Vinod 05 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 596 0 Hindi :: हिंदी
भाग 8: शांत कुआँ काली पहाड़ी दूर से सिर्फ एक पहाड़ी लगती थी। पास आने पर समझ आता था कि वह पहाड़ी नहीं, एक चुप बैठा हुआ जानवर है। उसकी ढलानों पर काले पत्थर ऐसे उभरे थे जैसे किसी ने धरती की पीठ पर जले हुए घाव छोड़ दिए हों। ऊपर पुराने बरगद और पीपल की जड़ें चट्टानों को पकड़कर बैठी थीं। नीचे की तरफ सूखी नदी की रेत थी, जिसमें कभी पानी बहता होगा। अब सिर्फ दरारें थीं। बीच-बीच में झाड़ियाँ थीं जिनमें प्लास्टिक की थैलियाँ अटकी थीं, जैसे इंसानों ने अपने छोटे-छोटे अपराध प्रकृति पर टाँग दिए हों। सूरज ढलने लगा था। आसमान में पीला रंग पहले नारंगी हुआ, फिर धीरे-धीरे लाल। बादल पहाड़ी के पीछे जमा हो रहे थे। हवा में राख, गीली मिट्टी और किसी पुराने धूपबत्ती की मिली-जुली गंध थी। सफेद पुरानी एम्बुलेंस नदी किनारे की कच्ची पगडंडी पर झटके खाती हुई आगे बढ़ रही थी। शशांक ड्राइव कर रहा था। उसके हाथ स्टीयरिंग पर थे, पर आँखें बार-बार रियर-व्यू मिरर में जा रही थीं। पीछे कोई गाड़ी दिखाई नहीं दे रही थी, फिर भी ऐसा लग रहा था कि पीछा हो रहा है। पीछे की सीट पर नयना बैठी थी। नयना। यह नाम अब उसके भीतर थोड़ा बैठने लगा था, पर मीरा अभी भी पूरी तरह गई नहीं थी। जैसे पुराने घर से निकलते समय कोई चाबी जेब में रह जाए। वह जानती थी—दुनिया उसे अब भी मीरा अवस्थी कहेगी। माँ उसे मीरा ही पुकारेंगी। कबीर के मुँह से भी शायद वही नाम निकलेगा। लेकिन कहीं बहुत अंदर, काली मिट्टी में दबा एक नाम उठ रहा था—नयना कश्यप। महेश कश्यप की बेटी। सुजाता की बेटी। अर्चना की पाली हुई बेटी। अरविंद की आवाज़। नाम बदल रहे थे, पर उसका डर वही था। कबीर उसके बगल में बैठा था। हाथ में लोहे की रॉड। वह बार-बार मोबाइल देखता, फिर बंद कर देता। नेटवर्क नहीं था। शायद अच्छा ही था। इस समय दुनिया से जुड़ना भी खतरा था। मीरा नाथ सामने वाली सीट पर बैठी थी। लाल रिबन उसके बालों में कसकर बँधा था। उसकी आँखें खिड़की के बाहर थीं, लेकिन वह बाहर नहीं देख रही थी। वह शायद आठ साल की उस रात को देख रही थी जब एक टूटी आवाज़ वाले आदमी ने उसे आश्रम से निकालते हुए कहा था—“एक दिन नयना लौटेगी।” डाकिया पीछे कोने में चुप बैठा था। उसकी छड़ी उसके घुटनों पर थी। उसकी साँस थोड़ी भारी थी। उम्र, दौड़, डर—सब उस पर चढ़ चुके थे। पर उसकी आँखों में एक जिद थी—जैसे उसने तय कर लिया हो कि इस बार अगर किसी को पार ले जाना पड़ा, तो बीच रास्ते गायब नहीं होगा। सबसे पीछे देवव्रत नाथ बैठा था। किसी ने उसे बाँधा नहीं था। पर वह बंदी जैसा बैठा था। सिर झुका हुआ। हाथ घुटनों पर। आँखें कभी-कभी मीरा नाथ पर उठतीं और तुरंत वापस झुक जातीं। वह आदमी जो कभी जिले की पुलिस चला चुका था, अब अपनी बेटी की चुप्पी से डर रहा था। नयना ने अचानक पूछा, “शांत कुआँ कहाँ है?” एम्बुलेंस में हलचल-सी हुई। शशांक ने गाड़ी धीमी की। डाकिये ने आँखें उठाईं। देवव्रत ने पहली बार सीधे उसकी तरफ देखा। “पहाड़ी के पीछे,” देवव्रत ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी। “पुराने आश्रम के नीचे।” कबीर ने कड़वाहट से कहा, “आश्रम के नीचे कुआँ। बहुत प्रतीकात्मक है।” देवव्रत ने जवाब नहीं दिया। नयना ने पूछा, “वहाँ लोग रखे जाते थे?” देवव्रत का जबड़ा कसा। “शुरू में रिकॉर्ड रखे जाते थे। फिर लोग। फिर दोनों में फर्क खत्म हो गया।” मीरा नाथ ने धीमे से कहा, “तुम वहाँ गए थे?” देवव्रत ने उसकी तरफ देखा। “हाँ।” “जब मुझे वहाँ रखा गया था?” उसने आँखें बंद कर लीं। “हाँ।” मीरा नाथ की आवाज़ पत्थर जैसी हो गई। “और तुमने मुझे देखा?” “एक बार।” “और लौट गए?” देवव्रत ने सिर झुका लिया। “मैं कायर था।” “नहीं,” मीरा नाथ बोली, “कायर भागता है। तुम रुके रहे। सिस्टम का हिस्सा बनकर। यह कायरता से भी बड़ा अपराध है।” देवव्रत ने कुछ नहीं कहा। एम्बुलेंस सूखी नदी पार करके झाड़ियों के बीच बने रास्ते पर मुड़ी। आगे पत्थर का पुराना फाटक दिखाई दिया। आधा टूटा हुआ। उस पर काई जमी थी। ऊपर उखड़े हुए अक्षरों में लिखा था— **बाल सेवा साधना केंद्र** नीचे किसी ने बाद में चूने से लिख दिया था— **परित्यक्त — प्रवेश वर्जित** कबीर ने फाटक पढ़ा। “बाल सेवा। वाह। अपराधियों की भाषा हमेशा मीठी क्यों होती है?” शशांक ने गाड़ी रोक दी। “आगे गाड़ी नहीं जाएगी।” सब नीचे उतरे। हवा ठंडी थी। पहाड़ी से उतरती हवा में अजीब-सी सीटी थी। जैसे चट्टानों के बीच कोई बहुत लंबी साँस ले रहा हो। पुराना आश्रम सामने था। दीवारें टूटी हुईं। बरामदों में झाड़ियाँ उगी हुईं। छत के किनारों पर बंदरों ने कब्ज़ा कर रखा था, लेकिन इस समय कोई बंदर नहीं दिख रहा था। ऐसा लगता था कि जानवर भी इस जगह से दूरी बनाकर रखते हों। अंदर का मुख्य हॉल अँधेरे से भरा था। टूटी घंटी हवा से हल्की-हल्की हिल रही थी, पर आवाज़ नहीं कर रही थी। नयना ने महसूस किया कि उसके पैरों में भारीपन आ गया है। क्या उसकी माँ, सुजाता, कभी यहाँ आई थीं? क्या उसके पिता, महेश कश्यप, यहाँ बंद किए गए थे? क्या वह खुद कभी इस जगह लाई गई थी? उसे कुछ याद नहीं था। पर शरीर कभी-कभी दिमाग से पुरानी खबर पहले पा लेता है। उसके पेट में ठंडा डर जमा हो गया। मीरा नाथ ने धीरे से कहा, “मैं इस जगह को पहचानती हूँ।” “तुम यहाँ रही थी?” कबीर ने पूछा। “नहीं। मुझे नए आश्रम में रखा गया था। लेकिन एक बार… शायद बहुत छोटी थी। मुझे यहाँ लाया गया था। नीचे पानी की गंध थी। और कोई औरत गाना गा रही थी।” “कौन-सा गाना?” मीरा नाथ ने आँखें बंद कीं। बहुत धीमे गुनगुनाया— “सो जा रे नन्ही अँखियों वाली, मिट्टी तुझे पुकारे…” नयना का दिल धक से हुआ। मिट्टी। अरविंद की आवाज़ याद आई—“तुम सोते-सोते एक ही शब्द बोलती थीं—मिट्टी।” नयना ने कहा, “यह गाना मेरी माँ गाती होंगी।” मीरा नाथ ने उसकी तरफ देखा। “शायद।” देवव्रत ने धीरे से कहा, “सुजाता गाती थी।” सबकी नजरें उस पर गईं। नयना आगे बढ़ी। “तुम मेरी माँ को जानते थे?” देवव्रत ने सिर हिलाया। “वह आंगनवाड़ी में काम करती थी। शांत, पर बहुत जिद्दी। उसने बच्चों की पहली असली सूची बनाई थी। कौन सच में बीमार था, कौन गायब, किसके नाम पर मनीऑर्डर आया, किसकी मौत बिना लाश के दर्ज हुई। महेश कश्यप उस सूची को जिलाधिकारी तक ले जाना चाहते थे। उससे पहले…” “क्या हुआ?” नयना की आवाज़ काँप गई। देवव्रत ने पहाड़ी की तरफ देखा। “भैरव ने उन्हें यहीं बुलाया। समझौते के नाम पर।” “और तुम वहाँ थे?” “हाँ।” नयना का हाथ खुद-ब-खुद मुट्ठी बन गया। “तुमने उन्हें रोका क्यों नहीं?” देवव्रत ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा। “क्योंकि उस समय तक मैं सोचता था कि यह सिर्फ फर्जी कागज़ों का खेल है। जमीन, फंड, पहचान, वोटर लिस्ट। मुझे बच्चों के तहखाने का सच उस रात पता चला।” कबीर ने तीखी आवाज़ में कहा, “और फिर भी तुमने कुछ नहीं किया।” देवव्रत ने स्वीकार किया, “हाँ।” यह आदमी हर आरोप पर “हाँ” कहता था। शायद इसलिए नहीं कि उसमें साहस था। शायद इसलिए कि झूठ बोलने की उम्र निकल चुकी थी। डाकिया आगे बढ़ा। “बहुत देर हो रही है। सूरज डूबने से पहले तहखाने का रास्ता ढूँढ़ना होगा।” शशांक ने बैग से टॉर्च निकाली। “रास्ता हॉल से नीचे जाता है?” देवव्रत ने सिर हिलाया। “मुख्य हॉल में देवी की टूटी मूर्ति होगी। उसके पीछे पत्थर की पटिया। चाबी तीसरी दीवार पर काम आएगी।” कबीर ने नयना की मुट्ठी में काली चाबी देखी। “चाबी संभालकर।” नयना ने सिर हिलाया। वे आश्रम के भीतर घुसे। मुख्य हॉल की छत आधी टूटी थी। धूप की आखिरी किरणें धूल में फँस रही थीं। दीवारों पर बच्चों के पुराने चित्र बने थे—सूरज, घर, पेड़, नदी, झंडा। कई चित्रों पर खरोंचें थीं। एक दीवार पर छोटे हाथों के रंगीन निशान थे। लाल, नीले, पीले। कुछ हाथ इतने छोटे थे कि नयना की आँखें भर आईं। कबीर ने धीमे कहा, “यहाँ बच्चे रहते थे?” देवव्रत ने कहा, “कागज़ पर अनाथालय था। असल में छँटाईघर।” “छँटाईघर?” मीरा नाथ ने पूछा। देवव्रत की आवाज़ भारी हो गई। “किसे बेचना है। किसे आश्रम में रखना है। किसकी पहचान बदलनी है। किसे मृत रखना है। किसे जिंदा दिखाना है।” शशांक ने दीवार की फोटो खींचनी चाही, पर फोन में नेटवर्क नहीं था। फिर भी उसने तस्वीरें सेव कीं। “सब रिकॉर्ड करना होगा।” कबीर ने कहा, “हाँ। लेकिन पहले जिंदा बचना होगा। यह बात हमारी टीम भूलती रहती है।” हॉल के अंत में देवी की टूटी मूर्ति थी। आधा चेहरा बचा था। एक हाथ टूटा हुआ। मूर्ति के पीछे सचमुच एक पत्थर की पटिया थी। काई से ढकी। बहुत भारी। देवव्रत ने आगे बढ़ना चाहा, पर मीरा नाथ ने हाथ से रोक दिया। “रास्ता आप बताएँगे,” उसने कहा। “खोलेंगे हम।” देवव्रत पीछे हट गया। कबीर, शशांक और डाकिया ने मिलकर पटिया हटाने की कोशिश की। पत्थर नहीं हिला। नयना ने भी हाथ लगाया। मीरा नाथ ने दूसरी तरफ से धक्का दिया। बहुत जोर लगाने पर पटिया ने पहले कराह जैसी आवाज़ की, फिर धीरे-धीरे खिसकी। नीचे सीढ़ियाँ थीं। गहरी। काली। और नीचे से सचमुच पानी की गंध आ रही थी। नयना का गला सूख गया। देवव्रत ने कहा, “नीचे जाते ही दाईं तरफ मत मुड़ना। पुरानी दीवार गिर चुकी है। बाईं तरफ गलियारा है। तीसरा मोड़ शांत कुआँ तक जाता है।” “और भैरव के लोग?” कबीर ने पूछा। “अगर उसने फाइलें हटानी शुरू की हैं, तो अंदर होंगे।” “कितने?” देवव्रत ने उसकी तरफ देखा। “इतने कि डर लगे। कम इतने कि मौका मिले।” कबीर ने मीरा नाथ की तरफ देखकर कहा, “तुम्हारे पापा के जवाब भी सरकारी नोटिस जैसे हैं।” मीरा नाथ ने पहली बार हल्की, बहुत हल्की मुस्कान की। दर्द में भी मुस्कान अजीब लगती है—जैसे सूखे कुएँ में अचानक पानी की छोटी चमक। वे नीचे उतरने लगे। सीढ़ियाँ संकरी और गीली थीं। दीवारों पर काई थी। टॉर्च की रोशनी आगे जाकर अँधेरे में निगल जाती थी। हर कदम पर पानी की बूंदें टपकतीं। नीचे हवा भारी थी—बासी, नम, और किसी पुराने लोहे की गंध से भरी। आधे रास्ते पर दीवार पर खरोंचें दिखीं। कबीर ने रोशनी डाली। छोटे-छोटे नाम। कुछ साफ़। कुछ मिटे हुए। कुछ सिर्फ अक्षर। **रीना** **सलीम** **गुड्डू** **नै…** **मी…** **आर्या** **क्यू-13** **घर जाना है** मीरा नाथ ने दीवार छुई। उसकी उँगलियाँ “आर्या” पर रुक गईं। “यह मैंने लिखा था,” उसने फुसफुसाया। नयना ने उसकी तरफ देखा। “मुझे याद है,” मीरा नाथ बोली। “नाखून से लिखा था। बहुत छोटी थी। किसी ने कहा था—नाम लिखोगी तो मारेंगे। मैंने फिर भी लिखा। क्योंकि डर था कि अगर नहीं लिखा तो मैं सच में आर्या बन जाऊँगी।” नयना ने उसके हाथ पर हाथ रखा। यह पहली बार था जब उसने उसे छुआ। दोनों ने कुछ नहीं कहा। पर उस छोटे स्पर्श में दो बचपन एक-दूसरे को पहचानने लगे। नीचे पहुँचकर गलियारा खुला। दीवारों पर लोहे के पुराने दरवाज़े थे। कुछ खुले, कुछ बंद। अंदर खाली कमरे। एक कमरे में टूटी खाट। दूसरे में जंग लगा बाल्टी। तीसरे में दीवार पर पुराना कैलेंडर—साल 2004। शशांक हर कमरे की फोटो ले रहा था। “इन सबका रिकॉर्ड चाहिए।” डाकिये ने कहा, “धीरे। आवाज़ कम।” दूर कहीं से धातु घसीटने की आवाज़ आई। सब रुक गए। कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “कोई है।” आवाज़ फिर आई। इस बार साथ में किसी आदमी की धीमी बात— “जल्दी करो। बाबा ने कहा है पुराने रजिस्टर नहीं बचने चाहिए।” दूसरी आवाज़—“कितने बक्से हैं?” “चार। और नीचे कुएँ वाले कमरे में फाइलें।” नयना का दिल तेज़ धड़कने लगा। कुएँ वाला कमरा। देवव्रत ने हाथ से इशारा किया—दाईं दीवार की आड़ में छिपो। वे एक टूटे कमरे में घुस गए। दरवाज़े की दरार से दो आदमी गुज़रे। दोनों के हाथ में टॉर्च। एक ने कंधे पर बोरा लटका रखा था। दूसरा फोन पर था, लेकिन यहाँ नेटवर्क नहीं था; शायद वॉकी डिवाइस था। “ऊपर से खबर आई?” बोरा वाला बोला। “हाँ। दोनों लड़कियाँ अभी तक नहीं मिलीं।” “बाबा नाराज़ होंगे।” “बाबा नाराज़ नहीं होते। गायब कर देते हैं।” दोनों हँसे। उनकी हँसी गलियारे में गूँजती चली गई। नयना ने कबीर की तरफ देखा। कबीर की आँखों में वही गुस्सा था जो नयना महसूस कर रही थी। लेकिन अभी हमला करना मूर्खता थी। देवव्रत ने इशारा किया—आगे। वे धीरे-धीरे गलियारे में बढ़े। तीसरे मोड़ पर दीवार अलग दिखी। बाकी दीवारें ईंट की थीं, यह पत्थर की। बीच में लोहे का छोटा चौकोर पैनल था। पैनल पर कोई ताला नहीं दिख रहा था, पर देवव्रत ने कहा था—तीसरी दीवार। नयना ने काली चाबी निकाली। पैनल के पास हाथ फेरने पर उसे एक छिपा हुआ छेद मिला। उसने चाबी डाली। चाबी पहले नहीं घुसी। उसने हल्का घुमाया। फिर चाबी अंदर चली गई। जैसे वर्षों से उसी हाथ का इंतज़ार कर रही हो। क्लिक। दीवार के अंदर कुछ भारी चीज़ खिसकी। पत्थर का एक हिस्सा धीरे-धीरे खुला। पीछे से ठंडी हवा आई। और फिर पानी की गहरी, बहुत गहरी गंध। शांत कुआँ। कमरा गोल था। बीच में विशाल पत्थर का कुआँ। पर कुएँ में पानी दिखाई नहीं दे रहा था। ऊपर लोहे की जाली लगी थी। जाली पर ताले। चारों तरफ लोहे की अलमारियाँ। कुछ खुली। कुछ टूटी। कई बक्से। दीवारों पर रैक। पुराने रजिस्टर। फोटो। बच्चे के कपड़े। स्कूल बैज। छोटी चप्पलें। लाल रिबन। नीला क्लिप। पहचान पत्र। जन्म प्रमाणपत्र। मृत्यु प्रमाणपत्र। यह कुआँ पानी का नहीं था। यह नामों का कब्रिस्तान था। नयना आगे बढ़ी। उसकी आँखें एक रैक पर टिक गईं। वहाँ फाइलें कोड से रखी थीं—Q-01, Q-02, Q-03… उसने काँपते हाथ से Q-19 की फाइल निकाली। फाइल मोटी थी। ऊपर धूल जमी थी। उसने खोलना चाहा, पर उँगलियाँ काँप रही थीं। कबीर उसके पास आ गया। “मैं खोलूँ?” नयना ने सिर हिलाया। “नहीं। यह मुझे करना है।” फाइल खुली। पहला पन्ना— **कोड: Q-19** **प्राथमिक नाम: नयना कश्यप** **पिता: महेश कश्यप** **माता: सुजाता कश्यप** **स्थिति: मृत्यु प्रस्तावित** **उपयोग: विनिमय / दबाव / रिकॉर्ड-परिवर्तन** **टिप्पणी: शिक्षक पिता के कारण संवेदनशील** नीचे लाल मुहर— **नाम परिवर्तन लंबित** अगला पन्ना। फोटो। एक छोटी बच्ची। बालों में नीला क्लिप। आँखें डरी हुईं। वही चेहरा जो धुंधली फोटो में था। नयना ने फोटो छुआ। “यह मैं हूँ।” उसके बगल में मीरा नाथ ने दूसरी फाइल उठाई—**M-NATH / लाल रिबन**। पहला पन्ना— **नाम: मीरा नाथ** **पिता: देवव्रत नाथ** **स्थिति: आधिकारिक रूप से अनुपलब्ध / निजी नियंत्रण** **उपयोग: देवव्रत नाथ पर नियंत्रण** मीरा नाथ ने आँखें बंद कर लीं। देवव्रत कमरे के दरवाज़े पर खड़ा था। उसने अंदर कदम नहीं रखा। जैसे यह कमरा उसके लिए अदालत था। नयना ने अपनी फाइल में आगे पन्ने पलटे। एक पन्ने पर सुजाता की फोटो थी। सरल चेहरा। बड़ी आँखें। माथे पर छोटी बिंदी। नीचे लिखा— **सुजाता कश्यप — उच्च जोखिम। बच्चे के रिकॉर्ड से भावनात्मक संबंध। गान-चिह्न: मिट्टी गीत।** नयना ने फुसफुसाया, “माँ…” दूसरी फोटो—महेश कश्यप। पतले चेहरे वाला आदमी, आँखों में तेज़। हाथ में कागज़ों का पुलिंदा। नीचे लिखा— **महेश कश्यप — सूची स्रोत। जीवित रखना उपयोगी।** नयना की साँस रुक गई। जीवित रखना उपयोगी। “मेरे पिता…” उसने शब्द पूरा नहीं किया। कबीर ने फाइल में आगे देखा। “यहाँ लोकेशन है।” पन्ने पर लिखा था— **स्थानांतरण: शांत कुआँ — गहराई कक्ष / स्तर 2** कबीर ने कुएँ की जाली की तरफ देखा। “स्तर 2 मतलब नीचे?” देवव्रत ने बहुत धीरे कहा, “कुएँ में नीचे कमरे हैं।” मीरा नाथ उसकी तरफ मुड़ी। “लोग नीचे रखे जाते थे?” देवव्रत ने सिर झुका लिया। “हाँ।” नयना की आँखों में आग जल उठी। “मेरे पिता नीचे हो सकते हैं?” देवव्रत ने कहा, “अगर भैरव ने उन्हें अब तक जिंदा रखा है… तो हाँ।” “मेरी माँ?” “सुजाता को मैंने आखिरी बार 2009 में सुना था। देखा नहीं। उसकी आवाज़ नीचे से आती थी।” नयना के हाथ से फाइल लगभग गिर गई। “सुना?” देवव्रत ने आँखें बंद कीं। “वह गाती थी। हर रात। शायद बच्चों के लिए। शायद खुद के लिए।” मीरा नाथ ने वही गीत फिर धीरे से गाया—“सो जा रे नन्ही अँखियों वाली…” नयना की आँखों से आँसू टपक पड़े। तभी कमरे के बाहर कदमों की आवाज़ आई। इस बार एक नहीं। कई। शशांक ने फुसफुसाया, “वे लौट आए।” कबीर ने तुरंत रॉड उठाई। डाकिये ने कमरे का दरवाज़ा बंद करना चाहा, पर दरवाज़ा अंदर से अटकता नहीं था। देवव्रत आगे आया। “मैं रोकता हूँ।” मीरा नाथ ने तीखे स्वर में कहा, “अब?” देवव्रत ने उसकी तरफ देखा। “हाँ। देर से सही।” वह दरवाज़े की ओर बढ़ा। बाहर से टॉर्च की रोशनी दीवार पर पड़ी। किसी ने कहा, “दरवाज़ा खुला है!” देवव्रत बाहर निकला। उसकी आवाज़ अचानक बदल गई। वही पुराना अफसर। बूढ़ा, टूटा हुआ, पर आदेश देने की आदत अभी बाकी। “रुको।” बाहर के लोग ठिठक गए। “नाथ साहब?” किसी ने कहा। देवव्रत बोला, “बाबा ने कहा था पुरानी फाइलें मैं देखूँगा। तुम लोग ऊपर जाओ।” “पर साहब—” “ऊपर जाओ।” कुछ पल चुप्पी रही। फिर एक आदमी बोला, “बाबा ने कहा था किसी पर भरोसा मत करना। आप पर भी नहीं।” देवव्रत की आवाज़ कठोर हुई। “भैरव को कह देना, देवव्रत नाथ अभी मरा नहीं है।” दूसरे आदमी ने हँसकर कहा, “बाबा कहते हैं, आप बहुत पहले मर चुके हैं। बस चलते-फिरते हैं।” अगले ही पल धक्का-मुक्की की आवाज़ आई। देवव्रत कराहा। कबीर दरवाज़े की तरफ बढ़ा, पर मीरा नाथ ने रोक लिया। “नहीं,” उसने कहा, “वह खुद चुना है।” लेकिन बाहर की आवाज़ें तेजी से बढ़ीं। किसी ने देवव्रत को दीवार से पटका। फिर दो आदमी दरवाज़े पर दिखे। कबीर ने पहली चोट रॉड से की। आदमी के हाथ से टॉर्च छूटी। दूसरा अंदर घुसा तो डाकिये ने छड़ी उसके घुटने पर मारी। शशांक ने फाइलों का बक्सा धक्का देकर रास्ते में गिरा दिया। अँधेरा, धूल, चीखें, लोहे की आवाज़—कमरा अचानक युद्ध में बदल गया। नयना ने Q-19 की फाइल बैग में ठूँसी। मीरा नाथ ने अपनी फाइल ली। शशांक रजिस्टर समेट रहा था। कबीर दो आदमियों को रोकने की कोशिश कर रहा था, पर तीसरा पीछे से अंदर घुस आया। वह सीधे नयना की तरफ बढ़ा। नयना पीछे हटते हुए कुएँ की जाली से टकराई। आदमी ने उसका बैग पकड़ना चाहा। उसने पूरी ताकत से फाइल का कोना उसके चेहरे पर मारा। आदमी पीछे डगमगाया। मीरा नाथ ने लोहे का छोटा ताला उठाकर उसके सिर पर मारा। वह गिर पड़ा। कबीर ने हाँफते हुए कहा, “टीमवर्क अच्छा है। डरावना, पर अच्छा।” बाहर अचानक गोली चली। सब रुक गए। गोली की आवाज़ तहखाने में कई बार गूँजी। देवव्रत दरवाज़े के पास दीवार से लगा था। उसके कंधे से खून बह रहा था। उसके हाथ में पिस्तौल थी। शायद उसने किसी आदमी से छीनी थी। सामने दो गुंडे पीछे हट रहे थे। देवव्रत ने भारी साँस लेते हुए कहा, “नीचे जाओ।” नयना ने पूछा, “कहाँ?” देवव्रत ने कुएँ की जाली की तरफ इशारा किया। “स्तर 2।” कबीर ने कहा, “कुएँ में? शानदार। अब हम सचमुच कुएँ में कूदेंगे?” देवव्रत लड़खड़ाया। “जाली के नीचे सीढ़ी है। ताला खोलो।” नयना ने काली चाबी फिर निकाली। जाली पर चार ताले थे। उनमें से एक में चाबी लगी। ताला खुला। फिर दूसरा। तीसरा नहीं खुला। देवव्रत ने कहा, “दूसरी चाबी भैरव के पास है।” कबीर ने रॉड उठाई। “तो पुराना तरीका।” उसने तीसरे ताले पर पूरी ताकत से चोट की। ताला नहीं टूटा। फिर शशांक ने लोहे की पाइप पकड़ी। दोनों ने मिलकर ताला मोड़ा। मीरा नाथ ने चौथे ताले पर पत्थर मारा। डाकिये ने ताला स्थिर पकड़ा। तीसरी चोट में ताला टूट गया। जाली उठी। नीचे अँधेरा था। कुएँ की गोल दीवार के भीतर लोहे की सीढ़ी नीचे जाती थी। बहुत नीचे। और उस गहराई से बहुत हल्की आवाज़ आ रही थी। एक गीत। बहुत बूढ़ी, बहुत थकी हुई औरत की आवाज़। “सो जा रे नन्ही अँखियों वाली…” नयना का शरीर जम गया। मीरा नाथ ने उसका हाथ पकड़ा। “सुजाता?” नयना कुछ बोल नहीं पाई। गीत फिर आया। “मिट्टी तुझे पुकारे…” नयना की आँखों से आँसू गिरने लगे। नीचे कोई गा रहा था। शायद उसकी माँ। शायद अठारह साल से। बाहर फिर कदमों की आवाज़ आई। देवव्रत ने पिस्तौल उठाई। “जाओ!” कबीर पहले सीढ़ी पर उतरा। फिर शशांक ने फाइलों का बैग नीचे दिया। नयना उतरने लगी, फिर पीछे मुड़ी। देवव्रत और मीरा नाथ की आँखें मिलीं। मीरा नाथ कुछ पल उसे देखती रही। फिर बोली, “मरना मत। अभी जवाब बाकी हैं।” देवव्रत की आँखें भर आईं। उसने सिर हिलाया। “पहली बार किसी ने मुझे मरने से रोका है।” मीरा नाथ नीचे उतर गई। डाकिया आखिरी में उतरा। ऊपर देवव्रत अकेला रह गया। जाली आधी बंद कर दी गई। नीचे उतरते हुए नयना को लगा कि वह कुएँ में नहीं, अपने जन्म से पहले के अंधेरे में उतर रही है। दीवारों से पानी टपक रहा था। सीढ़ी ठंडी थी। नीचे गीत साफ़ होता जा रहा था। “सो जा रे…” फिर अचानक गीत रुक गया। नीचे से एक और आवाज़ आई। पुरुष की। कमजोर, लेकिन स्पष्ट। “कौन है?” नयना की साँस रुक गई। कबीर नीचे से फुसफुसाया, “यहाँ दरवाज़ा है।” नयना जल्दी से नीचे उतरी। वहाँ छोटा गोल प्लेटफॉर्म था। सामने लोहे का दरवाज़ा। दरवाज़े पर अंदर से किसी ने खरोंचकर लिखा था— **नाम मत भूलना।** नयना ने काँपते हाथ से दरवाज़े की सलाख पकड़ी। अंदर अँधेरा था। उसने बहुत धीरे कहा, “महेश कश्यप?” कुछ पल सन्नाटा। फिर अँधेरे के भीतर से एक बूढ़ी आवाज़ आई। “यह नाम… इतने साल बाद किसने लिया?” नयना रो पड़ी। “मैं…” शब्द गले में अटक गए। मीरा नाथ ने उसके कंधे पर हाथ रखा। नयना ने पूरी ताकत से कहा— “मैं नयना हूँ।” अँधेरे के भीतर पहले सन्नाटा रहा। फिर किसी धातु के गिरने की आवाज़ आई। फिर एक औरत की टूटी हुई चीख— “नयना?” नीचे का अँधेरा काँप उठा। नयना सलाखों से चिपक गई। “माँ?” अंदर से रोने की आवाज़ आई। कोई दरवाज़े तक घिसटकर आया। टॉर्च की रोशनी अंदर पड़ी। एक दुबली, सफेद बालों वाली औरत सलाखों के पास बैठ गई थी। चेहरा हड्डियों से चिपका हुआ, आँखें गहरी, पर उनमें वही बिंदी वाली फोटो की छाया थी। सुजाता। उसने सलाखों के बीच से हाथ बाहर निकाला। नयना ने उसका हाथ पकड़ा। हाथ ठंडा था। काँपता हुआ। सचमुच का। जीवित। “मेरी बच्ची…” सुजाता ने रोते हुए कहा। “तुझे मिट्टी याद रही?” नयना टूट गई। उसी पल ऊपर से धमाका हुआ। गोली। चीख। फिर किसी के गिरने की आवाज़। कबीर ने ऊपर देखा। “वे अंदर आ गए।” लोहे के दरवाज़े के भीतर से पुरुष आवाज़ आई—कमजोर, मगर तेज़। “चाबी भैरव के पास नहीं है।” नयना ने आँसू पोंछे। “क्या?” अँधेरे से एक बूढ़ा आदमी सलाखों के पास आया। बहुत दुबला। आँखों में जलता हुआ तेज़। महेश कश्यप। उसने कहा, “दरवाज़े की चाबी उस आदमी के पास है जिसने तुम्हें बचाया था।” नयना ने समझने की कोशिश की। “अरविंद?” मीरा नाथ ने पूछा। महेश कश्यप ने सिर हिलाया। “हाँ।” कबीर ने कहा, “पर अरविंद कहाँ हैं?” महेश ने सलाखों को पकड़ा। उसकी आँखें नयना पर टिक गईं। “यहीं।” सब जम गए। महेश ने धीरे से कहा— “शांत कुआँ में एक और स्तर है। सबसे नीचे। जहाँ वे उन लोगों को रखते हैं जिनकी आवाज़ उनसे भी नहीं छीनी जा सकी।” ऊपर से देवव्रत की आवाज़ आई— “जल्दी करो!” फिर गोली। महेश कश्यप ने नयना का हाथ कसकर पकड़ा। “तुम्हारे अरविंद अवस्थी जिंदा हैं,” उसने कहा। “लेकिन देर मत करना। भैरव आज रात उन्हें सचमुच मार देगा।” और उसी पल कुएँ की गहराई से, बहुत नीचे से, एक टूटी हुई आवाज़ उठी— “टुनटुन… रिपोर्टर…” नयना की दुनिया रुक गई। क्योंकि वह आवाज़ रिकॉर्डिंग नहीं थी। इस बार भी वह लाइव थी। पर इस बार नकली नहीं।