Join Us:
दिशा-लाइव ग्रुप ने लॉन्च किया नया ब्रांड BizPry - लोकल से ग्लोबल तक 20 मई स्पेशल -इंटरनेट पर कविता कहानी और लेख लिखकर पैसे कमाएं - आपके लिए सबसे बढ़िया मौका साहित्य लाइव की वेबसाइट हुई और अधिक बेहतरीन और एडवांस साहित्य लाइव पर किसी भी तकनीकी सहयोग या अन्य समस्याओं के लिए सम्पर्क करें

आवाज़ नंबर 19 (भाग:15) This post in Under Review

Vinod 06 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 505 0 Hindi :: हिंदी

भाग 15: जिनकी आवाज़ बदली जानी थी

पायल की आवाज़ फोन कटने के बाद भी कमरे में बनी रही।

वह कोई बड़ी आवाज़ नहीं थी। सिर्फ एक बच्ची की फुसफुसाहट थी—डरी हुई, टूटी हुई, जल्दी में बोली गई। लेकिन उस फुसफुसाहट ने पूरी रात जागते हुए लोगों को फिर से खड़ा कर दिया।

“जल्दी आना। कल हमारी आवाज़ बदलेंगे।”

नयना ने यह वाक्य कम से कम बीस बार सुना।

हर बार उसके भीतर कुछ नया टूटता।

नाम छीनना उसने समझ लिया था। फाइलें बदलना समझ लिया था। मृत प्रमाणपत्र बनाना समझ लिया था। बच्चे को दत्तक, आश्रम, सेवा, पुनर्वास, प्रशिक्षण जैसे शब्दों में छिपाना भी समझ लिया था। लेकिन आवाज़ बदलना…

आवाज़ तो आखिरी चीज़ होती है।

जब नाम भूल जाएँ, चेहरा बदल जाए, उम्र बढ़ जाए, कागज़ जल जाएँ—तब भी कोई माँ अपने बच्चे की आवाज़ पहचान सकती है। कोई बच्चा माँ की लोरी पहचान सकता है। कोई पिता अपनी बेटी की “पापा” में पूरी दुनिया सुन सकता है।

अगर आवाज़ भी बदल दी जाए, तो बचता क्या है?

सुबह के साढ़े पाँच बजे अस्पताल के उसी कॉन्फ्रेंस रूम में सब फिर बैठे थे। बाहर अभी पूरा उजाला नहीं हुआ था। खिड़की से दिल्ली की पीली धुंध दिख रही थी। मेज पर ठंडी चाय, खुला लैपटॉप, नक्शे, फोन, मेडिकल फाइलें और आधे खाए बिस्कुट पड़े थे।

कबीर ने पायल की कॉल का ऑडियो स्क्रीन पर खोला। वेवफॉर्म छोटी-छोटी काँपती लकीरों जैसी दिख रही थी।

“लोकेशन पिंग बहुत कमजोर है,” उसने कहा। “सिर्फ इतना मिला—लखनऊ आउटर, रेलवे लाइन के पास, किसी बंद इंडस्ट्रियल ज़ोन के आसपास। फोन शायद पुराना था, इंटरनेट नहीं, सिर्फ सिक्योर कॉल रूट से जुड़ा।”

अदिति राणा वीडियो कॉल पर थीं। उनके पीछे पुलिस कंट्रोल रूम दिखाई दे रहा था। “लखनऊ पुलिस को अलर्ट भेज दिया गया है, लेकिन वहाँ आधिकारिक छापा मारने के लिए लोकेशन चाहिए। सिर्फ कॉल और ‘रेलवे लाइन के पास पीली दीवार’ से वारंट नहीं मिलेगा।”

कबीर ने कहा, “अगर बच्ची कह रही है कि कल आवाज़ बदलेंगे, तो वारंट आने तक आवाज़ बदल जाएगी।”

अदिति ने थकी हुई आँखों से उसे देखा। “मुझे पता है।”

“तो?”

“तो हमें लोकेशन पक्की करनी होगी। बिना शोर किए।”

नयना ने पूछा, “पायल ने जो गीत गुनगुनाया था—‘आम के पेड़ तले… नदिया बोले रे…’ क्या उससे कुछ मिल सकता है?”

महेश कश्यप, जो रात भर शायद सोए नहीं थे, धीरे से बोले, “यह पूर्वांचल की तरफ का लोकगीत लगता है। लेकिन शब्द बदल गए हैं। बच्चे अक्सर गीत का आधा हिस्सा याद रखते हैं। ‘आम के पेड़ तले’ कई जगह मिलता है।”

सुजाता ने कहा, “पायल ने अपना नाम ‘शायद पायल’ कहा। इसका मतलब उसे नाम पर भरोसा नहीं। लेकिन गीत शायद उसका असली सुराग हो।”

मीरा नाथ, जो खिड़की के पास खड़ी थी, बोली, “आवाज़ प्रशिक्षण में बच्चों से पहले उनके पुराने गीत गवाए जाते हैं।”

सब उसकी तरफ मुड़े।

उसने कुर्सी खींचकर बैठते हुए कहा, “मुझे याद है। आश्रम में जब मुझे आर्या बनाया गया था, वे पहले मेरी असली बोली रिकॉर्ड करते थे। मैं किस शब्द पर अटकती हूँ, कौन-सा अक्षर कैसे बोलती हूँ, रोते हुए मेरी आवाज़ कैसी होती है, गाते हुए कैसी। फिर धीरे-धीरे नया उच्चारण सिखाते थे। कहते थे—‘देवी की आवाज़ साफ़ होनी चाहिए।’ असल में वे मेरी पुरानी पहचान मिटा रहे थे।”

नयना ने पूछा, “कैसे?”

“पहले नाम बदलो। फिर गीत बदलो। फिर बोलने का तरीका। फिर याद। अगर बच्चा अपने पुराने घर का नाम बोलता है, तो उसे सुधारते—‘नहीं, वह सपना था।’ अगर वह माँ कहता, तो कहते—‘माँ आश्रम है।’ अगर वह अपनी भाषा बोलता, तो उसे दंड। फिर नई आवाज़ में रिकॉर्डिंग।”

कबीर ने धीरे से कहा, “ब्रेनवॉश प्लस वॉइस ट्रेनिंग।”

मीरा नाथ ने सिर हिलाया। “और अब शायद तकनीक भी। पायल ने कहा—कल आवाज़ बदलेंगे। यह सिर्फ बोलचाल की ट्रेनिंग नहीं लगती। शायद रिकॉर्डिंग होगी। शायद किसी और की आवाज़ की नकल। शायद किसी बच्चे से फोन पर झूठ बुलवाना।”

नयना ने कहा, “जैसे मेरे पास नकली पापा की आवाज़ आई थी।”

कबीर ने स्क्रीन पर पायल की वेवफॉर्म बढ़ाई। “यह सुनो।”

उसने कॉल का आखिरी हिस्सा चलाया—

“जल्दी आना। कल हमारी आवाज़ बदलेंगे।”

फिर बैकग्राउंड में बहुत हल्की आवाज़ आई। पहले शोर जैसी। कबीर ने ऑडियो साफ़ किया। आवाज़ फिर चली।

दूर से कोई बच्चा एक ही वाक्य दोहरा रहा था—

“मैं सुरक्षित हूँ। मुझे घर नहीं जाना।”

फिर दूसरा स्वर—

“मैं सुरक्षित हूँ। मुझे घर नहीं जाना।”

फिर तीसरा।

सभी बच्चों से वही वाक्य बुलवाया जा रहा था।

कमरे में सन्नाटा भर गया।

अर्चना ने धीरे से कहा, “वे बच्चों से गवाही रिकॉर्ड करवा रहे हैं।”

अदिति ने वीडियो कॉल पर नोट लिया। “यह महत्वपूर्ण है। अदालत में, मीडिया में, परिवारों को भेजने के लिए—‘बच्चा खुद कह रहा है कि वह सुरक्षित है।’”

कबीर ने मुट्ठी भींच ली। “अगर आवाज़ बदलकर भेजें तो परिवार मान भी सकता है।”

शशांक ने कहा, “या वॉइस क्लोनिंग से बच्चे को किसी और का बना सकते हैं। पुराने केसों में सिर्फ दस्तावेज़ बदलते थे। अब आवाज़ भी दस्तावेज़ है।”

नयना की आँखें पायल की वेवफॉर्म पर टिक गईं। “हमें आज ही जाना होगा।”

अदिति ने कहा, “मैं आधिकारिक टीम भेज रही हूँ। पर तुम्हें सीधे अंदर नहीं जाना चाहिए।”

कबीर ने हल्के से कहा, “मैडम, यह वाक्य अब हमारी कहानी का बैकग्राउंड म्यूज़िक बन गया है।”

अदिति ने उसकी तरफ कठोर नज़र से देखा। “और हर बार तुम अंदर जाकर घायल लौटे हो।”

“जी। लेकिन लौटे तो हैं।”

“कबीर,” राकेश ने धीमे कहा, “हर बार लौटना भाग्य नहीं, चेतावनी भी होता है।”

कबीर चुप हो गया।

राकेश अब भी कमजोर थे, पर उनकी आवाज़ में उस ड्राइवर की थकान थी जिसने बहुत रास्ते देखे थे और बहुत देर से बोलना शुरू किया था।

“लखनऊ रूट मैं जानता हूँ,” राकेश बोले। “पुराने सेवा-वाहन वहाँ रुकते थे। शहर में घुसने से पहले एक जगह थी—रेलवे यार्ड के पास। वहाँ बच्चों को वैन से उतारकर छोटे ऑटो या स्कूल बस में भेजते थे। बड़े वाहन ट्रेस हो जाते हैं। छोटे शहर में घुल जाते हैं।”

अदिति ने पूछा, “नाम?”

राकेश ने आँखें बंद कीं। “तब बोर्ड पर लिखा था—‘सुर साधना बाल केंद्र’। पर वह असली नाम नहीं होगा। सामने संगीत स्कूल, पीछे शेल्टर।”

मीरा नाथ ने धीरे से कहा, “सुर…”

नयना ने पायल की बात याद की—“एक दीदी ने फोन दिया। सब उसे सुर कहते हैं।”

कबीर ने तुरंत टाइप किया। “सुर साधना। लखनऊ। बाल केंद्र। संगीत स्कूल। रेलवे लाइन।”

कुछ सेकंड बाद उसने स्क्रीन घुमाई। “सीधे नाम से कुछ नहीं। पर ‘नवस्वर बाल कला संस्थान’ नाम की एक संस्था है। लोकेशन—लखनऊ आउटर, ऐशबाग यार्ड से आगे पुराना औद्योगिक क्षेत्र। बोर्ड पर संगीत और वोकल ट्रेनिंग। बाल कल्याण से जुड़ा हुआ। वेबसाइट बहुत साफ़-सुथरी, बहुत नकली।”

अदिति ने कहा, “स्क्रीन शेयर करो।”

कबीर ने वेबसाइट खोली। होमपेज पर मुस्कुराते बच्चों की स्टॉक जैसी फोटो। ऊपर लिखा—

**नवस्वर बाल कला संस्थान**
**हर बच्चे को अपनी आवाज़**

नीचे कार्यक्रम—
“वंचित बच्चों के लिए संगीत शिक्षा”
“आवाज़ चिकित्सा”
“आत्मविश्वास निर्माण”
“कानूनी पुनर्वास सहयोग”
“सुरक्षित आवासीय सुविधा”

नयना ने स्क्रीन घूरा। “हर बच्चे को अपनी आवाज़।”

मीरा नाथ ने ठंडे स्वर में कहा, “यही जगह है।”

अदिति ने कहा, “मैं लखनऊ टीम को यह भेजती हूँ। लेकिन तब तक वे सबूत नष्ट कर सकते हैं।”

कबीर ने पूछा, “अगर हम संगीत प्रशिक्षक बनकर जाएँ?”

अर्चना तुरंत बोलीं, “नहीं।”

कबीर ने कहा, “मैंने सिर्फ विचार रखा था। लोकतंत्र में विचार—”

“नहीं,” अर्चना ने फिर कहा।

नयना ने कहा, “इस बार हम आधिकारिक टीम के साथ काम करेंगे। अंदर कोई अकेला नहीं जाएगा।”

कबीर ने उसे देखा। “तू ठीक है? यह वही नयना है जो कल गेट देखकर भागी थी?”

“कल मेरा भाई अंदर था,” नयना बोली। “आज पायल है। और कई बच्चे। इसलिए गलती की गुंजाइश कम है।”

कबीर ने सिर हिलाया। “ठीक। तो प्लान?”

अदिति ने कहा, “तुम लोग लखनऊ जाओगे, लेकिन स्थानीय टीम के साथ। आधिकारिक रूप से तुम सलाहकार हो—डेटा पहचान, आवाज़ सत्यापन, पीड़ित पहचान। फील्ड में मेरी अनुमति के बिना प्रवेश नहीं।”

कबीर ने धीरे से नयना से कहा, “इसका मतलब हम प्रवेश करेंगे, पर अनुमति की परिभाषा लचीली होगी।”

अदिति ने वीडियो कॉल पर ही कहा, “मैं सुन रही हूँ।”

कबीर सीधे बैठ गया। “जी मैडम।”

नयना ने कहा, “सुजाता माँ आरव के साथ रहेंगी। अर्चना भी यहीं रहेंगी। पायल को निकालने के बाद बच्चों को संभालने के लिए हमें सुरक्षित जगह चाहिए।”

अर्चना ने सिर हिलाया। “मैं दिल्ली में बच्चों की पहचान प्रक्रिया देखूँगी। सुजाता आरव के साथ रहेंगी। महेश जी परिवारों की प्राथमिक सूची में मदद करेंगे। अरविंद अस्पताल से नोट भेजेंगे। तुम लोग लखनऊ जाओ।”

सुजाता ने नयना का हाथ पकड़ा। “पायल को बोलना—नाम वापस आता है। लेकिन धीरे।”

नयना ने कहा, “बोलूँगी।”

आरव, जो कुर्सी पर बैठे-बैठे जाग गया था, उनकी बात सुन रहा था। उसकी आँखें अभी भी डरी हुई थीं। उसने नयना को देखा और धीरे से पूछा—

“दीदी जाएगी?”

नयना उसके पास घुटनों के बल बैठ गई। “हाँ। एक बच्ची को लाना है।”

“वापस आएगी?”

नयना ने अरविंद का वाक्य याद किया—वादा नहीं, कोशिश।

पर आरव बच्चा था। कुछ वादे बच्चों को चाहिए होते हैं।

उसने कहा, “आऊँगी।”

आरव ने अपनी लाल कार उसकी तरफ बढ़ाई। “ले जाओ। डर नहीं लगेगा।”

नयना ने कार हाथ में ली। छोटी, टूटी हुई, लाल। उसने उसे ऐसे पकड़ा जैसे कोई ताबीज़ हो।

“धन्यवाद,” उसने कहा।

आरव ने पहली बार हल्की मुस्कान की।

---

लखनऊ की ट्रेन में जगह नहीं मिली।

सरकारी अनुमति से फ्लाइट मिल सकती थी, पर समय, पहचान और औपचारिकता की वजह से देर होती। आखिरकार निर्णय हुआ—रात वाली तेज़ गाड़ी से निकलना, रास्ते में अदिति की टीम और लखनऊ पुलिस से समन्वय। शशांक की एम्बुलेंस दिल्ली में बच्चों के काम के लिए रह गई। लखनऊ जाने वाली टीम छोटी थी—नयना, कबीर, मीरा नाथ, राकेश, और अदिति की ओर से एक अधिकारी—इंस्पेक्टर फरहान अली, जो लखनऊ में टीम से जुड़ने वाले थे।

शाम को स्टेशन पर भीड़ थी। प्लेटफॉर्म पर चाय, समोसा, कुली, उद्घोषणा, रोते बच्चे, झगड़ते यात्री, भागते लोग। नयना ने भीड़ में बच्चों के चेहरों को अलग नज़र से देखना शुरू कर दिया था। कौन सुरक्षित है? कौन डरा हुआ है? कौन किसके साथ है? कौन सचमुच परिवार के साथ, कौन ले जाया जा रहा? यह नज़र वरदान नहीं थी। यह बोझ थी।

कबीर ने उसका ध्यान देखा। “हर बच्चे को शक की नजर से मत देख। तू टूट जाएगी।”

“अगर किसी को छोड़ दिया तो?”

“तो हम सिस्टम बनाएँगे। अकेली आँख नहीं। नेटवर्क। याद है? आवाज़ नंबर 19।”

नयना ने गहरी साँस ली। “हाँ।”

मीरा नाथ चुप थी। उसके हाथ में लाल रिबन था। वह उसे बार-बार उँगली पर लपेटती और खोलती।

नयना ने पूछा, “डर लग रहा है?”

“हाँ,” उसने कहा। “लखनऊ जैसा केंद्र मैंने देखा है। वहाँ बच्चे रोते नहीं। क्योंकि उन्हें रोने का सुर भी सिखा दिया जाता है।”

कबीर ने कहा, “इस वाक्य से मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।”

मीरा नाथ ने आगे कहा, “पायल ने फोन किया। इसका मतलब वहाँ अंदर कोई है जो अभी पूरी तरह टूटा नहीं। वह ‘सुर’ दीदी कौन है, यह महत्वपूर्ण है। वह मदद कर रही है। या हमें बुला रही है।”

“जाल?” नयना ने पूछा।

“दोनों हो सकता है,” मीरा बोली। “कई बार जो जाल होता है, उसी में अंदर से कोई धागा काट रहा होता है।”

ट्रेन आई। लोहे की लंबी साँस। भीड़ हिली। वे चढ़े।

रात की यात्रा में नींद किसी को नहीं आई। राकेश ने पुराने रूट बताए—कहाँ एम्बुलेंस रुकती थीं, किस तरह बच्चे को “मरीज” दिखाया जाता, कब गाड़ी का नंबर बदलता, किस पेट्रोल पंप पर कोई सवाल नहीं पूछता। कबीर सुनता रहा। कभी-कभी नोट करता। कभी सिर्फ पिता का चेहरा देखता। उनके बीच बातचीत अब भी कठिन थी, लेकिन चुप्पी पहले जैसी जहरीली नहीं रही।

करीब आधी रात के बाद नयना खिड़की के पास बैठी थी। बाहर अँधेरे खेत, दूर गाँवों की रोशनी, कभी-कभी स्टेशन। उसे पायल की आवाज़ याद आ रही थी—“मेरा नाम शायद… पायल?”

शायद।

यह शब्द सबसे ज्यादा दर्द देता था।

क्योंकि बच्ची अपने नाम पर भी भरोसा नहीं कर पा रही थी।

कबीर सामने वाली सीट पर बैठा ऑडियो सुन रहा था। उसने अचानक इयरफोन उतारा। “एक चीज़ मिली।”

नयना झुककर बैठी।

“पायल की कॉल में बैकग्राउंड में जो ट्रेन की आवाज़ है, वह सामान्य ट्रेन नहीं। सुन।”

उसने आवाज़ बढ़ाई। पीछे से धातु की लंबी चर्र-चर्र, फिर पहियों की धीमी खड़खड़ाहट, फिर सीटी नहीं, सिर्फ ब्रेक की हवा।

“मालगाड़ी?” नयना ने पूछा।

“हाँ। और बहुत धीमी। मतलब यार्ड या शंटिंग लाइन। पायल ने सही कहा—रात में ट्रेन की आवाज़ आती है। नवस्वर बाल कला संस्थान ऐशबाग यार्ड की एक पुरानी शंटिंग लाइन से करीब सात सौ मीटर है।”

मीरा नाथ ने कहा, “वहीं।”

कबीर ने सिर हिलाया। “लगभग तय।”

नयना ने पूछा, “लगभग?”

“क्योंकि मैं अब पक्का शब्द इस्तेमाल करने से डरता हूँ। हर बार कहानी मुझे थप्पड़ मारती है।”

सुबह वे लखनऊ पहुँचे।

---

लखनऊ की सुबह दिल्ली से अलग थी।

हवा में धूल कम, नमी ज्यादा थी। स्टेशन के बाहर चाय की भाप, कुल्हड़ की गंध, ताज़ा कचौड़ी, रिक्शों की आवाज़, पुराने शहर की धीमी गरिमा। लेकिन टीम के पास शहर देखने का समय नहीं था।

इंस्पेक्टर फरहान अली स्टेशन के बाहर मिले। मध्यम कद, साफ़ दाढ़ी, आँखों में सजगता। उन्होंने बिना औपचारिकता के कहा, “गाड़ी उधर है। बात रास्ते में।”

कबीर ने धीरे से कहा, “मुझे ऐसे लोग पसंद हैं जो परिचय में समय बर्बाद नहीं करते।”

गाड़ी में बैठते ही फरहान ने फाइल खोली। “नवस्वर बाल कला संस्थान पिछले पाँच साल से रजिस्टर है। मालिकाना ट्रस्ट—‘स्वरांजलि सेवा फाउंडेशन’। चेयरपर्सन—स्मिता रावल। सलाहकार मंडल में वेदांत मेहरा का नाम था, दो साल पहले हटाया गया। फंडिंग में तीन शेल कंपनियाँ। बाल कल्याण विभाग से सीमित अनुमति। आवासीय सुविधा सिर्फ दस बच्चों के लिए स्वीकृत, पर हमारे सूत्र कहते हैं अंदर तीस से ज्यादा बच्चे हो सकते हैं।”

नयना ने पूछा, “छापा?”

“ऊपर से अनुमति माँगी है। जवाब—‘जाँच करिए, कार्रवाई में जल्दबाज़ी न करें।’ इसका अर्थ आप समझते हैं।”

कबीर ने कहा, “ऊपर में कोई नीचे वालों का दोस्त है।”

फरहान ने सपाट स्वर में कहा, “कई।”

मीरा नाथ ने पूछा, “अंदर जाने का तरीका?”

फरहान ने कहा, “आज शाम वहाँ ‘बाल स्वर मूल्यांकन’ कार्यक्रम है। कुछ बाहरी संगीत प्रशिक्षक आने वाले हैं। हमने उनमें से एक टीम को रोका है। उनके पहचान-पत्र से दो लोग अंदर जा सकते हैं।”

कबीर ने तुरंत हाथ उठाया। “मैं साउंड इंजीनियर।”

मीरा नाथ बोली, “मैं वॉइस ट्रेनर।”

नयना ने कहा, “मैं?”

फरहान ने उसकी तरफ देखा। “तुम बाहर रहोगी।”

“नहीं।”

“तुम्हारा चेहरा वायरल है। भैरव नेटवर्क तुम्हें पहचानता होगा।”

कबीर ने भी कहा, “वह सही कह रहे हैं।”

नयना ने दोनों को देखा। “तुम लोग अंदर जाओगे, पायल को पहचानोगे कैसे?”

मीरा नाथ ने कहा, “उसकी आवाज़ से।”

“और अगर वह बोल नहीं पाई?”

नयना ने आरव की लाल कार जेब से निकाली। “बच्चे भरोसे से बोलते हैं। मैं उससे बात कर चुकी हूँ।”

फरहान ने कहा, “जोखिम बहुत है।”

नयना ने शांत स्वर में कहा, “इसलिए मेरा रोल अंदर का नहीं, बाहर का रखिए। अगर बच्ची तक ऑडियो पहुँचे, मैं उससे बात करूँगी। अगर कोई पहचान की जरूरत हो, मैं बोलूँगी। लेकिन पूरी तरह बाहर नहीं रहूँगी।”

फरहान ने कुछ सोचा। “ठीक। तुम बाहर मोबाइल वैन में रहोगी। लाइव ऑडियो लिंक। अंदर कबीर और मीरा। राकेश जी पीछे के वाहन रूट पहचानेंगे। मैं टीम के साथ आसपास रहूँगा। छापा तभी जब लोकेशन, बच्चों की संख्या और अवैध कैद का दृश्य प्रमाण मिले।”

कबीर ने कहा, “मतलब हम अंदर जाकर सबूत लेकर बाहर आएँगे, बिना पकड़े।”

फरहान ने कहा, “हाँ।”

कबीर ने नयना की तरफ देखा। “कभी-कभी मुझे हमारे काम का जॉब डिस्क्रिप्शन बहुत अवास्तविक लगता है।”

---

नवस्वर बाल कला संस्थान बाहर से सुंदर था।

पीली दीवारें।

नीला गेट।

दीवार पर रंगीन म्यूरल—बच्चे माइक पकड़े गा रहे हैं। ऊपर बड़े अक्षरों में लिखा था—

**नवस्वर बाल कला संस्थान**
**हर बच्चे को अपनी आवाज़**

गेट के अंदर छोटा बगीचा। गुलदाउदी के पौधे। दीवार पर तानपुरा और तबले की पेंटिंग। एक तरफ प्रशासनिक भवन। पीछे लंबा हॉल। और उससे आगे वह हिस्सा जो बाहर से दिखाई नहीं देता था।

नयना मोबाइल वैन में बैठी थी। उसके सामने मॉनिटर। कबीर के बैग में छिपे कैमरे का फीड। मीरा नाथ के दुपट्टे में माइक्रोफोन। फरहान पास बैठा वायरलेस पर टीम से बात कर रहा था। राकेश पीछे की गली के नक्शे देख रहे थे।

कबीर और मीरा नाथ गेट पर पहुँचे।

गार्ड ने पूछा, “कौन?”

कबीर ने फाइल दिखाई। “दिल्ली से ऑडियो सपोर्ट। बाल स्वर मूल्यांकन।”

गार्ड ने सूची देखी। नाम मिल गए। उसने अंदर फोन किया। फिर गेट खोला।

कबीर फुसफुसाया, “प्रवेश मिल गया। अभी तक जीवित।”

नयना ने ईयरपीस में कहा, “मजाक कम।”

“नर्वस सिस्टम स्थिर रखने के लिए जरूरी।”

मीरा नाथ ने धीमे कहा, “अंदर की गंध वही है।”

“कौन-सी?” कबीर ने पूछा।

“फिनाइल, अगरबत्ती और डर।”

अंदर एक महिला ने उनका स्वागत किया। उम्र चालीस के आसपास, साड़ी, गले में आईडी कार्ड, चेहरे पर अभ्यास की हुई मुस्कान।

“मैं स्मिता रावल,” उसने कहा। “आप लोग थोड़ी देर से हैं। आज बच्चों का विशेष सत्र है।”

कबीर ने हाथ जोड़कर कहा, “जी, ट्रेन लेट थी। भारत की सांस्कृतिक परंपरा।”

स्मिता ने उसे समझा नहीं, या समझकर अनदेखा किया।

वे एक हॉल में ले जाए गए। हॉल में करीब बीस बच्चे बैठे थे। उम्र पाँच से चौदह। सभी सफेद कुर्ता-पायजामा या सलवार में। सामने हारमोनियम। दीवार पर लिखा—

**सुर में जीवन, अनुशासन में मुक्ति**

नयना ने स्क्रीन पर बच्चों को देखा। उसकी आँखें पायल को ढूँढ़ रही थीं।

कहीं कोई पायल?

एक लड़की तीसरी लाइन में बैठी थी। दुबली, बाल छोटे कटे हुए, आँखें झुकी हुईं। वह लगातार अपनी उँगलियों से घुटने पर कुछ लय बना रही थी।

मीरा नाथ ने जैसे उसे पहचान लिया। “तीसरी लाइन, बाईं तरफ। वही हो सकती है।”

कबीर ने बहुत हल्का कैमरा उसकी तरफ घुमाया।

नयना ने स्क्रीन पर देखा। लड़की ने एक पल सिर उठाया। उसकी आँखें कैमरे की दिशा में नहीं, मीरा नाथ की आवाज़ की दिशा में गईं। फिर वह तुरंत झुक गई।

स्मिता ने ताली बजाई। “बच्चो, आज बाहर से विशेषज्ञ आए हैं। वे आपकी आवाज़ जाँचेंगे। जो बच्चे अच्छे रहेंगे, उन्हें कल मुख्य केंद्र भेजा जाएगा।”

एक बच्चा काँप गया।

“मुख्य केंद्र” शब्द पर हॉल में बहुत हल्की डर की लहर दौड़ी।

मीरा नाथ ने फुसफुसाया, “मुख्य केंद्र मतलब शिफ्टिंग।”

कबीर ने उपकरण सेट करने का नाटक किया। “कितने बच्चे मुख्य केंद्र जाएँगे?”

स्मिता ने मुस्कुराकर कहा, “जो योग्य होंगे। हम बच्चों को अवसर देते हैं।”

मीरा नाथ ने पूछा, “क्या आज रिकॉर्डिंग होगी?”

“हाँ,” स्मिता बोली। “पहले बेस वॉइस, फिर करेक्शन, फिर नई स्क्रिप्ट।”

“नई स्क्रिप्ट?” मीरा ने पूछा।

“आत्मविश्वास वाक्य,” स्मिता बोली। “जैसे—‘मैं सुरक्षित हूँ। मुझे डर नहीं।’ ट्रॉमा रिकवरी में मदद मिलती है।”

नयना ने वैन में दाँत भींच लिए।

कबीर ने कहा, “बहुत अच्छा। क्या बच्चे अपना नाम बोलेंगे?”

स्मिता की मुस्कान एक सेकंड के लिए रुकी। “जो नाम संस्थान रिकॉर्ड में है, वही।”

मीरा नाथ ने धीमे स्वर में कहा, “और अगर बच्चे को दूसरा नाम याद हो?”

स्मिता ने उसकी तरफ देखा। “यादें भ्रम भी हो सकती हैं। हम बच्चों को स्थिर पहचान देते हैं।”

मीरा नाथ की उँगलियाँ कस गईं। “स्थिर या नई?”

स्मिता ने मुस्कुराते हुए कहा, “दोनों में फर्क हमेशा स्पष्ट नहीं होता।”

कबीर ने तुरंत बीच में कहा, “चलिए रिकॉर्डिंग शुरू करें? ऑडियो लेवल सेट कर लेते हैं।”

स्मिता ने बच्चों को संकेत दिया।

पहला बच्चा उठा। माइक के सामने आया। कागज़ पढ़ा—

“मेरा नाम देव है। मैं सुरक्षित हूँ। मुझे घर नहीं जाना।”

उसकी आवाज़ सपाट थी। जैसे यह वाक्य कई बार रटवाया गया हो।

दूसरा बच्चा।

“मेरा नाम आरुष है। मैं सुरक्षित हूँ। मुझे घर नहीं जाना।”

तीसरा।

चौथा।

हर बच्चा वही वाक्य।

नयना की उँगलियाँ आरव की लाल कार पर कसती गईं।

फिर तीसरी लाइन वाली लड़की की बारी आई।

वह धीरे-धीरे उठी। उसके पाँव में पायल नहीं थी। शायद नाम इसलिए पायल था? या कभी रही होगी?

स्मिता ने कहा, “प्रीति, साफ़ बोलना।”

लड़की माइक के सामने खड़ी हुई।

कबीर ने ऑडियो लेवल बढ़ाया।

स्मिता ने कागज़ उसके हाथ में दिया।

लड़की ने पढ़ना शुरू किया—

“मेरा नाम…”

वह रुक गई।

स्मिता की आँखें तेज़ हुईं। “प्रीति।”

लड़की ने दोबारा कहा—

“मेरा नाम प्रीति है। मैं सुरक्षित हूँ। मुझे घर नहीं जाना।”

उसकी आवाज़ काँप रही थी।

नयना ने ईयरपीस में बहुत धीरे कहा, “उससे गीत बोलवाओ।”

मीरा नाथ ने तुरंत कहा, “एक मिनट। इस बच्ची की प्राकृतिक आवाज़ जाँचना चाहूँगी। कोई लोकगीत याद है?”

स्मिता ने कहा, “इन बच्चों को पुराने ट्रिगर से दूर रखा जाता है।”

मीरा ने ठंडे स्वर में कहा, “वॉइस असेसमेंट बिना प्राकृतिक सुर के अधूरा है।”

कबीर ने टेक्निकल अंदाज़ में जोड़ा, “जी, वरना फॉर्मेंट बेसलाइन नहीं मिलेगी।”

स्मिता ने शब्द नहीं समझे, पर विरोध करना उसे अनपढ़ दिखा सकता था। उसने बच्ची को देखा। “छोटा गाओ।”

लड़की चुप।

नयना ने वैन से माइक्रोफोन में बहुत हल्के स्वर में गुनगुनाया—

“आम के पेड़ तले…”

कबीर ने वह ऑडियो अपने मॉनिटर से हल्का-सा माइक के पास प्ले कर दिया, जैसे टेस्ट टोन हो।

लड़की के चेहरे पर बिजली-सी कौंधी।

उसने आँखें उठाईं।

मीरा नाथ ने नरम स्वर में कहा, “आगे?”

लड़की के होंठ काँपे।

फिर उसने बहुत धीमे गाया—

“नदिया बोले रे…”

नयना की आँखें भर आईं।

पायल।

स्मिता का चेहरा बदल गया। “बस। पर्याप्त है।”

मीरा नाथ ने कहा, “नहीं, बच्ची की आवाज़ खुल रही है।”

स्मिता ने सख्ती से कहा, “मैंने कहा बस।”

कबीर ने हॉल के पीछे कैमरा घुमाया। वहाँ एक दरवाज़ा था जिस पर लिखा था—**रिकॉर्डिंग कक्ष**। उसके पास दो आदमी खड़े थे। एक के हाथ में टैबलेट। स्क्रीन पर बच्चों की सूची। कुछ नामों के सामने लाल निशान।

कबीर ने फुसफुसाया, “नयना, हमें पीछे का कमरा चाहिए।”

फरहान ने वैन में कहा, “दृश्य प्रमाण मिल रहा है, पर अभी कैद नहीं दिखी।”

राकेश ने पीछे से कहा, “बच्चों की वैन कहाँ है?”

नयना ने मॉनिटर बदला। बाहर दूसरी टीम ने गली का फीड भेजा। संस्थान के पीछे दो मिनी बसें खड़ी थीं। इंजन बंद, पर ड्राइवर अंदर।

राकेश बोले, “शिफ्टिंग आज होगी।”

फरहान ने वायरलेस पकड़ा। “टीम तैयार रहे।”

हॉल में स्मिता ने घोषणा की—“आज का सत्र यहीं समाप्त। जिन बच्चों के नाम पुकारे जाएँगे, वे रिकॉर्डिंग कक्ष में आएँ।”

उसने सूची पढ़नी शुरू की।

“प्रीति।”

पायल उठी।

“देव।”

एक छोटा लड़का।

“आरुष।”

“सिया।”

“मनन।”

छह बच्चे चुने गए।

मीरा नाथ ने नयना को बहुत धीमे कहा, “ये आवाज़ बदलने वाले बच्चे हैं।”

कबीर ने उपकरण समेटने का नाटक किया। “हम रिकॉर्डिंग कक्ष में सेटअप लेकर आएँ?”

स्मिता ने कहा, “नहीं। वहाँ हमारा सिस्टम है।”

“तो हम ऑडियो क्वालिटी कैसे—”

“जरूरत नहीं।”

अब उसके स्वर में मुस्कान नहीं थी।

मीरा नाथ ने पायल की ओर देखा। बच्ची की आँखों में साफ़ विनती थी।
मत छोड़ो।

नयना वैन में सीट से उठ गई। “मैं अंदर जा रही हूँ।”

फरहान ने कहा, “रुको।”

“वह अभी ले जाएँगे।”

“टीम मूव कर रही है।”

“देरी हुई तो—”

उसी समय पायल ने अचानक माइक पकड़ लिया।

शायद यह उसकी आखिरी हिम्मत थी।

उसने बहुत तेज़, काँपती आवाज़ में कहा—

“मेरा नाम प्रीति नहीं है!”

हॉल जम गया।

स्मिता चीखी—“माइक बंद करो!”

पायल ने आँखें बंद कीं और चिल्लाई—

“मेरा नाम पायल है! मुझे घर जाना है!”

बच्चे हिल गए। कुछ रोने लगे। एक छोटा लड़का बोला—“मुझे भी घर जाना है।” दूसरी बच्ची—“मेरा नाम सिया नहीं है।” तीसरा—“मुझे मम्मी चाहिए।”

स्मिता का चेहरा क्रोध से भर गया। “सभी बच्चों को अंदर ले जाओ!”

दो आदमी आगे बढ़े।

मीरा नाथ उनके बीच आ गई।

“हाथ मत लगाना।”

कबीर ने तुरंत हॉल का मुख्य ऑडियो लाइव कर दिया। वैन में, फरहान की टीम के पास, रिकॉर्डिंग शुरू।

स्मिता ने उसकी ओर देखा। “तुम लोग कौन हो?”

कबीर ने कहा, “आवाज़ विभाग।”

बाहर सायरन नहीं बजा था। फरहान ने शायद चुपचाप घेरना चुना था। लेकिन संस्थान के अंदर अब शोर फैल चुका था।

पीछे के दरवाज़े से एक आदमी भागता हुआ आया। “मैडम, पुलिस की गाड़ी दिखी है!”

स्मिता ने पायल की तरफ देखा। “इसको नीचे ले जाओ।”

नीचे।

मीरा नाथ का चेहरा बदल गया। हर ऐसे केंद्र में एक “नीचे” होता था।

कबीर ने ईयरपीस में कहा, “फरहान, अब।”

फरहान की आवाज़ आई—“टीम प्रवेश कर रही है।”

उसी पल हॉल की लाइट बंद हो गई।

पूरी तरह अँधेरा।

बच्चे चीखने लगे।

कबीर ने जेब से छोटी टॉर्च निकाली। “पायल!”

अँधेरे में भागते कदमों की आवाज़। किसी ने कबीर को धक्का दिया। वह गिरा। मीरा नाथ ने पायल का हाथ पकड़ने की कोशिश की, पर कोई उसे खींचकर रिकॉर्डिंग कक्ष की तरफ ले गया।

नयना वैन से बाहर निकल चुकी थी। फरहान ने उसे रोकना चाहा, पर वह गेट की तरफ भागी। गेट आधा खुला था। पुलिस अंदर घुस रही थी। गार्ड भाग रहे थे। बच्चे रो रहे थे।

नयना हॉल में पहुँची।

अँधेरे में उसने सिर्फ आवाज़ सुनी—

“दीदी!”

पायल।

रिकॉर्डिंग कक्ष की तरफ।

नयना दौड़ी।

कबीर ने पीछे से चिल्लाया, “नयना, रुक!”

पर वह रुक नहीं सकी।

रिकॉर्डिंग कक्ष का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर से हल्की नीली रोशनी आ रही थी। नयना अंदर घुसी।

कमरा छोटा नहीं था। यह असली स्टूडियो था। दीवारों पर फोम, सामने माइक्रोफोन, कंप्यूटर, हेडफोन, बच्चों के नामों वाली फाइलें, और एक बड़ा काँच। काँच के पार दूसरा कमरा था।

वहाँ पायल कुर्सी से बाँधी जा रही थी।

उसके सिर पर हेडफोन चढ़ाया जा रहा था।

एक आदमी कंप्यूटर पर कमांड चला रहा था। स्क्रीन पर लिखा था—

**Voice Reassignment Session**
**Subject: Preeti / Pending**
**Original voice sample detected**
**Overwrite training: Begin?**

नयना का खून जम गया।

उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। अंदर से लॉक था।

“पायल!” वह चिल्लाई।

पायल ने उसे देखा। आँखों में पहचान की बिजली।

“दीदी!”

कंप्यूटर वाला आदमी मुड़ा। उसके चेहरे पर मास्क था। उसने स्क्रीन पर कुछ दबाया।

स्पीकर से अचानक नयना की अपनी आवाज़ गूँजी—

“पायल, डरो मत। मैं तुम्हें लेने आई हूँ।”

नयना जम गई।

यह उसकी आवाज़ थी।

बिल्कुल उसकी।

लेकिन उसने यह वाक्य अभी नहीं बोला था।

कंप्यूटर वाला आदमी धीरे-धीरे मास्क उतारने लगा।

कबीर और मीरा नाथ दरवाज़े पर पहुँचे।

नयना ने काँच के पार आदमी को देखा।

वह मुस्कुरा रहा था।

अजनबी नहीं।

वह भैरव नहीं था। वेदांत नहीं। स्मिता भी नहीं।

वह एक युवा आदमी था, शायद तीस के आसपास, साफ़ चेहरा, आँखों में खतरनाक स्थिरता।

उसने इंटरकॉम चालू किया और नयना की ही आवाज़ में कहा—

“कहानी में स्वागत है, नयना।”

फिर अपनी असली आवाज़ में बोला—

“मैं वह हूँ जो आवाज़ें सिर्फ बदलता नहीं… बनाता है।”

कबीर ने फुसफुसाया, “यह कौन है?”

आदमी ने स्क्रीन पर एक फाइल खोली।

फाइल का नाम था—

**VOICE_19_SOURCE_MASTER**

नयना का दिल रुक गया।

आदमी ने कहा—

“तुम्हारे पिता की आवाज़, तुम्हारी आवाज़, पायल की आवाज़… सब मेरे पास है। और अब पुलिस भी सुनेगी वही, जो मैं चाहूँगा।”

बाहर पुलिस के कदम नज़दीक आ रहे थे।

अंदर स्क्रीन पर कमांड चमकी—

**Overwrite training: 10 seconds**

पायल कुर्सी पर बँधी रो रही थी।

नयना ने काँच पर मुट्ठी मारी।

“उसे छोड़ दो!”

आदमी मुस्कुराया।

“पहले अपनी आवाज़ बचाओ,” उसने कहा।

काउंटडाउन शुरू हो चुका था।

दस।

नौ।

आठ।

और पहली बार नयना को लगा—

भैरव ने नाम छीने थे।

यह आदमी आवाज़ का जन्म ही बदल सकता था।

Comments & Reviews

Post a comment

Login to post a comment!

Related Articles

बहुत समय पहले की बात है रहमान चाचा के यहाँ एक चूहा रहता था. हर दिन की तरह उस दिन भी बाज़ार से गाँव लौटते वक़्त चाचा झोले में कुछ सामान लेकर � read more >>
सच्चे भाई सुबह की योगा क्लास लेने के बाद मैं पार्क से होते हुए बाजार वाली रोड पर सैर के लिए निकल पड़ी । सुबह के व� read more >>
लड़का: शुक्र है भगवान का इस दिन का तो मे कब से इंतजार कर रहा था। लड़की : तो अब मे जाऊ? लड़का : नही बिल्कुल नही। लड़की : क्या तुम मुझस read more >>
Join Us: