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आवाज़ नंबर 19 (भाग:7) This post in Under Review

Vinod 05 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 538 0 Hindi :: हिंदी

भाग 7: दो मीराएँ

दुकान के बाहर सफेद स्कॉर्पियो की आवाज़ गली में ऐसे गूँजी जैसे किसी ने लोहे की बड़ी चादर घसीट दी हो।

शटर आधा उठा था। बाहर धूप तेज़ थी, लेकिन गली में खड़ी स्कॉर्पियो के शीशे काले थे। उसके पीछे दो बाइक आकर रुकीं। बाइक वालों ने हेलमेट नहीं उतारे। उन्हें चेहरा छिपाने की ज़रूरत नहीं थी; इस कस्बे में डर ही उनका चेहरा था।

शशांक त्रिपाठी ने फुसफुसाकर कहा, “शटर बंद करो।”

कबीर ने बिना सवाल किए शटर नीचे खींच दिया। लोहे की पट्टी जमीन से टकराई तो आवाज़ दुकान के भीतर गूँज गई। मीरा—या नयना—ने पहली बार महसूस किया कि अब सिर्फ उसका पीछा नहीं हो रहा था। अब सच की पूरी दिशा बदल गई थी।

उसके सामने खड़ी औरत ने अभी-अभी कहा था—

“मैं मीरा नाथ हूँ।”

वह औरत शांत दिखने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसकी उँगलियाँ दुपट्टे के किनारे को बार-बार मोड़ रही थीं। बाल कसकर बंधे थे, पर उनमें लगा छोटा लाल रिबन जैसे किसी पुराने समय की जिद था। चेहरे पर उम्र से ज्यादा थकान थी। आँखों में अजीब बात थी—वे मीरा अवस्थी जैसी नहीं थीं, फिर भी उनमें कुछ ऐसा था जिसे देखकर लगता था कि दोनों ने एक ही आग अलग-अलग तरफ से देखी है।

कबीर ने शटर के पास झुककर बाहर देखा। “तीन आदमी उतरे हैं। एक फोन पर बात कर रहा है। शायद उन्हें पता है हम अंदर हैं।”

शशांक ने जल्दी से कहा, “पीछे से निकलना होगा। डार्करूम के नीचे पुराना ड्रेनेज है।”

कबीर ने तीखी नज़र से अपने मामा को देखा। “आपकी हर जगह से सुरंग क्यों निकलती है?”

शशांक ने जवाब नहीं दिया। शायद उसके पास वक्त नहीं था। शायद शर्म थी। शायद दोनों।

मीरा नाथ, लाल रिबन वाली, धीरे से नयना की तरफ बढ़ी।

नयना।

यह नाम अभी भी भीतर अटक रहा था। जैसे किसी ने अचानक उसके गले में नया हार नहीं, पुरानी बेड़ी डाल दी हो।

“मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना है,” मीरा नाथ ने कहा।

मीरा अवस्थी—जिसे अब शायद नयना कहना होगा—उसकी तरफ देखती रही। “तुमने मुझे नयना कहा।”

“क्योंकि तुम वही हो।”

“तुम्हें कैसे पता?”

मीरा नाथ की आँखें भर आईं, लेकिन आँसू नहीं गिरे। “क्योंकि मैंने तुम्हें जाते हुए देखा था।”

दुकान के बाहर किसी ने शटर पर जोर से हाथ मारा।

धड़ाम।

“अंदर जो भी है, शांति से बाहर आ जाए।”

आवाज़ नई थी। न रेनकोट वाले की, न देवव्रत नाथ की। यह आदमी छोटा गुंडा लगता था, जिसके भीतर बड़े आदमी की नकली अकड़ भरी गई थी।

शशांक ने काउंटर के नीचे से एक लोहे की रॉड निकाली और कबीर की तरफ बढ़ाई। कबीर ने उसे देखा, फिर कड़वाहट से हँसा। “वाह मामा। आपने अपनी दुकान को अपराध-म्यूज़ियम बना रखा था क्या?”

शशांक ने पहली बार उसके सामने आँख उठाई। “कबीर, मज़ाक बाद में करना। पहले जिंदा बचना।”

कबीर का चेहरा सख्त हो गया। “जिंदा तो सब बच गए मामा। बस सच मर गया।”

शशांक जैसे थप्पड़ खाकर पीछे हट गया।

डाकिया बीच में बोला, “बहस का वक्त नहीं है। वे लोग शटर काटेंगे।”

शशांक डार्करूम की तरफ मुड़ा। “सब अंदर।”

वे भागते हुए डार्करूम में पहुँचे। लाल बल्ब अब भी जल रहा था। दीवारों पर लटके नेगेटिव्स ऐसे हिल रहे थे जैसे पुरानी आत्माएँ साँस ले रही हों। शशांक ने मेज हटाई। उसके नीचे लकड़ी का फर्श था। उसने जेब से छोटी चाबी निकाली और फर्श के एक हिस्से में छिपे ताले को खोला।

कबीर ने चौंककर कहा, “मुझे इस जगह के बारे में कभी क्यों नहीं बताया?”

शशांक ने फर्श की पटरी उठाते हुए कहा, “क्योंकि मैं चाहता था कि मेरा एक बच्चा तो इस गंदगी से दूर रहे।”

कबीर कुछ बोलता, उससे पहले बाहर शटर पर दूसरी चोट पड़ी।

इस बार लोहे में दाँत जैसी आवाज़ आई।

“कटर लाओ!” किसी ने बाहर कहा।

नीचे अँधेरा था। फिर वही सीलन, वही छिपा रास्ता। मझगवाँ की जमीन जैसे सच के साथ-साथ सुरंगों से भी भरी हुई थी।

शशांक पहले उतरा। फिर मीरा नाथ। फिर नयना। उसके पीछे कबीर और डाकिया। नीचे जगह बहुत कम थी। शशांक ने ऊपर से पटरी वापस खींच ली। लाल रोशनी धीरे-धीरे बंद हो गई। अँधेरा उनकी साँसों में घुल गया।

कुछ सेकंड बाद ऊपर से लोहे के कटने की आवाज़ आने लगी।

कबीर ने फुसफुसाया, “यह रास्ता कहाँ जाता है?”

शशांक की आवाज़ आगे से आई, “पुराने नाले में नहीं। सीधे पीछे वाले गोदाम तक। फिर वहाँ से गली। पाँच मिनट। अगर चुप रहे तो बच जाएँगे।”

डाकिया खाँसने लगा। मीरा नाथ ने तुरंत उसका हाथ पकड़ा। “धीरे।”

उसका यह एक शब्द अजीब था—आदत जैसा। जैसे उसने सालों तक कमजोर लोगों को संभाला हो। जैसे वह खुद टूटते हुए भी दूसरों को गिरने से बचाती रही हो।

नयना उसके बिल्कुल पीछे थी। अँधेरे में सिर्फ उसकी पीठ दिखाई दे रही थी। लाल रिबन की छोटी गाँठ धुँधली चमक जैसी दिख रही थी।

“तुम सच में मीरा नाथ हो?” नयना ने धीरे से पूछा।

आगे से जवाब आया, “यह सवाल मैंने खुद से अठारह साल पूछा है।”

“जवाब मिला?”

“नाम मिला। जवाब नहीं।”

कबीर ने पीछे से कहा, “दर्शनशास्त्र बाद में। अभी कदम संभालो।”

सुरंग में कुछ दूर तक सिर्फ कदमों की हल्की आवाज़ रही। ऊपर कहीं से लोगों के चिल्लाने की आवाज़ आई—शायद वे दुकान में घुस चुके थे। एक बार किसी ने फर्श पर जोर से कुछ पटका। धूल सुरंग की दरारों से गिरने लगी।

शशांक ने हाथ उठाकर सबको रोक दिया।

ऊपर से आवाज़ आई, “डार्करूम खाली है।”

दूसरी आवाज़, “फाइलें नहीं हैं। कोई ले गया।”

तीसरी आवाज़, “साहब को फोन करो।”

कुछ सेकंड बाद वही आदमी फोन पर बोला, “जी… भाग गए… हाँ… लड़की दोनों थीं… नहीं साहब, दोनों… जी… जी…”

नयना ने साँस रोक ली।

दोनों थीं।

अब उन्हें पता था।

फोन पर आदमी बोला, “जी, बाबा तक खबर पहुँच गई है।”

बाबा।

भैरवनाथ।

सुरंग के भीतर ठंड और गहरी हो गई।

शशांक ने इशारा किया—चलो।

वे आगे बढ़े। रास्ता एक छोटे लोहे के दरवाज़े पर खत्म हुआ। शशांक ने धक्का दिया। दरवाज़ा बाहर की तरफ खुला। वे एक बंद गोदाम में निकले। वहाँ पुराने फोटो-फ्रेम, शादी के बैकड्रॉप, नकली फूलों की झालरें और धूल में दबे स्पीकर पड़े थे।

बाहर से किसी के होने की आवाज़ नहीं थी।

शशांक ने दरवाज़ा थोड़ा खोला, झाँका। “रास्ता साफ़ है।”

“अब कहाँ?” कबीर ने पूछा।

शशांक ने कहा, “मेरे पुराने घर नहीं जा सकते। दुकान गई। रेडियो स्टेशन गया। तुम्हारा घर गया। अब सिर्फ एक जगह बची है।”

डाकिये ने उसे देखा। “नहीं।”

“हाँ,” शशांक बोला।

“वहाँ जाना पागलपन है।”

शशांक ने थके हुए स्वर में कहा, “अब तक जो किया, वह क्या था? भजन?”

नयना ने पूछा, “कहाँ?”

शशांक ने जवाब दिया, “भैरवनाथ आश्रम।”

कमरे में सबकी साँस अटक गई।

कबीर लगभग चीख पड़ा, “वहीं? जहाँ से ये सब शुरू हुआ? जहाँ बाबा बैठा है, गुंडे हैं, भक्त हैं, सीसीटीवी है, और शायद आधी पुलिस उसके चरण दबाती है?”

शशांक ने कहा, “और जहाँ अर्चना हो सकती है।”

नयना का चेहरा बदल गया।

माँ।

इन सब नामों, रिकॉर्डिंग्स, फोटोज़ और पुरानी साजिशों के बीच एक चीज़ अब भी सीधी थी—माँ जिंदा थीं। और खतरे में थीं।

मीरा नाथ ने धीरे से कहा, “आश्रम में नीचे तहखाना है।”

डाकिया चौंका। “तुम्हें याद है?”

“कुछ चीज़ें शरीर याद रखता है, दिमाग नहीं।”

नयना ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। “तुम वहाँ रहीं?”

मीरा नाथ की आँखें दूर चली गईं। “बहुत साल। पहले मुझे आर्या कहा गया। फिर आर्या दीदी। फिर देवी-स्वर। मेरी आवाज़ से वे दान जुटाते थे। कहते थे, बच्ची में दिव्य शक्ति है। मैं मंच पर भजन गाती थी और नीचे वही लोग बैठे होते थे जिन्होंने बच्चों की आवाज़ें छीनी थीं।”

कबीर ने धीरे से कहा, “तुम भागी कैसे?”

“मुझे अरविंद अवस्थी ने दूसरी बार बचाया।”

नयना की रीढ़ सीधी हो गई।

“पापा?” शब्द खुद निकल गया। फिर उसे लगा—किसके पापा? उसके? इस औरत के? दोनों के? किसी के भी नहीं?

मीरा नाथ ने उसकी आँखों में देखकर कहा, “हाँ। अरविंद अंकल जिंदा थे। कम से कम तब तक।”

डाकिये ने आगे बढ़कर पूछा, “तुमने उन्हें कब देखा?”

“2016 में।”

कमरे में यह साल हथौड़े की तरह गिरा।

कबीर बोला, “मतलब आग के आठ साल बाद?”

“हाँ,” मीरा नाथ ने कहा। “मैं तब आश्रम के महिला विभाग में रहती थी। बाहर मंच पर जाती थी, फिर वापस बंद कमरों में। एक रात किसी ने मेरे कमरे के दरवाज़े के नीचे कागज़ सरकाया—‘अगर तुम्हें अपना नाम याद है तो रात तीसरे पहर पीछे के कुएँ पर आना।’ मैं गई। वहाँ एक आदमी था। बहुत दुबला। आधा चेहरा दाढ़ी में छिपा। गला खराब। वह ठीक से बोल नहीं पाता था।”

नयना ने साँस रोक ली।

“उसने अपना नाम नहीं बताया,” मीरा नाथ ने कहा। “बस मेरी तरफ देखकर बोला—‘लाल रिबन अभी भी रखती हो?’”

“तुमने पहचाना?” शशांक ने पूछा।

“नहीं। पर उसने मुझे मेरा बचपन बताया। रेडियो स्टेशन। माइक्रोफोन। पापा। गोली। अर्चना। नीला क्लिप। उसने कहा कि मैं मीरा नाथ हूँ। देवव्रत की बेटी। लेकिन मुझे देवव्रत से बचना है, क्योंकि वह पिता होने से पहले अपराधी बन चुका है।”

डाकिये की आँखें भर आईं। “वह अरविंद था।”

मीरा नाथ ने सिर हिलाया। “शायद। उसकी आवाज़ टूटी हुई थी। जैसे किसी ने गले पर जंग लगा ताला लगा दिया हो। वह लंबे वाक्य नहीं बोल पाता था। कुछ शब्द लिखकर देता था। उसने मुझे आश्रम से निकलने का रास्ता दिया। और जाते समय कहा—‘एक दिन नयना लौटेगी। उसे दोष मत देना।’”

नयना की आँखें जलने लगीं।

“उसने मेरा नाम लिया?”

“हाँ।”

“उसने कहा मैं कौन हूँ?”

मीरा नाथ ने धीरे कहा, “उसने कहा—जिस बच्ची को हमने बचाया, वह हमारी गलती नहीं, हमारा प्रायश्चित है।”

नयना ने चेहरा फेर लिया।

कबीर ने धीरे से पूछा, “और आवाज़ 19?”

मीरा नाथ ने अपने झोले से एक छोटी धातु की डिबिया निकाली। उसमें पेन ड्राइव थी। उस पर सफेद रंग से लिखा था—**19-B**

नयना ने अपनी पेन ड्राइव याद की—**19**

“यह तुम्हारे पास कैसे?” उसने पूछा।

“अरविंद अंकल ने दो हिस्से बनाए थे। कहा था—पूरा सच एक जगह रहेगा तो मर जाएगा। आधा तुम्हें भेजना, आधा मेरे पास रखना। अगर हम दोनों मिलें, तभी आवाज़ 19 पूरी होगी।”

शशांक ने काँपते हुए कहा, “तो पहली फाइल तुमने भेजी?”

मीरा नाथ ने सिर हिलाया। “नहीं। मैंने नहीं भेजी। मैं भेजने वाली थी, पर उससे पहले मेरी छिपने की जगह पर हमला हुआ। 19 का पहला हिस्सा चोरी हो गया। फिर वही हिस्सा तुम्हें पहुँचा। इसका मतलब तीसरा खिलाड़ी है।”

कबीर ने माथा पकड़ा। “इस कहानी में खिलाड़ी इतने हो गए कि क्रिकेट टीम बन जाए।”

“तीसरा कौन?” नयना ने पूछा।

मीरा नाथ ने कहा, “शायद देवव्रत। शायद भैरव। शायद कोई जो हम सबको एक जगह लाना चाहता है।”

शशांक बोला, “या अरविंद खुद।”

सब उसकी तरफ मुड़े।

शशांक ने धीमे कहा, “मैं यह नहीं कह रहा कि वह जिंदा है। लेकिन उसने हमेशा चीज़ें इस तरह छोड़ीं कि मौत के बाद भी घटना घटती रहे। जैसे वह सामने न हो, फिर भी कहानी धकेल रहा हो।”

नयना ने पेन ड्राइव को देखा। “हमें दोनों हिस्से जोड़ने होंगे।”

“कहाँ?” कबीर ने पूछा। “कंप्यूटर चाहिए, सुरक्षित जगह चाहिए, और पाँच मिनट चाहिए जिसमें कोई हमें मारने न आए। इस कस्बे में तीनों लग्ज़री हैं।”

शशांक ने कहा, “एक पोर्टेबल रिकॉर्डर मेरे पास है। पेन ड्राइव चल जाएगी। लेकिन आवाज़ जोड़ने के लिए सिस्टम चाहिए।”

“आपके पास होगा,” कबीर ने कटाक्ष किया। “आपने इतने साल सब छिपाया है, तो एक लैपटॉप भी छिपा होगा।”

शशांक ने सिर झुका लिया। “है।”

कबीर की आँखें फैल गईं। “मैंने मज़ाक किया था।”

“मैंने नहीं,” शशांक बोला। “पुरानी एम्बुलेंस में।”

“कौन-सी एम्बुलेंस?”

डाकिये ने कहा, “भैरव की सेवा समिति की एम्बुलेंस?”

शशांक ने सिर हिलाया। “कभी उसी में बच्चों को ले जाया जाता था। बाद में वह कबाड़ में बेच दी गई। मैंने खरीद ली। पीछे सिस्टम लगा है। ऑफलाइन। कोई नेटवर्क नहीं।”

कबीर ने कड़वाहट से कहा, “मामा, आपने अपराध के सबूत ऐसे इकट्ठा किए जैसे लोग डाक टिकट जमा करते हैं।”

शशांक की आँखों में दर्द आया। “क्योंकि एक दिन हिम्मत आएगी, यही सोचकर जीता रहा।”

“और आई?”

“नहीं। तुम लोग ले आए।”

यह सुनकर कबीर चुप हो गया।

बाहर गोदाम के पास किसी बाइक की आवाज़ आई। सब तुरंत दीवार से लग गए। बाइक धीरे से गुज़री। शायद उन्हें नहीं देखा। लेकिन समय कम था।

शशांक ने कहा, “एम्बुलेंस पुराने श्मशान के पीछे खड़ी है।”

कबीर ने भौंहें चढ़ाईं। “वाह। लोकेशन भी पूरी फैमिली-फ्रेंडली है।”

नयना ने कहा, “चलते हैं।”

मीरा नाथ ने उसका हाथ पकड़ लिया। “एक बात पहले।”

नयना ने उसकी तरफ देखा।

“अगर आवाज़ 19 में वह निकला जो मुझे लगता है, तो तुम्हें अपने बारे में कुछ ऐसा पता चल सकता है जिसे सुनना आसान नहीं होगा।”

नयना ने कड़वी मुस्कान से कहा, “आज कुछ आसान हुआ है क्या?”

मीरा नाथ ने हाथ छोड़ा। “नहीं।”

वे गोदाम से पीछे की गली में निकले। शशांक रास्ता जानता था। वह छोटी गलियों से ले जा रहा था जहाँ कपड़े सूख रहे थे, बच्चे प्लास्टिक की बोतल से क्रिकेट खेल रहे थे, और औरतें दरवाज़े से झाँककर तुरंत पर्दा खींच लेती थीं। मझगवाँ में खबर धुएँ से तेज़ फैलती थी। अब शायद आधा कस्बा जान चुका था कि कोई पुराना भूत लौट आया है।

रास्ते में नयना और मीरा नाथ साथ-साथ चल रही थीं। दोनों के बीच अजीब दूरी थी—करीब भी, दूर भी। जैसे दो आईने हों जिनमें अलग-अलग उम्र की एक ही आग दिख रही हो।

नयना ने धीरे से पूछा, “तुमने देवव्रत को कभी पिता कहा?”

मीरा नाथ ने थोड़ी देर बाद जवाब दिया, “याद में कहा था। सामने नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि जब याद लौटी, तब तक वह मेरे लिए सिर्फ वह आदमी था जिसने मुझे बचाया नहीं।”

“शायद वह मजबूर था।”

मीरा नाथ ने उसकी तरफ देखा। “मजबूरी से अपराध छोटा नहीं होता।”

नयना चुप हो गई।

फिर मीरा नाथ बोली, “और तुम? अर्चना को माँ मानती हो?”

नयना ने बिना सोचे कहा, “हाँ।”

फिर कुछ पल बाद जोड़ा, “गुस्सा है। सवाल हैं। पर माँ वही हैं।”

मीरा नाथ ने सिर हिलाया। “तो तुम मुझसे ज्यादा भाग्यशाली हो।”

यह वाक्य नयना को भीतर तक चीर गया।

जिसे वह अपनी टूटी हुई पहचान समझ रही थी, किसी और की नज़र में वह जीवन का सबसे बड़ा वरदान था—माँ।

पुराने श्मशान के पास हवा बदल गई। वहाँ मिट्टी में राख की गंध थी। कुछ अधजले लकड़ी के टुकड़े किनारे पड़े थे। पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे टूटी चौकी। उसके पीछे झाड़ियों में एक पुरानी सफेद एम्बुलेंस खड़ी थी। उस पर हरे रंग से कभी लिखा रहा होगा—**सेवा रथ**। अब अक्षर छिल चुके थे।

कबीर ने हँसने की कोशिश की। “मामा, आप सच में हॉरर प्रोडक्शन डिजाइनर हो सकते थे।”

शशांक ने एम्बुलेंस का पिछला दरवाज़ा खोला।

अंदर धूल थी, लेकिन व्यवस्था भी। एक फोल्डिंग टेबल, पुराना लैपटॉप, बैटरी बैकअप, टेप डेक, ऑडियो इंटरफेस, कुछ हार्ड ड्राइव, और दीवार पर चिपके छोटे कागज़—नाम, तारीखें, कोड।

नयना ने एक कागज़ पढ़ा—

**Q-19 — नयना / मीरा — स्थिति अस्पष्ट**

दूसरा—

**आर्या = मीरा नाथ? पुष्टि 2016**

तीसरा—

**अरविंद — जीवित? अंतिम संपर्क?**

उसने शशांक की तरफ देखा। “आपने खोज बंद नहीं की थी।”

शशांक ने धीमे कहा, “हिम्मत नहीं थी बाहर बोलने की। पर भूलने की भी नहीं थी।”

कबीर एम्बुलेंस में चढ़ा। “लैपटॉप ऑन करते हैं।”

शशांक ने बैटरी जोड़ी। मशीन धीरे-धीरे चालू हुई। स्क्रीन पर पुराना ऑपरेटिंग सिस्टम खुला। कोई इंटरनेट नहीं। सिर्फ फोल्डर।

कबीर ने नयना की पेन ड्राइव माँगी। उसने 19 वाला पहला हिस्सा दिया। मीरा नाथ ने 19-B दिया।

कबीर ने दोनों लगाए। स्क्रीन पर दो फाइलें दिखीं—

**VOICE_19_A_final.wav**
**VOICE_19_B_lock.wav**

“लॉक?” कबीर ने पूछा।

मीरा नाथ ने कहा, “दूसरी फाइल पासफ्रेज़ माँगती है। मुझे नहीं पता।”

कबीर ने फाइल खोली। स्क्रीन पर छोटा-सा बॉक्स आया—

**Enter phrase**

कबीर ने कहा, “पासफ्रेज़ क्या हो सकता है? टुनटुन रिपोर्टर?”

नयना का दिल हिला।

“टाइप करो,” उसने कहा।

कबीर ने लिखा—**tuntun reporter**

गलत।

उसने हिंदी में लिखा—**टुनटुन रिपोर्टर**

गलत।

मीरा नाथ ने कहा, “छोटी रेडियो?”

कबीर ने लिखा। गलत।

शशांक ने कहा, “अर्चना?”

गलत।

डाकिये ने कहा, “जन-खिड़की।”

गलत।

हर गलत जवाब के साथ स्क्रीन पर लाल निशान आता। पाँचवीं कोशिश के बाद संदेश आया—

**Two attempts left**

कबीर ने हाथ पीछे खींच लिया। “अब गलती नहीं कर सकते।”

नयना ने आँखें बंद कीं।

अरविंद ने यह फाइल उसके लिए छोड़ी थी। पर अगर आधा सच मीरा नाथ के पास था, तो पासफ्रेज़ ऐसा होगा जिसे दोनों जोड़कर समझें।

आवाज़ 2 में पापा ने कहा था—“जिसे बचा लिया, अब उसी को सच तक पहुँचाना होगा।”
डार्करूम में रिकॉर्डिंग—“अर्चना, जल्दी!”
बच्ची—“मेरा नाम मीरा है।”
नयना—शायद रोती हुई।
अरविंद—टुनटुन रिपोर्टर।
मीरा नाथ—लाल रिबन।

नयना ने आँखें खोलीं। “लाल रिबन नहीं। नीला क्लिप नहीं। दोनों।”

कबीर ने पूछा, “क्या?”

“पासफ्रेज़ शायद दोनों निशानों से जुड़ा है।”

मीरा नाथ धीरे से बोली, “लाल रिबन, नीला क्लिप।”

कबीर ने टाइप किया—

**लाल रिबन नीला क्लिप**

स्क्रीन कुछ पल स्थिर रही।

फिर हरा निशान आया।

फाइल खुल गई।

एम्बुलेंस के भीतर कोई नहीं बोला।

कबीर ने दोनों ऑडियो फाइलें ऑडियो सॉफ्टवेयर में खोलीं। A और B अलग-अलग ट्रैक पर आ गए। दोनों में खाली जगहें थीं। कबीर ने वेवफॉर्म देखी। “ये दोनों अलग नहीं। इंटरलॉक हैं। बीच-बीच में एक की आवाज़ दूसरे की खामोशी भरती है।”

“जोड़ो,” नयना ने कहा।

कबीर ने ट्रैक सिंक किए। कुछ सेकंड तक सिस्टम रुका। फिर पूरी फाइल बनी—

**VOICE_19_COMPLETE.wav**

कबीर ने प्ले बटन पर उँगली रखी।

“तैयार?” उसने पूछा।

किसी ने हाँ नहीं कहा। पर किसी ने रोका भी नहीं।

प्ले दबा।

पहले वही खरखराहट आई जो नयना ने नोएडा में सुनी थी।

फिर अरविंद अवस्थी की आवाज़।

कमजोर, टूटी हुई, पर इस बार पहले से ज्यादा साफ़।

“मीरा… नयना… अगर तुम दोनों यह सुन रही हो, तो इसका मतलब है कि मेरा डर सच हुआ और मेरी उम्मीद भी। डर यह था कि सच ने तुम्हें चैन से जीने नहीं दिया। उम्मीद यह थी कि तुम दोनों एक-दूसरे तक पहुँच गईं।”

नयना ने महसूस किया—उसका शरीर काँप रहा था।

अरविंद आगे बोले—

“सबसे पहले, नयना… जिस दिन अर्चना ने तुम्हें उठाया, वह गलती नहीं थी। वह धुएँ, खून और डर में लिया गया फैसला था। मैंने लाल रिबन कहा था, पर गोली लगते ही मेरी आवाज़ टूट गई। अर्चना ने नीला क्लिप उठाया। उसने तुम्हें बचाया। उसने तुम्हें जन्म नहीं दिया, लेकिन मौत से छीना। उसे दोष मत देना।”

नयना की आँखों से आँसू बह निकले।

अर्चना माँ थीं।

गलत बच्ची नहीं। बची हुई बच्ची।

आवाज़ आगे चली—

“मीरा नाथ… अगर तुम सुन रही हो, तो मुझसे नफरत करना। मैं तुम्हें उस रात नहीं बचा पाया। मैं जानता था कि तुम्हारे पिता देवव्रत हैं, पर यह भी जानता था कि वह तुम्हें बचाने की कीमत नहीं चुका पाएगा। मैंने कोशिश की। मैं हार गया। लेकिन मैं तुम्हें भूला नहीं। 2016 में तुम्हें आश्रम से निकालना मेरा दूसरा जीवन था। शायद उसी दिन मुझे मर जाना चाहिए था। पर कुछ आवाज़ें बाकी थीं।”

मीरा नाथ ने मुँह पर हाथ रख लिया। उसकी आँखें बंद थीं।

अरविंद की आवाज़ और धीमी हुई—

“अब सबसे बड़ा सच। शांत कुआँ सिर्फ बच्चों का नेटवर्क नहीं था। यह पहचान बदलने की फैक्ट्री थी। जिन बच्चों को मरा दिखाया गया, उनमें कुछ को बड़े घरों में बेचा गया। कुछ को आश्रमों में। कुछ को राजनीति के काम में। लेकिन Q-19 खास था, क्योंकि नयना सिर्फ कोई बच्ची नहीं थी।”

नयना की साँस रुक गई।

कबीर स्क्रीन को देख रहा था। डाकिया सिर झुकाए खड़ा था। शशांक की उँगलियाँ काँप रही थीं।

“नयना,” अरविंद बोले, “तुम्हारे असली पिता का नाम रामलाल नहीं, जैसा रिकॉर्ड में लिखा है। तुम्हारे पिता थे—महेश कश्यप। पेशे से स्कूल शिक्षक। वे शांत कुआँ की पहली सूची बाहर लाने वाले आदमी थे। तुम्हारी माँ, सुजाता, आंगनवाड़ी में काम करती थीं। उन्होंने बच्चों के गायब होने की पहली गिनती बनाई थी। उन्हें पहले चुप कराया गया। फिर मरा घोषित किया गया। लेकिन वे मरे नहीं थे।”

नयना के भीतर जैसे कोई दरवाज़ा खुला।

महेश कश्यप।
सुजाता।

नाम।
असली नाम।

उसने इन नामों को मन में दोहराया। वे अजनबी थे, फिर भी उनकी ध्वनि में मिट्टी थी।

“वे कहाँ हैं?” उसने फुसफुसाया, जैसे रिकॉर्डिंग जवाब देगी।

अरविंद की आवाज़ आई—

“अगर यह रिकॉर्डिंग कभी पूरी सुनी जाए, तो काली पहाड़ी के नीचे पुराने आश्रम के तहखाने को देखना। वहाँ फाइलें हैं। और शायद… लोग भी।”

कबीर ने तुरंत शशांक की तरफ देखा। “पुराना आश्रम?”

शशांक फुसफुसाया, “भैरवनाथ का पहला आश्रम। काली पहाड़ी के पास। अब बंद पड़ा है।”

रिकॉर्डिंग में अरविंद ने गहरी साँस ली।

“भैरव प्रताप अब बाबा है। देवव्रत नाथ अब अपनी ही बेटी और अपने अपराध के बीच फँसा बूढ़ा आदमी है। राघवेंद्र सिंह राजनीति का चेहरा था। लेकिन असली ताला भैरव के पास है। वह आवाज़ों से नहीं डरता। वह नामों से डरता है। असली नामों से। नयना, तुम्हारा असली नाम ही उसकी बरबादी की पहली चाबी है। मीरा, तुम्हारी गवाही दूसरी।”

रिकॉर्डिंग में अचानक खाँसी आई। लंबी। डरावनी। फिर बहुत धीमी आवाज़—

“अर्चना… अगर तुम सुन रही हो… मैंने तुम्हें माफ़ किया। तुमने गलत बच्ची नहीं उठाई। तुमने मेरी बेटी उठाई। क्योंकि जिसे हम बचाते हैं, वह हमारी हो जाती है।”

नयना रो पड़ी।

कबीर ने चुपचाप उसका हाथ पकड़ लिया।

आवाज़ कुछ क्षण रुकी। फिर अंतिम हिस्सा शुरू हुआ।

“और अब आखिरी बात। मैं शायद जिंदा नहीं रहूँगा। अगर रहूँ भी, तो अपनी आवाज़ में नहीं। वे मेरी आवाज़ इस्तेमाल करेंगे। वे मुझे तुमसे मिलाने का नाटक करेंगे। भरोसा सिर्फ उस बात पर करना जो मैंने कभी दुनिया से नहीं कही—”

लंबा सन्नाटा।

फिर अरविंद ने बहुत धीरे कहा—

“नयना, जब तुम पहली रात हमारे घर आई थीं, तुम सोते-सोते एक ही शब्द बोलती थीं—‘मिट्टी’। अर्चना ने कहा था, बच्ची को अपनी मिट्टी याद है। इसीलिए मैंने तुम्हारे तकिये के नीचे गाँव की मिट्टी रखी थी। तुम पहली बार उसी रात बिना रोए सोई थीं।”

नयना का हाथ अपने सीने पर गया।

उसे कोई याद नहीं थी। पर शरीर के बहुत भीतर जैसे मिट्टी की गंध उठी।

रिकॉर्डिंग की आवाज़ टूटने लगी।

“काली पहाड़ी… पुराना आश्रम… तहखाने की दीवार पर लाल रिबन और नीले क्लिप का निशान… वहीं से आगे रास्ता खुलेगा। और हाँ… देवव्रत को पूरी तरह दुश्मन मत समझना। वह अपराधी है, पर उसके पास एक चाबी है। भैरव को मारना नहीं, बेनकाब करना। वरना शांत कुआँ फिर नया नाम लेकर जिंदा हो जाएगा।”

स्टैटिक बढ़ी।

“मेरी दोनों बेटियों…”

नयना और मीरा नाथ दोनों ने एक साथ सिर उठाया।

अरविंद की आवाज़ आखिरी बार साफ़ हुई—

“आवाज़ बचाना। आदमी मर जाए तो भी आवाज़ अगर सही कान तक पहुँचे, तो न्याय देर से सही, आता है।”

रिकॉर्डिंग कट गई।

एम्बुलेंस में सिर्फ मशीन की हल्की आवाज़ बची।

बाहर श्मशान के पेड़ से कौवा उड़ा।

किसी ने कुछ देर तक कुछ नहीं कहा।

नयना ने आँसू पोंछे। फिर धीरे से बोली, “मेरे माता-पिता शायद जिंदा हैं।”

मीरा नाथ ने उसे देखा। “और मेरे पिता अपराधी हैं।”

“नहीं,” नयना ने कहा। “तुम्हारे पिता भी फँसे हुए हैं।”

मीरा नाथ की आँखों में दर्द तैर गया। “फँसा हुआ आदमी अगर दूसरों को नहीं बचाता, तो वह भी कैदी नहीं, पहरेदार होता है।”

डाकिये ने पहली बार सिर उठाया। “काली पहाड़ी जाना होगा।”

कबीर ने कहा, “सीधे? अभी? बिना प्लान? शानदार। पिछली बार हम घर, पोस्ट ऑफिस, रेडियो स्टेशन, लाइब्रेरी, फोटो स्टूडियो और श्मशान से भाग चुके हैं। अब आश्रम से भागना रह गया है।”

शशांक ने लैपटॉप बंद किया। “काली पहाड़ी तक जाने का एक पुराना रास्ता है। मुख्य सड़क से नहीं। नदी किनारे से।”

“माँ?” नयना ने पूछा।

मीरा नाथ ने कहा, “अगर अर्चना को उन्होंने पकड़ा है, तो या तो नए आश्रम में होंगी या पुराने तहखाने में। भैरव जानता है कि हम अब वहाँ जाएँगे।”

कबीर ने कहा, “मतलब जाल।”

“हाँ,” शशांक बोला। “पर इस बार जाल में जाने का कारण हमारे पास है।”

तभी डाकिये ने बाहर झाँका। उसका चेहरा सख्त हो गया।

“कोई आ रहा है।”

सब सतर्क हो गए।

श्मशान के रास्ते पर एक अकेला आदमी चल रहा था। सफेद कुर्ता, हल्की झुकी चाल। हाथ में कोई हथियार नहीं। वह बहुत बूढ़ा लग रहा था, पर उसके कदमों में अभी भी अफसरों वाली सीधी रेखा थी।

मीरा नाथ की साँस अटक गई।

“नहीं…” उसके मुँह से निकला।

नयना ने पूछा, “कौन?”

आदमी एम्बुलेंस से दस कदम दूर आकर रुका।

उसने काले चश्मे उतारे। चेहरा झुर्रियों से भरा था, पर आँखें तेज़ थीं। उनमें पश्चाताप भी था, और डर भी। वह आदमी स्क्रीन, रिकॉर्डिंग, फोटो, सब से निकलकर सामने आ गया था।

देवव्रत नाथ।

उसने मीरा नाथ को देखा।

होंठ काँपे।

“मीरा…”

मीरा नाथ पीछे हट गई। “मेरा नाम मत लीजिए।”

देवव्रत की आँखें भर आईं, पर आँसू बाहर नहीं आए। शायद इतने सालों के अपराध ने आँसू की जगह भी पत्थर भर दिए थे।

नयना ने बैग कसकर पकड़ा। कबीर ने लोहे की रॉड उठा ली। डाकिया आगे खड़ा हो गया।

देवव्रत ने दोनों हाथ ऊपर कर दिए।

“मैं लड़ने नहीं आया।”

कबीर ने कहा, “आप जैसे लोग लड़ते नहीं, लड़वाते हैं।”

देवव्रत ने सिर झुका लिया। “सही कहा।”

नयना ने पूछा, “माँ कहाँ हैं?”

देवव्रत ने उसकी तरफ देखा। “अर्चना जिंदा है।”

“कहाँ?”

“काली पहाड़ी।”

सब चुप।

देवव्रत ने आगे कहा, “भैरव आज रात पुरानी फाइलें हटाने वाला है। उसे पता है आवाज़ 19 पूरी हो गई है।”

शशांक ने काँपकर कहा, “आपको कैसे पता?”

देवव्रत ने थकी हुई नज़र से उसे देखा। “क्योंकि तुम सबको यहाँ तक आने देने का आदेश मैंने दिया था।”

कबीर ने रॉड कस ली। “मतलब आप हमें इस्तेमाल कर रहे हैं।”

“हाँ,” देवव्रत ने साफ़ कहा। “और तुम भी मुझे इस्तेमाल कर सकते हो।”

मीरा नाथ ने पहली बार उसकी आँखों में देखा। “अठारह साल बाद पिता बनेंगे?”

देवव्रत टूट गया। सचमुच टूट गया। उसका चेहरा सिकुड़ गया। वह कुछ कहना चाहता था, पर शब्द गले में अटक गए।

फिर उसने जेब से एक छोटी चाबी निकाली। काली, लंबी, पुरानी।

“तहखाने की तीसरी दीवार,” उसने कहा। “यह चाबी सिर्फ मेरे पास थी। भैरव को लगता है मैंने इसे खो दिया। मैंने नहीं खोया। हिम्मत खोई थी।”

उसने चाबी जमीन पर रख दी। सीधे मीरा नाथ को नहीं दी। शायद उसे अधिकार नहीं समझा।

मीरा नाथ ने चाबी नहीं उठाई।

नयना आगे बढ़ी। उसने चाबी उठाई।

देवव्रत ने उसकी तरफ देखा। “तुम महेश कश्यप की बेटी हो।”

नयना के भीतर बिजली-सी दौड़ी। “आप जानते थे?”

“हाँ।”

“और आपने मुझे मृत घोषित किया?”

देवव्रत ने आँखें बंद कर लीं। “हाँ।”

“मेरे माता-पिता?”

वह बहुत देर चुप रहा।

नयना की आवाज़ टूट गई। “जिंदा हैं?”

देवव्रत ने आँखें खोलीं।

“तुम्हारी माँ शायद। तुम्हारे पिता… अगर जिंदा हैं तो वही आदमी हैं जिससे भैरव आज भी डरता है।”

“कहाँ हैं?”

देवव्रत ने काली पहाड़ी की दिशा में देखा।

“शांत कुआँ में।”

हवा थम गई।

कबीर ने धीमे कहा, “शांत कुआँ जगह नहीं, तरीका था।”

देवव्रत बोला, “तरीका भी। जगह भी।”

दूर से गाड़ियों की आवाज़ आने लगी। इस बार बहुत सारी।

देवव्रत ने कहा, “मेरे पीछे लोग आए हैं। मैंने उन्हें ज्यादा देर तक नहीं रोका। तुम्हारे पास बीस मिनट हैं।”

कबीर ने पूछा, “आप हमारे साथ चलेंगे?”

देवव्रत ने मीरा नाथ की तरफ देखा।

“अगर यह अनुमति दे।”

मीरा नाथ ने बहुत देर तक उसे देखा। फिर कहा—

“आप हमारे साथ नहीं, हमारे पीछे चलेंगे। जैसे अपराधी चलता है।”

देवव्रत ने सिर झुका लिया। “मंजूर।”

नयना ने काली चाबी मुट्ठी में कस ली।

उसके पास अब दो नाम थे। दो माताएँ। दो पिता। दो मीराएँ। एक अधूरा न्याय। और सामने काली पहाड़ी।

उसने एम्बुलेंस के भीतर रखी आवाज़ 19 की कॉपी हार्ड ड्राइव में सेव की, फिर पेन ड्राइव अपने बैग में रखी।

“चलते हैं,” उसने कहा।

कबीर ने धीरे से पूछा, “कहाँ तक?”

नयना ने पहाड़ी की तरफ देखा।

“जहाँ नाम मिटाए जाते थे।”

मीरा नाथ ने लाल रिबन कसकर बाँधा।

“और जहाँ से उन्हें वापस लाया जाएगा।”

दूर काली पहाड़ी के ऊपर बादल जमा हो रहे थे।

शाम से पहले उन्हें वहाँ पहुँचना था।

क्योंकि रात होते ही शांत कुआँ फिर खुलने वाला था।

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