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आवाज़ नंबर 19 (भाग:10) This post in Under Review

Vinod 05 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 1052 0 Hindi :: हिंदी

भाग 10: प्रसारण से पहले

रात के उस अँधेरे में, काली पहाड़ी के नीचे, सबके चेहरों पर एक ही सवाल था—

अब?

पीछे पुराना आश्रम था, जिसके भीतर शांत कुआँ पानी, खून और आवाज़ों से भरकर शायद फिर बंद हो रहा था। आगे नया भैरवनाथ आश्रम था—रोशनी, भजन, भक्तों और कैमरों से भरा हुआ। बीच में वे थे—थके हुए, घायल, भीगे हुए, लेकिन पहली बार सच के इतने करीब कि डर अब पीछे छूटता हुआ लग रहा था।

नयना ने आवाज़ 19 की पेन ड्राइव मुट्ठी में पकड़ी हुई थी।

उसके सामने दो माताएँ थीं—सुजाता, जिनके हाथ अभी भी सलाखों की ठंडक से काँप रहे थे, और अर्चना, जो स्क्रीन के उस पार भैरव की कैद में थीं। एक पिता था—महेश कश्यप, जिसकी आँखों में अठारह साल की कैद के बावजूद शिक्षक वाली आग बची थी। एक पिता और था—अरविंद अवस्थी, जो लगभग मृत्यु से लौटे हुए लग रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में आवाज़ अब भी जिंदा थी। मीरा नाथ के पास उसका पिता था—देवव्रत नाथ, खून से भीगा, अपराध से भारी, पर अब पहली बार बचाने की कोशिश करता हुआ। और कबीर…

कबीर चुप था।

अभी-अभी उसने वीडियो कॉल पर अपने पिता को देखा था। वह पिता, जिसके बारे में उसने हमेशा आधा सच बताया था और आधा मज़ाक में छिपाया था।

“कबीर…” नयना ने धीरे से कहा।

कबीर ने उसकी तरफ देखा, पर उसकी आँखें जैसे उसे पार कर कहीं और देख रही थीं।

“वो…” नयना ने शब्द खोजे, “वो तुम्हारे पापा थे?”

कबीर ने हल्के से हँसने की कोशिश की। आवाज़ टूटी। “हाँ। कमाल है न? कहानी में ट्विस्ट आया और मैं सपोर्टिंग कैरेक्टर से फैमिली पैकेज में अपग्रेड हो गया।”

किसी ने नहीं हँसा।

कबीर ने खुद भी नहीं।

उसने जमीन से रॉड उठाई, फिर वापस गिरा दी। “मुझे लगा था वो हमें छोड़कर चले गए। माँ कहती थीं, ‘तेरे पापा कमजोर आदमी थे।’ मैं गुस्सा करता था। फिर बड़ा हुआ तो सोचा—ठीक है, हर आदमी हीरो नहीं होता। कुछ लोग भाग जाते हैं। मैंने उन्हें माफ़ भी नहीं किया, ढूँढ़ा भी नहीं।”

शशांक पीछे खड़ा था। उसका चेहरा और झुक गया।

कबीर ने उसकी तरफ देखा। “मामा। आपको पता था?”

शशांक ने आँखें बंद कर लीं।

कबीर की आवाज़ तेज़ हो गई। “आपको पता था?”

शशांक ने बहुत धीरे कहा, “हाँ।”

कबीर ने जैसे एक कदम पीछे लिया। “कितने साल से?”

“लगभग पंद्रह साल।”

कबीर की साँस रुक गई। “पंद्रह साल?”

“कबीर, मैं—”

“नहीं। अभी कोई लंबा पछतावा मत खोलिए। सीधे बोलिए। मेरे पिता शांत कुआँ में कैसे पहुँचे?”

शशांक ने अपने चश्मे को उतारकर आँखें पोंछीं। “तुम्हारे पिता, राकेश, पहले भैरव की सेवा समिति के लिए एम्बुलेंस चलाते थे।”

कबीर ने सूखे मुँह से दोहराया, “एम्बुलेंस?”

शशांक ने सिर हिलाया। “उन्हें शुरुआत में लगा था कि गरीब बच्चों को शहर के अस्पताल ले जाया जाता है। कागज़ मिलते थे, मुहर लगी होती थी, पुलिस की गाड़ी साथ होती थी। एक ड्राइवर कितना सवाल करता? फिर एक रात उन्होंने एक बच्चे को होश में आते सुना। बच्चा बार-बार कह रहा था—‘मुझे घर जाना है।’ राकेश ने गाड़ी रोक दी।”

कबीर की आँखें फैल गईं।

“उन्होंने बच्चे को उतारने की कोशिश की?” नयना ने पूछा।

“हाँ,” शशांक बोला। “और उसी रात उन्हें पता चला कि यह सेवा नहीं, सौदा है। वे भागकर मेरे पास आए। मेरे पास पहले से अरविंद के कुछ नेगेटिव और रिकॉर्डिंग्स थीं। राकेश ने कहा—‘सब बाहर करो।’ मैं डर गया। मैंने कहा—तैयारी करनी पड़ेगी। उसी देरी में भैरव को खबर मिल गई।”

कबीर ने दाँत भींच लिए। “और आपने?”

शशांक का गला भर आया। “मैं उन्हें बचा नहीं पाया।”

“या आपने कोशिश नहीं की?”

शशांक चुप।

कबीर का चेहरा कस गया। “कौन-सा?”

शशांक ने सिर झुका दिया। “दोनों।”

यह जवाब कबीर पर पत्थर की तरह गिरा। उसने शशांक की तरफ देखा—जिस आदमी ने उसे बचपन में कैमरा पकड़ना सिखाया, रेडियो की तारें समझाईं, पहली बार एडिटिंग सॉफ्टवेयर दिखाया। वह आदमी सिर्फ मामा नहीं था, एक पिता की खाली जगह पर रखा गया सहारा था। और अब वही सहारा अंदर से दीमक लगा निकला।

कबीर ने बहुत धीरे कहा, “माँ को पता था?”

“नहीं। उसे मैंने कहा कि राकेश भाग गए। मैंने झूठ बोला। क्योंकि अगर वह खोजती तो…”

“वह भी पकड़ी जाती?” कबीर ने वाक्य पूरा किया। “यह आपका हर झूठ का बहाना है न? किसी को बचाने के लिए झूठ। और अजीब बात है, जिन्हें बचाया, वे सब टूट गए।”

शशांक के पास कोई जवाब नहीं था।

देवव्रत, जो पत्थर से टिककर बैठा था, अचानक बोला, “झूठ कभी अकेला नहीं आता। पहले वह सुरक्षा बनकर आता है। फिर आदत। फिर जेल।”

सबकी नजरें उसकी ओर गईं।

कबीर ने कड़वाहट से कहा, “सर, आपसे नैतिक शिक्षा लेना थोड़ा अजीब लग रहा है।”

देवव्रत ने सिर झुका लिया। “ठीक है।”

मीरा नाथ ने उसकी ओर देखा। “फिर भी सच है।”

कबीर ने एक गहरी साँस ली। फिर उसने शशांक की तरफ देखा। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे। अभी नहीं। वहाँ सिर्फ काम था।

“मेरे पिता जिंदा हैं। इसका मतलब आपने उनके बारे में कुछ न कुछ बचाया होगा। ऑडियो, फोटो, रूट, रिकॉर्ड। कुछ।”

शशांक ने सिर हिलाया। “हाँ। एम्बुलेंस में एक फोल्डर है—R-07।”

“R?”

“राकेश।”

कबीर एम्बुलेंस की तरफ भागा। नयना उसके पीछे गई। उसने दरवाज़ा खोला। भीतर की बैटरी अभी भी चल रही थी। पुराने लैपटॉप की स्क्रीन नीली रोशनी फैला रही थी। कबीर ने काँपते हाथों से फोल्डर खोला।

**R-07_driver_log**
**R-07_audio_clip**
**R-07_last_route**
**R-07_possible_live**

कबीर ने “possible_live” पर क्लिक किया। फाइल खुली। उसमें एक पुराना नोट था।

**राकेश को 2011 में नए आश्रम के निर्माण कार्य में देखा गया। 2014 में सेवा-वाहन गैरेज में। 2018 में भैरव के निजी सुरक्षा-विभाग के कमरे के पास। स्थिति: कैदी / दबाव में कर्मचारी / अज्ञात।**

कबीर की साँस भारी हो गई। “वो इतने साल… यहीं थे?”

शशांक दरवाज़े तक आ गया। “शायद। मुझे पूरा भरोसा नहीं था।”

कबीर ने उसकी तरफ देखा। “तो आपने खोजा क्यों नहीं?”

शशांक ने धीमे कहा, “मैं अकेला था।”

“नहीं,” कबीर ने कहा, “आप डरपोक थे। फर्क है।”

शशांक ने इस बार विरोध नहीं किया।

नयना ने कबीर का कंधा छुआ। “हम उन्हें निकालेंगे।”

कबीर ने स्क्रीन से नज़र नहीं हटाई। “तुझे अपनी माँ निकालनी है। पिता निकालने हैं। अरविंद अंकल को बचाना है। मीरा को उसके अतीत से मिलाना है। देवव्रत को जिंदा रखना है क्योंकि उसके पास चाबी है। और अब मेरे पिता भी। यह मिशन नहीं, पूरी बारात है।”

नयना ने धीरे से कहा, “तो बारात ही सही। लेकिन दूल्हा भैरव नहीं होगा।”

कबीर ने पहली बार हल्की हँसी छोड़ी। “तू इस हालत में भी डायलॉग मार रही है। मैं प्रभावित हूँ।”

“तुझसे सीखा है।”

कबीर ने आँखें पोंछीं। “ठीक है। अब प्लान बनाते हैं। क्योंकि अगर हम ऐसे ही नए आश्रम गए तो बाबा हमें प्रसाद की तरह पैक कर देगा।”

सब एम्बुलेंस के पास इकट्ठा हुए।

शशांक ने पुराने लैपटॉप पर नक्शा खोला। वह इंटरनेट वाला नक्शा नहीं था, बल्कि हाथ से बनाया स्कैन। नए भैरवनाथ आश्रम का लेआउट। मुख्य द्वार, प्रवचन हॉल, सेवा रसोई, महिला आवास, निजी कक्ष, प्रसारण कक्ष, दान कार्यालय, गैरेज, पीछे की पहाड़ी और भूमिगत मार्ग।

कबीर ने नक्शा देखते ही कहा, “यह आपके पास कब से है?”

शशांक ने कहा, “2019 से।”

कबीर ने माथा पकड़ा। “आप पर गुस्सा करने के लिए मुझे अलग से कैलेंडर बनाना पड़ेगा।”

नयना ने नक्शे पर उँगली रखी। “अर्चना कहाँ होंगी?”

देवव्रत ने धीमे से कहा, “अगर भैरव ने उन्हें वीडियो में दिखाया, तो वे सार्वजनिक हिस्से में नहीं होंगी। निजी कक्ष या प्रसारण कक्ष के नीचे।”

मीरा नाथ ने कहा, “नए आश्रम में एक ‘मौन-कक्ष’ है। जहाँ भक्त ध्यान के लिए जाते हैं। असल में वहाँ ध्वनि-रोधी कमरे हैं। मुझे पहले वहाँ रखा गया था।”

“और कबीर के पिता?” नयना ने पूछा।

शशांक ने गैरेज की तरफ इशारा किया। “अगर वह अभी भी वाहन-सेवा से जुड़ा है, तो गैरेज या बेसमेंट वर्कशॉप।”

कबीर ने कहा, “वह बंधे हुए दिख रहे थे। शायद भैरव ने हमें दिखाने के लिए वहाँ लाया। असली जगह बदल भी सकता है।”

अरविंद, जो अब एम्बुलेंस की दीवार से टिके बैठे थे, बहुत धीरे बोले, “भैरव… मंच… छोड़ेगा… नहीं…”

सब चुप हो गए।

अरविंद ने बोलने की कोशिश की। गला अटक रहा था। नयना ने तुरंत पानी दिया। उन्होंने थोड़ा पिया। फिर बहुत मुश्किल से कहा—

“वह… प्रसारण… करेगा…”

कबीर आगे झुका। “कौन-सा प्रसारण?”

अरविंद ने शशांक से कागज़ माँगा। हाथ काँप रहा था। नयना ने उनके हाथ में पेन रखा। उन्होंने धीरे-धीरे लिखा—

**आज रात गुरु पूर्णिमा विशेष लाइव प्रवचन। राष्ट्रीय प्रसारण। दान अभियान।**

शशांक ने चौंककर कहा, “हाँ! आज गुरु पूर्णिमा का विशेष कार्यक्रम है। आश्रम का सबसे बड़ा लाइव इवेंट। टीवी चैनल, यूट्यूब, लोकल केबल, आश्रम ऐप—सब पर प्रसारण होगा।”

कबीर की आँखों में चमक आई। “मतलब भैरव खुद कैमरे पर होगा।”

नयना ने कहा, “और हम उसे वहीं गिराएँगे।”

देवव्रत ने सिर हिलाया। “मंच पर वह अछूत है। हजारों भक्त होंगे। सुरक्षा होगी। पुलिस होगी। कोई आरोप लगाओगे तो वे कहेंगे—साजिश, नकली वीडियो, एआई आवाज़।”

कबीर ने कहा, “सही। तो हमें सिर्फ सबूत नहीं, लाइव प्रतिक्रिया चाहिए। ऐसी चीज़ जो वह झुठला न सके।”

मीरा नाथ ने पूछा, “क्या?”

कबीर ने भैरव की पुरानी रिकॉर्डिंग याद की—“बेटी, मैं दशकों से सामने ही हूँ।” वह आदमी आवाज़ से खेलता था। कथा बनाता था। भीड़ को मोड़ता था। उसे सिर्फ फाइल से नहीं गिराया जा सकता था। उसे उसके अपने नाटक में हराना होगा।

कबीर ने कहा, “तीन चीज़ें चाहिए। पहली—आवाज़ 19 और पुरानी रिकॉर्डिंग्स का छोटा पैकेज। दूसरी—फाइलों की फोटो और असली नामों की सूची। तीसरी—लाइव गवाही। सिर्फ नयना नहीं। सुजाता, महेश, मीरा नाथ, अरविंद, देवव्रत, शशांक, डाकिया… और शायद मेरे पिता।”

शशांक ने कहा, “इतने लोगों को मंच तक ले जाना असंभव है।”

“मंच तक नहीं,” कबीर बोला। “सिस्टम तक। प्रसारण-कक्ष तक। अगर हम उनके लाइव फीड में घुस गए तो मंच हमारा होगा, भले बाबा सामने बैठा रहे।”

नयना ने तुरंत समझा। “हैक?”

कबीर ने कहा, “पूरी तरह नहीं। लोकल फीड ओवरराइड। अगर प्रसारण कक्ष में एनालॉग बैकअप है, तो हम लाइन में अपना सिग्नल डाल सकते हैं। मामा?”

शशांक ने नक्शे पर प्रसारण कक्ष दिखाया। “यहाँ से मुख्य फीड जाता है। मेरे पास पुराना कनेक्टर हो सकता है। आश्रम की पहली ऑडियो-वीडियो सेटअप मैंने ही लगाया था।”

कबीर ने उसे देखा। “बिल्कुल। अपराध में टेक सपोर्ट।”

शशांक ने आँखें नीची कर लीं। “आज उसी से तोड़ेंगे।”

“ठीक,” कबीर बोला। “हमें दो टीम चाहिए।”

नयना ने कहा, “नहीं। अलग होना खतरा है।”

कबीर ने नरम आवाज़ में कहा, “साथ रहे तो सब पकड़े जाएँगे। अलग होंगे तो शायद कुछ कर पाएँगे।”

महेश कश्यप, जो अब तक शांत थे, बोले, “हम भी चलेंगे।”

नयना ने तुरंत कहा, “नहीं। आप दोनों अभी-अभी कैद से निकले हैं।”

सुजाता ने उसकी तरफ देखा। “बेटी, हम अठारह साल से कैद में थे। अब बाहर आकर छिप जाएँ? हमारा नाम हमने दिया था। गवाही भी हम देंगे।”

महेश ने कहा, “बच्चों की पहली सूची मैंने बनाई थी। उसके बिना मामला अधूरा रहेगा।”

नयना ने सुजाता का हाथ पकड़ा। “आप चल पाएँगी?”

सुजाता ने थकी मुस्कान दी। “माँ अपनी बच्ची के पीछे कुएँ से निकल आई। आश्रम क्या चीज़ है?”

नयना का गला भर आया।

अरविंद ने धीरे से हाथ उठाया। “मैं… भी…”

“नहीं,” नयना ने लगभग आदेश दिया। “आपकी हालत—”

अरविंद ने उसकी आँखों में देखा। फिर मुश्किल से बोले, “आवाज़… मेरी… है…”

नयना चुप हो गई।

सच था। भैरव को गिराने वाली सबसे बड़ी आवाज़ अरविंद की थी—रिकॉर्डिंग में भी, जीवित भी।

कबीर ने कहा, “ठीक। टीम एक—नयना, मीरा नाथ, कबीर। हम प्रसारण-कक्ष में जाएँगे। टीम दो—शशांक, डाकिया, महेश, सुजाता, अरविंद। आप लोग पीछे के सेवा-मार्ग से मौन-कक्ष की तरफ जाएँगे। अर्चना और मेरे पिता अगर वहाँ हैं तो निकालेंगे।”

“और देवव्रत?” मीरा नाथ ने पूछा।

सबकी नजरें देवव्रत पर गईं।

देवव्रत ने धीरे से कहा, “मैं मुख्य द्वार से जाऊँगा।”

कबीर ने आँखें सिकोड़ दीं। “अकेले?”

“हाँ। मैं अभी भी कई लोगों के लिए देवव्रत नाथ हूँ। भले बूढ़ा, भले गिरा हुआ, पर नाम है। मैं उन्हें व्यस्त रख सकता हूँ। कुछ गार्ड मेरा आदेश मानेंगे। कुछ नहीं मानेंगे। पर भ्रम पैदा होगा।”

मीरा नाथ ने कहा, “और अगर भैरव ने तुम्हें मंच पर बुला लिया?”

देवव्रत ने उसकी तरफ देखा। “तो मैं पहली बार सच बोलूँगा।”

“और अगर उसने तुम्हें मार दिया?”

“तो कम से कम इस बार मैं सही वजह से मरूँगा।”

मीरा नाथ ने कोई जवाब नहीं दिया। पर इस बार उसने उसकी तरफ से नज़र नहीं हटाई।

नयना ने कहा, “एक और काम है। सबूतों की कॉपी बाहर भेजनी होगी।”

कबीर ने कड़वी हँसी हँसी। “नेटवर्क भैरव के कंट्रोल में हो सकता है।”

“तो?” नयना ने पूछा।

कबीर की आँखें चमकीं। “रेडियो।”

अरविंद ने हल्का सिर उठाया।

कबीर ने कहा, “पुराने लोकध्वनि केंद्र का ट्रांसमीटर हमने चालू होता देखा। मामा, क्या एम्बुलेंस से रेडियो फीड भेज सकते हैं?”

शशांक ने सोचा। “छोटा रेंज होगा। पर अगर पहाड़ी से रिले मिल गया तो आसपास के कस्बों में जा सकता है।”

डाकिया बोला, “पुराने डाक टावर पर एंटीना है। बंद पड़ा है, पर केबल शायद बची हो।”

“कहाँ?” कबीर ने पूछा।

“नए आश्रम के पीछे पहाड़ी पर। भैरव ने कभी उसे इंटरनेट टावर बनवाने की कोशिश की थी, पर काम अधूरा रह गया।”

कबीर ने कहा, “तो तीसरी लाइन—रेडियो बैकअप। अगर लाइव वीडियो फेल हुआ, तो ऑडियो बाहर जाएगा।”

नयना ने अरविंद की तरफ देखा। उनकी आँखों में गर्व था। कमजोर, पर साफ़।

“आवाज़ बचाना,” उन्होंने फुसफुसाया।

कबीर ने लैपटॉप पर तेजी से काम शुरू किया। उसने आवाज़ 19 का छोटा संस्करण बनाया। उसमें अरविंद का सच, नयना और मीरा की पहचान, भैरव की पुरानी आवाज़, देवव्रत की संलिप्तता, शांत कुआँ की फाइलों के दृश्य, सुजाता और महेश की गवाही के लिए खाली जगह—सब जोड़ा। फिर उसने अलग-अलग पेन ड्राइव और हार्ड ड्राइव में कॉपी की।

“कम से कम पाँच कॉपी,” उसने कहा। “एक नयना के पास। एक मेरे पास। एक मामा। एक डाकिया। एक…” वह रुका।

मीरा नाथ ने हाथ आगे बढ़ाया। “एक मेरे पास।”

कबीर ने उसे दी।

देवव्रत ने भी हाथ बढ़ाया। सबने उसकी तरफ देखा।

“मेरे पास भी एक होनी चाहिए,” उसने कहा। “अगर मैं मुख्य द्वार से अंदर गया और पकड़ा गया, तो शायद वे सोचेंगे मेरे पास कुछ नहीं। बूढ़े अपराधी की तलाशी लोग भरोसे से नहीं लेते।”

मीरा नाथ ने कहा, “या तुम फिर सौदा करोगे।”

देवव्रत ने उसकी आँखों में देखा। “कर सकता हूँ। इसलिए मुझे कॉपी मत दो।”

उसका यह जवाब कमरे को चुप कर गया।

कभी-कभी इंसान अपने ऊपर अविश्वास का अधिकार खुद देकर पहली बार विश्वास कमाता है।

मीरा नाथ ने पेन ड्राइव अपनी मुट्ठी में कस ली। “नहीं। कॉपी मेरे पास रहेगी।”

देवव्रत ने सिर झुका लिया।

दूर कहीं से ढोल और माइक की हल्की आवाज़ आने लगी। नए आश्रम की दिशा से।

भजन।

“जय भैरवनाथ बाबा…”

आवाज़ हवा में तैरती हुई आई। कितना अजीब था—एक तरफ कैद से निकले लोग काँप रहे थे, दूसरी तरफ हजारों लोग उसी आदमी की जय बोलने जा रहे थे।

सुजाता ने धीमे कहा, “लोगों को पता नहीं।”

महेश बोले, “कई बार लोग जानना भी नहीं चाहते। क्योंकि सच उनके विश्वास को तोड़ देता है।”

अरविंद ने बहुत मुश्किल से कहा, “तो… तोड़ो…”

नयना ने उनकी तरफ देखा।

“हाँ,” उसने कहा। “आज तोड़ेंगे।”

---

नए भैरवनाथ आश्रम तक पहुँचने का रास्ता पुराने आश्रम से बिल्कुल अलग था।

वहाँ अँधेरा नहीं, रोशनी थी।

चमकदार लाइटें, रंगीन झंडियाँ, बड़े-बड़े पोस्टर, एलईडी स्क्रीन, फूलों की माला, भक्तों की भीड़, भजन मंडली, भंडारे की लाइन, सुरक्षा गार्ड, पुलिस, कैमरे, ड्रोन। प्रवेश द्वार पर लिखा था—

**विश्व शांति महायज्ञ एवं गुरु पूर्णिमा महोत्सव**
**परम पूज्य बाबा भैरवनाथ जी महाराज का दिव्य संदेश**

गेट के बाहर कारें, बसें, ट्रैक्टर-ट्रॉलियाँ, मीडिया वैन, एम्बुलेंस, पुलिस जीप—सब खड़े थे। भीड़ में घुसना मुश्किल भी था, आसान भी। मुश्किल इसलिए कि सुरक्षा थी। आसान इसलिए कि भीड़ हर चेहरे को निगल लेती है।

नयना ने दुपट्टा सिर पर लिया। मीरा नाथ ने अपने लाल रिबन को अंदर छिपा लिया। कबीर ने कैमरा बैग कंधे पर डाल लिया, जैसे वह मीडिया टीम का हिस्सा हो। शशांक ने अरविंद को एक पुरानी व्हीलचेयर पर बैठाया, जो एम्बुलेंस से मिली थी। अरविंद का चेहरा कम्बल से आधा ढँका था। सुजाता और महेश साधारण भक्तों की तरह चल रहे थे। डाकिया झुका हुआ, छड़ी के सहारे, जैसे किसी वृद्धाश्रम से आया भक्त। देवव्रत सबसे अलग खड़ा था।

वह कुछ देर तक गेट को देखता रहा।

मीरा नाथ उसके पास आई। “डर लग रहा है?”

देवव्रत ने सच कहा, “हाँ।”

“अच्छा है।”

वह हल्का-सा मुस्कुराया। “तुम्हारी माँ भी ऐसा ही बोलती।”

मीरा नाथ का चेहरा सख्त हुआ। “मेरी माँ?”

देवव्रत की आँखें धुंधली हो गईं। “तुम्हारी माँ का नाम वासंती था। वह बहुत कम बोलती थी। पर जब बोलती थी तो आदमी को झूठ बोलने की हिम्मत नहीं रहती थी। तुम उसकी तरह दिखती हो।”

मीरा नाथ बहुत देर तक चुप रही।

“यह नाम आपने मुझे पहले कभी क्यों नहीं दिया?” उसने पूछा।

देवव्रत ने आँखें झुका लीं। “क्योंकि मैं तुम्हारे सामने आने लायक नहीं था।”

मीरा नाथ ने गहरी साँस ली। “आज भी नहीं हो। पर आज काम है।”

“हाँ,” उसने कहा। “काम।”

नयना ने सबको आखिरी बार देखा। “सबको रास्ता याद है?”

कबीर ने कहा, “तू और मैं बाएँ सर्विस कॉरिडोर से प्रसारण-कक्ष। मीरा हमारे साथ। मामा टीम दो को मौन-कक्ष की तरफ ले जाएँगे। डाकिया रेडियो टावर का रास्ता देखेगा। देवव्रत मुख्य गेट से ध्यान भटकाएगा। अगर कोई फँसा, तो बाकी रुकेंगे नहीं।”

सुजाता ने तुरंत कहा, “नहीं। कोई पीछे नहीं छूटेगा।”

कबीर ने नर्म स्वर में कहा, “माँजी, यह भाव अच्छा है, रणनीति खराब।”

सुजाता ने उसे देखा। “तू भी बच्चा है?”

कबीर ने एक सेकंड रुककर कहा, “आजकल लग रहा है, हाँ।”

सुजाता ने उसके सिर पर हाथ रखा। “तो तू भी पीछे नहीं छूटेगा।”

कबीर की आँखें भर आईं। वह तुरंत दूसरी तरफ देखने लगा। “ठीक है, अब सब भावुकता बंद। मैं काम नहीं कर पाऊँगा।”

दूर मंच पर उद्घोषक की आवाज़ आई—

“बस कुछ ही क्षणों में परम पूज्य बाबा भैरवनाथ जी महाराज पधारने वाले हैं!”

भीड़ में जयकारा उठा।

“बाबा भैरवनाथ की—”

“जय!”

यह जयकारा पहाड़ी से टकराकर लौटा। नयना को लगा जैसे हर “जय” किसी बच्चे के नाम पर रखी मिट्टी को और दबा रहा हो।

देवव्रत ने अपने कुर्ते की जेब ठीक की। फिर नयना की तरफ देखा।

“अगर मैं बचा नहीं,” उसने कहा, “तो मेरी गवाही शशांक के सिस्टम में है। वीडियो रिकॉर्ड। पासवर्ड—वासंती।”

मीरा नाथ ने झटके से उसकी तरफ देखा।

देवव्रत ने कहा, “अब कम से कम उसका नाम किसी काम आए।”

वह मुड़ा और मुख्य द्वार की तरफ बढ़ गया।

दो गार्ड पहले उसे पहचान नहीं पाए। फिर उनमें से एक सीधा खड़ा हो गया।

“नाथ साहब?”

देवव्रत ने वही पुराना स्वर निकाला—धीमा, पर आदेश से भरा। “बाबा से मिलना है। अभी।”

गार्ड असमंजस में पड़ गया। वह फोन करने लगा।

नयना ने फुसफुसाया, “चलो।”

वे भीड़ के बीच से बाएँ मुड़े। सर्विस कॉरिडोर तक पहुँचने के लिए भंडारे की लाइन के पीछे से जाना था। रसोई में बड़े-बड़े भगोने चढ़े थे। सेवक खिचड़ी बाँट रहे थे। धुएँ और घी की गंध फैली थी। कोई नहीं सोच सकता था कि इसी आश्रम में तहखानों से लोग निकाले गए हैं।

कबीर ने मीडिया बैज जैसा कुछ गले में डाल रखा था, जो शायद शशांक ने पुराने प्रेस किट से निकाला था। वह तेज़ चाल से चला, जैसे उसे पता हो कहाँ जाना है। ऐसे मौकों पर आत्मविश्वास कई बार असली अनुमति-पत्र से बेहतर काम करता है।

एक सेवक ने रोका। “किधर?”

कबीर ने झट से कहा, “लाइव फीड में ऑडियो लेग है। कंट्रोल से कॉल आया है।”

सेवक घबरा गया। “अभी? बाबा आने वाले हैं।”

“तो क्या बाबा को म्यूट में दिखाएँगे?” कबीर ने झल्लाकर कहा। “चलने दो।”

सेवक हट गया।

नयना ने धीरे से कहा, “तेरे झूठों में कला है।”

कबीर बोला, “धन्यवाद। बचपन से पारिवारिक माहौल मिला है।”

मीरा नाथ चुप चल रही थी। पर उसकी आँखें हर दरवाज़े, हर कैमरे, हर रास्ते को पहचान रही थीं। “यह हिस्सा नया है,” उसने कहा। “लेकिन दाएँ जो गलियारा है, वह पुराने महिला विंग से जुड़ता होगा।”

“अर्चना?” नयना ने पूछा।

“शायद।”

वे एक मोड़ पर पहुँचे। सामने दो रास्ते थे—एक प्रसारण-कक्ष, दूसरा मौन-कक्ष की दिशा।

यहीं टीम अलग होनी थी।

शशांक, जो अरविंद की व्हीलचेयर धकेल रहा था, उनके पास आया। सुजाता और महेश उसके पीछे। डाकिया ने धीरे से कहा, “मैं टावर के रास्ते जा रहा हूँ। अगर प्रसारण रुका तो रेडियो चालू करूँगा।”

नयना ने उसका हाथ पकड़ा। “सावधान रहना।”

डाकिये ने मुस्कुराकर कहा, “इस बार वापस आऊँगा।”

उस एक वाक्य में अठारह साल का पश्चाताप था।

अरविंद ने नयना को देखा। हाथ उठाया। वह झुकी। उन्होंने बहुत धीरे कहा, “डरो… मत…”

नयना ने उनके हाथ को माथे से लगाया। “आप भी नहीं।”

सुजाता ने उसे गले लगा लिया। “नाम चाहे नयना हो या मीरा, तू मेरी आँख है।”

नयना ने महसूस किया कि इस वाक्य ने उसके दोनों नामों को एक साथ थाम लिया।

महेश ने कहा, “याद रखो—सच को बोलना नहीं, साबित करना पड़ता है।”

कबीर ने कहा, “और साबित करने के लिए हमें कंट्रोल रूम चाहिए। चलते हैं।”

टीम अलग हुई।

नयना, कबीर और मीरा नाथ प्रसारण-कक्ष की तरफ बढ़े।

दरवाज़े पर “अधिकृत प्रवेश निषेध” लिखा था। बाहर एक गार्ड बैठा था। वह मोबाइल पर भजन की रील देख रहा था। कबीर ने बैग से केबल निकाला और झुँझलाते हुए बोला, “भाई, अंदर किसने XLR लाइन उलटी लगा दी? बाहर फीड क्रैक कर रहा है।”

गार्ड ने सिर उठाया। “कौन?”

कबीर ने इतनी बेइज्ज़ती वाली नजर से देखा कि गार्ड खुद असुरक्षित महसूस करने लगा। “टेक टीम। दिल्ली से। तुम लोग लोकल हो न? हर साल यही गड़बड़ करते हो।”

गार्ड उठा। “मुझे आदेश नहीं है—”

मीरा नाथ आगे आई। उसने बहुत शांत स्वर में कहा, “बाबा का लाइव रुक गया तो आदेश किसे समझाओगे?”

गार्ड का चेहरा उतर गया। उसने दरवाज़ा खोल दिया। “जल्दी करो।”

तीनों अंदर घुस गए।

प्रसारण-कक्ष उम्मीद से बड़ा था। स्क्रीनें लगी थीं। एक पर मंच। एक पर भक्तों की भीड़। एक पर सोशल मीडिया लाइव चैट। एक पर दान की गिनती। तीन टेक्नीशियन बैठे थे। दो लोग कैमरा फीड बदल रहे थे। एक ऑडियो मिक्सर पर था।

कबीर ने तुरंत फुसफुसाया, “ज्यादा लोग हैं।”

नयना ने पूछा, “अब?”

कबीर ने कहा, “अब वही करेंगे जिसमें मैं अच्छा हूँ—घबराते हुए काम।”

वह सीधे ऑडियो मिक्सर वाले के पास गया। “भाई, आउटपुट में ह्यूम आ रहा है।”

टेक्नीशियन ने चिढ़कर कहा, “कौन हो तुम?”

कबीर ने स्क्रीन की तरफ इशारा किया। “दिल्ली फीड। अभी कॉल आया होगा। चेक करो।”

तभी बाहर मंच पर जयकारा उठा। बाबा भैरवनाथ मंच पर आ चुके थे।

सारी स्क्रीन पर उनका चेहरा फैल गया—शांत, चमकदार, चंदन लगा माथा, सफेद दाढ़ी, करुण मुस्कान। हजारों लोग हाथ जोड़कर खड़े थे।

भैरव ने मंच पर बैठते हुए आँखें बंद कीं।

“बच्चो,” उसकी आवाज़ स्पीकर से निकली, “आवाज़ ईश्वर की देन है। आवाज़ का सही उपयोग भजन है, सेवा है, सत्य है।”

नयना के भीतर आग भड़क गई।

कबीर ने धीमे कहा, “कितना घटिया आदमी है। खुद पर डॉक्यूमेंट्री बनवा रहा है।”

मीरा नाथ की आँखें स्क्रीन पर जम गईं। “उसने मुझसे यही कहलवाया था। आवाज़ ईश्वर की देन है। फिर मेरी आवाज़ बेच दी।”

कबीर ने दाँत भींचे। “आज वापस लेते हैं।”

उसने मौका देखकर अपने बैग से छोटा डिवाइस निकाला। पेन ड्राइव लगाई। उसे बैकअप इनपुट में जोड़ना था। लेकिन मिक्सर तक पहुँचना आसान नहीं था। टेक्नीशियन उसकी हर हरकत देख रहा था।

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला।

देवव्रत अंदर आया।

सब चौंक गए।

गार्ड उसके पीछे था, घबराया हुआ। “सर, इन्होंने कहा—”

देवव्रत ने कमरे में सब पर नजर दौड़ाई। नयना और कबीर को देखते ही उसकी आँखों में हल्की चेतावनी आई—सावधान।

फिर उसने टेक्नीशियन से कहा, “बाबा ने निजी रिकॉर्डिंग माँगी है। बैकअप फीड मेरे सामने चेक करो।”

टेक्नीशियन तुरंत खड़ा हो गया। “जी नाथ साहब।”

कबीर ने मौका पकड़ा। वह मिक्सर के पास झुका। डिवाइस जोड़ा। स्क्रीन पर छोटा संकेत आया—**External Feed Detected**

नयना का दिल धड़कने लगा।

तभी प्रसारण-कक्ष के दूसरे दरवाज़े से एक आदमी अंदर आया। काला सूट। कान में वायरलेस। सुरक्षा प्रमुख।

“रुकिए,” उसने कहा। “यह फीड किसने जोड़ा?”

कबीर का हाथ जम गया।

सुरक्षा प्रमुख ने नयना को देखा। फिर मीरा नाथ को।

उसकी आँखें फैल गईं।

“ये वही लड़कियाँ हैं।”

सब कुछ एक ही पल में टूट गया।

नयना ने पास रखी कुर्सी सुरक्षा प्रमुख की तरफ धकेली। वह टकराकर पीछे गिरा। कबीर ने तुरंत मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद किया। मीरा नाथ ने ऑडियो टेक्नीशियन का हेडफोन खींचकर उसे पीछे हटाया।

कमरे में अफरा-तफरी मच गई।

“फीड चालू!” कबीर चिल्लाया।

नयना ने पूछा, “कहाँ से?”

“यह लाल बटन! पर रुको—”

दरवाज़े पर बाहर से धक्का पड़ा। गार्ड चिल्ला रहे थे।

देवव्रत ने पिस्तौल नहीं निकाली। शायद उसके पास अब नहीं थी। उसने दरवाज़े के सामने खड़े होकर कहा, “कोई अंदर नहीं आएगा!”

कबीर ने सिस्टम पर एंटर दबाया।

स्क्रीन पर चेतावनी आई—

**Override live feed? Confirm with master key.**

“मास्टर की?” कबीर चीखा। “ये क्या नया तमाशा है?”

देवव्रत ने तुरंत कहा, “भैरव के पास होगी।”

मीरा नाथ ने स्क्रीन पर देखा। “या प्रसारण प्रमुख के पास।”

सुरक्षा प्रमुख जमीन से उठने की कोशिश कर रहा था। नयना ने उसके जैकेट की जेबें टटोलीं। एक की-कार्ड मिला। उसने कबीर को फेंका।

कबीर ने कार्ड लगाया।

स्क्रीन बदली।

**Override ready. 10-second delay.**

कबीर ने नयना की तरफ देखा। “यह करते ही सब हमारे खिलाफ आएँगे।”

नयना ने स्क्रीन पर बाबा को देखा। वह अभी बोल रहा था—

“सत्य से बड़ा कोई धर्म नहीं…”

नयना ने कहा, “कर।”

कबीर ने एंटर दबाया।

दस।

नौ।

आठ।

दरवाज़े पर धक्का।

सात।

बाहर से आवाज़—“दरवाज़ा तोड़ो!”

छह।

मीरा नाथ ने नयना का हाथ पकड़ लिया।

पाँच।

देवव्रत ने पहली बार बिना झुके दरवाज़े की तरफ देखा।

चार।

कबीर ने बुदबुदाया, “पापा, जहाँ भी हो… देखना।”

तीन।

नयना ने पेन ड्राइव की फाइल को देखा—**AWAAZ_BACHAO_FINAL**

दो।

एक।

पूरे आश्रम की स्क्रीन झपकी।

बाबा भैरवनाथ का चेहरा गायब हुआ।

कुछ पल काला पर्दा।

फिर अरविंद अवस्थी की आवाज़ पूरे आश्रम, लाइव प्रसारण, केबल, ऐप और शायद रेडियो की शुरुआती लाइन पर गूँजी—

“तारीख चौदह जुलाई दो हजार आठ। यह पहली रिकॉर्डिंग है…”

भीड़ में हलचल हुई।

मंच पर बैठे भैरव का चेहरा पहली बार मुस्कान से खाली हुआ।

स्क्रीन पर शांत कुआँ की फाइलें दिखीं। बच्चों के नाम। Q-19। M-NATH। सुजाता। महेश। देवव्रत। भैरव प्रताप की पुरानी आवाज़—

“नाम भूल जाएगी। बच्चे जल्दी भूलते हैं।”

भीड़ में शोर उठा।

कबीर ने दूसरी फाइल चलाई।

भैरव की आवाज़—

“आज से आपकी बेटी समाज की बेटी है…”

देवव्रत की पुरानी टूटी आवाज़—

“वह मेरी बच्ची है…”

कैमरा लाइव फीड पर कट हुआ—मंच पर बैठा भैरव अचानक खड़ा हो चुका था। वह चिल्ला रहा था, लेकिन उसका माइक्रोफोन बंद था। उसकी आवाज़ नहीं जा रही थी।

कबीर ने कहा, “माइक काट दिया उसका।”

नयना ने पहली बार गहरी साँस ली।

लेकिन तभी स्क्रीन पर अचानक भैरव की आँखें कैमरे में सीधी टिक गईं।

उसने किसी को संकेत दिया।

कंट्रोल रूम की सारी लाइटें लाल हो गईं।

कबीर की स्क्रीन पर नया संदेश आया—

**Remote override initiated. Source: Baba Console**

कबीर ने गाली दी। “वो वापस कंट्रोल ले रहा है!”

दरवाज़ा टूटने लगा।

नयना ने पूछा, “कितना समय?”

“एक मिनट से कम!”

मीरा नाथ ने कहा, “गवाही लाइव करो। अभी।”

कबीर ने कैमरा इनपुट ऑन किया। कंट्रोल रूम का छोटा कैमरा चालू हुआ। स्क्रीन पर नयना, मीरा नाथ, कबीर और पीछे देवव्रत दिखे।

कबीर ने कहा, “नयना, बोल!”

नयना का दिल धड़का।

हजारों लोग। लाइव प्रसारण। बाबा। भैरव। माँ कैद में। कबीर का पिता कैद में। अरविंद कहीं दूसरी टीम के साथ। सब कुछ एक मिनट में।

वह कैमरे के सामने आई।

और बोली—

“मेरा नाम नयना कश्यप है। मुझे अठारह साल पहले मृत घोषित किया गया था। मैं जिंदा हूँ।”

बाहर शोर थम गया।

“मेरे पिता महेश कश्यप और मेरी माँ सुजाता कश्यप को शांत कुआँ में कैद रखा गया। पत्रकार अरविंद अवस्थी ने मुझे बचाया। अर्चना अवस्थी ने मुझे पाला। बाबा भैरवनाथ, जिसका असली नाम भैरव प्रताप है, इस पूरे अपराध-जाल का मालिक है।”

मीरा नाथ आगे आई।

“मैं मीरा नाथ हूँ। देवव्रत नाथ की बेटी। मुझे भी मृत, गायब और फिर आर्या बनाकर आश्रम में रखा गया। मेरी आवाज़ से भजन गवाए गए, दान लिया गया, और मेरी पहचान छीन ली गई।”

देवव्रत धीरे-धीरे कैमरे के सामने आया।

उसका चेहरा पीला था, पर आवाज़ साफ़।

“मैं देवव्रत नाथ। पूर्व पुलिस अधिकारी। मैंने अपराध किया। मैंने रिकॉर्ड बदले। बच्चों को मृत घोषित किया। भैरव प्रताप के दबाव और अपने लालच में लोगों की जिंदगी बर्बाद की। यह गवाही स्वेच्छा से दे रहा हूँ। भैरव प्रताप दोषी है। मैं भी दोषी हूँ।”

कंट्रोल रूम में सन्नाटा।

बाहर शायद पूरा आश्रम सुन रहा था।

स्क्रीन पर रिमोट ओवरराइड 87% दिखा।

कबीर चिल्लाया, “और तीस सेकंड!”

नयना ने कहा, “अर्चना अवस्थी और राकेश—”

अचानक दरवाज़ा टूट गया।

गार्ड अंदर घुसे।

उसी पल स्क्रीन काली हो गई।

प्रसारण कट गया।

કबीर ने सिस्टम पर हाथ मारा। “नहीं!”

गार्डों ने कबीर को पकड़ लिया। नयना को दो लोगों ने पीछे से जकड़ा। मीरा नाथ ने संघर्ष किया, लेकिन एक गार्ड ने उसका हाथ मोड़ दिया। देवव्रत को धक्का दिया गया; वह गिर पड़े।

प्रसारण-कक्ष का दूसरा दरवाज़ा खुला।

भैरव प्रताप अंदर आया।

मंच वाला चंदन, सफेद वस्त्र, वही शांत चेहरा। लेकिन अब उसकी आँखों में कोई मुखौटा नहीं था।

वह धीरे-धीरे नयना के सामने आया।

“अच्छा बोली,” उसने कहा। “बहुत अच्छा। आवाज़ में असर है। खून बोलता है शायद।”

नयना ने दाँत भींचे। “अब सबने सुन लिया।”

भैरव मुस्कुराया। “सुनना और मानना अलग बात है। मैं कहूँगा—डीपफेक। राजनीतिक षड्यंत्र। बीमार बूढ़े की जबरन गवाही। दो मानसिक रूप से अस्थिर लड़कियाँ। और जनता?”

वह झुका।

“जनता वही मानेगी जिससे उसका भगवान बच जाए।”

कबीर ने गार्ड की पकड़ में झटके से कहा, “इतना कॉन्फिडेंस मत रख बाबा। इंटरनेट पर लोग बिल्ली की छींक भी सेव कर लेते हैं।”

भैरव ने उसकी तरफ देखा। “तुम कबीर हो। राकेश का बेटा।”

कबीर जम गया।

भैरव बोला, “तुम्हारे पिता ने भी बहुत बोलने की कोशिश की थी। ड्राइवर था। पर दिल में हीरो बनने की बीमारी। तुम पर गया है।”

कबीर ने थूक निगला। “वो कहाँ हैं?”

“यहीं,” भैरव ने कहा। “और अभी तक जिंदा हैं। पर अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम सब कितने समझदार हो।”

नयना ने कहा, “तुम्हारा प्रसारण गया है।”

भैरव ने हल्के से ताली बजाई। “हाँ। पूरे बयालीस सेकंड। फिर कट। उसके बाद हमारी टीम ने बाबा का भावुक संदेश चला दिया—‘तकनीकी व्यवधान और दुष्ट शक्तियों की परीक्षा।’ भक्त रो रहे हैं। दान दोगुना आ रहा है।”

कबीर का चेहरा गिरा।

भैरव ने कहा, “तुम लोग सच को घटना समझते हो। मैं सच को प्रबंधन समझता हूँ।”

तभी कमरे के कोने में रखे पुराने स्पीकर से हल्की खरखराहट आई।

सबने उधर देखा।

कबीर की आँखों में अचानक चमक लौटी।

स्पीकर से डाकिये की आवाज़ आई—

“लोकध्वनि रेडियो से सीधा प्रसारण जारी है। जो सुन रहे हैं, रिकॉर्ड करते रहें। नामों की सूची अब पढ़ी जाएगी।”

भैरव का चेहरा पहली बार सचमुच बदल गया।

कबीर ने मुस्कुराकर कहा, “बाबा, रेडियो सुना है कभी? पुरानी चीज़ है। पर भरोसे से चलती है।”

स्पीकर पर महेश कश्यप की आवाज़ आई—

“सूची क्रमांक Q-01…”

फिर सुजाता की आवाज़—

“रीना, पिता रामू, गाँव बेलाही…”

फिर अरविंद की टूटी हुई आवाज़—

“Q-02…”

भैरव ने चीखकर कहा, “बंद करो इसे!”

लेकिन आवाज़ जा चुकी थी।

आश्रम के बाहर, कस्बे के पुराने रेडियो, मोबाइल रिकॉर्डर, लोकल केबल के बैकअप ऑडियो, चाय की दुकानों के स्पीकर—जहाँ-जहाँ भी लोकध्वनि की पुरानी तरंग पहुँच सकती थी, वहाँ शांत कुआँ के नाम बहने लगे।

नाम।

एक-एक नाम।

जिन्हें कागज़ ने मारा था, आवाज़ उन्हें वापस बुला रही थी।

भैरव ने नयना की तरफ देखा।

इस बार उसकी आँखों में पहली बार डर था।

नयना ने धीमे कहा—

“कहानी अब तुम्हारे हाथ में नहीं है।”

और बाहर भीड़ में पहली बार जयकारे की जगह सवाल उठने लगे।

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