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आवाज़ नंबर 19 (भाग:6) This post in Under Review

Vinod 05 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 443 0 Hindi :: हिंदी

भाग 6: लाल रिबन

लाइब्रेरी के बाहर कदमों की आवाज़ नज़दीक आ रही थी।

मीरा ने फोटो सीने से चिपका ली।

फोटो में दो बच्चियाँ थीं। एक के बालों में नीला क्लिप। दूसरी के बालों में लाल रिबन। दोनों इतनी मिलती-जुलती थीं कि धुंधली तस्वीर में उनका फर्क सिर्फ बालों के रंगीन निशानों से पहचाना जा सकता था। पीछे पेंसिल से लिखा था—

**मीरा नाथ और नयना — टेस्ट रिकॉर्डिंग, 17 अगस्त 2003**
**सिर्फ एक को बचाना संभव होगा।**

और नीचे अरविंद अवस्थी की लिखावट में वह लाइन थी जिसने मीरा के भीतर बाकी बचा संतुलन भी तोड़ दिया था—

**अर्चना ने गलत बच्ची उठा ली।**

गलत बच्ची।

क्या कोई बच्चा गलत होता है?

या सही-गलत सिर्फ उन लोगों का खेल है जो बच्चों को नाम, नंबर और फाइलों में बदल देते हैं?

मीरा का गला सूख गया। उसने डाकिये की तरफ देखा। बूढ़ा आदमी रैक के सहारे खड़ा था, जैसे अचानक उसकी उम्र बीस साल और बढ़ गई हो।

“गलत बच्ची मतलब क्या?” मीरा ने दबे स्वर में पूछा।

डाकिये ने जवाब देने के लिए होंठ खोले, पर तभी बाहर से किसी ने लाइब्रेरी का दरवाज़ा धक्का दिया।

दरवाज़ा बंद था, लेकिन कुंडी पुरानी थी। पहली चोट पर लकड़ी काँपी। दूसरी चोट पर धूल झरने लगी।

कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “इतिहास की क्लास बाद में। अभी भूगोल देखो—निकास कहाँ है?”

लाइब्रेरी लंबी थी। दोनों तरफ लोहे के रैक। बीच में टूटी मेजें। पीछे की दीवार पर बड़ी खिड़कियाँ थीं, जिनमें से आधी ईंटों से बंद कर दी गई थीं। एक कोने में लकड़ी का पुराना कार्ड-कैटलॉग पड़ा था। ऊपर छत से पंखा लटका था, जो वर्षों से बंद था, फिर भी हवा में धीरे-धीरे हिल रहा था।

बाहर तीसरी चोट पड़ी।

“अंदर हैं!” किसी ने चिल्लाया।

कबीर ने रैक के पीछे से झाँका। “दो आदमी दरवाज़े पर। बाकी शायद नीचे सीढ़ियों पर।”

डाकिये ने बहुत धीमे कहा, “पीछे पत्रिका-कक्ष है। उसके बाद एक छोटी खिड़की है। वहाँ से मैदान के पीछे उतरा जा सकता है।”

कबीर ने आँखें तरेरीं। “ये जानकारी आपने पहले क्यों नहीं दी?”

“क्योंकि पहले तुम पूछ नहीं रहे थे।”

“काका, आपकी टाइमिंग सच में अपराध है।”

मीरा ने फोटो बैग में रखी और आगे बढ़ी। “चलो।”

तीनों रैक के बीच झुककर पीछे की तरफ बढ़े। हर कदम पर धूल उड़ती। पुरानी किताबों की गंध, सीलन और डर मिलकर अजीब-सी चुभन पैदा कर रहे थे। एक जगह कबीर का पैर किताबों के ढेर से टकराया। किताबें गिर पड़ीं। आवाज़ छोटी थी, पर उस समय किसी धमाके जैसी लगी।

बाहर से तुरंत आवाज़ आई—“पीछे हैं!”

दरवाज़े पर भारी चोट पड़ी। कुंडी आधी उखड़ गई।

वे पत्रिका-कक्ष तक पहुँचे। दरवाज़ा जाम था। कबीर ने कंधा मारा। नहीं खुला। दूसरी बार मारा। लकड़ी कराही, पर टस से मस नहीं हुई।

“हटो,” मीरा ने कहा।

कबीर ने उसे देखा। “तू क्या करेगी?”

मीरा ने सरिया उसके हाथ से ली और दरवाज़े के नीचे फँसाकर जोर लगाया। लकड़ी का हिस्सा चटका। उसने फिर जोर लगाया। इस बार उसकी हथेली का पुराना घाव खुल गया, पर उसने हाथ नहीं छोड़ा। तीसरी कोशिश में दरवाज़ा अंदर की तरफ टूटकर खुल गया।

कबीर ने हैरानी से कहा, “ठीक है। मैं आधिकारिक रूप से डर गया हूँ।”

पत्रिका-कक्ष छोटा था। अंदर फटी मैगज़ीनों के बंडल, बंद अलमारी और दीवार में जंग लगी खिड़की थी। खिड़की पर लोहे की सलाखें थीं, मगर बीच की दो सलाखें पहले से काटी हुई लग रही थीं।

डाकिये ने कहा, “अरविंद ने करवाया था।”

मीरा ने उसे देखा।

पापा हर जगह रास्ता छोड़ गए थे।

या हर जगह खतरा पहले से था?

कबीर ने खिड़की को धक्का दिया। जंग की वजह से वह अटकी थी। पीछे से लाइब्रेरी का मुख्य दरवाज़ा टूटने की आवाज़ आई।

“जल्दी,” मीरा ने कहा।

कबीर ने सरिया सलाखों के बीच फँसाई। मीरा ने भी हाथ लगाया। डाकिये ने अपनी पूरी ताकत से फ्रेम धकेला। जंग टूटी। खिड़की बाहर की तरफ खुल गई।

नीचे करीब आठ फीट की ऊँचाई थी। मैदान की पिछली तरफ घास और कचरे का ढेर था।

“पहले बैग,” कबीर ने कहा।

मीरा ने बैग नीचे फेंका। फिर खुद खिड़की से निकली। उसके पैर दीवार से छिल गए। नीचे कूदते ही घुटने में दर्द उठा, पर वह उठ गई। कबीर उसके पीछे कूदा। फिर डाकिया।

बूढ़ा आदमी कूद नहीं पाया। वह आधा लटक गया। कबीर ने नीचे से उसका पैर पकड़ा। मीरा ने उसका हाथ। पीछे पत्रिका-कक्ष में किसी के घुसने की आवाज़ आई।

“ये रहे!”

कबीर और मीरा ने डाकिये को खींचा। वह धड़ाम से नीचे गिरा और दर्द से कराह उठा।

“भागिए!” कबीर ने उसे उठाते हुए कहा।

पीछे खिड़की से एक आदमी ने हाथ बढ़ाकर पकड़ने की कोशिश की, पर मीरा पहले ही बैग उठाकर मैदान की झाड़ियों की तरफ भाग चुकी थी। कबीर ने डाकिये को सहारा दिया। तीनों कॉलेज की पिछली दीवार की तरफ दौड़े।

दीवार ऊँची नहीं थी, पर डाकिये के लिए मुश्किल थी। कबीर पहले चढ़ा। फिर ऊपर से हाथ बढ़ाया। मीरा ने नीचे से धक्का दिया। किसी तरह डाकिया ऊपर पहुँचा। फिर मीरा चढ़ी। दूसरी तरफ कूदते ही वे पुराने बस-स्टैंड की तरफ खुलती गली में आ गए।

पीछे से आवाज़ें आईं, लेकिन पीछा करने वाले दीवार पार नहीं कर पाए। शायद उन्हें दूसरी तरफ घूमना पड़ता।

कबीर ने साँस फुलाते हुए कहा, “अब कहाँ?”

मीरा ने बैग से फोन निकाला। स्क्रीन पर कोई सिग्नल नहीं था। उसने फोन वापस रख दिया।

डाकिये ने अपना घुटना पकड़ा। “शशांक के पास।”

कबीर ने तुरंत कहा, “अभी? आपने खुद कहा था उसका घर निगरानी में होगा।”

डाकिये ने दर्द से दाँत भींचे। “घर नहीं। उसका पुराना डार्करूम।”

“मामा का डार्करूम?” कबीर चौंका। “वो तो सालों पहले बंद हो गया।”

“बंद जगहें ही सबसे ज्यादा काम आती हैं,” डाकिये ने कहा।

मीरा ने पूछा, “वहाँ क्या मिलेगा?”

“अगर शशांक ने सच में कुछ बचाया है, तो वहीं होगा। वह आवाज़ें रिकॉर्ड करता था, पर फोटो भी खींचता था। अरविंद कहता था—लिखा हुआ झूठ बन सकता है, आवाज़ बदली जा सकती है, पर एक सही फोटो आदमी की नींद छीन लेती है।”

मीरा ने बैग में रखी फोटो को महसूस किया।

“और अगर शशांक ने धोखा दिया?” कबीर ने पूछा।

डाकिये ने कबीर की आँखों में देखा। “तो तुम्हें सच अपनी ही खून की लाइन में मिलेगा।”

कबीर का चेहरा कठोर हो गया। “मामा मेरे पिता जैसे हैं।”

“तो प्रार्थना करो कि वे पिता जैसे ही निकले।”

गली के मोड़ पर एक पुराना ई-रिक्शा खड़ा था। चालक बीड़ी पी रहा था। कबीर ने जेब से पैसे निकाले और जल्दी से बोला, “चाचा, पुरानी अनाज मंडी से आगे जो कैमरा वाली गली है, चलोगे?”

चालक ने तीनों को ऊपर से नीचे देखा—धूल, खून, फटी साँसें, बूढ़ा आदमी, बैग।

“क्या मामला है?” उसने पूछा।

कबीर ने बिना पलक झपकाए कहा, “नाटक मंडली हैं। शूटिंग चल रही है।”

चालक ने मीरा की तरफ देखा। “बहुत असली लग रहा है।”

कबीर बोला, “भैया, हमारी एक्टिंग ही ऐसी है।”

चालक ने बीड़ी फेंकी। “बैठो।”

ई-रिक्शा चल पड़ा। मझगवाँ की गलियाँ पीछे छूटती गईं। हर मोड़ पर मीरा को लगा कोई देख रहा है। किसी दुकान के शीशे में सफेद स्कॉर्पियो की परछाई दिखाई देती, तो उसका दिल उछल जाता। हर बाइक की आवाज़ पर वह गर्दन घुमा देती।

कबीर ने धीरे से पूछा, “ठीक है?”

मीरा ने उसकी तरफ देखा।

यह सवाल अब कितना छोटा लग रहा था।

ठीक?

क्या ठीक था?

जिस पिता की आवाज़ से वह बड़ी हुई थी, वह शायद उसका जैविक पिता नहीं था। जिस माँ ने उसे बचाया, उसने शायद गलत बच्ची उठा ली थी। जिस नाम से उसने दुनिया को जवाब दिया, वह शायद किसी और बच्ची का था। और जिस बच्ची का असली नाम मीरा था, वह शायद लाल रिबन पहनती थी। या शायद वही थी। या शायद दोनों नहीं।

“मुझे नहीं पता,” उसने कहा।

कबीर ने सिर हिलाया। “यह जवाब इस समय सबसे ईमानदार है।”

कुछ देर दोनों चुप रहे।

फिर कबीर ने धीमे स्वर में कहा, “मेरे मामा… बचपन में मुझे रेडियो खोलकर दिखाते थे। कहते थे, आवाज़ तार से नहीं, भरोसे से चलती है। मैं तब समझता नहीं था। आज सोच रहा हूँ—जो आदमी आवाज़ों से इतना प्यार करता था, क्या वह आवाज़ों को हथियार बनने देगा?”

मीरा ने कहा, “कभी-कभी लोग प्यार की चीज़ों से ही सबसे बड़ा अपराध करते हैं।”

कबीर ने उसकी तरफ देखा। वह बात किसी किताब से नहीं आई थी। वह इस समय उसकी अपनी टूटी हुई जगह से आई थी।

डाकिया पीछे बैठा था, आँखें बंद। शायद दर्द में। शायद याद में। शायद पछतावे में।

मीरा ने पूछा, “अर्चना ने गलत बच्ची उठा ली—इसका मतलब क्या है?”

डाकिये ने आँखें खोलीं। “उस रात सब कुछ आग, धुआँ और चीखों में हुआ। अरविंद ने पहले से योजना बनाई थी कि जिस बच्ची को सूची में क्यू-19 लिखा गया है, उसे बचाना है। वही बच्ची शायद नयना थी। लेकिन वहाँ दो बच्चियाँ थीं। दोनों लगभग एक जैसी। एक के बालों में लाल रिबन था, एक के बालों में नीला क्लिप। अरविंद घायल था। मैं बाहर लोगों को भटका रहा था। अर्चना अंदर गई।”

“और उन्होंने मुझे उठाया?”

“हाँ।”

“कौन-सी?”

डाकिये ने गहरी साँस ली। “यही तो सवाल है।”

“फोटो में तो लिखा है अर्चना ने गलत बच्ची उठा ली।”

“अरविंद ने यह बाद में लिखा होगा। शायद उसे लगा होगा कि अर्चना ने नयना की जगह मीरा नाथ को उठा लिया।”

“तो फिर मैं देवव्रत की बेटी हो सकती हूँ?” मीरा ने पूछा।

ई-रिक्शा अचानक एक गड्ढे से उछला। तीनों हिले, पर किसी ने उस वाक्य की चोट से ज्यादा कुछ महसूस नहीं किया।

डाकिये ने कहा, “हो सकती हो।”

“और अगर मैं देवव्रत की बेटी हूँ, तो जिसने मुझे बचाया, वह मेरे पिता का दुश्मन था। और जिसने मुझे जन्म दिया, वह बच्चों का सौदागर।”

“जन्म देने वाला पिता हो, यह जरूरी नहीं,” डाकिया बोला।

मीरा ने कड़वाहट से कहा, “यह बात आज तीसरी बार सुन रही हूँ। लेकिन खून अपना सवाल पूछता है।”

डाकिया चुप हो गया।

ई-रिक्शा एक तंग गली में मुड़ा। दीवारों पर पुराने फोटो स्टूडियो के बोर्ड जमे थे—“मॉडर्न डिजिटल”, “राजू कलर लैब”, “शुभ विवाह वीडियोग्राफी।” आखिरी मोड़ पर एक बंद दुकान थी, जिसके ऊपर जंग लगे अक्षरों में लिखा था—

**त्रिपाठी फोटो एंड साउंड सर्विस**

कबीर का चेहरा बदल गया।

“यही है,” उसने कहा।

शटर बंद था। ऊपर धूल जमी थी। ताला नया था।

“मामा ने नया ताला लगाया,” कबीर बुदबुदाया। “मतलब वे आते रहे हैं।”

डाकिये ने आसपास देखा। “जल्दी करो।”

कबीर ने जेब से चाबी निकाली। “मामा ने मुझे कभी-कभी यहाँ भेजा है। पर अंदर डार्करूम में जाने नहीं दिया।”

चाबी ताले में लगी। ताला खुल गया।

दुकान के अंदर अँधेरा था। बाहर के बोर्ड का पीला रंग अंदर धूल में घुला हुआ था। दीवारों पर पुरानी शादी की तस्वीरें टेढ़ी लटकी थीं। एक कोने में कैमरा ट्राइपॉड, दूसरे में पुराने स्पीकर। काउंटर पर एल्बमों का ढेर। ऊपर धूल में उँगलियों के निशान थे—ताज़ा।

“कोई आया था,” मीरा ने कहा।

कबीर ने सिर हिलाया। “या मामा।”

“डार्करूम कहाँ है?”

कबीर ने पीछे का पर्दा हटाया। एक संकरा रास्ता था। उसके अंत में लाल बल्ब वाला कमरा। दरवाज़े पर अंदर से कुंडी नहीं थी, बाहर ताला था। कबीर ने दूसरी चाबी लगाई। ताला खुल गया।

दरवाज़ा खुलते ही रसायनों की पुरानी गंध आई—डेवलपर, फिक्सर, नमी, और बंद समय।

डार्करूम छोटा था। दीवारों पर नेगेटिव स्ट्रिप्स लटकी थीं। एक मेज पर एनलार्जर मशीन। कोने में धातु की अलमारी। लाल बल्ब बंद था, पर कबीर ने स्विच दबाया तो कमरा हल्की लाल रोशनी से भर गया।

मीरा को लगा जैसे वे किसी गर्भ में आ गए हों जहाँ तस्वीरें जन्म लेती हैं।

कबीर ने अलमारी खोली। अंदर फाइलें थीं, लेबल लगे हुए—
“विवाह 2001”,
“विद्यालय समारोह”,
“ब्लॉक ऑफिस”,
“चुनाव 2004”,
“लोकध्वनि केंद्र”,
“निजी — न खोलें।”

कबीर का हाथ “निजी” पर रुका।

“खोलो,” मीरा ने कहा।

“ये मामा की—”

“कबीर।”

उसने फाइल निकाली।

अंदर छोटे-छोटे लिफाफे थे। हर लिफाफे पर तारीख। 17 अगस्त 2003 वाला लिफाफा बीच में था।

कबीर ने उसे खोला। अंदर नेगेटिव्स, कुछ कॉन्टैक्ट शीट्स और दो फोटो थीं।

पहली फोटो वही थी जो उन्हें लाइब्रेरी में मिली थी—दो बच्चियाँ, लाल रिबन और नीला क्लिप।

दूसरी फोटो अलग थी।

उसमें अर्चना अवस्थी थीं। युवा, डरी हुई, आँखें लाल। उनकी गोद में नीले क्लिप वाली बच्ची थी। बच्ची रो रही थी। पीछे अरविंद खड़े थे, घायल नहीं, लेकिन बेहद तनाव में। फोटो के कोने में एक आदमी आधा दिख रहा था—शायद शशांक। और पृष्ठभूमि में काँच के पार लाल रिबन वाली बच्ची बैठी थी।

अकेली।

माइक्रोफोन के पास।

मीरा ने फोटो हाथ में ली। “माँ ने नीले क्लिप वाली बच्ची उठाई।”

कबीर ने फुसफुसाया, “और लाल रिबन वाली रह गई।”

डाकिये ने दीवार पकड़ ली।

“अगर यह फोटो सच है,” मीरा ने कहा, “तो मैं वही हूँ—नीले क्लिप वाली।”

कबीर बोला, “लेकिन नीला क्लिप किसका था? नयना का या मीरा नाथ का?”

मीरा ने फोटो पलटी।

पीछे शशांक की लिखावट थी—

**अर्चना बच्ची ले गई। अरविंद को शक है—यह नयना नहीं।**

नीचे दूसरी लाइन—

**लाल रिबन वाली बच्ची ने कहा: “मैं मीरा हूँ।”**

कमरा और छोटा हो गया।

कबीर की आँखें नेगेटिव्स पर गईं। “रुको। शायद नेगेटिव में और फ्रेम हों।”

उसने कॉन्टैक्ट शीट लाल रोशनी के नीचे फैलाई। छोटे-छोटे फ्रेम क्रम में थे।

फ्रेम 1: रिकॉर्डिंग रूम खाली।
फ्रेम 2: दो बच्चियाँ अंदर लाई जा रही हैं।
फ्रेम 3: अरविंद झुककर उनसे बात कर रहे हैं।
फ्रेम 4: लाल रिबन वाली बच्ची माइक्रोफोन पकड़ रही है।
फ्रेम 5: नीले क्लिप वाली बच्ची रो रही है।
फ्रेम 6: अर्चना अंदर घुसती हैं।
फ्रेम 7: बाहर कोई आदमी बंदूक लिए दिख रहा है।
फ्रेम 8: अर्चना नीले क्लिप वाली को उठा रही हैं।
फ्रेम 9: अरविंद उनका हाथ पकड़कर कुछ कह रहे हैं।
फ्रेम 10: लाल रिबन वाली बच्ची काँच के पार देख रही है।

कबीर ने फ्रेम 10 पर उँगली रखी। “यह बच्ची देख किसे रही है?”

मीरा ने ध्यान से देखा। काँच में हल्की परछाई थी। परछाई एक आदमी की थी—साफ़ चेहरा नहीं। बस लंबा कद, सफेद कुर्ता, और हाथ में अजीब-सी अंगूठी।

डाकिये ने फोटो जैसे ही देखी, उसका चेहरा बदल गया।

मीरा ने पूछा, “कौन है?”

डाकिया बोला नहीं।

कबीर ने कॉन्टैक्ट शीट उसकी आँखों के सामने कर दी। “काका।”

डाकिये ने बहुत धीरे कहा, “यह वही आदमी है जिसकी आवाज़ बाहर प्रसारण में आई थी।”

“नाम?”

डाकिये के होंठ सूख गए। “भैरव प्रताप।”

कबीर ने दोहराया, “भैरव प्रताप?”

मीरा ने पूछा, “कौन?”

डाकिये ने कहा, “तब कोई बड़ा पद नहीं था। सिर्फ एक स्थानीय ठेकेदार। मंदिर कमेटी, स्कूल ट्रस्ट, अनाज मंडी, एम्बुलेंस सेवा—हर जगह उसका पैसा था। लोग उसे दानवीर कहते थे।”

“और असल में?”

“असल में वही शांत कुआँ का मालिक था।”

मीरा ने महसूस किया, देवव्रत नाथ, राघवेंद्र सिंह—ये शायद सिर्फ परतें थीं। सबसे नीचे कोई और था। कोई जिसने अपनी आवाज़ अब तक छिपाकर रखी थी।

कबीर ने कहा, “भैरव प्रताप अभी कहाँ है?”

डाकिया कड़वी हँसी हँसा। “जहाँ ऐसे लोग जाते हैं—सम्मानित जगहों पर। अब वह भैरव प्रताप नहीं, ‘बाबा भैरवनाथ’ है। आधा उत्तर भारत उसके आश्रमों में सिर झुकाता है।”

मीरा को याद आया—नोएडा से आते समय हाईवे पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगे थे। सफेद दाढ़ी वाला एक संत, माथे पर चंदन, नीचे लिखा—

**परम पूज्य बाबा भैरवनाथ जी महाराज — सेवा ही साधना**

उसने धीमे कहा, “मैंने इन्हें देखा है।”

“सभी ने देखा है,” डाकिये ने कहा। “यही उनकी ताकत है। अपराधी छिपता है। संत मंच पर बैठता है।”

कबीर ने फाइल में और कागज़ खोजे। एक छोटा ऑडियो मिनी-कैसेट केस मिला। उस पर लिखा था—

**टेस्ट रिकॉर्डिंग — लाल रिबन**

मीरा ने उसे हाथ में लिया।

“इसे सुनना होगा,” उसने कहा।

कबीर ने कमरे में नज़र दौड़ाई। “मिनी-कैसेट प्लेयर चाहिए।”

अलमारी के नीचे एक छोटा रिकॉर्डर पड़ा था। कबीर ने उठाया। बैटरी नहीं थी, लेकिन बगल में अडैप्टर था। उसने प्लग लगाया। लाल लाइट जली।

“चल गया,” उसने कहा।

मीरा ने मिनी-कैसेट डाली।

प्ले दबाया।

पहले हल्की खड़खड़ाहट।

फिर बच्चों की रुलाई।

फिर शशांक की युवा आवाज़—नरम, घबराई हुई।

“बेटा, नाम बोलो। डरो मत। बस नाम बोलना है।”

एक बच्ची की आवाज़ आई। काँपती हुई।

“नयना…”

किसी ने पीछे से कहा, “जोर से।”

बच्ची रोने लगी।

दूसरी बच्ची की आवाज़ आई। थोड़ी साफ़, थोड़ी जिद्दी।

“मैं नहीं बोलूँगी।”

शशांक ने कहा, “बेटा, बस नाम बोलो।”

“मेरा नाम मीरा है।”

यह वही आवाज़ थी जो स्टूडियो में गूँजी थी।

मीरा की उँगलियाँ कस गईं।

रिकॉर्डिंग में शशांक ने पूछा, “पूरा नाम?”

बच्ची बोली, “मीरा…”

फिर रुक गई। शायद उसे पूरा नाम याद नहीं था। या डर गई थी।

पीछे से एक भारी आवाज़ आई—भैरव प्रताप की।

“नाम भूल जाएगी। बच्चे जल्दी भूलते हैं।”

दूसरी आवाज़—शायद देवव्रत की—काँपती हुई बोली, “उसे मत छूना।”

मीरा और कबीर ने एक-दूसरे को देखा।

देवव्रत?

उसकी आवाज़ में आदेश नहीं था। डर था।

भैरव प्रताप हँसा। “भावुक मत बनिए नाथ साहब। आज से आपकी बेटी समाज की बेटी है। और समाज के काम आएगी।”

देवव्रत गरजा, “मैंने तुम्हारी मदद की, बेटी देने की सौगंध नहीं खाई थी।”

भैरव प्रताप की आवाज़ अचानक ठंडी हो गई। “आपने मदद नहीं की। आपने हिस्सा लिया। अब हिस्सा चुकाइए।”

रिकॉर्डिंग में बच्ची फिर रोई—“पापा…”

मीरा का दिल थम गया।

देवव्रत की साँस सुनाई दी। भारी, टूटी हुई।

भैरव प्रताप ने कहा, “देखिए, नाथ साहब। आदमी का सबसे बड़ा इम्तिहान वही होता है जहाँ उसका अपना खून सामने हो। अगर आप आज पीछे हटे तो सारी फाइलें बाहर चली जाएँगी। आपकी वर्दी, आपका करियर, आपका नाम—सब खत्म।”

देवव्रत ने कहा, “वह मेरी बच्ची है।”

भैरव प्रताप ने जवाब दिया, “अब नहीं। कागज़ में वह मर चुकी है।”

टेप में अचानक हलचल हुई। एक बच्ची चीखी। दूसरी रोने लगी। किसी ने कहा, “अर्चना आ गई!”

फिर अरविंद की आवाज़—“अर्चना, जल्दी!”

अर्चना की आवाज़ आई। “कौन-सी?”

अरविंद बोले, “लाल—”

उसी पल गोली की आवाज़।

टेप में चीख।

अफरा-तफरी।

अर्चना की आवाज़—“अरविंद!”

अरविंद दर्द से कराहते हुए बोले—“बच्ची उठा… भाग…”

अर्चना फिर चीखीं—“कौन-सी?”

पर अरविंद की आवाज़ डूब गई।

फिर कपड़ों की सरसराहट, दौड़ते कदम, बच्ची की रुलाई।

शशांक की आवाज़ बहुत पास से आई—शायद उसने रिकॉर्डर उठा लिया था।

“हे भगवान… उन्होंने नीले वाली उठा ली…”

फिर किसी ने उसे थप्पड़ मारा। रिकॉर्डर गिरा। टेप घूमता रहा।

भैरव प्रताप की आवाज़ आई—

“कोई बात नहीं। जो गई, वही सही। जो बची है, वह असली मोहरा है।”

देवव्रत की टूटी हुई आवाज़—

“मीरा…”

बच्ची रो रही थी।

लाल रिबन वाली बच्ची।

“पापा…”

रिकॉर्डिंग कट गई।

डार्करूम में लाल रोशनी जल रही थी।

किसी ने साँस नहीं ली।

मीरा के हाथ से रिकॉर्डर छूटकर मेज पर गिर गया।

अब सच थोड़ा साफ़ था, और इसलिए और ज्यादा भयानक।

अर्चना ने नीले क्लिप वाली बच्ची उठा ली थी।

अरविंद शायद लाल रिबन वाली को बचाना चाहते थे।

लाल रिबन वाली बच्ची देवव्रत की बेटी मीरा थी।

और नीले क्लिप वाली… शायद नयना।

शायद वह।

मीरा ने बहुत धीरे कहा, “तो मैं नयना हूँ।”

किसी ने जवाब नहीं दिया।

इस बार कबीर ने भी नहीं।

वह सिर्फ उसे देखता रहा, जैसे किसी दोस्त को टूटते हुए देख रहा हो और उसके पास कोई सही शब्द न हो।

डाकिये ने धीमे से कहा, “हो सकता है।”

मीरा हँसी। वह हँसी नहीं थी। खाली जगह से निकली आवाज़ थी।

“हो सकता है,” उसने दोहराया। “हर चीज़ हो सकती है। मैं नयना हो सकती हूँ। मीरा हो सकती हूँ। देवव्रत की बेटी हो सकती हूँ। किसी अंजान मजदूर की बेटी हो सकती हूँ। या सिर्फ एक गलती।”

कबीर ने कठोर स्वर में कहा, “तू गलती नहीं है।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखें लाल थीं। “अगर अर्चना ने गलत बच्ची उठाई, तो किसी दूसरी बच्ची को वहीं छोड़ दिया गया। वह बच्ची अपने पिता को पुकार रही थी। और मैं बच गई।”

“तूने खुद को नहीं बचाया था,” कबीर ने कहा। “तू बच्ची थी।”

“पर मैं उसकी जिंदगी जी रही हूँ।”

“नहीं। तू अपनी जिंदगी जी रही है। चाहे नाम उधार का हो, साँस तेरी है।”

मीरा ने फोटो उठाई। लाल रिबन वाली बच्ची की धुंधली आँखें काँच के पार देख रही थीं। शायद पिता को। शायद मौत को। शायद उस औरत को जो उसे छोड़कर दूसरी बच्ची उठा ले गई थी।

“वह जिंदा है?” मीरा ने पूछा।

डाकिये ने कहा, “नहीं पता।”

कबीर ने कहा, “भैरव ने कहा—जो बची है, वह असली मोहरा है। इसका मतलब उसे तुरंत नहीं मारा होगा।”

मीरा ने अचानक सिर उठाया। “देवव्रत ने फिर भैरव के साथ काम क्यों किया? अगर उसकी बेटी उन्होंने छीन ली थी?”

डाकिया बोला, “क्योंकि अपराध आदमी को बाँध देता है। और अपराधबोध उससे भी ज्यादा। देवव्रत पहले भ्रष्ट था। फिर ब्लैकमेल हुआ। फिर अपनी बेटी के कारण कैदी बन गया। लेकिन कैदी भी अपराधी हो सकता है।”

कबीर ने फाइल में बाकी कागज़ देखे। “यहाँ एक और चीज़ है।”

उसने एक पुरानी चिट्ठी निकाली। चिट्ठी शशांक ने शायद खुद के लिए लिखी थी, भेजी नहीं थी।

कबीर ने पढ़ना शुरू किया—

“अगर कभी यह सब बाहर जाए तो मैं कहना चाहता हूँ कि मैंने आवाज़ें रिकॉर्ड कीं, पर मैं समझ नहीं पाया कि उन्हें किस तरह इस्तेमाल किया जाएगा। मैं डर गया था। जब अरविंद ने कहा कि बच्चों की पहचान बदली जा रही है, मैंने मदद की। जब भैरव ने कहा कि अगर मैंने मुँह खोला तो मेरे परिवार को भी सूची में डाल देगा, मैं चुप हो गया। चुप रहना भी अपराध है। यह बात मुझे रोज़ सोने नहीं देती।”

कबीर की आवाज़ टूटने लगी।

मीरा ने चिट्ठी उसके हाथ से ली और आगे पढ़ा—

“नीले क्लिप वाली बच्ची को अर्चना ले गई। अरविंद ने बाद में कहा कि शायद यही भगवान की मर्जी थी। उसने बच्ची को कभी दोष नहीं दिया। उसने कहा—जिसे बचा लिया, अब उसी को सच तक पहुँचाना होगा। लेकिन अर्चना ने कहा—नहीं। बच्ची को सिर्फ माँ चाहिए, सच नहीं। मैं नहीं जानता कौन सही था।”

नीचे लिखा था—

“लाल रिबन वाली बच्ची को मैंने आखिरी बार भैरव के आश्रम में देखा। नया नाम—आर्या।”

मीरा की आँखें जम गईं।

“आर्या,” उसने कहा।

कबीर ने चौंककर पूछा, “क्या?”

“लाल रिबन वाली बच्ची का नया नाम आर्या था।”

डाकिये ने माथा पकड़ लिया। “आर्या…”

“आप जानते हैं?” मीरा ने पूछा।

डाकिया बोला, “बाबा भैरवनाथ के आश्रम में एक लड़की थी। लोग उसे ‘आर्या दीदी’ कहते थे। मंच पर भजन गाती थी। उसकी आवाज़…”

वह रुका।

“क्या?”

“उसकी आवाज़ बहुत सुंदर थी। लेकिन मैंने कभी उसका चेहरा पास से नहीं देखा। आश्रम में औरतों का अलग हिस्सा था। फिर एक दिन वह भी गायब हो गई।”

कबीर ने कहा, “कब?”

“लगभग दस साल पहले।”

मीरा ने तेजी से सोचा। “अगर वह जिंदा थी… तो शायद आवाज़ 19 उसी ने भेजी हो।”

“या उसके किसी साथी ने,” कबीर बोला।

“और उसने मुझे मैसेज किया—वह जिसे अरविंद ने दूसरी बार बचाया था।”

डाकिये ने धीरे से कहा, “अरविंद ने दूसरी बार किसे बचाया… यह मुझे नहीं पता।”

तभी दुकान के बाहर शटर पर हल्की दस्तक हुई।

तीनों जम गए।

एक बार।

दो बार।

तीन बार।

फिर एक धीमी आवाज़ आई—

“कबीर?”

कबीर का चेहरा बदल गया।

“मामा,” वह फुसफुसाया।

शटर के बाहर वही आवाज़ आई, इस बार और जल्दी—

“कबीर, खोलो। मुझे पता है तुम अंदर हो। और अगर तुमने अभी दरवाज़ा नहीं खोला तो वे लोग भी आ जाएँगे।”

कबीर ने मीरा की तरफ देखा।

डाकिये ने सिर हिलाया। “सावधान।”

कबीर आगे बढ़ा। “मामा अकेले हैं?”

बाहर से जवाब आया, “नहीं।”

कबीर ठिठक गया।

“किसके साथ?”

कुछ पल चुप्पी रही।

फिर शशांक त्रिपाठी की आवाज़ काँपी—

“उस लड़की के साथ… जिसे तुम लोग लाल रिबन वाली समझ रहे हो।”

मीरा का दिल रुक गया।

बाहर से एक और आवाज़ आई।

एक औरत की।

धीमी, थकी हुई, मगर भीतर कहीं घंटी जैसी साफ़।

“दरवाज़ा खोलो, नयना।”

मीरा पीछे हट गई।

किसी ने उसे इस नाम से पहली बार पुकारा था।

नयना।

और इस बार यह नाम धमकी नहीं लगा।

यह जैसे बहुत दूर से लौटती हुई कोई खोई हुई पुकार थी।

कबीर ने शटर थोड़ा उठाया।

बाहर एक दुबला, मध्यम उम्र का आदमी खड़ा था—सफेद बाल, आँखों पर मोटा चश्मा, कंधे पर पुराना कैमरा बैग। उसके पीछे एक औरत खड़ी थी। उम्र करीब पच्चीस-छब्बीस। चेहरे पर हल्का दुपट्टा। बाल खुले नहीं, कसकर बँधे हुए। उनकी कलाई पर लाल धागा बँधा था।

और उनके बालों में, जैसे किसी पुराने घाव की जिद, एक छोटा लाल रिबन लगा था।

मीरा ने उसे देखा।

वह औरत भी मीरा को देख रही थी।

दोनों के बीच दुकान की धूल, अठारह साल, दो चुराए हुए नाम और एक गलत उठाई गई बच्ची खड़ी थी।

औरत ने धीरे से कहा—

“मैं आर्या नहीं हूँ।”

उसने एक कदम अंदर रखा।

“मैं मीरा नाथ हूँ।”

मीरा की उँगलियाँ बैग पर कस गईं।

और उसी पल बाहर गली से सफेद स्कॉर्पियो की आवाज़ आई।

शशांक ने फुसफुसाकर कहा—

“अब सच सुनने का समय नहीं है। अब सच बचाने का समय है।”

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