने काँपते हुए नदी के उस पार झाड़ियों से आगे की तरफ इशारा किया। वहाँ धुंधली पगडंडी थी। बहुत पतली। सीमा की ओर जाती हुई। “वहाँ और बच्चे हैं,” उसने कहा। “छोटे वाले। जिन्हें बोलना नहीं आता।” अदिति ने नकाबपोश आदमी का चेहरा हटाया। वह स्थानीय तस्कर जैसा था, पर उसकी गर्दन पर एक टैटू था—छोटी घंटी। कबीर ने देखा। “घंटी चिह्न।” मीरा नाथ ने कहा, “त्रिलोचन का पुराना नेटवर्क।” अदिति ने आदमी से पूछा, “बच्चे कहाँ हैं?” वह चुप। अदिति ने फिर पूछा। “कहाँ हैं?” वह हँसा। “गीत पूरा नहीं जानते तो रास्ता नहीं मिलेगा।” नयना ने लड़के की तरफ देखा। “तुम जानते हो?” लड़का डर गया। “थोड़ा।” लड़की, जिसे राकेश ने संभाल रखा था, फुसफुसाई—“हम दोनों जानते हैं। आधा-आधा।” कबीर ने धीरे से कहा, “गीत को बच्चों में बाँट दिया गया है।” राकेश ने कहा, “ताकि एक पकड़ा जाए तो पूरा रास्ता न खुल जाए।” मीरा नाथ ने बच्चों के सामने घुटनों के बल बैठते हुए कहा, “तुम्हें अभी पूरा गीत गाना होगा। लेकिन डरना मत। हम सुनेंगे, वे नहीं।” लड़की ने आँखें बंद कीं। लड़के ने उसका हाथ पकड़ा। दोनों ने मिलकर धीरे-धीरे गाना शुरू किया— “चौथे मोड़ पे नीला धागा, सीमा की धूल उड़ाए रे। बिना नाम की छोटी चिरैया, पार नदी नहीं, सरहद जाए रे। लाल झंडे से मत जाना रे, काँटे वाली पगडंडी ले। जहाँ नमक मीठा बोले रे, वहाँ बच्चे आँख न खोले रे…” कबीर ने सब रिकॉर्ड किया। लड़की ने आगे कहा— “सात कदम पर सूखी डाली, आठवें पर मत मुड़ना रे। तीन पत्थर और आधा चाँद, नीचे रोता कुंज खुलना रे…” वह रुक गई। “आगे?” नयना ने पूछा। लड़का बोला— “आगे छोटा अंतरा है।” “गाओ।” लड़के की आवाज़ काँपी— “अगर दीदी आवाज़ पुकारे, नाम नहीं, बस गीत सुनाना। जो गीत पूरा साथ गाए, उसी को घर तक ले जाना।” गीत खत्म। सब कुछ स्पष्ट नहीं था, पर इतना काफी था। काँटे वाली पगडंडी। सात कदम। सूखी डाली। तीन पत्थर। आधा चाँद। नीचे रोता कुंज। अदिति ने कहा, “यह लोकेशन निर्देश है। चलो।” कबीर ने नकाबपोश आदमी को पुलिस अधिकारी के हवाले किया। “इसको भागने मत देना। यह पहेली विभाग का अपराधी है।” वे पगडंडी की तरफ बढ़े। सूरज लगभग डूब चुका था। सीमा की हवा ठंडी हो रही थी। झाड़ियों के बीच रास्ता सचमुच काँटेदार था। बच्चों के बताए अनुसार सात कदम पर सूखी डाली मिली। आठवें पर रास्ता दाईं तरफ मुड़ता था, लेकिन गीत ने कहा था—आठवें पर मत मुड़ना। वे सीधे गए। आगे तीन पत्थर थे—त्रिकोण में रखे हुए। उनके ऊपर मिट्टी से आधा चाँद बनाया गया था। “नीचे रोता कुंज,” नयना ने कहा। मीरा नाथ ने झाड़ियों के पीछे देखा। वहाँ नीचे की ओर छोटी ढलान थी। घनी झाड़ियों से छिपा हुआ एक गड्ढेनुमा स्थान। उसके भीतर टीन की छत वाला छोटा कमरा। अंदर से बहुत हल्की सिसकी आ रही थी। बच्चे। अदिति ने हाथ उठाया। “सावधान।” दरवाज़ा बाहर से बंद था। ताला छोटा। कबीर ने उसे तोड़ा। अंदर अँधेरा। बदबू। मिट्टी। और सात बच्चे। बहुत छोटे। कुछ तीन साल के। कुछ पाँच। दो इतने छोटे कि शायद अपना नाम भी न बता सकें। उनमें से एक बच्चा लकड़ी की छोटी बांसुरी पकड़े था। एक बच्ची की गर्दन में नीला धागा था। एक लड़का सोते-सोते भी रो रहा था। नयना अंदर बैठ गई। उसने कोई सवाल नहीं पूछा। नाम नहीं। गीत। उसने बहुत धीरे गाना शुरू किया— “आम के पेड़ तले…” एक बच्ची ने सिर उठाया। मीरा नाथ ने साथ दिया— “नदिया बोले रे…” बच्चों में से एक ने रोना बंद किया। कबीर दरवाज़े पर खड़ा रिकॉर्ड कर रहा था, लेकिन उसकी आँखें स्क्रीन पर नहीं थीं। राकेश ने छोटे बच्चे को गोद में उठाया। अदिति ने तुरंत मेडिकल सहायता के लिए वायरलेस पर कॉल करने की कोशिश की, पर सिग्नल नहीं था। उसने स्थानीय अधिकारी को वापस पुल की ओर भेजा। नयना ने एक-एक बच्चे को बाहर निकाला। कोई नाम नहीं पूछा। सिर्फ हाथ पकड़ा। जब आखिरी बच्ची बाहर आई, उसने नयना के कान के पास बहुत धीरे कहा— “माधवी दीदी आई थीं।” नयना जम गई। “कब?” “रात में। उसने कहा था—अगर गीत वाली दीदी आए तो बोलना, ‘मैं सरहद पर नहीं रुकूँगी।’” अदिति ने यह सुना। उनका चेहरा बदल गया। “माधवी यहाँ थी?” उन्होंने बच्ची से पूछा। बच्ची डर गई। नयना ने तुरंत कहा, “डरो मत। यह उनकी दीदी हैं।” बच्ची ने अदिति को देखा। शायद चेहरे में कुछ पहचाना। शायद आवाज़ में। “वो आपके जैसी दिखती थीं,” उसने कहा। अदिति की आँखें भर आईं। “कहाँ गईं?” बच्ची ने सीमा की ओर नहीं, उल्टी दिशा में इशारा किया—नदी की तरफ। “वो बच्चों को भेजकर वापस गईं। बोलीं—घुँघरू गलत हाथ में गया है। उसे वापस लेना है।” कबीर ने धीरे से कहा, “तो माधवी त्रिलोचन के पीछे नहीं गई… घुँघरू के पीछे गई।” अदिति ने पूछा, “किसके पास?” बच्ची ने अपनी मुट्ठी खोली। उसमें एक छोटा कागज़ था। शायद माधवी ने दिया था। अदिति ने काँपते हाथों से खोला। कागज़ पर सिर्फ एक लाइन थी— **घुँघरू असली चाबी नहीं। असली चाबी बच्चे हैं। उन्हें गीत याद है। मुझे मत ढूँढ़ो, रूट बंद करो।** नीचे एक और शब्द— **पूर्वी दरवाज़ा।** नयना ने पूछा, “पूर्वी दरवाज़ा?” राकेश का चेहरा सफेद पड़ गया। “नेपाल रूट नहीं,” उन्होंने कहा। “पूर्वी दरवाज़ा मतलब दूसरा अंतरराष्ट्रीय रास्ता—बंगाल की तरफ, नदी और रेल से। अगर नेपाल रूट सिर्फ ध्यान भटकाने के लिए था…” कबीर ने वाक्य पूरा किया—“तो असली खेप पूर्व की तरफ जा रही है।” अदिति ने कागज़ कस लिया। “माधवी हमें बचा भी रही है और दूर भी रख रही है।” मीरा नाथ बोली, “क्योंकि वह जानती है, हम उसके पीछे भागेंगे। और तब बच्चे छूट जाएँगे।” नयना ने बचाए गए छोटे बच्चों को देखा। वे काँप रहे थे, भूखे थे, डरे हुए थे। पर वे जिंदा थे। गीत ने उन्हें ढूँढ़ लिया था। दूर मेला मैदान में पुलिस की लाइटें चमकने लगी थीं। मदद आ रही थी। नयना ने कहा, “आज बच्चों को पहले सुरक्षित करेंगे।” अदिति ने उसकी तरफ देखा। “और माधवी?” नयना ने धीरे से कहा, “वह चाहती है हम रूट बंद करें। हम दोनों करेंगे। पर क्रम वही होगा जो बच्चों को बचाए।” अदिति ने आँखें बंद कीं। बहन यह नहीं मानना चाहती थी। अधिकारी जानती थी—यह सही है। “ठीक,” उन्होंने कहा। “पूर्वी दरवाज़ा।” कबीर ने थकी आवाज़ में कहा, “हम नदी से सरहद, सरहद से पूर्व, गीत से डेटा, डेटा से बच्चे—यह कहानी नक्शा बन चुकी है।” मीरा नाथ ने बच्चों को देखते हुए कहा, “और नक्शा अभी पूरा नहीं।” नयना ने पायल का धागा खोला और छोटे बच्चे की कलाई पर हल्के से बाँध दिया, जो बांसुरी पकड़े था। “अब तुम अकेले नहीं हो,” उसने कहा। बच्चे ने पूछा, “नाम पूछोगी?” नयना ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। “नहीं। जब याद आए, तब बताना। अभी गीत सुनाओ।” बच्चे ने बांसुरी होंठों पर रखी। आवाज़ बहुत कमजोर थी। टूटती हुई। पर उसमें वही धुन थी— “आम के पेड़ तले…” मेला, सीमा, पुलिस, अपराधी, घबराहट—सब कुछ उस छोटी बांसुरी के सामने कुछ पल के लिए रुक गया। अदिति ने धीरे से कहा, “माधवी ने सही कहा था।” नयना ने पूछा, “क्या?” “नाम मत पूछना। गीत पूछना।” दूर पूर्व की दिशा में आसमान लाल हो रहा था। सूरज डूब रहा था, पर वहाँ कोई नई आग जलने वाली थी। और नयना जानती थी— अब लड़ाई सिर्फ बच्चों को ढूँढ़ने की नहीं रही। अब गीतों में छिपे रास्ते बंद करने की थी। पूर्वी दरवाज़ा खुलने से पहले।