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आवाज़ नंबर 19 (भाग:12) This post in Under Review

Vinod 06 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 495 0 Hindi :: हिंदी

भाग 12: गर्भगृह

गर्भगृह में भगवान नहीं था।

वहाँ स्क्रीनें थीं।

दीवार से दीवार तक, ऊपर से नीचे तक, छोटे-बड़े मॉनिटर जल रहे थे। कुछ पर लाइव कैमरे। कुछ पर फाइलों की सूचियाँ। कुछ पर नक्शे। कुछ पर बच्चों के चेहरे। कुछ पर स्कूल प्रमाणपत्र, आधार कार्ड, जन्म रजिस्टर, अस्पताल की स्लिप, मृत्यु प्रमाणपत्र। कमरे में अगरबत्ती की गंध नहीं, गरम मशीनों, बंद हवा और झूठे दस्तावेज़ों की गर्मी थी।

बाहर आश्रम में भीड़ गरज रही थी।

अंदर भैरव प्रताप की साँस नयना के कान के पास थी। उसके हाथ में चाकू था। चाकू की ठंडी धार नयना के गले को छू रही थी। डर शरीर में फैल रहा था, पर उसका ध्यान डर पर नहीं, स्क्रीन पर था।

एक स्क्रीन पर पाँच साल का बच्चा रो रहा था। कमरे में कोई नहीं था, लेकिन कैमरा चालू था। बच्चे के हाथ में टूटी हुई लाल कार थी।

दूसरी स्क्रीन पर एक किशोरी बैठी थी। वह घुटनों को सीने से लगाए दीवार से लगी थी। उसके बाल कटे हुए थे। स्क्रीन के कोने में लिखा था—**Unit B-Delhi Transit**।

तीसरी स्क्रीन पर एक कंप्यूटर विंडो खुली थी—
**नई सूची — चरण 2**
**कुल सक्रिय रिकॉर्ड: 43**
**प्राथमिक श्रेणी: पहचान-परिवर्तन / दत्तक मार्ग / धार्मिक संरक्षण / श्रम-स्थानांतरण**

नयना के होंठ सूख गए।

अठारह साल पुराना शांत कुआँ खत्म नहीं हुआ था।

उसने सिर्फ कपड़े बदल लिए थे।

भैरव ने धीमे स्वर में कहा, “देखा? तुम लोग अतीत लेकर आई थीं। मैंने भविष्य दिखा दिया।”

नयना ने बोलने की कोशिश की, पर चाकू की धार गले पर और सख्त हो गई।

“धीरे,” भैरव फुसफुसाया। “बहुत बोल चुकी हो।”

दरवाज़े के बाहर कदमों की आवाज़ तेज़ हुई। कबीर की आवाज़ आई—

“नयना!”

नयना ने जवाब देना चाहा। भैरव ने उसकी गर्दन पर पकड़ कस दी।

“एक शब्द,” उसने कहा, “और दिल्ली वाली यूनिट खाली हो जाएगी। बच्चा कहाँ गया, कोई नहीं पूछ पाएगा। फाइलें मिटेंगी, कैमरे बंद होंगे, लोग बदल जाएँगे। तुम मुझे पकड़ लोगी, तो भी नेटवर्क बच जाएगा। तुम नेटवर्क बचाओगी, तो शायद मैं चला जाऊँगा। चुनो।”

दरवाज़े के बाहर कबीर ने जोर से कहा, “दरवाज़ा खोल, बाबा! वरना तोड़ दूँगा!”

भैरव हल्का हँसा। “लड़का अपने पिता पर गया है। देर से समझता है, जोर से बोलता है।”

नयना ने दाँत भींचे। “तुम हार चुके हो।”

“हार?” भैरव ने कमरे में लगी स्क्रीनों की तरफ देखा। “हार उस आदमी की होती है जिसके पास एक नाम हो, एक चेहरा हो, एक अपराध हो। मेरे पास व्यवस्था है। मैं भैरव प्रताप हूँ, बाबा भैरवनाथ हूँ, सेवा ट्रस्ट हूँ, बाल कल्याण समिति हूँ, दानदाता हूँ, स्कूल का संरक्षक हूँ, अस्पताल का सलाहकार हूँ, मीडिया का आध्यात्मिक चेहरा हूँ। तुम किसे पकड़ोगी?”

बाहर मीरा नाथ की आवाज़ आई—“नयना, अंदर हो?”

नयना ने भैरव की पकड़ में रहते हुए स्क्रीनों पर नज़र दौड़ाई। कमरे में एक कंसोल था। उसके सामने मुख्य कंप्यूटर। दाईं तरफ सर्वर रैक। बाईं तरफ पुराने रिकॉर्डिंग उपकरण। एक कोने में तिजोरी। छत पर दो कैमरे। दरवाज़े के ऊपर लाल लाइट। और सामने की दीवार पर लकड़ी के फ्रेम में लिखा वाक्य—

**मौन से बड़ा कोई संरक्षण नहीं।**

नयना को उल्टी-सी आने लगी।

उसने धीरे से कहा, “तुम बच्चों को धर्म के नाम पर बेचते हो।”

भैरव ने सुधार किया, “सुरक्षित स्थान देता हूँ।”

“नाम बदलकर?”

“कुछ नाम बोझ होते हैं।”

“माँ-बाप से छीनकर?”

“कई माँ-बाप बच्चों को भूख देते हैं। हम पहचान देते हैं।”

“मृत घोषित करके?”

“मृत रिकॉर्ड नया जीवन शुरू करने का सबसे आसान कागज़ है।”

नयना ने महसूस किया कि यह आदमी पागल नहीं था। यह अपने अपराध को सिद्धांत की भाषा में बदल चुका था। यही उसे सबसे खतरनाक बनाता था। वह खुद को खलनायक नहीं मानता था। वह खुद को व्यवस्था से भी ऊपर मानता था।

दरवाज़े पर जोरदार चोट पड़ी।

भैरव ने चाकू हटाए बिना दूसरे हाथ से कंसोल पर एक बटन दबाया।

दरवाज़े के बाहर लगे स्पीकर से उसकी आवाज़ गूँजी—

“रुको। अंदर एक कदम भी बढ़ाया तो दिल्ली, लखनऊ, सूरत और नेपाल रूट—सभी फाइलें मिट जाएँगी। जिन बच्चों को बचाने का नाटक कर रहे हो, उनका पता कभी नहीं चलेगा।”

बाहर सन्नाटा।

कबीर की आवाज़ आई, इस बार नियंत्रित—“तू ब्लफ कर रहा है।”

भैरव ने नयना के सामने स्क्रीन पर एक कमांड विंडो खोली। उसने उँगली से एक लाइन दिखायी—

**Emergency Purge Protocol — Active**

“ब्लफ नहीं,” उसने कहा। “सिर्फ प्रबंधन।”

बाहर से अर्चना की आवाज़ आई—“नयना, कुछ मत करना जल्दबाज़ी में।”

माँ।

अर्चना की आवाज़ सुनते ही नयना के भीतर की घबराहट थोड़ी जमीन पर लौटी।

भैरव ने अर्चना की आवाज़ पहचान ली। “अर्चना। तुम्हें हमेशा जल्दी रहती थी। उस रात भी। अगर तुमने सही बच्ची उठाई होती तो कहानी शायद अलग होती।”

दरवाज़े के बाहर कुछ हलचल हुई। शायद अर्चना आगे आई थीं।

“सही बच्ची?” अर्चना की आवाज़ काँपी नहीं। “मैंने बच्ची उठाई थी। सही-गलत तुम जैसे लोग बनाते हो। माँ सिर्फ बचाती है।”

भैरव की आँखों में एक पल को चिढ़ चमकी।

नयना ने वही क्षण पकड़ा।

उसने पूछा, “तुम्हें डर किससे है? फाइलों से? आवाज़ से? या इस बात से कि जिन लोगों को तुमने नामों में बाँटा, वे अब एक-दूसरे को पहचानने लगे हैं?”

भैरव ने चाकू की धार थोड़ा दबाई। हल्की जलन हुई। नयना ने दर्द सहा, आवाज़ नहीं निकाली।

“बहुत बोलती हो,” भैरव बोला।

“पत्रकार की बेटी हूँ।”

“किसकी? महेश की? अरविंद की? या उस झूठ की जो अर्चना ने पाला?”

नयना ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “तीनों की। और यही तुम्हारी समस्या है। तुमने लोगों से नाम छीने। हमने रिश्ते वापस जोड़ लिए।”

भैरव की पकड़ एक पल ढीली हुई।

अचानक कमरे की एक स्क्रीन झपकी।

फिर दूसरी।

फिर तीसरी।

भैरव ने स्क्रीन की तरफ देखा।

कंसोल पर छोटा संदेश आया—

**External audio ping detected**

भैरव सख्त हुआ। उसने जल्दी से कीबोर्ड पकड़ा।

बाहर से कबीर की धीमी आवाज़ आई, जैसे वह दरवाज़े से नहीं, किसी इंटरकॉम से बोल रहा हो—

“बाबा, पुरानी चीज़ों को कभी बेकार मत समझो। तुमने खुद कहा था, सच को प्रबंधन चाहिए। हम सीख रहे हैं।”

भैरव ने दाँत भींचे। “लड़का सिस्टम में घुस गया?”

नयना ने पहली बार हल्की मुस्कान की। “तुम्हें लगा वह सिर्फ मज़ाक करता है?”

भैरव ने उसे धक्का देकर कंसोल की तरफ खींचा। “पासवर्ड डालो।”

“मुझे नहीं पता।”

“झूठ बोलोगी तो पहले दिल्ली वाला बच्चा गायब होगा।”

नयना ने स्क्रीन की तरफ देखा। उस बच्चे की लाल कार अभी भी उसके हाथ में थी। वह रोते-रोते सो गया था। उसका चेहरा नयना के भीतर उतर गया।

“मैं सच कह रही हूँ,” उसने कहा।

“तो अपने लोगों से कहो रुक जाएँ।”

भैरव ने इंटरकॉम चालू किया। “बोलो।”

नयना ने माइक की तरफ देखा।

बाहर सब सुन रहे होंगे—कबीर, मीरा नाथ, अर्चना, शायद अरविंद, सुजाता, महेश, देवव्रत, राकेश।

उसने धीरे कहा, “कबीर, रुक जा।”

बाहर चुप्पी।

कबीर की आवाज़ आई—“तू सच में कह रही है या चाकू गले पर है?”

भैरव ने चाकू थोड़ा और दबाया।

नयना ने कहा, “चाकू है। लेकिन बात सच है। बच्चों की लाइव लोकेशन मिट सकती है। सिस्टम को समझे बिना छेड़ना मत।”

कुछ पल चुप्पी।

फिर कबीर बोला, “ठीक। मैं नहीं छेड़ रहा।”

भैरव ने राहत की बहुत छोटी साँस ली।

कबीर ने आगे कहा, “पर कोई और छेड़ रहा है।”

भैरव का चेहरा बदल गया।

कंसोल पर अचानक नया संदेश उभरा—

**User: VASANTI entered archive layer**

देवव्रत।

मीरा नाथ की माँ का नाम—वासंती।

भैरव गरजा, “देवव्रत!”

बाहर से देवव्रत की कमजोर मगर साफ़ आवाज़ आई—

“तुम्हें लगा था मुझे पासवर्ड याद नहीं होंगे?”

भैरव ने गुस्से में कंसोल पर टाइप करना शुरू किया। “तुम्हें तो मर जाना चाहिए था, नाथ।”

देवव्रत बोला, “मर गया था। बेटी ने बुला लिया।”

मीरा नाथ की आवाज़ आई—“जल्दी करो।”

देवव्रत ने कहा, “मैं आर्काइव खोल रहा हूँ, मिटा नहीं रहा। बच्चों की लोकेशन कॉपी हो रही है।”

भैरव ने स्क्रीन पर देखा। सचमुच डेटा कॉपी हो रहा था।

**Archive Route Maps — 12%**
**Active Child Records — 18%**
**Transit Nodes — 24%**

भैरव ने तुरंत अपना मास्टर कोड डालना चाहा।

नयना ने उसी क्षण उसकी कलाई पकड़ ली।

वह जानती थी कि वह ताकत में उससे नहीं जीत सकती। पर उसे बस दो सेकंड चाहिए थे। उसने पूरी ताकत से उसकी उँगलियों को कीबोर्ड से दूर धकेला। भैरव ने चाकू उसकी गर्दन से हटाकर हाथ छुड़ाने के लिए झटका दिया। यही मौका था।

नयना ने सिर पीछे मारकर उसके चेहरे पर चोट की।

भैरव लड़खड़ाया।

चाकू गिरा नहीं, पर उसकी पकड़ ढीली हुई। नयना नीचे झुकी, उसकी बाँह से निकलकर कंसोल की दूसरी तरफ गई। भैरव ने झपट्टा मारा, लेकिन वह स्क्रीनों के बीच रखी कुर्सी से टकराया।

दरवाज़े पर बाहर से जोरदार चोट पड़ी।

“नयना!” कबीर चिल्लाया।

भैरव ने दरवाज़े का लॉक फिर सक्रिय किया। “कोई अंदर नहीं आएगा!”

नयना कंसोल के पास खड़ी थी। सामने कई बटन। कौन-सा क्या करता है, उसे नहीं पता था। लेकिन एक चीज़ समझ में आई—भैरव डेटा मिटाना चाहता था। देवव्रत कॉपी कर रहा था। उसे समय चाहिए था।

भैरव फिर उसकी तरफ बढ़ा।

“तुम्हें पता भी है क्या कर रही हो?” उसने कहा।

“हाँ,” नयना ने कहा। “देरी।”

भैरव ने हमला किया। नयना बगल हट गई। उसने टेबल पर रखा धातु का छोटा गणेश उठाकर उसकी कलाई पर मारा। चाकू गिरा। भैरव ने उसके बाल पकड़ लिए और उसे दीवार से टकरा दिया। आँखों में चिंगारियाँ फूटीं। स्क्रीनें धुँधली हो गईं।

उसने सुनाई दिया—

**Active Child Records — 41%**

बाहर से मीरा नाथ चिल्लाई—“दरवाज़े का ऊपरी लॉक तोड़ो!”

कबीर—“तार काटूँगा तो अंदर करंट जा सकता है!”

अर्चना—“साइड पैनल देख!”

मीरा नाथ—“यहाँ है!”

भैरव ने नयना को फिर खींचा। “तुम समझती नहीं। यह नेटवर्क मेरे बिना भी चलेगा। मुझे मारोगी तो दस लोग मेरी जगह आएँगे।”

नयना ने दर्द में भी कहा, “इसलिए तो डेटा चाहिए।”

भैरव ने उसके गले को पकड़ा। “तुम्हारा विश्वास खतरनाक है।”

नयना ने उसके हाथों को पकड़ा। “तुम्हारा डर भी।”

तभी कमरे की एक स्क्रीन पर अचानक अरविंद का चेहरा आया।

वह टावर पर नहीं थे। शायद किसी ने कैमरा उनसे जोड़ा था। उनका चेहरा पीला, थका, पर आँखें जिंदा थीं। वे सीधे स्क्रीन में देख रहे थे।

उनकी आवाज़ टूटी हुई थी—

“भैरव…”

भैरव एक पल को मुड़ा।

बस वही पल।

नयना ने घुटना उठाकर उसके पेट में मारा। वह पीछे हट गया। उसने साँस खींची। नयना कंसोल के पीछे हट गई।

स्क्रीन पर अरविंद बोले—

“आवाज़… कभी… पूरी… नहीं छीन पाए…”

भैरव ने दाँत भींचे। “तुम्हें तो मैंने सालों पहले खत्म कर दिया था।”

अरविंद ने बहुत धीमे कहा—“आदमी… खत्म… आवाज़… नहीं…”

भैरव चिल्लाया, “बंद करो इसे!”

स्क्रीन पर अरविंद के पीछे महेश और सुजाता दिखे। सुजाता फाइलों के पन्ने उठाए थीं। महेश ने कहा—

“डेटा कॉपी हो रहा है। जो भी यह देख रहा है, रिकॉर्ड करे। यह बच्चों की सक्रिय सूची है।”

भैरव ने समझा—यह सिर्फ गर्भगृह की स्क्रीन पर नहीं, किसी फीड में जा रहा था।

“नहीं…” उसके मुँह से निकला।

कंसोल पर संदेश आया—

**External Broadcast Patch: ON**

कबीर ने बाहर से चिल्लाया—“बाबा, हमने वीडियो नहीं रोका था। हमने रास्ता बदल दिया था!”

भैरव का चेहरा राख हो गया।

नयना ने स्क्रीनों की तरफ देखा। अब गर्भगृह की कुछ स्क्रीन लाइव प्रसारण पर थीं। बाहर भीड़ शायद वही देख रही थी—बच्चों की लोकेशन नहीं, लेकिन रिकॉर्ड की संरचना, रूट मैप्स, भैरव का कंट्रोल रूम, उसकी आवाज़, उसकी धमकी। संवेदनशील विवरणों को शायद कबीर ने ब्लर या काट दिया था। पर इतना साफ़ था कि यह कोई झूठा आरोप नहीं था। यह जिंदा नेटवर्क था।

बाहर भीड़ का शोर बदल गया।

पहले सवाल थे। अब आक्रोश था।

“बच्चे कहाँ हैं?”
“दरवाज़ा खोलो!”
“पुलिस को बुलाओ!”
“बाबा को पकड़ो!”
“फाइलें बचाओ!”

भैरव ने अचानक शांति पकड़ ली।

यह उसका सबसे डरावना रूप था।

वह सीधा खड़ा हुआ। वस्त्र ठीक किया। चाकू उठाया नहीं। कंसोल की तरफ देखा। फिर नयना की तरफ।

“ठीक,” उसने कहा। “तुमने मुझे सार्वजनिक कर दिया। अब मैं भी तुम्हें विकल्प देता हूँ।”

उसने कंसोल पर एक और बटन दबाया।

स्क्रीन पर नया विंडो खुला—

**Manual Purge: Physical Trigger Required**
**Location: Inner Vault**

नयना ने पढ़ा।

“भौतिक ट्रिगर?” उसने पूछा।

भैरव मुस्कुराया। “डिजिटल चीज़ों पर भरोसा मूर्ख करते हैं। असली नाश हमेशा हाथ से होता है। अंदर तिजोरी में हार्ड सर्वर है। उसे नष्ट कर दूँ तो कॉपी अधूरी रह जाएगी। कई लोकेशन बचेंगी नहीं।”

“तुम वहाँ तक नहीं पहुँचोगे।”

“तुम रोक नहीं पाओगी।”

वह तिजोरी की तरफ बढ़ा।

नयना ने रास्ता रोका। भैरव ने उसे धक्का दिया। वह गिर गई। सिर फर्श से लगा। दर्द उठा। आँखों के सामने अँधेरा छाया। उसने उठने की कोशिश की।

भैरव तिजोरी के सामने था। उसने अपनी माला के भीतर से छोटी चाबी निकाली। तिजोरी खोली।

अंदर काले रंग का सर्वर-कोर था। छोटा, भारी, धातु में बंद। उसके साथ कुछ हार्ड ड्राइव और कागज़ी सील।

भैरव ने एक धातु का हथौड़ा उठाया।

नयना लड़खड़ाकर उठी।

“रुको!”

भैरव ने कहा, “देर हो गई।”

उसने हथौड़ा उठाया।

उसी क्षण दरवाज़े का ऊपरी हिस्सा टूटकर अंदर गिरा।

कबीर सबसे पहले अंदर कूदा। उसके पीछे मीरा नाथ। अर्चना। फिर राकेश, जो ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे, फिर भी अंदर आए। देवव्रत दरवाज़े के बाहर दीवार पकड़कर खड़ा था। उसके हाथ में कोई टैबलेट था—शायद उसी से कॉपी चल रही थी।

कबीर ने आते ही भैरव की तरफ छलाँग लगाई। भैरव ने हथौड़ा घुमाया। कबीर बच गया, पर उसके कंधे पर चोट लगी। वह गिरा, फिर उठने की कोशिश की।

मीरा नाथ ने तिजोरी की तरफ दौड़ लगाई। भैरव ने उसे धक्का दिया। वह स्क्रीन से टकराई। स्क्रीन फट गई। चिंगारी निकली।

अर्चना ने नयना को उठाया। “ठीक है?”

“सर्वर,” नयना ने कहा। “उसे बचाना है।”

राकेश ने कबीर को उठाया। “साथ?”

कबीर ने दाँत भींचे। “हमेशा।”

पिता और बेटा एक साथ भैरव पर टूटे। राकेश कमजोर थे, पर उन्होंने भैरव की बाँह पकड़ी। कबीर ने उसका दूसरा हाथ पकड़ा। भैरव ने दोनों को झटका। वह उम्रदराज था, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से ताकतवर। शायद सत्ता शरीर को भी जिद्दी बना देती है।

मीरा नाथ ने फर्श से गिरा चाकू उठाया।

देवव्रत दरवाज़े से चिल्लाया, “नहीं!”

मीरा नाथ रुक गई।

भैरव ने मौका देखा और कबीर को लात मारी। कबीर पीछे गिरा। हथौड़ा फिर उठा।

इस बार नयना आगे आई।

उसके हाथ में आवाज़ 19 की पेन ड्राइव थी। उसने उसे ऊपर उठाया।

“भैरव!”

भैरव रुका।

“तुम सर्वर तोड़ दोगे,” नयना बोली, “पर यह आवाज़ अब कई जगह है। रेडियो पर। लोगों के फोन में। बाहर की भीड़ में। तुम्हारे भक्तों के कैमरे में। तुम्हारे अपने मंच पर। तुम हार्ड ड्राइव तोड़ सकते हो, याद नहीं।”

भैरव ने कहा, “यादें अदालत में नहीं चलतीं।”

“नाम चलते हैं,” नयना ने कहा। “और हमने नाम पढ़ दिए।”

भैरव ने हथौड़ा फिर उठाया। “सभी नहीं।”

तभी देवव्रत की आवाज़ आई—

“अब सभी।”

सबने उसकी तरफ देखा।

टैबलेट पर कॉपी 100% थी।

**Active Child Records — Complete**
**Transit Nodes — Complete**
**Archive Routes — Complete**
**Emergency Backup — Sent**

भैरव का चेहरा खाली हो गया।

“कहाँ भेजा?” उसने पूछा।

देवव्रत ने दीवार पकड़ते हुए कहा, “जहाँ मुझे बहुत पहले भेजना चाहिए था। अदालत, प्रेस, बाल अधिकार आयोग, और कुछ ऐसे लोग जिन पर तुम्हारा हाथ नहीं।”

भैरव ने धीमे से कहा, “तुम्हारा हाथ काँपता था। आज नहीं काँपा?”

देवव्रत ने मीरा नाथ की तरफ देखा। “आज मेरी बेटी देख रही थी।”

भैरव ने हथौड़ा नीचे कर दिया।

कुछ पल लगा कि वह हार गया।

फिर वह हँसा।

बहुत धीरे।

बहुत ठंडा।

“तुम लोग सचमुच समझते हो कि बाहर की संस्थाएँ तुम्हें बचाएँगी? अदालत? प्रेस? आयोग? वे सब भी मनुष्यों से चलते हैं। मनुष्य डरते हैं। बिकते हैं। थकते हैं।”

नयना ने कहा, “हाँ। पर सब नहीं।”

भैरव ने उसकी तरफ देखा। “और अगर बच्चे तब तक हट गए तो?”

कबीर ने कहा, “रूट मैप लाइव हो गए हैं। लोग पहुँचेंगे।”

“कौन लोग?” भैरव ने हँसकर पूछा।

तभी बाहर से भीड़ का गहरा शोर आया। फिर कोई महिला चिल्लाई—

“हम जाएँगे!”

दूसरी आवाज़—

“हमारे बच्चे हैं!”

तीसरी—

“गाड़ियों में बैठो!”

चौथी—

“लाइव लोकेशन रिकॉर्ड करो!”

कबीर ने स्क्रीन देखी। बाहर भक्तों की भीड़ अब भक्तों की तरह नहीं, परिवारों की तरह चल रही थी। कई लोग अपने-अपने गाँवों के नाम पुकार रहे थे। कुछ स्थानीय पत्रकार कैमरे लेकर दौड़ रहे थे। कुछ पुलिस वाले भीड़ को रोकने की कोशिश कर रहे थे, पर कई पुलिसकर्मी खुद फोन पर किसी से बात कर रहे थे—शायद ऊपर सूचना दे रहे थे। कुछ गार्ड भाग चुके थे।

भैरव ने यह दृश्य देखा।

पहली बार उसका चेहरा बूढ़ा लगा।

फिर भी वह गिरा नहीं।

उसने धीरे से कहा, “भीड़। सबसे अविश्वसनीय जीव। आज तुम्हारी, कल मेरी।”

नयना ने कहा, “आज नामों की है।”

भैरव ने अचानक तिजोरी के अंदर हाथ डालकर एक छोटा डिवाइस निकाला। वह रिमोट जैसा था। लाल बटन।

देवव्रत चीखा—“रुको!”

भैरव मुस्कुराया। “तुमने डेटा बचा लिया। ठीक। पर गर्भगृह नहीं।”

कबीर की आँखें फैल गईं। “बम?”

भैरव ने कहा, “आग। शुद्धिकरण।”

उसने बटन दबा दिया।

कुछ नहीं हुआ।

भैरव ने फिर दबाया।

कुछ नहीं।

कबीर ने धीरे से कहा, “बैटरी निकाली थी मैंने।”

भैरव ने उसकी तरफ देखा।

कबीर ने जेब से छोटी बैटरी दिखायी। “जब तुम दर्शन दे रहे थे, मैं टेक सपोर्ट कर रहा था।”

राकेश ने अपने बेटे को देखा। उसके चेहरे पर गर्व साफ़ था।

“कब्बू…” उन्होंने कहा।

कबीर ने कहा, “हाँ, अब आप यह नाम सार्वजनिक मत कीजिएगा।”

भैरव ने रिमोट फेंक दिया।

अब उसके पास चाकू नहीं, हथौड़ा नहीं, आग नहीं, झूठ नहीं। बस वह खुद था।

और कभी-कभी अपराधी सबसे ज्यादा खतरनाक तब होता है जब उसके पास बचाने को कुछ नहीं बचता।

वह अचानक नयना की तरफ झपटा।

लेकिन इस बार नयना अकेली नहीं थी।

अर्चना बीच में आईं। मीरा नाथ ने उसका हाथ पकड़ा। कबीर ने पैर अड़ाया। राकेश ने पीछे से धक्का दिया। भैरव लड़खड़ाकर फर्श पर गिरा। देवव्रत ने किसी तरह अंदर आकर तिजोरी का दरवाज़ा उसके हाथ पर गिरा दिया। भैरव दर्द से चिल्लाया।

मीरा नाथ ने लाल रिबन उसकी कलाई पर बाँध दिया।

भैरव ने तड़पकर पूछा, “यह क्या कर रही हो?”

मीरा नाथ ने कहा, “निशान लगा रही हूँ। कहीं फिर नाम बदलकर न भाग जाओ।”

नयना ने फर्श से चाकू उठाया। सबने उसे देखा।

वह भैरव के पास गई।

भैरव ने पहली बार उसकी आँखों में डर से देखा। “मारोगी?”

नयना ने चाकू उसकी तरफ झुकाया।

फिर उसने चाकू से उसके वस्त्र का वह हिस्सा काटा जिस पर बड़ा-सा चंदन और आश्रम का प्रतीक बना था। कपड़ा फर्श पर गिरा।

“नहीं,” नयना ने कहा। “तुम्हें जीना पड़ेगा। अपने नाम के साथ।”

बाहर सायरन की आवाज़ आने लगी। इस बार अलग थी। सिर्फ आश्रम की नहीं। पुलिस की। एम्बुलेंस की। शायद मीडिया वैन की भी।

कबीर ने स्क्रीन पर देखा। लाइव चैट पागल हो चुकी थी। लोग रिकॉर्डिंग शेयर कर रहे थे। कुछ न्यूज़ चैनलों ने फीड उठा ली थी। “भैरवनाथ आश्रम से बड़ी खबर”, “गायब बच्चों का मामला”, “लाइव प्रसारण में सनसनी”, “पूर्व पुलिस अधिकारी की कबूलियत”—शीर्षक चमक रहे थे।

कबीर ने गहरी साँस ली। “अब यह इंटरनेट पर है। बाबा का मैनेजमेंट विभाग ओवरटाइम करेगा।”

अर्चना ने नयना के चेहरे को पकड़ा। “खून निकल रहा है।”

नयना ने पहली बार महसूस किया कि उसके गले पर चाकू की पतली कट थी। सिर भी दर्द कर रहा था। शरीर काँप रहा था। लेकिन वह खड़ी थी।

“मैं ठीक हूँ,” उसने कहा।

अर्चना ने उस झूठ को माँ की तरह पहचान लिया, पर कुछ नहीं कहा। बस उसे गले लगा लिया।

नयना ने पहली बार उस रात पूरी तरह रोना चाहा। मगर अभी नहीं। अभी बहुत लोग थे। बहुत नाम। बहुत दरवाज़े।

देवव्रत जमीन पर बैठ गया। उसके कंधे से खून बह रहा था। मीरा नाथ उसके पास आई। कुछ पल उसे देखती रही। फिर उसने अपने दुपट्टे का हिस्सा फाड़कर उसकी चोट पर बाँधा।

देवव्रत की आँखें भर आईं। “मीरा…”

“मत बोलिए,” वह बोली। “चोट बाँध रही हूँ, इतिहास नहीं।”

देवव्रत ने सिर झुका लिया। “ठीक।”

कबीर अपने पिता के सामने खड़ा था। दोनों कुछ कहना चाहते थे। बहुत कुछ। पर वर्षों की दूरी एक ही रात में पार नहीं होती। राकेश ने बस हाथ बढ़ाया। कबीर ने उसे पकड़ा।

“घर चलेंगे?” राकेश ने पूछा।

कबीर ने कहा, “पहले अस्पताल। फिर पुलिस। फिर माँ। फिर गाली। फिर शायद घर।”

राकेश ने धीमे से कहा, “मंजूर।”

गर्भगृह के बाहर भीड़ की आवाज़ और तेज़ हो रही थी। कुछ लोग दरवाज़े तक पहुँच चुके थे। पुलिस भी आ रही थी। पत्रकार भी। अराजकता थी। लेकिन उस अराजकता में पहली बार उम्मीद भी थी।

नयना ने स्क्रीनों की तरफ देखा।

दिल्ली यूनिट वाली स्क्रीन अब भी चालू थी। वही बच्चा, वही लाल कार। पर इस बार स्क्रीन के नीचे लोकेशन कॉपी हो चुकी थी। एक नई विंडो खुली—

**Rescue Alert Sent**

नयना ने बहुत धीरे कहा, “उसका नाम क्या है?”

कबीर ने सिस्टम में देखा। “रिकॉर्ड में लिखा है—A-27। असली नाम अभी नहीं।”

नयना ने स्क्रीन पर बच्चे को देखा। “मिल जाएगा।”

अरविंद की आवाज़ दरवाज़े से आई।

“नाम… मिलते… हैं…”

सब मुड़े।

अरविंद को महेश और शशांक सहारा देकर अंदर ला रहे थे। सुजाता उनके साथ थीं। डाकिया पीछे था, हाथ में पुराना माइक और तारों का गुच्छा। अरविंद थके हुए थे, मगर उनकी आँखें गर्भगृह की स्क्रीनों पर टिक गईं।

वह धीरे-धीरे नयना के पास आए।

“रिपोर्ट… पूरी?” उन्होंने पूछा।

नयना ने भैरव की तरफ देखा, फिर स्क्रीनों, फिर अपने परिवारों की तरफ।

“नहीं,” उसने कहा। “पहला भाग खत्म हुआ है।”

अरविंद की आँखों में चमक आई। “अच्छी… पत्रकार…”

नयना मुस्कुराई। आँसू के बीच।

“आपने सिखाया।”

भैरव फर्श पर बँधा पड़ा था। लाल रिबन उसकी कलाई पर था। वह अब भी चुप था। लेकिन उसकी आँखें नयना से हट नहीं रही थीं। जैसे वह अब भी कोई अगली चाल सोच रहा हो।

अचानक उसने बहुत धीमे कहा—

“तुम दिल्ली जाओगी।”

नयना ने उसकी तरफ देखा।

“तुम जाओगी,” भैरव बोला। “क्योंकि वहाँ बच्चे हैं। फाइलें हैं। और वहाँ मेरे लोग भी हैं। तुम सोच रही हो मैंने सब खो दिया। नहीं, नयना। तुमने दरवाज़ा खोला है। अब देखना, कितने कमरे हैं।”

कबीर ने झुककर कहा, “तू चुप रह बाबा। अभी तेरी स्पिन-ऑफ सीरीज नहीं चाहिए।”

भैरव ने कबीर को नजरअंदाज किया।

उसने नयना से कहा—

“दिल्ली में जिस बच्चे को बचाने जाओगी, उसका नाम A-27 नहीं है।”

नयना चुप रही।

भैरव मुस्कुराया।

“उसका नाम आरव कश्यप है।”

नयना का दिल रुक गया।

कश्यप।

महेश और सुजाता ने एक-दूसरे को देखा।

महेश की आवाज़ काँपी—“आरव?”

भैरव ने कहा, “तुम्हारे परिवार की कहानी अभी पूरी नहीं हुई, नयना। कुछ खून की लाइनें बहुत उपयोगी होती हैं। इसलिए खत्म नहीं की जातीं। बस दूर रखी जाती हैं।”

सुजाता का चेहरा सफेद पड़ गया। “नहीं…”

नयना ने पूछा, “आरव कौन है?”

महेश ने दीवार पकड़ ली। उनकी आँखें फटी रह गईं।

सुजाता के होंठ काँपे।

बहुत देर बाद उन्होंने कहा—

“तेरा छोटा भाई।”

कमरे की सारी आवाज़ें फिर एक बार दूर चली गईं।

नयना ने स्क्रीन पर बच्चे को देखा।

लाल कार पकड़े सोया हुआ बच्चा।

आरव कश्यप।

उसका भाई।

जिसके बारे में उसे पता भी नहीं था।

भैरव ने आँखें बंद कीं, जैसे वह कोई भजन सुन रहा हो।

“देखा?” उसने फुसफुसाया। “कहानी सचमुच अब शुरू होती है।”

बाहर पुलिस गर्भगृह में घुसी।

कैमरे चमके।

लोग चिल्लाए।

किसी ने भैरव को पकड़ लिया।

किसी ने सर्वर सील किया।

किसी ने नयना से सवाल पूछा।

पर नयना की आँखें सिर्फ स्क्रीन पर थीं।

उस बच्चे पर।

उस नाम पर।

आरव।

नामों का प्रसारण खत्म नहीं हुआ था।

अब उसे एक नाम की तरफ जाना था—दिल्ली।

और इस बार वह किसी रिकॉर्डिंग के पीछे नहीं, जीवित बच्चे के पीछे जाएगी।

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