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आवाज़ नंबर 19 (भाग:11) This post in Under Review

Vinod 06 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 531 0 Hindi :: हिंदी

भाग 11: नामों का प्रसारण

पहला नाम हवा में गया, तो किसी ने ध्यान नहीं दिया।

“Q-01… रीना… पिता रामू… गाँव बेलाही…”

आश्रम के बाहर भंडारे की लाइन में खड़े लोग पहले समझे कि यह कोई घोषणा है। किसी ने सोचा, खोया-पाया विभाग होगा। किसी ने कहा, “शायद दानदाताओं के नाम पढ़ रहे हैं।” किसी ने मोबाइल में कैमरा ऑन रखा, क्योंकि अभी-अभी बड़े स्क्रीन पर अजीब-सी गड़बड़ी हुई थी। बाबा का चेहरा गया था, कुछ फाइलें दिखी थीं, दो लड़कियाँ बोल रही थीं, फिर सब कट गया था। लोग असमंजस में थे, पर भीड़ में असमंजस हमेशा शोर में दब जाता है।

दूसरा नाम आया—

“Q-02… सलीम… माता शबनम… दर्ज मृत्यु—बिना शव…”

इस बार एक बूढ़ा आदमी चाय के स्टॉल के पास ठिठका।

उसके हाथ से कुल्हड़ गिर गया।

“कौन बोला?” उसने चारों तरफ देखा।

तीसरा नाम—

“Q-03… गुड्डू उर्फ गोपाल… पिता हरिनारायण… गाँव—चंद्रपुरा…”

भीड़ के पीछे से एक औरत ने चीख मारी।

“गुड्डू!”

लोग मुड़े।

औरत भीड़ चीरकर आगे आई। उसका चेहरा पसीने और आँसुओं से भीगा था। उसने दोनों हाथ हवा में उठाए, जैसे आवाज़ पकड़ना चाहती हो।

“मेरा गुड्डू! मेरा गुड्डू शहर नहीं गया था! मैंने कहा था, वो शहर नहीं गया था!”

लोगों ने उसे संभालना चाहा। किसी ने कहा, “बहन जी, शांत हो जाइए।” किसी ने कहा, “प्रसारण बंद करो।” किसी ने अपने फोन पर रिकॉर्डिंग शुरू कर दी।

चौथा नाम आया।

पाँचवाँ।

छठा।

लोकध्वनि रेडियो की पुरानी तरंगें, जो वर्षों से मरी हुई समझी गई थीं, रात की हवा में फटकर फैल रही थीं। डाकिये की आवाज़ बीच-बीच में आती—“जो सुन रहे हैं, रिकॉर्ड करें। यह शांत कुआँ की सूची है। जिन बच्चों को मृत घोषित किया गया, गायब बताया गया, या नए नामों में बदला गया—उनकी सूची।”

फिर महेश कश्यप की आवाज़।

कमजोर, मगर स्पष्ट।

“मैं महेश कश्यप, पूर्व शिक्षक, मझगवाँ ब्लॉक। यह सूची मैंने और मेरी पत्नी सुजाता ने 2003 में तैयार की थी। हमें चुप कराने के लिए मृत घोषित किया गया। हम जिंदा हैं।”

फिर सुजाता की आवाज़।

“अगर किसी ने अपना बच्चा खोया है, तो नाम सुनते रहें। सब नाम नहीं बचे, पर जितने बचे हैं, वे अब दबेंगे नहीं।”

और फिर अरविंद अवस्थी की टूटी हुई आवाज़—

“आवाज़… बचाइए…”

यही तीन शब्द भीड़ पर किसी हथौड़े की तरह गिरे।

कई बुज़ुर्गों ने नाम पहचाने। कई युवाओं ने पहली बार अपने घर के पुराने घावों का नाम सुना। कुछ लोग फोन मिलाने लगे—“अरे रेडियो ऑन कर!” “लाइव रिकॉर्ड कर!” “भैरवनाथ आश्रम में कुछ हो रहा है!” “पुराने गायब बच्चों की सूची पढ़ रहे हैं!”

आश्रम का चमकदार महोत्सव अब दो हिस्सों में टूट चुका था—मंच पर भजन, हवा में गवाही।

और प्रसारण-कक्ष के अंदर, बाबा भैरवनाथ पहली बार सचमुच गुस्से में था।

“बंद करो इसे!” उसकी आवाज़ फट रही थी। “टावर कहाँ है? किसने लोकध्वनि चालू किया?”

गार्ड एक-दूसरे को देख रहे थे। टेक्नीशियन कंसोल पर बटन दबा रहे थे, लेकिन रेडियो फीड उनके सिस्टम से नहीं आ रही थी। वह बाहर किसी पुराने एंटीना से जा रही थी। उस पुराने ढाँचे से, जिसे भैरव ने बेकार समझकर छोड़ दिया था। अपराधियों की सबसे बड़ी गलती यही होती है—वे पुरानी चीज़ों को मृत समझ लेते हैं।

कबीर, जिसे दो गार्ड पकड़कर खड़े थे, होंठों पर खून लिए मुस्कुरा रहा था।

“बाबा,” उसने कहा, “आपने सही कहा था—सच को मैनेज करना पड़ता है। पर आपने रेडियो वाला विभाग आउटसोर्स नहीं किया लगता।”

एक गार्ड ने उसके पेट में घूँसा मारा। कबीर झुक गया, पर हँसी दबा नहीं पाया।

नयना ने झटका खाया। “कबीर!”

भैरव ने हाथ उठाया। “मारो मत। अभी नहीं। यह लड़का काम आएगा।”

कबीर ने मुश्किल से सीधा होकर कहा, “मेरी माँ ने भी यही कहा था—कबीर, तू कभी काम आएगा। मैं भावुक हो गया।”

भैरव ने उसे ध्यान से देखा। “तुम्हें पता है तुम्हारे पिता ने आखिरी बार क्या कहा था?”

कबीर की मुस्कान रुक गई।

भैरव ने एक-एक शब्द चबाकर कहा, “उसने कहा—‘मेरे बेटे को मत बताना कि मैं डर गया था।’”

कबीर का चेहरा एक पल को खाली हो गया।

नयना ने तुरंत कहा, “झूठ बोल रहा है।”

भैरव ने उसकी तरफ देखा। “झूठ? बेटी, झूठ वही होता है जो पकड़ा जाए। मैं तो लोगों को वही देता हूँ जो वे मानना चाहते हैं। यह लड़का अपने पिता को कायर मान चुका है। मैं बस उसके विश्वास को पुष्ट कर रहा हूँ।”

कबीर ने दाँत भींच लिए। “मेरे पिता कहाँ हैं?”

“मौन-कक्ष में,” भैरव ने सहजता से कहा। “लेकिन वहाँ पहुँचने के लिए पहले तुम्हें मौन होना पड़ेगा।”

उसने सुरक्षा प्रमुख को इशारा किया। “तीनों को नीचे ले जाओ। प्रसारण बंद होने तक ये कहीं नहीं जाएँगे।”

मीरा नाथ आगे झटकी। “हमें हाथ लगाया तो—”

भैरव ने शांत स्वर में कहा, “तो क्या? तुम फिर गाओगी? याद है, आर्या? पहले सुर तुम्हारे काँपते थे। फिर मैंने तुम्हें सिखाया था—दर्द को भजन बना दो। लोग रो पड़ेंगे। दान भी देंगे।”

मीरा नाथ के चेहरे पर घृणा फैल गई। “तुमने मुझे बेचा।”

“नहीं,” भैरव बोला, “मैंने तुम्हें मंच दिया। दुनिया में कितने बच्चे भूख से मरते हैं। तुम देवी बनकर जीती रहीं।”

“देवी?” उसने उसकी तरफ थूक दिया। “तुम्हारी दुनिया में कैद को कृपा कहते हैं।”

भैरव का चेहरा एक पल को कस गया। फिर उसने रूमाल से अपना वस्त्र पोंछा। “ले जाओ इन्हें।”

उसी समय स्पीकर से डाकिये की आवाज़ फिर आई—

“अब Q-19 की फाइल पढ़ी जाएगी। नाम—नयना कश्यप। पिता—महेश कश्यप। माता—सुजाता कश्यप। स्थिति—मृत्यु प्रस्तावित। टिप्पणी—शिक्षक पिता के कारण संवेदनशील।”

प्रसारण-कक्ष में सबकी आँखें नयना पर गईं।

भैरव ने धीरे से ताली बजाई। “अच्छा प्रभाव है। नाम का नाटक हमेशा चलता है। लेकिन भीड़ को रोने दो। रोती भीड़ सोचती नहीं। थोड़ी देर में मैं मंच पर जाऊँगा, कहूँगा—दुष्ट लोग आश्रम पर हमला कर रहे हैं, पुरानी फाइलों को तोड़-मरोड़कर संतों पर आरोप लगा रहे हैं। फिर देखना, यही भीड़ तुम्हें पत्थर मारेगी।”

नयना ने उसकी आँखों में देखा। “तुम्हें डर लग रहा है।”

भैरव हँसा। “मुझे?”

“हाँ। क्योंकि नाम जा चुके हैं। अब उन्हें वापस नहीं निगल सकते।”

भैरव झुका। “नामों से साम्राज्य नहीं गिरते, बच्ची। साम्राज्य डर से चलते हैं। और डर अभी भी मेरे पास है।”

उसने स्क्रीन पर एक बटन दबाया।

प्रसारण-कक्ष की दूसरी स्क्रीन पर मौन-कक्ष का कैमरा खुला।

अर्चना कुर्सी पर बँधी थीं। उनके बगल में कबीर के पिता—राकेश। चेहरे पर चोट, दाढ़ी बढ़ी हुई, आँखें थकी हुईं। लेकिन जब उन्होंने स्क्रीन पर कबीर को देखा, उनकी आँखें जीवित हो गईं।

कबीर की साँस अटक गई।

“पापा…” उसके होंठों से निकला।

राकेश ने कुछ कहने की कोशिश की। मुँह पर कपड़ा बँधा था।

भैरव ने कहा, “देखो। डर।”

स्क्रीन पर एक आदमी अर्चना के पीछे खड़ा हुआ। दूसरे ने राकेश की कुर्सी के पास पेट्रोल का डिब्बा रखा।

नयना का खून जम गया।

“तुम ऐसा नहीं करोगे,” उसने कहा।

“मैं?” भैरव ने आश्चर्य का अभिनय किया। “मैं तो मंच पर प्रवचन दूँगा। अगर कोई दुर्घटना हो जाए, तो दुख की बात है।”

कबीर ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की। गार्डों ने उसे दबा लिया।

“छोड़ो!” वह चीखा। “छोड़ो मुझे!”

भैरव ने सुरक्षा प्रमुख से कहा, “मौन-कक्ष की लाइव लाइन बंद रखो। सिर्फ इन्हें दिखती रहे। जब तक रेडियो बंद न हो, आग लगा देना।”

नयना ने पहली बार भीतर से ठंडा डर महसूस किया। भैरव सचमुच सब जला सकता था—फाइलें, लोग, रिश्ते, नाम। और फिर मंच पर जाकर रो भी सकता था।

तभी प्रसारण-कक्ष की तीसरी स्क्रीन झपकी।

उस पर नई वीडियो फीड आई।

काली। फिर धुँधली। फिर टेढ़ी।

कबीर ने स्क्रीन देखी और समझ गया—यह उनकी टीम का नहीं, किसी और का फीड था।

स्क्रीन पर डाक टावर की ऊँचाई से आश्रम का दृश्य दिख रहा था। शायद डाकिये ने कोई पुराना कैमरा या मोबाइल जोड़ दिया था। हवा तेज़ थी। आवाज़ टूट रही थी।

फिर डाकिये की आवाज़ आई—

“कबीर, सुन रहे हो तो जवाब मत देना। हम टावर पर हैं। रेडियो फीड चल रही है। लेकिन पाँच मिनट से ज्यादा नहीं। नीचे दो लोग चढ़ रहे हैं।”

भैरव गरजा, “लोकेट करो टावर!”

एक टेक्नीशियन भागा।

नयना ने स्क्रीन पर ध्यान से देखा। डाकिये के पीछे कोई और था—अरविंद। व्हीलचेयर नहीं। शशांक और महेश के सहारे खड़े। उनके हाथ में माइक था। सुजाता पास बैठी थीं, फाइलें खोलकर नाम पढ़ रही थीं। इतने कमजोर लोग, इतनी ऊँचाई पर, इतना बड़ा प्रसारण।

नयना की आँखें भर आईं।

अरविंद ने माइक पकड़ा। उनकी आवाज़ बहुत टूटी हुई थी, पर रेडियो पर जा रही थी।

“जो… सुन रहे… हैं… आश्रम… मत छोड़िए… पुलिस… बुलाइए… मीडिया… बुलाइए… रिकॉर्ड… कीजिए…”

भैरव ने टीवी स्क्रीन पर रिमोट फेंक दिया। “बंद करो!”

कबीर फुसफुसाया, “अंकल…”

भैरव ने उसे घूरा। “तुम्हारे पिता जलने वाले हैं और तुम मुस्कुरा रहे हो?”

कबीर ने उसकी आँखों में देखा। “नहीं। मैं देख रहा हूँ कि बूढ़े लोग भी तुमसे ज्यादा जवान निकले।”

भैरव ने सुरक्षा प्रमुख से कहा, “इसे पहले ले जाओ। लड़के को। इसके सामने पिता जलेगा तो बाकी दो बोलना बंद करेंगी।”

नयना तुरंत आगे बढ़ी, पर गार्ड ने उसे जकड़ लिया। “नहीं!”

कबीर को घसीटकर दरवाज़े की तरफ ले जाया जाने लगा। वह संघर्ष कर रहा था, पर दो गार्ड भारी थे।

मीरा नाथ ने अपनी पकड़ छुड़ाने की कोशिश की। देवव्रत, जो अब तक गिरा पड़ा था, अचानक उठने की कोशिश करने लगा। उसके कंधे से खून बह रहा था, पर उसने एक गार्ड की टांग पकड़ ली। गार्ड लड़खड़ा गया।

“भागो!” देवव्रत ने चीखने की कोशिश की, पर आवाज़ टूट गई।

मीरा नाथ ने इस छोटे-से मौके में अपने गार्ड की कलाई मरोड़ी और छूट गई। उसने पास का ट्राइपॉड उठाकर दूसरे गार्ड के सिर पर मारा। नयना ने अपनी कोहनी पीछे वाले आदमी के पेट में मारी। वह झुका। उसने उसकी पकड़ से हाथ निकाला।

कबीर अभी भी दरवाज़े के पास था।

भैरव पीछे हट गया। “पकड़ो!”

कमरा फिर युद्ध बन गया।

टेक्नीशियन नीचे झुककर भागे। स्क्रीनें काँप रही थीं। बाहर मंच पर भजन रुक चुका था। भीड़ की आवाज़ बढ़ती जा रही थी। किसी ने दरवाज़े के बाहर से चिल्लाया—“क्या सच है?” दूसरा—“नामों की सूची कहाँ से आ रही?” तीसरा—“बाबा बाहर आओ!”

भैरव ने यह सुना। उसका चेहरा और कठोर हो गया।

“मंच,” उसने कहा। “मुझे मंच पर जाना है।”

उसने सुरक्षा प्रमुख को आदेश दिया—“तीनों को मौन-कक्ष ले जाओ। अगर भीड़ अंदर आई तो इन्हें बंधक बनाओ।”

नयना ने कबीर की तरफ दौड़ लगाई। कबीर ने भी गार्ड को धक्का दिया। दोनों के हाथ मिले ही थे कि पीछे से किसी ने नयना के कंधे पर झटका मारा। वह गिरते-गिरते बची।

मीरा नाथ ने भैरव का रास्ता रोक लिया।

“कहीं नहीं जाओगे।”

भैरव ने उसे देखा। “तुम्हारे अंदर अभी भी मंच की भूख है, आर्या। चलो, मेरे साथ चलो। भीड़ को बताओ कि तुम बीमार हो। कि तुमसे जबरन बयान दिलवाया गया। मैं तुम्हें फिर से देवी बना दूँगा।”

मीरा नाथ ने कहा, “मैं देवी नहीं बनना चाहती। इंसान बनना काफी है।”

“इंसान टूटते हैं,” भैरव बोला।

“देवी भी तुम्हारे आश्रम में बिकती थीं,” उसने कहा।

भैरव ने पहली बार हाथ उठाकर उसे थप्पड़ मारना चाहा।

पर हाथ बीच में रुक गया।

क्योंकि देवव्रत ने पिस्तौल उसके सिर पर रख दी थी।

सब थम गए।

देवव्रत काँप रहा था। पिस्तौल खाली थी या नहीं, यह किसी को नहीं पता था। शायद देवव्रत को भी नहीं। पर उस क्षण भैरव भी नहीं जानता था। और भय हमेशा जानकारी की कमी से जन्मता है।

देवव्रत ने कहा, “मेरी बेटी से दूर।”

भैरव ने धीरे से उसकी तरफ देखा। “अब याद आया?”

देवव्रत की आँखों में आँसू नहीं थे। वहाँ राख थी।

“हाँ,” उसने कहा। “अब।”

भैरव मुस्कुराया। “बहुत देर कर दी।”

“जानता हूँ।”

“तो गोली चलाओ।”

कमरा चुप।

देवव्रत की उँगली ट्रिगर पर काँपी।

मीरा नाथ ने धीरे से कहा, “नहीं।”

देवव्रत ने उसकी तरफ देखा।

“उसे मत मारो,” उसने कहा। “मरकर यह बाबा बन जाएगा। जिंदा रहेगा तो अपराधी बनेगा।”

देवव्रत की आँखें उसकी आँखों में अटक गईं।

फिर उसने पिस्तौल थोड़ा नीचे कर दी।

यही गलती थी।

भैरव ने बिजली की तेजी से देवव्रत की कलाई पकड़ी, पिस्तौल मोड़ी और उसे धक्का दिया। पिस्तौल छूटकर फर्श पर दूर चली गई। सुरक्षा प्रमुख ने तुरंत देवव्रत को पीछे से पकड़ा।

भैरव ने झुककर देवव्रत के कान में कहा, “तुम हमेशा आधा काम करते हो। इसलिए जिंदा हो।”

मीरा नाथ चीखी और आगे बढ़ी, पर गार्डों ने उसे पकड़ लिया।

नयना, कबीर और मीरा नाथ—तीनों फिर जकड़े गए।

भैरव ने अपना वस्त्र ठीक किया। चेहरा फिर शांत किया। जैसे अभी-अभी कुछ हुआ ही न हो।

“मैं मंच पर जा रहा हूँ,” उसने कहा। “भीड़ को संभालता हूँ। तब तक मौन-कक्ष।”

उसने सुरक्षा प्रमुख को इशारा किया।

तीनों को बाहर घसीटा गया।

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मौन-कक्ष तक जाने वाला रास्ता मुख्य आश्रम की चमक से बिल्कुल अलग था।

बाहर फूलों की सजावट, अंदर सफेद टाइलें। बाहर भजन, अंदर मोटी दीवारें। बाहर भक्तों की भीड़, अंदर कैमरे और बंद दरवाज़े। रास्ते में “मौन ही साधना है” लिखा था। नयना को लगा—कितना आसान है अपराध को अध्यात्म की भाषा देना।

उन्हें नीचे उतरती छोटी सीढ़ियों से ले जाया गया। वहाँ एक लंबा गलियारा था। दोनों तरफ ध्वनि-रोधी कमरे। हर कमरे पर नंबर। कुछ खाली। कुछ बंद। कहीं से हल्की सिसकी आई। कहीं कोई दीवार खटखटा रहा था।

कबीर ने सुन लिया। “यहाँ और लोग हैं।”

सुरक्षा प्रमुख ने उसे धक्का दिया। “चल।”

कबीर ने कहा, “तुम लोग संतों की जेल भी चलाते हो? पैकेज में मोक्ष फ्री?”

सुरक्षा प्रमुख ने उसे फिर मारा। इस बार कबीर की साँस रुक गई। नयना ने गुस्से में कहा, “मत मारो उसे!”

“तो चुप रहो,” आदमी बोला।

उन्हें आखिरी कमरे के सामने रोका गया।

दरवाज़ा खुला।

अंदर अर्चना बँधी थीं। बगल में राकेश—कबीर के पिता। कमरे में पेट्रोल की गंध थी। एक कोने में कैमरा लगा था। शायद भैरव उन्हें देख सकता था।

“माँ!” नयना अर्चना की तरफ झपटी, लेकिन गार्ड ने पकड़ लिया।

अर्चना ने उसे देखा। उनके चेहरे पर चोट थी, होंठ कटे हुए, पर आँखों में अजीब शांति थी।

“तू आ गई,” उन्होंने कहा। “मुझे पता था।”

नयना रो पड़ी। “आपने कहा था भाग जाना।”

“माएँ कहती हैं,” अर्चना ने हल्की मुस्कान से कहा। “बेटियाँ सुनती कब हैं?”

कबीर राकेश को देख रहा था।

राकेश का मुँह अब खुला था। वह बहुत दुबले थे। बाल सफेद, आँखें गहरी। लेकिन कबीर की आँखें देखते ही वह टूट गए।

“कब्बू…”

यह नाम किसी ने कबीर को सालों से नहीं पुकारा था।

कबीर का चेहरा सख्त से बच्चा हो गया।

“आप…” उसकी आवाज़ काँप गई। “आप भागे नहीं थे?”

राकेश ने सिर हिलाया। “भागना चाहता था… पर तुम्हारे पास…”

कबीर ने आँखें बंद कर लीं। जैसे यह सुनना उससे ज्यादा दर्दनाक था कि पिता कायर थे। क्योंकि कायर पिता से गुस्सा किया जा सकता है। कैद पिता से सिर्फ रोया जा सकता है।

सुरक्षा प्रमुख ने गार्डों से कहा, “इन्हें बाँधो।”

नयना, कबीर और मीरा नाथ को अलग-अलग कुर्सियों से बाँधा जाने लगा। सुरक्षा प्रमुख ने पेट्रोल का डिब्बा उठाया।

“आदेश मिलते ही,” उसने कहा, “सब खत्म।”

नयना ने कमरे में तेजी से देखा। दरवाज़ा भारी। कैमरा। दो गार्ड बाहर। एक अंदर। पेट्रोल। अर्चना के हाथ रस्सी से बँधे, पर उँगलियाँ चल रही थीं। वह धीरे-धीरे अपने कंगन को घुमा रही थीं।

कंगन?

नयना की नजर अर्चना की कलाई पर गई। वह पुराना चाँदी का कंगन था जिसे अर्चना हमेशा पहनती थीं। बचपन में नयना उससे खेलती थी। कंगन के अंदर एक छोटी नोक छिपी होती थी, जिससे अर्चना कभी-कभी धागा काटती थीं। माँ कहती थीं—“औरत को हमेशा छोटी चीज़ें काम आती हैं।”

अर्चना की आँखें नयना से मिलीं।

एक पल।

बस एक पल।

नयना समझ गई।

कबीर के पिता ने भी धीरे से अपनी कुर्सी हिलाई। शायद वे रस्सी ढीली करने की कोशिश कर रहे थे। मीरा नाथ ने कमरे के कैमरे की दिशा देखी। उसने जानबूझकर ऊँची आवाज़ में कहा, “भैरव सुन रहा है?”

सुरक्षा प्रमुख हँसा। “सुन रहा होगा।”

“अच्छा,” मीरा नाथ बोली। “तो सुन ले। तूने मुझे आर्या बनाया था। आज मैं अपना नाम खुद बोलूँगी—मीरा नाथ। और तूने जो भजन मुझसे गवाए, उनमें हर सुर में श्राप था।”

सुरक्षा प्रमुख ने कहा, “चुप रह।”

“नहीं,” वह बोली। “मौन-कक्ष में अब मौन नहीं रहेगा।”

उसने अचानक पूरा जोर लगाकर गाना शुरू किया।

वही गीत।

“सो जा रे नन्ही अँखियों वाली…”

गार्ड चौंक गया। “चुप!”

लेकिन उसकी आवाज़ कमरे की मोटी दीवारों में गूँज उठी। सुर बहुत साफ़ था। दर्द से भरा हुआ। वही आवाज़ जिसने कभी भक्तों को रुलाया होगा। लेकिन अब उसमें भक्ति नहीं थी। उसमें पहचान थी।

अर्चना ने अपनी कलाई तेजी से घुमाई। कंगन की छोटी नोक बाहर आई। वह रस्सी काटने लगीं।

नयना ने गाने में साथ दिया। आवाज़ काँपी, फिर स्थिर हुई।

“मिट्टी तुझे पुकारे…”

कबीर ने पहले अजीब नज़र से देखा। फिर समझ गया—आवाज़ कैमरे में जा रही थी। शायद भैरव के कंट्रोल में। शायद बाहर नहीं। लेकिन गार्ड विचलित हो रहे थे।

राकेश ने भी गुनगुनाने की कोशिश की, पर गला सूखा था।

सुरक्षा प्रमुख चिल्लाया, “चुप रहो!”

मीरा नाथ और ऊँची गाने लगी। नयना भी।

“नाम न भूलना, घर न भूलना…”

यह पंक्ति असली गीत में नहीं थी। नयना ने खुद जोड़ी।

अर्चना की रस्सी आधी कट चुकी थी।

कबीर ने गार्ड से कहा, “भाई, तुमको नहीं लगता माहौल थोड़ा म्यूज़िकल हो गया है?”

गार्ड ने उसे थप्पड़ मारने के लिए हाथ उठाया।

उसी क्षण अर्चना की रस्सी खुल गई।

उन्होंने कुर्सी से उठते ही अपने कंगन की नोक सुरक्षा प्रमुख की आँख के पास घोंप दी। वह चीखा। पेट्रोल का डिब्बा गिर गया। नयना ने अपनी कुर्सी पूरे वजन से पीछे धकेली। कुर्सी गार्ड के पैरों से टकराई। कबीर ने अपने बँधे हाथों सहित कंधा मारकर दूसरे गार्ड को गिराया।

मीरा नाथ की कुर्सी उलट गई, पर वह गिरते हुए भी गाती रही—

“मिट्टी तुझे पुकारे…”

अर्चना नयना की रस्सी काटने लगीं। “हिल मत!”

“माँ…” नयना रोते हुए बोली।

“बाद में,” अर्चना बोलीं। “पहले मार।”

रस्सी खुलते ही नयना उठी। उसने गिरे हुए पेट्रोल डिब्बे को दूर लात मारी। कबीर की रस्सी काटी। कबीर मुक्त होते ही राकेश की तरफ भागा।

“पापा!”

राकेश ने उसके चेहरे को दोनों हाथों से पकड़ा। “कब्बू…”

कबीर रोना चाहता था, पर समय नहीं था। उसने कहा, “चलो। भावुकता बाद में। मैं अब यह लाइन समझता हूँ।”

अर्चना ने मीरा नाथ की रस्सी काटी। दोनों की आँखें मिलीं।

अर्चना ने फुसफुसाकर कहा, “मुझे माफ़ कर देना।”

मीरा नाथ ने उन्हें देखा। फिर कहा, “नहीं। अभी नहीं। पहले बाहर निकलो। माफी लंबी होगी।”

अर्चना की आँखें भर आईं। “ठीक है।”

सुरक्षा प्रमुख अभी भी आँख पकड़कर कराह रहा था। कबीर ने उसका वायरलेस उठाया। उसमें आवाज़ आ रही थी—“मौन-कक्ष स्थिति?” “मौन-कक्ष जवाब दो।”

कबीर ने वायरलेस में भारी आवाज़ बनाकर कहा, “सब नियंत्रण में है। बाबा मंच पर जाएँ।”

नयना ने उसे देखा।

कबीर ने कंधे उचकाए। “कला।”

वे कमरे से बाहर निकले। गलियारे में दो गार्ड दौड़ते आए। अर्चना ने पेट्रोल की गीली फर्श पर गिरा हुआ लाइटर देखा। नयना ने सिर हिलाया—नहीं।

अर्चना ने लाइटर नहीं उठाया। इसके बजाय उसने दरवाज़े के पास लगे फायर अलार्म को तोड़ दिया।

तेज सायरन बज उठा।

गलियारे में लाल लाइटें चमकने लगीं।

ऊपर आश्रम की भीड़ में अफरा-तफरी फैलनी तय थी।

कबीर ने अपने पिता को सहारा दिया। “चल पाएँगे?”

राकेश ने धीमे से कहा, “तुम्हारे लिए… दौड़ भी लूँगा।”

“नहीं,” कबीर बोला। “चलना काफी है। मैं भावुक होकर आपको उठाने की हालत में नहीं हूँ।”

मीरा नाथ आगे रास्ता दिखा रही थी। “इस गलियारे से महिला विंग, फिर पीछे का आँगन। वहाँ से प्रसारण-कक्ष के नीचे सर्विस सीढ़ी।”

नयना ने पूछा, “हमें वापस प्रसारण-कक्ष जाना है?”

“हाँ,” कबीर बोला। “रेडियो चल रहा है, लेकिन वीडियो कट गया। हमें फिर फीड लेना होगा। और इस बार सिर्फ आवाज़ नहीं—चेहरे।”

अर्चना ने कहा, “भैरव मंच पर होगा। भीड़ को मोड़ने की कोशिश करेगा।”

“तो उससे पहले पहुँचना होगा,” नयना बोली।

वे सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर पहुँचे। आश्रम में अब सचमुच अफरा-तफरी थी। सायरन, भक्तों की आवाज़ें, गार्डों की दौड़, मंच से आती घोषणा—“कृपया शांत रहें! तकनीकी समस्या है!”

फिर मंच पर भैरव की आवाज़ गूँजी।

माइक्रोफोन चालू था।

“मेरे प्रिय बच्चों…”

भैरव वापस मंच पर था।

उसकी आवाज़ में फिर वही करुणा थी। वही संत वाला कंपन। वह भीड़ को फिर अपनी तरफ खींच रहा था।

“आज दुष्ट शक्तियाँ हमारे आश्रम की परीक्षा ले रही हैं। झूठे नाम, झूठे आरोप, नकली आवाज़ें… पर सत्य का दीपक बुझता नहीं…”

भीड़ का कुछ हिस्सा शांत होने लगा। कुछ लोग रो रहे थे। कुछ अब भी फोन पर रिकॉर्डिंग सुना रहे थे। कुछ चिल्ला रहे थे—“पहले जवाब दो!” पर भैरव की आवाज़ मजबूत थी। मंच, माइक्रोफोन, रोशनी—सब उसके पक्ष में थे।

नयना ने दाँत भींचे। “यह फिर कहानी लिख रहा है।”

कबीर ने कहा, “तो चलो एडिट करते हैं।”

वे सर्विस सीढ़ी से ऊपर भागे।

लेकिन प्रसारण-कक्ष पहुँचने से पहले ही रास्ते में एक बड़ा लोहे का दरवाज़ा बंद मिला। इलेक्ट्रॉनिक लॉक। लाल बत्ती।

“बंद,” कबीर ने कहा। “बाबा ने रास्ता काट दिया।”

मीरा नाथ ने दीवार पर हाथ फेरा। “दूसरा रास्ता है। मंच के नीचे।”

नयना ने पूछा, “मंच के नीचे?”

“हाँ,” वह बोली। “भजन मंडली और कलाकारों के आने-जाने का रास्ता। जब मैं आर्या थी, मुझे वहीं से मंच पर ले जाते थे।”

कबीर ने कहा, “मतलब हमें सीधे मंच के नीचे जाना होगा? जहाँ बाबा अभी लाइव प्रवचन दे रहा है?”

मीरा नाथ ने लाल रिबन बालों से निकालकर कलाई पर बाँधा।

“हाँ,” उसने कहा। “इस बार मैं मंच पर खुद जाऊँगी।”

अर्चना ने उसका हाथ पकड़ा। “अकेली नहीं।”

नयना ने दूसरा हाथ थाम लिया। “दोनों मीराएँ साथ जाएँगी।”

मीरा नाथ ने नयना को देखा। “तुम नयना हो।”

नयना ने कहा, “और मीरा भी। क्योंकि वह नाम मुझे प्यार से मिला था, चोरी से नहीं।”

अर्चना की आँखें भर आईं।

कबीर ने अपने पिता को सहारा दिया और कहा, “ठीक है। नामों का सेमिनार बाद में। मंच पर चलते हैं।”

वे संकरे रास्ते से मंच के नीचे पहुँचे। ऊपर भैरव की आवाज़ गूँज रही थी—

“जो लोग कहते हैं कि बच्चे गायब हुए, वे हमारी सेवा नहीं समझते। हम अनाथों को घर देते हैं…”

नीचे अँधेरे में कबीर ने फुसफुसाया, “यह आदमी अगर अपराधी न होता तो बहुत सफल मोटिवेशनल स्पीकर होता।”

राकेश ने पहली बार हल्की आवाज़ में कहा, “बेटा…”

कबीर ने उनकी तरफ देखा।

“मैं भागा नहीं था,” राकेश बोले।

कबीर की आँखें भर आईं। “मुझे पता है।”

“नहीं,” राकेश ने कहा, “पूरा सुन। मैं पहले डर गया था। सच में। जब पहली बार समझ आया, मैं भागा। फिर वापस आया। उसी दिन पकड़ा गया।”

कबीर ने उनका हाथ पकड़ा। “ठीक है।”

“नहीं। माफ़ करना।”

कबीर ने गहरी साँस ली। “पापा, मैं अभी आपको माफ़ कर दूँगा तो बाद में लड़ने का मुद्दा क्या बचेगा? बाहर चलो। लंबी लड़ाई करेंगे।”

राकेश रोते हुए मुस्कुरा दिए।

ऊपर भैरव बोल रहा था—

“अगर कोई सचमुच पीड़ित है तो मंच पर आए। मैं स्वयं सुनूँगा। भैरवनाथ का दरबार सबके लिए खुला है।”

नयना ने मीरा नाथ की तरफ देखा।

“वह बुला रहा है,” उसने कहा।

मीरा नाथ ने उत्तर दिया, “तो चलते हैं।”

कबीर ने जल्दी से वायरलेस, छोटा कैमरा और अपने फोन को जोड़ा। “मैं मंच के नीचे से फीड पकड़ने की कोशिश करूँगा। तुम लोग उसे बोलते रखो। जितना ज्यादा बोलेगा, उतना फँसेगा।”

अर्चना ने कहा, “और अगर उसने हमला किया?”

कबीर ने मंच की सीढ़ियों की तरफ देखा। “तब भीड़ देखेगी।”

नयना ने आवाज़ 19 की पेन ड्राइव अपनी मुट्ठी में पकड़ी।

फिर वह सीढ़ियाँ चढ़ी।

मीरा नाथ उसके साथ।

अर्चना पीछे।

मंच की रोशनी ने उन्हें एक साथ निगल लिया।

भैरव प्रवचन के बीच रुक गया।

हजारों लोगों की आँखें उनकी तरफ मुड़ीं।

स्क्रीन पर उनका चेहरा दिखाई दिया—नयना, मीरा नाथ, अर्चना।

भीड़ में शोर उठा।

“वही लड़की!”
“यही बोल रही थी!”
“अर्चना है!”
“अरे, ये तो अवस्थी की बेटी है!”
“कौन-सी बेटी?”

भैरव ने एक पल में खुद को संभाल लिया। मुस्कुराया।

“आओ बेटियों,” उसने माइक में कहा। “डरो मत। सच के दरबार में डर कैसा?”

नयना आगे बढ़ी। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं।

“दरबार तुम्हारा नहीं है,” उसने कहा। “यह उन नामों का है जिन्हें तुमने मिटाया।”

भैरव मुस्कुराया। “किसने तुम्हें भरमाया है? यह दुख की बात है कि कुछ लोग तुम्हारे दर्द का उपयोग कर रहे हैं।”

मीरा नाथ आगे आई। “तुमने मेरे दर्द का उपयोग किया था। याद है, बाबा? आर्या की पहली भजन संध्या? तुमने कहा था—रोते हुए गाना, दान ज्यादा मिलेगा।”

भीड़ में हलचल।

भैरव की मुस्कान थोड़ी सख्त हुई। “यह बच्ची मानसिक आघात से गुज़री है। इसे आराम चाहिए।”

“मेरा नाम बच्ची नहीं,” वह बोली। “मीरा नाथ है। देवव्रत नाथ की बेटी। जिसे तुमने आर्या बनाया।”

भीड़ में कुछ लोग देवव्रत का नाम सुनकर चौंके।

भैरव ने माइक बंद करने के लिए हाथ बढ़ाया, पर उसी समय मंच के बड़े स्क्रीन पर अचानक नया फीड आया।

कबीर ने नीचे से फीड हाइजैक कर लिया था।

स्क्रीन पर मौन-कक्ष का दृश्य चला—अर्चना बँधी हुई, राकेश बँधे हुए, पेट्रोल का डिब्बा, सुरक्षा प्रमुख का आदेश।

भीड़ से सामूहिक चीख उठी।

भैरव ने मुड़कर स्क्रीन देखा।

उसका चेहरा पहली बार सार्वजनिक रूप से फट गया।

“बंद करो!” वह चिल्लाया।

पर आवाज़ माइक में चली गई।

नयना ने तुरंत कहा, “सुन लिया? यही उसका सच है। यह आश्रम नहीं, कैदखाना है।”

स्क्रीन बदलकर शांत कुआँ की फाइलें दिखाने लगी।

Q-19।
M-NATH।
गुड्डू।
रीना।
सलीम।
नाम।
फोटो।
मृत्यु प्रमाणपत्र।
जन्म प्रमाणपत्र।
बदले हुए नाम।

फिर अरविंद का वीडियो—टावर पर खड़े, माइक पकड़े।

“मैं… अरविंद अवस्थी… पत्रकार… मुझे 2008 में मृत घोषित किया गया… मैं जिंदा हूँ…”

भीड़ में कई लोगों ने हाथ मुँह पर रख लिए।

भैरव ने नयना की तरफ देखा। उसकी आँखों में अब संत नहीं, शिकारी था।

“तुम समझती नहीं,” उसने बिना माइक के कहा। “भीड़ सच से नहीं, दिशा से चलती है।”

उसने अचानक माइक फिर चालू किया और भीड़ की तरफ मुड़ा।

“भक्तों!” वह गरजा। “यह हमला है! धर्म पर हमला! सेवा पर हमला! ये लोग झूठे वीडियो बनाकर आपके विश्वास को तोड़ना चाहते हैं!”

भीड़ दो हिस्सों में बाँट गई।

कुछ लोग चिल्लाए—“झूठ है!”
कुछ—“सच बताओ!”
कुछ—“बाबा की जय!”
कुछ—“बच्चों की सूची पढ़ो!”

भैरव ने हाथ उठाया। “जो मेरे साथ हैं, आगे आएँ!”

नयना ने देखा—भैरव भीड़ को हथियार बना रहा था।

तभी पीछे से आवाज़ आई।

बहुत कमजोर, पर माइक पर।

“जो अपने बच्चे खो चुके हैं… वे आगे आएँ।”

सबने मुड़कर देखा।

महेश कश्यप मंच के दूसरे छोर पर खड़े थे। सुजाता उनके साथ। अरविंद व्हीलचेयर में। शशांक पीछे कैमरा पकड़े। डाकिया खून से लथपथ, पर माइक स्टैंड थामे।

महेश ने कहा, “मैं शिक्षक हूँ। मैंने सूची बनाई थी। यह धर्म पर हमला नहीं। यह अपराध पर गवाही है।”

सुजाता ने माइक लिया।

उन्होंने गाना शुरू किया—

“सो जा रे नन्ही अँखियों वाली…”

भीड़ चुप हो गई।

यह कोई मंचीय भजन नहीं था। यह माँ का गीत था। उसमें राग कम, राख ज्यादा थी। जो लोग चिल्ला रहे थे, वे भी रुक गए। क्योंकि माँ की आवाज़, अगर सचमुच टूटकर निकले, तो सबसे ऊँचे नारे को भी रोक देती है।

गीत के बीच एक औरत भीड़ से आगे आई।

“मेरा गुड्डू कहाँ है?” उसने चिल्लाकर पूछा।

फिर दूसरा आदमी—“मेरे सलीम का नाम क्यों पढ़ा?”

तीसरी आवाज़—“मेरी रीना मर नहीं सकती थी!”

भैरव पीछे हटने लगा।

भीड़ अब उसकी तरफ नहीं, मंच की तरफ आ रही थी—जवाब लेने।

भैरव ने सुरक्षा प्रमुख को संकेत दिया।

और उसी क्षण मंच की लाइटें बंद हो गईं।

अँधेरा।

चीखें।

धक्का-मुक्की।

किसी ने नयना का हाथ पकड़ा।

वह कबीर नहीं था।

वह भैरव था।

उसने उसके कान में फुसफुसाया—

“नाम वापस ले लिया? अब जान भी लेनी पड़ेगी।”

नयना ने छूटने की कोशिश की, पर उसकी पकड़ लोहे जैसी थी।

अँधेरे में भैरव उसे मंच के पीछे खींचने लगा।

वह चिल्लाई—“कबीर!”

भीड़ के शोर में उसकी आवाज़ डूब गई।

पर एक आवाज़ ने सुना।

अरविंद।

उन्होंने व्हीलचेयर से उठने की कोशिश की। गिर पड़े। फिर भी चिल्लाए—

“टुनटुन!”

यह आवाज़ सुनते ही कबीर ने अँधेरे में दिशा पकड़ी।

“नयना!”

मीरा नाथ ने लाल रिबन खोलकर अपनी कलाई से फाड़ा और अँधेरे में फेंका—जहाँ भैरव खींचकर ले जा रहा था। लाल कपड़ा लाइट की हल्की चमक में जमीन पर गिरा।

कबीर ने उसे देखा।

“उधर!”

अर्चना दौड़ीं।

मीरा नाथ दौड़ी।

भीड़ टूट रही थी।

सायरन बज रहे थे।

रेडियो पर अब भी नाम पढ़े जा रहे थे।

और मंच के पीछे, अँधेरे गलियारे में, भैरव नयना को घसीटते हुए उसी जगह ले जा रहा था जहाँ शायद इस पूरी कहानी का आखिरी दरवाज़ा था।

दरवाज़े पर लिखा था—

**गर्भगृह — प्रवेश निषिद्ध**

भैरव ने दरवाज़ा खोला।

अंदर अँधेरा नहीं था।

अंदर दर्जनों स्क्रीन जल रही थीं।

हर स्क्रीन पर कोई न कोई कमरा। कोई बच्चा। कोई फाइल। कोई पुराना रिकॉर्ड। कोई नया आश्रम। कोई शहर। कोई स्कूल। कोई परिवार।

नयना ने समझ लिया।

शांत कुआँ सिर्फ मझगवाँ में नहीं था।

यह नेटवर्क अब भी जिंदा था।

भैरव ने उसके गले पर चाकू रखा।

“देखो,” उसने कहा, “तुमने सिर्फ कुएँ का पानी हिलाया है। समुद्र अभी बाकी है।”

नयना ने काँपते हुए स्क्रीनें देखीं।

एक स्क्रीन पर एक छोटा बच्चा रो रहा था।

दूसरी पर एक लड़की किसी कमरे में बंद थी।

तीसरी पर दस्तावेज़ स्कैन हो रहे थे।

चौथी पर लिखा था—

**नई सूची — चरण 2**

और आखिरी स्क्रीन पर एक लाइव फीड था—

**दिल्ली।**

भैरव ने मुस्कुराकर कहा—

“अब कहानी सचमुच शुरू होती है, नयना।”

दरवाज़े के बाहर कदमों की आवाज़ आ रही थी।

कबीर, मीरा नाथ, अर्चना शायद पहुँच रहे थे।

पर भैरव ने स्क्रीन की तरफ इशारा किया।

“एक कदम और, और यह पूरा नेटवर्क गायब हो जाएगा। सारे बच्चे, सारी फाइलें, सारे नाम। सोच लो—मुझे पकड़ना है या उन्हें बचाना?”

नयना की साँस अटक गई।

कहानी अब बदले से बड़ी हो चुकी थी।

यह सिर्फ भैरव को गिराने की नहीं रही।

अब उन सभी नामों को बचाना था, जो अभी मिटाए भी नहीं गए थे।

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