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आवाज़ नंबर 19 (भाग:14) This post in Under Review

Vinod 06 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 449 0 Hindi :: हिंदी

भाग 14: जिनके नाम लौटने बाकी हैं

दिल्ली के निजामपुर शेल्टर से अठारह बच्चे निकाले गए थे।

टीवी चैनलों ने पहले इसे “बड़ी सफलता” कहा। फिर “सनसनीखेज़ खुलासा” कहा। फिर शाम होते-होते वही बहस शुरू हो गई जो हर बड़े सच के बाद इस देश में शुरू होती है—किसकी साजिश? किसका एजेंडा? कौन-सा धर्म बदनाम किया जा रहा है? किस पार्टी को फायदा होगा? वीडियो असली है या एडिटेड? लड़की कौन है? वह सच बोल रही है या किसी ने उसे सिखाया है?

पर अस्पताल के बाल वार्ड में इन बहसों की कोई आवाज़ नहीं थी।

वहाँ सिर्फ बच्चों की धीमी साँसें थीं।

किसी बच्चे को नींद की दवा दी गई थी। कोई डर से सो नहीं पा रहा था। कोई नर्स का हाथ पकड़कर ही लेटना चाहता था। दो बच्चे हर दस मिनट पर पूछते—“हमें वापस तो नहीं भेजेंगे?” एक बच्ची, जिसकी उम्र शायद सात साल होगी, खाने की प्लेट को बिस्तर के नीचे छिपा रही थी। जब नर्स ने पूछा क्यों, तो उसने कहा—“बाद में भूख लगेगी, तब कौन देगा?”

नयना दरवाज़े पर खड़ी सब देख रही थी।

किसी की कलाई पर अस्पताल का नया बैंड था। किसी की पुरानी पहचान मिट चुकी थी। किसी को अपना नाम याद था, पर गाँव नहीं। किसी को गाँव याद था, नाम नहीं। एक बच्चा अपना नाम “मन्नू” बता रहा था, पर फाइल में उसका कोड “D-14” था। एक बच्ची खुद को “आरुषि” कह रही थी, लेकिन रिकॉर्ड में उसका नाम “रुखसाना” निकल रहा था। कौन सच था? कौन उसे सिखाया गया था? कौन-सा नाम जन्म का था और कौन-सा बचाव का? यह तय करना अब सिर्फ कागज़ का काम नहीं था। यह आत्मा की सिलाई थी।

आरव सुजाता की गोद में सो रहा था।

सोते हुए भी उसने उनकी साड़ी का पल्लू पकड़ा हुआ था। जैसे डर हो कि हाथ छूटा तो फिर कोई उसे किसी वैन में डाल देगा। सुजाता लगातार उसका माथा सहला रही थीं। उनकी आँखें खुली थीं। वे सो नहीं रहीं थीं। शायद डर रही थीं कि नींद आई तो कहीं यह सब सपना न निकले।

नयना उनके पास बैठी।

“कुछ खाया आपने?” उसने पूछा।

सुजाता ने सिर हिलाया। “तू?”

“नहीं।”

“तो पहले तू खा।”

नयना हल्का मुस्कुराई। “आप अभी भी माँ ही हैं।”

सुजाता ने कहा, “और तू अभी भी बच्ची ही है। बस दुनिया ने तेरे हाथ में फाइल पकड़ा दी है।”

नयना ने आरव के बालों पर हाथ फेरा। “उसे मुझे याद नहीं होगा।”

“उसे खुद भी खुद याद नहीं,” सुजाता ने कहा। “बच्चे याद से नहीं, भरोसे से लौटते हैं।”

“अगर वह कभी मुझे बहन न माने?”

सुजाता ने उसकी तरफ देखा। “रिश्ता घोषित करने से नहीं बनता। रोज़ बैठने से बनता है। तू बैठना। वह मान लेगा। शायद नाम से नहीं, गंध से। आवाज़ से। किसी दिन तुझे देखकर चुप हो जाएगा, फिर समझना—पहचान शुरू हुई।”

नयना की आँखें भर आईं।

इतने में कबीर आया। हाथ में तीन पेपर कप—चाय। उसकी चाल में थकान थी, पर चेहरे पर वही कोशिश कि माहौल टूटे नहीं।

“एक चाय जन्म-माँ के लिए, एक पालन-माँ की बेटी के लिए, और एक मेरे लिए क्योंकि मैं खुद को इस कहानी का कैफीन विभाग घोषित करता हूँ।”

सुजाता ने चाय ली। “तू बहुत बोलता है।”

कबीर ने गंभीरता से सिर हिलाया। “जी। यह बीमारी है। पर कंट्रोल में है।”

नयना ने कप लिया। “क्या खबर है?”

कबीर ने फोन स्क्रीन उसे दिखाई। वीडियो पोस्ट हो चुका था। बच्चों के चेहरे धुंधले थे। नयना का बयान साफ़ था। लाखों लोग देख चुके थे। हजारों कमेंट। कुछ समर्थन। कुछ सवाल। कुछ गालियाँ। कुछ लोग अपने गायब बच्चों की तस्वीरें पोस्ट कर रहे थे। कोई लिख रहा था—“मेरे भाई का नाम भी सूची में देखो।” कोई—“1998 में मेरी बहन गायब हुई थी।” कोई—“भैरवनाथ निर्दोष हैं, यह झूठ है।” कोई—“मेरे पास पुराने आश्रम की फोटो है।” कोई—“मेरा बेटा दत्तक गया था, पर प्रक्रिया अजीब थी।”

नयना ने स्क्रीन देखते हुए कहा, “यह बहुत बड़ा हो रहा है।”

कबीर ने कहा, “हाँ। और बहुत गंदा भी। भैरव की टीम ने भी काम शुरू कर दिया है। कुछ चैनल कह रहे हैं कि हमें विदेशी फंडिंग मिली है। एक चैनल ने मुझे ‘स्वघोषित डिजिटल एक्टिविस्ट’ कहा है। सुनकर अच्छा लगा। करियर बन रहा है।”

“और भैरव?”

कबीर का चेहरा गंभीर हो गया। “उसकी मेडिकल जांच हुई। वकील पहुँच गए। आधिकारिक बयान आया है—बाबा बीमार हैं, उन्हें राजनीतिक और धार्मिक षड्यंत्र में फँसाया गया है। वे कह रहे हैं कि गर्भगृह एक ‘बाल सुरक्षा निगरानी केंद्र’ था।”

नयना ने गहरी साँस ली। “वे बच्चों को निगरानी कहेंगे, कैद नहीं।”

“हाँ। और वेदांत मेहरा का वकील कह रहा है कि वह पंजीकृत शेल्टर चला रहा था। बच्चों का स्थानांतरण ‘आपात सुरक्षा प्रोटोकॉल’ था। कागज़ दिखा देंगे। हमारे पास भावनात्मक कहानी है, उनके पास फाइलें हैं।”

“हमारे पास भी फाइलें हैं।”

“हाँ,” कबीर बोला, “लेकिन फाइलें समझाने के लिए लोग चाहिए। डेटा को सबूत बनाना पड़ेगा। वरना यह सब वायरल होकर थक जाएगा। लोगों का ध्यान आज है, कल कोई नया तमाशा आ जाएगा।”

नयना ने खिड़की से बाहर देखा। अस्पताल के बाहर मीडिया खड़ी थी। माइक। कैमरे। चीखते रिपोर्टर। “नयना जी एक बयान!” “क्या आप बाबा को जानती थीं?” “क्या यह धर्म-विरोधी साजिश है?” “आपका असली नाम क्या है?” “क्या आपने अपने पालक परिवार को धोखा दिया?” “क्या देवव्रत नाथ ने आपको भेजा?”

उसने धीमे कहा, “वे कहानी बदल देंगे।”

कबीर ने कहा, “तो हमें अपनी कहानी बार-बार, साफ़-साफ़ बोलनी होगी। बिना ड्रामा। बिना खाली आरोप। नाम, तारीख, फाइल, गवाही, लोकेशन। और बच्चों की पहचान सुरक्षित।”

नयना ने उसकी तरफ देखा। “तू यह सब कब से इतना गंभीरता से सोचने लगा?”

कबीर ने चाय का घूँट लिया। “जिस दिन पता चला कि मेरे पिता कायर नहीं, कैदी थे। आदमी अचानक बड़ा हो जाता है जब उसे अपने गुस्से पर शर्म आती है।”

नयना चुप हो गई।

कबीर ने बात हल्की करने की कोशिश की। “लेकिन चिंता मत कर, मेरा बचकानापन अभी पूरी तरह मरा नहीं है। बस अस्थायी छुट्टी पर है।”

तभी गलियारे में तेज़ कदमों की आवाज़ आई। अदिति राणा आईं। उनके साथ दो अधिकारी और एक महिला बाल मनोवैज्ञानिक थीं।

“हमें बात करनी है,” अदिति ने कहा।

“किस बारे में?” नयना ने पूछा।

“बच्चों की पहचान प्रक्रिया, मीडिया प्रोटोकॉल, और तुम्हारी सुरक्षा।”

कबीर ने कहा, “सुरक्षा शब्द सुनते ही डर लगता है। आमतौर पर इसके बाद किसी को कहीं बंद कर दिया जाता है।”

अदिति ने उसे देखा। “कभी-कभी बंद करना बचाना होता है। लेकिन इस केस में मैं समझती हूँ कि तुम लोग बंद नहीं रहोगे।”

“अच्छा है। आप सीख रही हैं।”

अदिति ने सीधे नयना से कहा, “तुम्हें आज रात से सुरक्षित स्थान पर ले जाना होगा। भैरव के लोग अभी भी सक्रिय हैं। सोशल मीडिया पर तुम्हारा पता, पुरानी फोटो, कॉलेज, नौकरी—सब निकालने की कोशिश हो रही है।”

नयना ने कहा, “मैं छिपूँगी नहीं।”

“छिपना और सुरक्षित रहना अलग बात है,” अदिति ने कहा। “तुम्हारे जिंदा रहने से केस मजबूत है। तुम्हारी बहादुरी की जरूरत है, लापरवाही की नहीं।”

अर्चना भी वहाँ आ पहुँची थीं। उन्होंने तुरंत कहा, “मैं इस बात से सहमत हूँ।”

नयना ने माँ की तरफ देखा। “आप कब आईं?”

“जब तू फिर से बहादुरी के नाम पर बेवकूफी करने वाली थी,” अर्चना बोलीं।

कबीर ने हाथ उठाया। “आंटी, यह वाक्य हमारे ग्रुप का मोट्टो होना चाहिए।”

अर्चना ने उसे घूरा। “तू भी इसमें शामिल है।”

“जी, मैं तो संस्थापक सदस्य हूँ।”

अदिति ने फाइल खोली। “पहला मुद्दा—बच्चों के नाम सार्वजनिक नहीं होंगे। जब तक परिवार सत्यापित न हो, कोई मीडिया एक्सपोज़र नहीं। दूसरा—जो डिजिटल वीडियो तुमने जारी किया, वह ठीक था क्योंकि चेहरे धुंधले थे। आगे से कोई भी सामग्री हमारी बाल सुरक्षा टीम से क्लीयर करानी होगी।”

कबीर ने कहा, “मैडम, अगर हम हर चीज़ क्लीयर कराएँगे तो आधी खबर मर जाएगी।”

अदिति ने शांत स्वर में कहा, “और अगर बिना क्लीयर किए पोस्ट करोगे तो कोई बच्चा फिर से खतरे में पड़ जाएगा। चुनो।”

कबीर चुप हो गया।

नयना ने कहा, “ठीक है। बच्चों की सुरक्षा पहले।”

“तीसरा,” अदिति बोलीं, “आवाज़ नंबर 19 को आधिकारिक सहयोगी समूह की तरह रजिस्टर करना होगा। वरना तुम लोगों की गतिविधि कानून में संदिग्ध मानी जा सकती है।”

कबीर ने धीरे से कहा, “हमने संगठन का नाम कल रात डर में रखा था, अब सरकार रजिस्ट्रेशन माँग रही है। विकास तेज़ है।”

अदिति ने उसे अनदेखा किया। “तुम्हें वकील, डेटा विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, बाल संरक्षण अधिकारी और फील्ड वेरिफिकेशन टीम चाहिए। सिर्फ भावनात्मक वीडियो से काम नहीं चलेगा।”

नयना ने सिर हिलाया। “कौन मदद करेगा?”

अदिति ने कहा, “कुछ लोग करेंगे। कुछ डरेंगे। कुछ बिकेंगे। तुम्हें पहचानना सीखना होगा।”

अर्चना ने पूछा, “भैरव का क्या?”

“कस्टडी माँगी गई है,” अदिति बोलीं। “पर उसके वकील मेडिकल आधार पर अस्पताल शिफ्ट चाहते हैं। अगर वह अस्पताल गया तो उससे मिलना, पूछताछ, सब मुश्किल होगा।”

नयना ने कहा, “वह भाग सकता है?”

अदिति ने बिना भाव बदले कहा, “ऐसे लोग चलते नहीं, निकलवाए जाते हैं। इसलिए हमें जल्दी मजबूत केस बनाना है।”

“वेदांत?”

“अभी पूछताछ में सहयोग नहीं कर रहा। उसके पास सभी कागज़ वैध दिखते हैं। शेल्टर पंजीकृत था। बच्चों के नाम अलग-अलग राज्यों से रेफर दिखाए गए हैं। कुछ कागज़ असली सरकारी पोर्टल से निकले हैं।”

कबीर ने दाँत भींचे। “मतलब नेटवर्क सिस्टम के अंदर है।”

“हाँ,” अदिति बोलीं। “और यही सबसे बड़ी समस्या है।”

नयना ने पूछा, “अगला रूट?”

अदिति ने फाइल से एक नक्शा निकाला। “डेटा में पाँच सक्रिय रूट मिले—लखनऊ, सूरत, जयपुर, नेपाल बॉर्डर, और एक विदेशी दत्तक मार्ग। लेकिन अभी सबसे ताज़ा गतिविधि लखनऊ रूट पर दिख रही है। टैग—**L-सेवा गृह / आवाज़ प्रशिक्षण**।”

मीरा नाथ, जो अब तक पीछे खड़ी थी, तुरंत आगे आई। “आवाज़ प्रशिक्षण?”

अदिति ने उसे देखा। “तुम्हें कुछ पता है?”

मीरा नाथ का चेहरा सख्त हो गया। “हाँ। जिन बच्चों की आवाज़ अच्छी होती थी, उन्हें अलग रखा जाता था। भजन, प्रवचन, फोन कॉल, रिकॉर्डेड संदेश, नकली गवाही—कई कामों में। वे आवाज़ से पहचान बनाते थे, फिर उसी आवाज़ से झूठ बोलवाते थे।”

कबीर ने धीरे से कहा, “वॉइस क्लोनिंग का पुराना, मानवीय संस्करण।”

मीरा नाथ ने कहा, “और अब तकनीक भी होगी। अगर लखनऊ रूट आवाज़ प्रशिक्षण है, तो वहाँ सिर्फ बच्चे नहीं—रिकॉर्डिंग्स भी होंगी।”

नयना के कानों में “आवाज़ 19” गूँज गई।

“क्या वहाँ पापा की आवाज़ का इस्तेमाल हुआ होगा?” उसने पूछा।

मीरा नाथ ने कहा, “शायद। या और लोगों की।”

अदिति ने कहा, “इसलिए अभी कोई फील्ड मूवमेंट नहीं। पहले डेटा विश्लेषण।”

नयना ने विरोध करना चाहा, पर अर्चना ने उसका हाथ दबाया।

“पहले आरव,” अर्चना ने कहा। “फिर दुनिया।”

नयना ने आरव को देखा। वह सुजाता की गोद में सो रहा था। हर बचाया हुआ बच्चा एक नया युद्ध था—डॉक्टर, बयान, पहचान, परिवार, डर, नींद, भरोसा। वह उसे छोड़कर अगले खतरे में भाग नहीं सकती थी।

कम से कम अभी नहीं।

---

शाम तक अस्पताल के एक खाली कॉन्फ्रेंस रूम को अस्थायी नियंत्रण-कक्ष बना दिया गया।

दीवार पर बड़ा बोर्ड लगाया गया—
**आवाज़ नंबर 19 — नाम पुनर्पहचान कार्य**

कबीर ने मार्कर से नीचे छोटे अक्षरों में लिख दिया—
**“ड्रामा कम, डेटा ज्यादा।”**

अर्चना ने देखा और कहा, “तू यह मिटा।”

कबीर ने कहा, “यह हमारी कार्य-संस्कृति है।”

अर्चना ने मार्कर उठाया और उसके नीचे लिख दिया—
**“और खाना समय पर।”**

कबीर ने सम्मान से सिर झुका दिया। “आंटी, आप सह-संस्थापक हैं।”

रूम में लोग थे—नयना, कबीर, मीरा नाथ, शशांक, राकेश, सुजाता, महेश, अर्चना, अदिति की टीम के दो अधिकारी, और वीडियो कॉल पर अस्पताल से अरविंद। अरविंद को आखिरकार भर्ती कर दिया गया था। डॉक्टर ने कड़ी हिदायत दी थी कि वे बोलेंगे नहीं। इसलिए वे स्लेट पर लिखकर कैमरे के सामने दिखाते थे।

पहला काम था—बचाए गए अठारह बच्चों की प्राथमिक सूची बनाना।

कबीर ने स्क्रीन पर टेबल खोली।

कॉलम:
**अस्थायी कोड**
**बच्चे द्वारा बताया नाम**
**फाइल में नाम**
**संभावित असली नाम**
**उम्र**
**पहचान चिह्न**
**याद के शब्द**
**भाषा/लहजा**
**तत्काल स्वास्थ्य स्थिति**
**परिवार सत्यापन स्थिति**

नयना ने टेबल देखा और धीमे से कहा, “बच्चों को फिर से फाइल बना रहे हैं।”

महेश ने कहा, “फर्क है। पहले फाइल से बच्चे मिटाए गए थे। अब फाइल से बच्चे खोजे जाएँगे। लेकिन सावधान रहना—कागज़ फिर बच्चा न बन जाए।”

यह बात सबने नोट की।

मनोवैज्ञानिक ने कहा, “किसी बच्चे से बार-बार नाम मत पूछिए। याद पर दबाव डालने से झूठी याद भी बन सकती है। उन्हें सुरक्षित महसूस करने दें। वे खेल, गीत, खाने की पसंद, बोली, गाली, स्थानीय शब्द—इनसे पहचान देंगे।”

सुजाता ने कहा, “लोरी से भी।”

मीरा नाथ ने जोड़ा, “डर से भी। कौन-सा शब्द सुनकर बच्चा काँपता है, कौन-सी गंध से छिपता है, कौन-सा नाम सुनकर चुप हो जाता है—सब सुराग हैं।”

शशांक ने धीरे से कहा, “फोटो भी। पुराने परिवार फोटो भेजेंगे। चेहरे उम्र के साथ बदलते हैं, लेकिन कान, आँखों का अंतर, माथे की रेखा, जन्म-चिह्न…”

कबीर ने उसकी तरफ देखा। “मामा, यह काम आपको करना होगा। लेकिन इस बार कुछ छिपाया तो…”

शशांक ने बात पूरी की। “तो मैं खुद पुलिस के पास जाऊँगा।”

कबीर ने कहा, “नहीं। इस बार हम आपको लेकर जाएँगे।”

राकेश ने बेटे को देखा। “कबीर…”

“पापा, आप भी बच नहीं रहे। आपका ड्राइवर लॉग चाहिए। जितने रूट याद हों, सब।”

राकेश ने सिर हिलाया। “दूँगा।”

नयना ने महसूस किया—यह टीम किसी आदर्श योजना से नहीं बनी थी। यह टूटे हुए लोगों का समूह था। अपराधी, गवाह, पीड़ित, माँएँ, पिता, दोस्त, झूठे, डरपोक, बहादुर—सब। पर शायद सच की लड़ाई में पवित्र लोग नहीं, ईमानदार क्षण काम आते हैं। और इस समय वे सब एक ईमानदार क्षण में बैठे थे।

वीडियो कॉल पर अरविंद ने स्लेट उठाई। उस पर लिखा था—

**नाम पढ़ते समय आवाज़ स्थिर रखो। रोओ मत। परिवार रोएगा। तुम संभालना।**

कबीर ने पढ़कर कहा, “अंकल, आप अस्पताल से भी प्रशिक्षण दे रहे हैं।”

अरविंद ने दूसरा शब्द लिखा—

**जरूरी।**

नयना ने पूछा, “क्या हमें सार्वजनिक पोर्टल बनाना चाहिए?”

कबीर ने कहा, “हाँ, लेकिन खुला नहीं। लोग बच्चों की फोटो अपलोड करेंगे, झूठे दावे भी होंगे, ट्रोल भी। हमें सत्यापन परत चाहिए। परिवारों के लिए सुरक्षित फॉर्म। पुलिस और बाल आयोग के साथ सीमित डेटा शेयर। पब्लिक में सिर्फ अपील।”

अदिति के अधिकारी ने कहा, “सही। हम आधिकारिक हेल्पलाइन सेट कर रहे हैं। लेकिन भरोसा आपकी तरफ ज्यादा आएगा। लोग पुलिस से डरेंगे।”

अर्चना ने कहा, “तो दोनों नंबर साथ जारी होंगे। एक सरकारी, एक आवाज़ नंबर 19। लेकिन बच्चे को लेने कोई सीधे नहीं आएगा। पहले सत्यापन।”

सुजाता ने आरव की तरफ देखा। “अगर कोई झूठा परिवार आ जाए?”

मनोवैज्ञानिक बोलीं, “आएँगे। इसलिए जल्दी नहीं। डीएनए, पुराने रिकॉर्ड, स्थानीय गवाही, बच्चे की प्रतिक्रिया—सब।”

नयना ने चौंककर पूछा, “डीएनए?”

महेश ने धीमे से कहा, “तुम्हारा भी होगा।”

कमरे में हल्की चुप्पी छा गई।

डीएनए।
अब तक नाम, आवाज़, याद, गोद, मिट्टी—सब थे। पर यह विज्ञान का ठोस दरवाज़ा था। यह बता सकता था कि नयना सचमुच महेश और सुजाता की बेटी है। आरव सचमुच उसका भाई है। और शायद कई भ्रम टूटेंगे।

अर्चना ने नयना की तरफ देखा। “डर रही है?”

नयना ने सच कहा। “हाँ।”

सुजाता ने उसका हाथ पकड़ा। “रिपोर्ट कुछ भी कहे, तू मेरी है।”

अर्चना ने दूसरा हाथ पकड़ा। “और मेरी भी।”

कबीर ने धीरे से कहा, “और हमारी टीम की भी। यह कानूनी रूप से शायद कमजोर दावा है, पर भावनात्मक रूप से मजबूत।”

नयना हँसी। थकी हुई, भीगी हुई, लेकिन हँसी।

“ठीक है,” उसने कहा। “डीएनए भी।”

---

रात करीब साढ़े दस बजे पहली सार्वजनिक अपील रिकॉर्ड की गई।

कमरा शांत किया गया। बच्चों के चेहरे नहीं दिखाए गए। सिर्फ एक मेज, उस पर पुरानी फाइलें, एक लाल रिबन, एक नीला क्लिप, और बीच में एक खाली नाम-पट्टी।

कबीर कैमरे के पीछे था।

“रेडी?” उसने पूछा।

नयना ने गहरी साँस ली।

अर्चना, सुजाता, मीरा नाथ और महेश उसके पीछे खड़े थे। अरविंद वीडियो कॉल पर स्क्रीन में थे। उनके हाथ में स्लेट थी—**धीरे बोलो।**

नयना ने सिर हिलाया।

रिकॉर्डिंग शुरू हुई।

“नमस्ते। मेरा नाम नयना कश्यप है। कुछ लोग मुझे मीरा अवस्थी के नाम से जानते हैं। आज मैं उन परिवारों से बात कर रही हूँ जिनका कोई बच्चा कभी गायब हुआ, मृत घोषित हुआ, या किसी संस्था, आश्रम, दत्तक केंद्र, शेल्टर, सेवा-ट्रस्ट या काम के नाम पर उनसे अलग हो गया।”

वह रुकी।

“हमने ‘आवाज़ नंबर 19’ नाम से एक नाम-पुनर्पहचान पहल शुरू की है। यह कोई भीड़-न्याय अभियान नहीं है। यह बच्चों की सुरक्षा, कानूनी सत्यापन और परिवारों की खोज का काम है। कृपया बच्चों की फोटो सार्वजनिक रूप से पोस्ट न करें। हमारे सुरक्षित फॉर्म और आधिकारिक हेल्पलाइन पर जानकारी दें। हर दावा जाँचा जाएगा। हर बच्चे की सुरक्षा पहले होगी।”

उसने लाल रिबन उठाया।

“कई बार पहचान एक रिबन में छिपी होती है।”

फिर नीला क्लिप।

“कई बार एक क्लिप में।”

फिर खाली नाम-पट्टी।

“कई बार बच्चे को अपना नाम फिर से सिखाना पड़ता है। हम जल्दबाज़ी नहीं करेंगे। हम रुकेंगे भी नहीं।”

उसकी आवाज़ थोड़ी भारी हुई, पर टूटी नहीं।

“अगर आपका बच्चा कहीं है, उसका नाम बचा है। अगर नाम नहीं बचा, उसकी आवाज़ बची होगी। अगर आवाज़ नहीं बची, उसकी आँखें, उसकी आदतें, उसका डर, उसका गीत—कुछ न कुछ बचा होगा। हम उसे खोजेंगे।”

वह सीधे कैमरे में देखी।

“नाम वापस दो।”

कबीर ने रिकॉर्डिंग बंद की।

कमरे में कुछ पल कोई नहीं बोला।

फिर अरविंद ने स्क्रीन पर स्लेट उठाई—

**अच्छी रिपोर्ट।**

नयना मुस्कुराई। “धन्यवाद, संपादक जी।”

कबीर ने कहा, “मैं इसे एडिट करता हूँ। बैकग्राउंड म्यूज़िक नहीं डालूँगा। सच को बीजीएम की ज़रूरत नहीं।”

मीरा नाथ ने कहा, “अंत में बच्चों की सुरक्षा वाला डिस्क्लेमर फिर डालना।”

“हाँ,” कबीर बोला। “और कमेंट मॉडरेशन चाहिए। ट्रोल आएँगे।”

अर्चना ने पूछा, “ट्रोल क्या?”

कबीर ने कहा, “डिजिटल मोहल्ले के बदतमीज़ लोग।”

अर्चना ने गंभीरता से कहा, “उनकी भी सूची बनाना।”

कबीर ने नयना की तरफ देखा। “तुम्हारी माँ डरावनी हैं।”

नयना ने कहा, “मैंने पहले ही बताया था।”

---

रात गहरी होने लगी।

कॉन्फ्रेंस रूम धीरे-धीरे खाली हुआ। बच्चे सुरक्षित वार्ड में थे। पुलिस पहरे पर थी। बाहर मीडिया अभी भी थी। भैरव और वेदांत हिरासत में थे। डेटा फोरेंसिक टीम ने कॉपी ले ली थी। सब कुछ व्यवस्थित दिख रहा था।

पर नयना को नींद नहीं आ रही थी।

वह अस्पताल की छत पर चली गई।

दिल्ली रात में भी जागती रहती है। दूर फ्लाईओवर पर गाड़ियों की लाइटें बह रही थीं। कहीं सायरन। कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। हवा में धूल थी, लेकिन मझगवाँ की काली पहाड़ी जैसा अँधेरा नहीं। यह शहर रोशनी में छिपता था।

कुछ देर बाद कबीर भी आया। हाथ में दो चाय।

“तू जहाँ जाती है, चाय विभाग पहुँच जाता है,” उसने कहा।

नयना ने कप लिया। “तू सोया नहीं?”

“सोने गया था। सपने में भैरव ने कंट्रोल रूम खोल लिया। उठ गया।”

“डर लग रहा है?”

“हाँ,” कबीर ने बिना मज़ाक के कहा। “तुझे?”

“बहुत।”

दोनों छत की दीवार से टिक गए।

कुछ देर बाद नयना ने पूछा, “तुझे अपने पापा से क्या कहना है?”

कबीर ने लंबी साँस ली। “इतना कुछ है कि कुछ भी नहीं कह पा रहा। गुस्सा भी है, दया भी, शर्म भी। मैं उन्हें कायर मानकर बड़ा हुआ। वह कैदी निकले। लेकिन उन्होंने पहले डरकर भागने की कोशिश की थी। तो क्या मेरा गुस्सा पूरी तरह गलत था? पता नहीं।”

“रिश्ते साफ़ नहीं होते,” नयना ने कहा। “नामों की तरह।”

कबीर ने उसे देखा। “तू अब दार्शनिक हो गई है।”

“तहखाने में उतरने के बाद लोग बदल जाते हैं।”

“सही बात।”

कुछ देर बाद कबीर ने कहा, “तू दो माँओं के साथ क्या करेगी?”

नयना ने कहा, “शायद पहले दोनों की डाँट अलग-अलग खाऊँगी। फिर देखूँगी।”

“और दो नाम?”

“दोनों रखूँगी।”

“नयना मीरा कश्यप अवस्थी?” कबीर ने पूछा। “आधार कार्ड की लाइन टूट जाएगी।”

नयना हँसी। “कानूनी नाम बाद में तय होगा। अभी मुझे फर्क नहीं पड़ता। मैं जानती हूँ कि मीरा प्यार से मिला था और नयना जन्म से। दोनों में कोई लड़ाई नहीं।”

कबीर ने सिर हिलाया। “तू भाग्यशाली है। मुझे कब्बू वापस मिला है। यह नाम मैं कोर्ट में चुनौती दूँगा।”

नयना फिर हँसी।

लेकिन हँसी पूरी होने से पहले उसका फोन बजा।

अदिति का दिया सुरक्षित फोन।

स्क्रीन पर कोई नंबर नहीं। सिर्फ लिखा—

**UNKNOWN SECURE LINE**

नयना और कबीर ने एक-दूसरे को देखा।

कबीर ने तुरंत रिकॉर्डिंग ऑन की।

नयना ने कॉल उठाई।

“हलो?”

कुछ सेकंड सिर्फ साँस।

फिर एक बच्ची की आवाज़ आई। बहुत धीमी।

“क्या आप आवाज़ नंबर 19 हो?”

नयना का दिल धड़क उठा।

“हाँ,” उसने कहा। “तुम कौन हो?”

बच्ची चुप रही। फिर फुसफुसाई—

“मुझे मेरा नाम नहीं पता।”

नयना की आँखें भर आईं। “तुम कहाँ हो?”

बच्ची ने शायद किसी से छिपकर फोन किया था। आवाज़ काँप रही थी।

“यहाँ हमें गाना सिखाते हैं। जो रोता है, उसे नीचे भेजते हैं। आज दीदी ने कहा टीवी पर नाम आ रहे हैं। क्या नाम सच में वापस मिलते हैं?”

नयना ने कबीर की तरफ देखा। कबीर का चेहरा सख्त हो गया।

“हाँ,” नयना ने धीरे कहा। “मिलते हैं। तुम डरो मत। जहाँ हो वहाँ कोई बोर्ड, कोई नाम, कोई रंग, कोई आवाज़ बता सकती हो?”

बच्ची ने कहा, “दीवार पीली है। बाहर घंटी बजती है। सब लोग कहते हैं—लखनऊ सेवा गृह। लेकिन रात में ट्रेन की आवाज़ आती है।”

लखनऊ।

आवाज़ प्रशिक्षण।

नयना ने फोन कस लिया। “तुम्हारे पास कितना समय है?”

“थोड़ा। फोन छिपाकर रखा है। एक दीदी ने दिया। उसने कहा, अगर बाहर की दुनिया सच में है तो इस नंबर पर बोलना।”

“उस दीदी का नाम?”

“वो अपना नाम नहीं बोलती। सब उसे ‘सुर’ कहते हैं।”

कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “सुर?”

बच्ची की साँस तेज़ हुई। “कोई आ रहा है।”

“रुको,” नयना ने जल्दी से कहा। “तुम्हें कोई गीत याद है? कोई शब्द? कुछ भी जो तुम्हारा हो?”

बच्ची ने बहुत धीरे गुनगुनाया—

“आम के पेड़ तले… नदिया बोले रे…”

फिर तुरंत फुसफुसाई—

“मेरा नाम शायद… प… पायल?”

दूर से किसी दरवाज़े की आवाज़ आई।

बच्ची घबरा गई। “वे आ गए।”

“फोन छिपा दो,” नयना ने कहा। “हम आएँगे। सुन रही हो? हम आएँगे।”

बच्ची ने बहुत धीरे कहा—

“जल्दी आना। कल हमारी आवाज़ बदलेंगे।”

कॉल कट गई।

छत पर हवा रुक गई।

कबीर ने फोन की स्क्रीन देखी। “लोकेशन?”

नयना ने सुरक्षित फोन चेक किया। “आंशिक पिंग। लखनऊ आउटर। रेलवे लाइन के पास।”

कबीर ने आँखें बंद कर लीं। “तो अगला रूट पक्का।”

नयना ने नीचे अस्पताल की रोशनी देखी। वहाँ आरव सो रहा था। सुजाता जाग रही होंगी। अर्चना शायद बयान लिख रही होंगी। अरविंद अस्पताल के कमरे में स्लेट पकड़े होंगे। मीरा नाथ शायद अपने लाल रिबन को देख रही होगी। और लखनऊ में कोई बच्ची अपनी आवाज़ बदल दिए जाने से पहले किसी अजनबी को फोन कर रही थी।

नयना ने बहुत धीरे कहा, “वे आवाज़ बदलेंगे।”

कबीर ने पूछा, “मतलब?”

“शायद बच्चों से गवाही रिकॉर्ड करवाएँगे। शायद वॉइस ट्रेनिंग। शायद नकली कॉल। शायद आवाज़ छीनना।”

कबीर की आवाज़ गंभीर हो गई। “तो हमें सोने का मौका नहीं मिलेगा।”

नयना ने फोन जेब में रखा।

“नींद बाद में,” उसने कहा।

“लखनऊ?” कबीर ने पूछा।

नयना ने सिर हिलाया।

“लेकिन इस बार,” कबीर बोला, “बिना प्लान नहीं। आधिकारिक टीम, बैकअप, डेटा, और चाय।”

नयना ने उसे देखा। “चाय ज़रूरी है?”

“लड़ाई लंबी है। संस्कृति बचानी है।”

नीचे से अर्चना की आवाज़ आई—

“नयना! कबीर! नीचे आओ। खाना ठंडा हो रहा है।”

कबीर ने आसमान की तरफ देखा। “देखा? मिशन कंट्रोल से आदेश आ गया।”

नयना ने पहली बार उस रात सुकून की छोटी-सी लहर महसूस की।

दुनिया में शांत कुआँ अभी भी जिंदा था। लखनऊ से आवाज़ आई थी। बच्चे अभी भी फँसे थे। भैरव जेल में होकर भी मुस्कुरा रहा होगा। वेदांत कानून की भाषा में रास्ते खोज रहा होगा।

लेकिन अब दूसरी तरफ भी आवाज़ थी।

नाम वापस दो।

और यह आवाज़ अब अकेली नहीं थी।

नयना सीढ़ियों की तरफ बढ़ी। कबीर उसके साथ।

नीचे जाने से पहले उसने आखिरी बार दिल्ली की रात देखी।

फिर कहा—

“पायल को ढूँढ़ना है।”

कबीर ने धीरे से जवाब दिया—

“और उसके नाम को भी।”

रात ने यह बात सुन ली।

शायद किसी और शहर तक पहुँचा भी दी।

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