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आवाज़ नंबर 19 (भाग:9) This post in Under Review

Vinod 05 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 669 0 Hindi :: हिंदी

भाग 9: सबसे नीचे की आवाज़

“टुनटुन… रिपोर्टर…”

आवाज़ कुएँ की सबसे गहरी अँधेरी नस से उठी थी।

धीमी। टूटी हुई। जैसे कोई पत्थरों के नीचे दबा आदमी अपनी बची हुई साँसों से नाम नहीं, जीवन पुकार रहा हो।

नयना ने सलाखों को पकड़े-पकड़े आँखें बंद कर लीं।

सारी आवाज़ें एक पल को थम गईं—ऊपर गोली, तहखाने की भागदौड़, सुजाता का रोना, महेश की काँपती साँसें, कबीर की बेचैनी, मीरा नाथ की कठोर चुप्पी—सब।

सिर्फ वह आवाज़ बची।

“टुनटुन… रिपोर्टर…”

नयना के भीतर पाँच साल की बच्ची जाग गई।

वही बच्ची जो रात को बुखार में अर्चना का आँचल पकड़कर सोती थी। वही बच्ची जो टेबल के नीचे छिपकर अरविंद को टाइपराइटर पर काम करते देखती थी। वही बच्ची जो हर सुबह पूछती—“आज की बड़ी खबर क्या है?” और अरविंद हँसकर कहते—“आज की बड़ी खबर यह है कि हमारी रिपोर्टर ने दूध पी लिया।”

वह आदमी जिंदा था।

या फिर इस दुनिया की सबसे निर्दयी उम्मीद उसके सामने खड़ी थी।

“पापा…” शब्द उसके मुँह से निकला, मगर इतना हल्का कि वह खुद भी नहीं सुन पाई।

अंदर सलाखों के पीछे सुजाता ने उसका हाथ कसकर पकड़ा। उसकी उँगलियाँ हड्डियों जैसी थीं, पर पकड़ में माँ की सारी उम्र थी।

“बिटिया,” सुजाता फुसफुसाईं, “पहले दरवाज़ा खोलो। फिर रोना।”

कबीर ने तुरंत खुद को संभाला। “हाँ। दरवाज़ा। चाबी?”

महेश कश्यप सलाखों के करीब आए। उनकी आँखों में उम्र थी, भूख थी, अठारह साल का अंधेरा था, लेकिन बुझा हुआ आदमी नहीं था। आवाज़ कमजोर थी, पर हर शब्द में शिक्षक की साफ़ रेखा थी।

“यह दरवाज़ा बाहर की चाबी से नहीं खुलता,” उन्होंने कहा। “ऊपर वालों को भी पता नहीं। असली कुंडी नीचे से खुलती है।”

“नीचे से?” कबीर ने कुएँ की तरफ देखा। “मतलब हमें और नीचे उतरना होगा?”

महेश ने सिर हिलाया। “स्तर तीन। वहाँ नियंत्रण-कक्ष है। पहले यह पूरा ढाँचा पुराने जल-संग्रह का हिस्सा था। भैरव ने इसे कैदखाना बना दिया। दरवाज़े, जाली, रिकॉर्ड रूम—सब नीचे से नियंत्रित होते हैं।”

मीरा नाथ ने पूछा, “अरविंद वहीं हैं?”

महेश की आँखों में एक गहरी छाया उतर आई। “हाँ। कई साल से।”

नयना का गला भर आया। “उन्होंने… उन्होंने कभी ऊपर आने की कोशिश नहीं की?”

महेश ने कुएँ के अंधेरे में देखा। “हर उस आदमी ने कोशिश की है जो जिंदा रहा। लेकिन कुछ कैदें ताले से नहीं, दूसरों की जान से बंद होती हैं। अरविंद के सामने हमेशा किसी न किसी की जान रखी गई। कभी हमारी। कभी अर्चना की। कभी तुम्हारी।”

ऊपर से फिर गोली चली।

इस बार गोली की आवाज़ के साथ देवव्रत की कराह भी आई।

मीरा नाथ तुरंत सीढ़ी की तरफ मुड़ी। “बाबा के लोग अंदर आ गए।”

कबीर ने रॉड कस ली। “हमारे पास टाइम नहीं है। नीचे कौन जाएगा?”

शशांक ने काँपते हुए कहा, “मैं सिस्टम समझ सकता हूँ। मुझे जाना चाहिए।”

कबीर ने उसकी तरफ देखा। “मामा, अगर यह पश्चाताप वाली हीरोइज़्म है तो अभी मत करिए। हमें काम का आदमी चाहिए, शहीद नहीं।”

शशांक ने पहली बार बिना बचाव के कहा, “मुझे पता है। इसलिए कह रहा हूँ। मशीनें मैं समझता हूँ।”

डाकिया ने अपनी छड़ी दीवार से टिकाई। “मैं यहीं रहूँगा। अगर ऊपर से कोई नीचे आया तो रोकूँगा।”

नयना ने तुरंत कहा, “नहीं। आप घायल हैं।”

डाकिये ने हल्की मुस्कान दी। “बिटिया, बूढ़ा आदमी जब बहुत देर तक जिंदा रहता है तो एक दिन उसकी उम्र भी हथियार बन जाती है। लोग सोचते हैं, यह क्या करेगा। वही क्षण काम आता है।”

मीरा नाथ ने सलाखों के पीछे सुजाता और महेश की तरफ देखा। “हम वापस आएँगे।”

सुजाता ने उसकी ओर पहली बार पूरा ध्यान दिया। “तू वही है न? लाल रिबन वाली?”

मीरा नाथ चुप रह गई।

सुजाता ने सलाखों के बीच से हाथ बढ़ाया। “इधर आ।”

मीरा नाथ धीरे-धीरे आगे बढ़ी। सुजाता ने उसकी उँगलियाँ पकड़ीं। “तू भी मेरी बच्ची है।”

मीरा नाथ का चेहरा टूट गया। इतने सालों में शायद किसी ने उसे इस तरह नहीं कहा था—बिना मंच, बिना भक्त, बिना उपयोग।

“मैं…” वह बोल नहीं पाई।

सुजाता ने उसके हाथ पर अपनी ठंडी हथेली रखी। “जिस रात तुझे छोड़ दिया गया, उस रात कोई बच्चा नहीं छूटा था। हम सब छूट गए थे। आज अगर तू लौटी है तो देर नहीं, दुआ है।”

नयना ने देखा—मीरा नाथ की आँखों से पहली बार आँसू गिरे। चुपचाप। बिना आवाज़।

कबीर ने धीरे से कहा, “चलना होगा।”

कुएँ की जाली के किनारे से अंदर उतरने वाली दूसरी सीढ़ी थी। लोहे की, गीली, पतली। नीचे अंधेरा ऐसा था जैसे रोशनी वहाँ पहुँचकर शर्मिंदा हो जाती हो।

कबीर पहले उतरा। उसके पीछे शशांक। फिर नयना। फिर मीरा नाथ।

नीचे उतरते हुए नयना ने ऊपर देखा। सलाखों के पीछे सुजाता का चेहरा दिखाई दे रहा था। माँ। पर कौन-सी माँ? अर्चना, जिसने पाला। सुजाता, जिसने जन्म दिया। दोनों के बीच अब कोई लड़ाई नहीं थी। दोनों ने उसे अलग-अलग मौतों से बचाया था—एक ने जन्म देकर, दूसरी ने छीनकर।

सीढ़ी लंबी थी। हर पायदान पर जंग। नीचे से पानी की गंध और तेज़ होती गई। कहीं-कहीं दीवार पर खून जैसा भूरा दाग था। कबीर की टॉर्च काँपती रोशनी फैला रही थी।

“अगर मैं फिसला,” कबीर ने धीमे कहा, “तो मेरी श्रद्धांजलि में कोई ये मत बोलना कि वह बहादुर था। बोलना कि वह बेवकूफ था पर वफादार।”

नयना की आँखों में डर के बीच हल्की मुस्कान आई। “चुपचाप उतर।”

“ठीक है, टुनटुन रिपोर्टर।”

यह नाम सुनते ही नयना का पैर एक पल रुका। फिर उसने धीरे से कहा, “यह नाम सिर्फ पापा बोलते थे।”

कबीर ने गर्दन घुमाए बिना कहा, “आज से कोई और नहीं बोलेगा। माफ़ करना।”

उसकी यह सादगी नयना को भीतर से छू गई। कुछ रिश्ते खून नहीं माँगते, बस सीमा पहचान लेते हैं।

नीचे पहुँचकर सीढ़ी एक गोल कक्ष में खुली। वहाँ पानी टखनों तक था। दीवारों पर पुरानी पाइपलाइनें थीं। बीच में लोहे का बड़ा पहिया, जैसे किसी पुराने बाँध का नियंत्रण हो। उसके बगल में लकड़ी की मेज, जिस पर धूल में ढँका एक रिकॉर्डिंग कंसोल पड़ा था। दीवार में कई लीवर थे—कुछ पर पुराने कोड लिखे थे: Q-05, Q-11, M-NATH, Q-19, LEVEL-2, MAIN GATE।

कबीर ने धीमे कहा, “यह तो पूरा कंट्रोल रूम है।”

शशांक कंसोल के पास गया। “यहाँ से ऊपर के दरवाज़े खुलते होंगे। और शायद ऑडियो भी यहीं से भेजा जाता था।”

नयना ने कक्ष में चारों ओर देखा। “पापा कहाँ हैं?”

तभी अँधेरे के दूसरे सिरे से खाँसी की आवाज़ आई।

लंबी। सूखी। दर्दनाक।

टॉर्च उस तरफ घूमी।

दीवार के पास एक आदमी बैठा था।

पहले वह आदमी नहीं, कपड़ों का ढेर लगा। फिर रोशनी उसके चेहरे पर गई। सफेद दाढ़ी, धँसी आँखें, बहुत पतला शरीर। कंधों पर फटा कम्बल। गले पर पुराने घाव के निशान। एक हाथ में धातु की छोटी प्लेट, जैसे उसने अभी-अभी किसी पाइप पर मारकर आवाज़ की हो। उसके पास तारों से जुड़ा एक पुराना माइक्रोफोन था, जिसके सहारे शायद उसकी आवाज़ ऊपर पहुँची थी।

नयना का शरीर पत्थर हो गया।

अरविंद अवस्थी।

अठारह साल ने उन्हें खा लिया था, पर पूरा निगल नहीं पाया था।

उनकी आँखें अब भी वही थीं।

गहरी। थकी हुई। पर जब उन्होंने नयना को देखा, उनमें जो रोशनी जली, वह किसी भी रिकॉर्डिंग से ज्यादा सच थी।

उन्होंने बोलने की कोशिश की। गला अटका। सिर्फ टूटी हवा निकली।

फिर उन्होंने बहुत धीरे कहा—

“मेरी… रिपोर्टर…”

नयना दौड़ी।

पानी छपछपाया। वह घुटनों के बल उनके सामने गिर गई। उनके कंधों को पकड़ते ही उसे डर लगा कि कहीं वह टूट न जाएँ। वह इतने हल्के थे जैसे शरीर नहीं, बची हुई इच्छा हों।

“पापा…” इस बार आवाज़ साफ़ निकली। “आप… आप जिंदा हैं…”

अरविंद ने हाथ उठाया। उँगलियाँ काँप रही थीं। उन्होंने उसके सिर को छुआ। फिर बालों को। जैसे यकीन कर रहे हों कि यह सचमुच वही बच्ची है। फिर उनकी उँगलियाँ उसके माथे पर रुकीं।

उनकी आँखों से आँसू बहे।

“बड़ी… हो गई…”

नयना उनके सीने से लग गई। वह रोई नहीं, टूट गई। कई तरह के रोने होते हैं। एक रोना तब आता है जब दर्द नया हो। दूसरा तब जब दर्द बहुत पुराना हो और अचानक उसे पता चले कि वह अकेला नहीं था। नयना का रोना दूसरा था।

“आपने मुझे क्यों नहीं बताया? आप आए क्यों नहीं? माँ… अर्चना… मैं…” शब्द बिखर गए।

अरविंद ने बहुत मुश्किल से उसकी पीठ थपथपाई। “बचाना… था…”

मीरा नाथ थोड़ा दूर खड़ी थी। उसका चेहरा अजीब था—पिघला हुआ भी, जम हुआ भी। अरविंद ने उसे देखा।

उनकी आँखों में अपराधबोध उतर आया।

“मीरा…”

मीरा नाथ पीछे हटना चाहती थी, पर रुकी रही।

“मुझे मत बुलाइए,” उसने कहा, पर आवाज़ में वैसी आग नहीं रही। उसमें रोका हुआ पानी था।

अरविंद ने सिर झुका लिया। “माफ़…”

“नहीं,” उसने तुरंत कहा। “अभी नहीं। पहले बाहर निकलते हैं। फिर आप माफी माँगना। जितनी बार चाहें।”

अरविंद की आँखों में पहली बार हल्की मुस्कान आई। वह मुस्कान बहुत कमजोर थी, पर वही अरविंद था—जो मौत के कुएँ में भी संवाद बचा ले।

कबीर ने आँखें पोंछते हुए मुँह फेर लिया। “माफ़ करना, इमोशनल सीन सुंदर है, पर ऊपर गुंडे हैं और यहाँ मशीनें हैं। हमें दरवाज़े खोलने हैं।”

शशांक कंसोल के सामने खड़ा था। उसका चेहरा पसीने से भीग गया था। “सिस्टम पुराना है, पर चल सकता है। पावर कहाँ से आ रही है?”

अरविंद ने काँपते हाथ से दीवार की तरफ इशारा किया। “पानी… टरबाइन…”

कबीर ने चौंककर कहा, “नीचे पानी की मूवमेंट से पावर? इसीलिए बिना बिजली के रेडियो चल रहे थे?”

शशांक ने कहा, “भैरव ने कमाल की चीज़ बनाई थी… अपराध के लिए।”

अरविंद ने सिर हिलाया। फिर बहुत धीरे बोले, “आवाज़… हथियार…”

नयना ने उनके पास पड़े माइक्रोफोन को देखा। “आपने ऊपर हमारी आवाज़ सुनी?”

उन्होंने सिर हिलाया। “सालों… सुनता… रहा…”

“सब?”

“नहीं… टुकड़े…”

कबीर ने लीवर देखे। “कौन-सा दरवाज़ा खोलना है?”

महेश की आवाज़ ऊपर से गूँजी, “स्तर दो की कोठरियों का लीवर ‘LEVEL-2’ होगा!”

शशांक ने लीवर देखा। “हाँ। है।”

“रुको,” मीरा नाथ ने कहा। “अगर हम सब दरवाज़े खोल देंगे तो ऊपर वाले भी रास्ता पा सकते हैं।”

अरविंद ने काँपते हाथ से मेज पर पड़ा एक पुराना स्लेट जैसा बोर्ड उठाया। उस पर चॉक से कुछ लिखा था—शायद वह बोलने से बचने के लिए लिखते थे।

उन्होंने लिखा—

**पहले Q-19। फिर M-NATH। फिर MAIN GATE बंद।**

कबीर ने पढ़ा। “मतलब सिर्फ महेश-सुजाता की कोठरी और मीरा नाथ का पुराना सेक्शन?”

अरविंद ने सिर हिलाया।

शशांक ने Q-19 का लीवर खींचा।

ऊपर से धातु खुलने की आवाज़ आई।

फिर सुजाता की चीख—इस बार डर की नहीं, विश्वास न कर पाने की।

“दरवाज़ा खुल गया!”

नयना ने आँखें बंद कर लीं। माँ मुक्त थीं। कम से कम सलाखों से।

शशांक ने M-NATH लीवर खींचा। कहीं दूर कोई और ताला खुला। शायद उस कमरे का जहाँ कभी मीरा नाथ का नाम बंद किया गया था। शायद कोई पुराना रिकॉर्ड। शायद कोई भटकी हुई याद।

फिर अचानक कंसोल पर लाल बत्ती जल उठी।

स्पीकर में आवाज़ आई।

धीमी, भारी, और इतनी साफ़ कि लगा वह आदमी इसी कक्ष में खड़ा है।

“अरविंद अवस्थी।”

कबीर ने फुसफुसाया, “कौन?”

अरविंद का चेहरा सख्त हो गया।

मीरा नाथ ने कहा, “भैरव।”

स्पीकर से आवाज़ आई—“अठारह साल में पहली बार तुमने मेरा सिस्टम मेरे खिलाफ चलाया। मानना पड़ेगा, पत्रकार मरता नहीं। बस दुर्गंध करने लगता है।”

नयना ने माइक्रोफोन की तरफ देखा। “भैरव!”

स्पीकर पर हल्की हँसी आई। “अरे वाह। नयना कश्यप। नाम वापस मिल गया? कैसा लग रहा है? पहचान का स्वाद मीठा होता है या खून जैसा?”

कबीर ने कंसोल पर स्विच ढूँढ़ा। “ये लाइन कहाँ से आ रही है?”

शशांक बोला, “ऊपर के इंटरकॉम से। बंद करना मुश्किल होगा।”

भैरव की आवाज़ जारी रही—“और मीरा नाथ भी साथ है? देवव्रत की नाकामी और अरविंद की दया—दोनों एक ही कुएँ में। क्या दृश्य होगा।”

मीरा नाथ ने दाँत भींचे। “तुम सामने आओ।”

“सामने?” भैरव हँसा। “बेटी, मैं दशकों से सामने ही हूँ। लोग मेरे चरण छूते हैं। तुम लोग ही देर से देख पा रहे हो।”

नयना ने कहा, “हमने फाइलें ले ली हैं।”

“फाइलें?” उसकी आवाज़ में उपहास था। “फाइलें जलती हैं। आदमी मुकरते हैं। फोटो नकली कही जाती है। आवाज़ एआई बोल दी जाती है। आज का युग तुम्हारे खिलाफ है, बच्ची। सच जितना बढ़ा, झूठ उतना सस्ता हो गया।”

कबीर ने बुदबुदाया, “दुश्मन का मीडिया-सेंस अच्छा है, यह समस्या है।”

भैरव बोला, “लेकिन मेरे पास दया है। अरविंद को छोड़ दो। फाइलें छोड़ दो। अर्चना और सुजाता को ले जाओ। देवव्रत को भी ले जाना हो तो ले जाओ। बूढ़ा कबाड़ है। लेकिन अरविंद…”

कुछ पल सन्नाटा।

“अरविंद मेरे साथ रहेगा।”

नयना ने अरविंद का हाथ कस लिया। “कभी नहीं।”

“भावुक मत बनो। तुम्हारे पिता महेश हैं। पालने वाला अरविंद है। और जिसने तुम्हें मरने दिया, वह देवव्रत है। तुम्हारी जिंदगी में पिता बहुत हैं। एक कम होगा तो भी कहानी चलेगी।”

नयना की आँखों में आग भर गई। “कहानी नहीं चलेगी। खत्म होगी। तुम्हारे साथ।”

स्पीकर से भैरव की साँस सुनाई दी। फिर आवाज़ ठंडी हो गई।

“ठीक है। तो कहानी का अगला मोड़ सुनो।”

ऊपर कहीं से धमाका हुआ। फिर पानी की तेज़ आवाज़।

शशांक चीखा, “वह फ्लड-गेट खोल रहा है!”

कक्ष की दीवारों के नीचे से पानी का दबाव बढ़ने लगा। जो पानी पहले टखनों तक था, वह तेजी से घुटनों तक आने लगा।

कबीर ने गाली दी। “हमें जल्दी निकलना होगा!”

अरविंद ने मेज पकड़कर उठने की कोशिश की। शरीर साथ नहीं दे रहा था। नयना ने उन्हें सहारा दिया। मीरा नाथ दूसरी तरफ आ गई।

अरविंद ने मना करना चाहा, पर मीरा नाथ ने कठोर स्वर में कहा, “चुप रहिए। इस बार कोई पीछे नहीं छूटेगा।”

ऊपर से महेश की आवाज़ आई, “जल्दी! पानी ऊपर भी आ रहा है!”

कबीर ने लीवर देखा। “MAIN GATE बंद करना है या खोलना?”

अरविंद ने काँपते हाथ से बोर्ड पर लिखा—

**MAIN GATE बंद। EXIT-OLD खुला।**

शशांक ने दीवार पर “EXIT-OLD” ढूँढ़ा। लीवर जंग में अटका था। उसने खींचा। नहीं हिला।

“जाम है!”

कबीर उसके पास गया। दोनों ने मिलकर खींचा। लीवर हिला, पर पूरा नहीं। पानी अब जाँघों तक आ रहा था। कक्ष में रखे कागज़ तैरने लगे। एक पुरानी फोटो पानी पर घूमती हुई नयना के पास आई—किसी अज्ञात बच्चे की। उसने उसे उठाकर बैग में ठूँस लिया। अब कोई नाम फिर पानी में नहीं जाएगा।

मीरा नाथ ने अरविंद को दीवार से टिकाया और लीवर की तरफ दौड़ी। तीनों ने साथ खींचा। लीवर ने पहले जंग की चीख निकाली, फिर नीचे गिर गया।

दूर कहीं पत्थर खुलने की भारी आवाज़ आई।

अरविंद ने बोर्ड पर फिर लिखा—

**सुरंग। पश्चिम। नदी।**

कबीर ने कहा, “सब ऊपर!”

वे सीढ़ी की तरफ बढ़े। पानी का बहाव अब तेज़ था। नयना अरविंद को सहारा दे रही थी। उनके पैर जवाब दे रहे थे। मीरा नाथ दूसरी तरफ थी। कबीर आगे रास्ता साफ़ कर रहा था। शशांक पीछे कंसोल से हार्ड ड्राइव निकालने लगा।

कबीर चिल्लाया, “मामा, अभी डेटा मत बचाओ, खुद बचो!”

शशांक ने हार्ड ड्राइव बैग में डाली। “यही तो बचाना है!”

सीढ़ी तक पहुँचना मुश्किल था। पानी नीचे की तरफ से धक्का दे रहा था। ऊपर से सुजाता और महेश की आवाज़ें आ रही थीं। डाकिया शायद उन्हें बाहर निकाल रहा था।

नयना ने अरविंद से कहा, “बस थोड़ा। पापा, बस थोड़ा।”

अरविंद ने हँसने की कोशिश की। गले से दर्दभरी हवा निकली। उन्होंने बहुत धीरे कहा—“रिपोर्टर… आदेश… दे रही…”

“हाँ,” नयना रोते हुए बोली। “और आपको मानना पड़ेगा।”

वे सीढ़ी चढ़ने लगे। हर पायदान पर अरविंद रुकते। उनका शरीर काँपता। मीरा नाथ ने उन्हें कंधे से पकड़ा। एक बार उनका पैर फिसला। नयना चीखी। कबीर ने ऊपर से हाथ बढ़ाकर पकड़ लिया।

“अरे अंकल,” कबीर हाँफते हुए बोला, “इतने साल बाद मिले हो, अभी ड्रामेटिक एग्ज़िट नहीं देना।”

अरविंद ने कबीर को देखा। आँखों में सवाल था।

नयना ने कहा, “कबीर। मेरा दोस्त।”

अरविंद ने बहुत मुश्किल से सिर हिलाया। फिर फुसफुसाए—“अच्छा… लड़का…”

कबीर ने कहा, “अंकल, अभी भावुक मत कीजिए। मैं वैसे ही रोने वाला हूँ।”

वे स्तर दो तक पहुँचे।

वहाँ अफरा-तफरी थी। सुजाता और महेश बाहर आ चुके थे। सुजाता खड़ी भी मुश्किल से हो पा रही थीं, पर नयना को देखते ही आगे बढ़ीं। फिर उन्होंने अरविंद को देखा।

उनकी आँखें फैल गईं।

“अरविंद…”

अरविंद रुक गए।

अठारह साल एक क्षण में उनके बीच खड़े हो गए—कर्ज, दर्द, बच्ची, वादा, असफलता।

सुजाता ने हाथ जोड़ दिए। “तुमने मेरी बच्ची बचाई।”

अरविंद ने सिर हिलाया। गला भरा। बोले नहीं।

महेश कश्यप आगे आए। उन्होंने अरविंद के कंधे पर हाथ रखा। दो बूढ़े आदमी—एक जिसने जन्म दिया, एक जिसने बचाया—एक-दूसरे को देख रहे थे। कोई ईर्ष्या नहीं। कोई दावा नहीं। सिर्फ वह दुख जो उन लोगों के बीच होता है जिन्हें एक ही राक्षस ने अलग-अलग तरह से तोड़ा हो।

महेश ने कहा, “अब इसे बाहर ले चलो।”

अरविंद ने धीमे से कहा, “हमारी… बच्ची…”

महेश की आँखें भर आईं। “हाँ। हमारी।”

नयना इस एक शब्द से भीतर तक हिल गई।

हमारी।

ऊपर से फिर गोली चली। डाकिया लड़खड़ाता हुआ दिखाई दिया। उसके माथे पर चोट थी, पर वह खड़ा था।

“ऊपर रास्ता बंद है!” उसने कहा। “देवव्रत ने उन्हें रोका, पर ज्यादा देर नहीं।”

मीरा नाथ का चेहरा सख्त हो गया। “देवव्रत कहाँ है?”

डाकिया चुप रहा।

“कहाँ है?” वह चीखी।

डाकिये ने धीमे कहा, “वह मुख्य हॉल में है। घायल। लेकिन जिंदा था जब मैंने छोड़ा।”

मीरा नाथ ने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ाया। नयना ने उसका हाथ पकड़ा। “अभी ऊपर जाओगी तो मर जाओगी।”

“वह मेरे पिता हैं।”

“और तुमने कहा था अपराधी पीछे चलता है। उसे मौका दो पीछे आने का। खुद को उसके अपराध में मत छोड़ो।”

मीरा नाथ काँपी। उसकी आँखों में गुस्सा, डर, बेटीपन, घृणा—सब एक साथ थे। फिर उसने दाँत भींचे और हाथ छुड़ा लिया। “ठीक। पर वह मरा तो भैरव से पहले मैं उसे मारूँगी।”

कबीर ने कहा, “यह भावनात्मक रूप से उलझा हुआ वाक्य है, पर अभी स्वीकार है।”

शशांक ने EXIT-OLD की दिशा बताई। दीवार के पीछे खुला रास्ता अब दिख रहा था। संकरा, झुककर चलने लायक। पानी पीछे से आता जा रहा था। उन्हें तुरंत जाना था।

सब एक-एक करके सुरंग में घुसे। सबसे आगे कबीर। फिर महेश और सुजाता। उनके पीछे नयना और अरविंद। फिर मीरा नाथ, शशांक और डाकिया।

सुरंग में पानी घुटनों तक था। ऊपर कम जगह। साँस लेना मुश्किल। लेकिन यह रास्ता बाहर जाता था। कम से कम उम्मीद यही थी।

पीछे से भैरव की आवाज़ फिर आई। इस बार दूर, मगर दीवारों से टकराकर।

“भागो। जितना भाग सकते हो भागो। बाहर दुनिया मेरी है।”

नयना रुकी नहीं।

उसने जवाब नहीं दिया।

क्योंकि कुछ आवाज़ों को जवाब अदालत में देना चाहिए, सुरंग में नहीं।

करीब दस मिनट तक वे पानी, अँधेरे और पत्थरों के बीच चलते रहे। सुजाता दो बार गिरते-गिरते बचीं। महेश ने उन्हें संभाला। अरविंद का शरीर बार-बार जवाब दे रहा था, पर नयना और मीरा नाथ ने उन्हें छोड़ा नहीं। कबीर आगे रास्ता देखता रहा। कई जगह रास्ता टूटा था। एक जगह उन्हें झुककर रेंगना पड़ा।

आखिर हवा बदली।

गीली बदबू की जगह बाहर की मिट्टी की गंध आई।

सामने हल्की रोशनी थी।

कबीर ने धक्का दिया। झाड़ियों के पीछे पत्थर का पुराना दरवाज़ा खुला। वे नदी की सूखी धार के दूसरी तरफ निकले। आसमान अब पूरी तरह अँधेरा था। दूर पुराने आश्रम की दिशा में हल्की आग जैसी रोशनी दिख रही थी।

शायद पानी का दबाव। शायद विस्फोट। शायद भैरव फाइलें जला रहा था।

वे सब बाहर गिरते-पड़ते निकले। सुजाता मिट्टी पर बैठ गईं और जमीन को छूने लगीं। महेश ने पहली बार आसमान देखा। उनकी आँखों से आँसू बहते रहे। अरविंद को नयना ने पत्थर से टिकाया। वह साँस ले रहे थे, पर बहुत मुश्किल से।

मीरा नाथ झाड़ियों से बाहर आई। उसने पीछे मुड़कर आश्रम की तरफ देखा। “देवव्रत…”

तभी अँधेरे से एक आकृति लड़खड़ाती हुई निकली।

सफेद कुर्ता खून से लाल। कंधा घायल। चेहरा पीला। हाथ में वही पिस्तौल, अब खाली।

देवव्रत नाथ।

वह कुछ कदम चला, फिर घुटनों पर गिर गया।

मीरा नाथ दौड़ी नहीं। पहले रुकी। जैसे खुद को रोक रही हो। फिर अचानक सब भूलकर उसकी तरफ भागी।

“पापा…”

यह शब्द उसके मुँह से अनायास निकला।

देवव्रत ने सिर उठाया। उसका चेहरा टूट गया। “फिर से बोलो…”

मीरा नाथ उसके पास घुटनों के बल बैठ गई। “अभी नहीं। पहले जिंदा रहो।”

देवव्रत हल्का हँसा। खाँसी में खून आया। “बेटी… आदेश… दे रही…”

नयना ने अरविंद की तरफ देखा। अरविंद भी वही बात कह चुके थे।

दो बेटियाँ। दो पिता। दो अपराध। दो बचाव।

और एक ही रात।

कबीर ने दूर सड़क की तरफ देखा। “हमें यहाँ से निकलना होगा। अभी।”

शशांक ने कहा, “एम्बुलेंस?”

“बहुत दूर है,” डाकिये ने कहा। “लेकिन नदी के मोड़ पर पुराना पंप-हाउस है। वहाँ से सड़क लगती है।”

वे आगे बढ़ने ही वाले थे कि नयना का फोन वाइब्रेट हुआ।

इतने अँधेरे, इतने गहरे इलाके में नेटवर्क अचानक लौट आया था।

स्क्रीन पर वीडियो कॉल थी।

अनजान नंबर।

सब रुक गए।

कबीर ने कहा, “मत उठाना।”

अरविंद ने नयना का हाथ पकड़ा। उनकी आँखों में चेतावनी थी।

पर फोन अपने आप कनेक्ट हो गया।

स्क्रीन पर बाबा भैरवनाथ का चेहरा आया।

सफेद दाढ़ी। चंदन। शांत मुस्कान। पीछे रोशनी, जैसे कोई प्रवचन मंच हो।

“नयना,” उसने कहा, “तुमने तहखाना खोल लिया। बधाई।”

कबीर ने फोन छीनना चाहा, पर स्क्रीन पर भैरव ने कहा—

“मत काटो। अर्चना मेरे पास है।”

नयना जम गई।

स्क्रीन थोड़ी हिली। कैमरा घूमाया गया।

एक कुर्सी पर अर्चना बैठी थीं। हाथ बँधे। चेहरा चोटिल। पर आँखें खुली। जिंदा।

“माँ!” नयना चीखी।

अर्चना ने उसे देखा। स्क्रीन के उस पार भी वह माँ ही थीं—थकी, घायल, मगर आँखों में वही आदेश।

“भाग जा,” अर्चना ने कहा। “मेरे लिए मत रुकना।”

भैरव मुस्कुराया। “माएँ हमेशा यही कहती हैं। और बेटियाँ हमेशा उल्टा करती हैं।”

नयना की साँसें तेज़ हो गईं। “तुम्हें क्या चाहिए?”

भैरव ने कहा, “अरविंद। फाइलें। दोनों लड़कियाँ। और देवव्रत की चाबी।”

कबीर ने बुदबुदाया, “कुछ बचा है क्या जो इसे नहीं चाहिए?”

भैरव ने जैसे सुन लिया। “लड़के को भी लाना चाहो तो लाओ। हास्य-रस काम आएगा।”

कबीर चुप हो गया।

नयना ने कहा, “हम तुम्हारे पास नहीं आएँगे।”

“आओगी,” भैरव ने शांत स्वर में कहा। “क्योंकि अर्चना के अलावा मेरे पास एक और मेहमान है।”

स्क्रीन फिर घुमी।

अंधेरे में एक और कुर्सी थी।

उस पर एक आदमी बैठा था। चेहरा ढका हुआ। शरीर कमजोर। हाथ बँधे।

भैरव ने कपड़ा हटाया।

शशांक चीख पड़ा—

“नहीं…”

कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।

कुर्सी पर उसका पिता बैठा था।

वह पिता जिसके बारे में कबीर ने कभी ज्यादा बात नहीं की थी। जो सालों पहले शहर छोड़कर गया बताया गया था। जो कबीर की जिंदगी में एक बंद अध्याय था।

भैरव ने मुस्कुराकर कहा—

“कहानियाँ सिर्फ तुम्हारे परिवार में नहीं छिपीं, कबीर। तुम्हारा घर भी शांत कुआँ से खाली नहीं गया था।”

कबीर के हाथ से रॉड गिर गई।

नयना ने उसे पकड़ा। “कबीर…”

स्क्रीन पर भैरव झुका। उसकी आँखें अब संत की नहीं, शिकारी की थीं।

“पुराने आश्रम से बच गए। अच्छा। अब नए आश्रम आओ। सुबह चार बजे से पहले। वरना अगली आवाज़ लाइव नहीं होगी।”

वह रुका।

फिर बोला—

“वह अंतिम होगी।”

कॉल कट गई।

रात अचानक बहुत बड़ी हो गई।

दूर पहाड़ी के ऊपर बादल गरजे।

नयना ने अर्चना को खोया नहीं था। अभी नहीं।
कबीर ने अपने पिता को पाया नहीं था। पर शायद खोने वाला था।
अरविंद जिंदा था, पर टूटने की सीमा पर।
सुजाता और महेश आज़ाद थे, पर अठारह साल की कैद उनकी साँसों में अटकी थी।
मीरा नाथ ने पिता कहा था, और उसी क्षण फिर युद्ध शुरू हो गया था।

काली पहाड़ी के अंधेरे से निकलकर वे अब भैरवनाथ के उजाले वाले मंच की तरफ धकेले जा रहे थे।

और नयना समझ गई—

शांत कुआँ सिर्फ जमीन के नीचे नहीं था।

वह हर उस जगह था जहाँ किसी का नाम छीनकर उसे किसी और की कहानी में कैद कर दिया गया था।

उसने फोन बंद किया। बैग कसकर पकड़ा।

“अब हम भागेंगे नहीं,” उसने कहा।

कबीर ने काँपते हुए पूछा, “तो करेंगे क्या?”

नयना ने अरविंद, सुजाता, महेश, मीरा नाथ, देवव्रत, शशांक और डाकिये की तरफ देखा।

फिर पहाड़ी के उस पार, जहाँ नए आश्रम की रोशनी आसमान पर चढ़ रही थी।

“अब प्रसारण करेंगे,” उसने कहा।

अरविंद की आँखों में धीमी चमक लौटी।

नयना ने आवाज़ 19 की पेन ड्राइव निकाली।

“भैरव कहता है फाइलें जलती हैं, लोग मुकरते हैं, आवाज़ एआई कह दी जाती है।”

कबीर ने धीरे से पूछा, “तो?”

नयना ने कहा—

“तो हम उसे उसकी अपनी आवाज़ में गिराएँगे।”

दूर कहीं मंदिर की घंटी बजी।

रात शुरू हो चुकी थी।

और पहली बार, कहानी उनके पीछे नहीं, उनके हाथ में थी।

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