Vinod 04 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 564 0 Hindi :: हिंदी
भाग 5: जिसका नाम चोरी हुआ मीरा को पहली बार अपने ही नाम से डर लगा। अब तक वह नाम उसका सहारा था—मीरा अवस्थी। वही नाम जिससे स्कूल की अटेंडेंस में उसे पुकारा गया था। वही नाम जिस पर कॉलेज की डिग्री छपी थी। वही नाम जिससे माँ उसे डाँटती थीं, कबीर उसे चिढ़ाता था और दुनिया उसे पहचानती थी। लेकिन उस अँधेरे स्टूडियो में, पुराने स्पीकर से आई एक बच्ची की काँपती आवाज़ ने उस नाम को उसके हाथ से छीन लिया था। “मेरा नाम नयना नहीं है…” फिर एक छोटी-सी साँस। “मेरा नाम मीरा है।” और फिर अरविंद अवस्थी की फुसफुसाहट— “रिकॉर्ड बंद करो। अर्चना आ रही है।” उसके बाद स्टूडियो में ऐसा सन्नाटा छा गया था जैसे किसी ने दुनिया की सारी आवाज़ें कपड़े में लपेटकर कहीं छिपा दी हों। लाल आपातकालीन बल्ब बुझ चुका था। ट्यूबलाइट फिर से झपक रही थी, लेकिन उसकी रोशनी में कुछ भरोसा नहीं था। वह हर दो सेकंड में मरती और फिर जी उठती, जैसे यह इमारत खुद तय नहीं कर पा रही थी कि उसे अतीत दिखाना है या छिपाना है। मीरा काँच पर दोनों हाथ टिकाए खड़ी थी। रिकॉर्डिंग रूम के अंदर कुर्सी पर रखा कागज़ अब भी वहीं था। **नयना को सच चाहिए तो पहले मीरा को मारना होगा।** कागज़ पर लाल अक्षर अँधेरे में भी चमकते हुए लग रहे थे। मीरा ने पढ़ा, फिर दोबारा पढ़ा, फिर तीसरी बार। पर शब्द बदलते नहीं थे। वे वहीं खड़े थे, जैसे किसी ने उसकी पूरी ज़िंदगी को एक छोटी-सी हिंसक पहेली में बदल दिया हो। कबीर उसके पीछे खड़ा था। उसके हाथ में सरिया थी, लेकिन उसकी पकड़ ढीली पड़ चुकी थी। “ये कागज़ पहले नहीं था,” उसने तीसरी बार कहा। डाकिया, जो दरवाज़े के पास खड़ा था, बिल्कुल चुप था। उसकी धुँधली आँख बंद थी, बची हुई आँख काँच के पार देख रही थी। उसके चेहरे पर डर नहीं था। उससे ज्यादा खतरनाक चीज़ थी—पहचान। मीरा मुड़ी। “आप जानते थे?” उसने पूछा। डाकिये ने जवाब नहीं दिया। “आप जानते थे कि देवव्रत की बेटी का नाम मीरा था?” कबीर चौंका। “क्या?” मीरा की आवाज़ धीमी थी, पर उसमें काँपती हुई धार थी। “आपके चेहरे पर लिखा है।” डाकिये ने बहुत धीरे आँखें खोलीं। “मैं सब नहीं जानता था।” “लेकिन यह जानते थे।” “हाँ।” यह छोटा-सा “हाँ” कमरे में गिरा और मीरा के भीतर फिर कुछ टूट गया। कबीर ने डाकिये की तरफ बढ़ते हुए कहा, “काका, अब पहेलियाँ बंद। सीधी बात। कौन मीरा? कौन नयना? यह सब क्या चल रहा है?” डाकिये ने छड़ी को जमीन पर टिकाया। उसकी आवाज़ थकी हुई थी, पर अब वह बचने की कोशिश नहीं कर रहा था। “देवव्रत नाथ की एक बेटी थी। नाम—मीरा नाथ। उम्र—लगभग तीन साल। उसकी माँ की मौत जल्दी हो गई थी। देवव्रत उसे अपने साथ पोस्टिंग पर रखता था। लोग कहते थे, उस आदमी में अगर कोई इंसानी हिस्सा बचा है तो वह उसकी बेटी है।” मीरा ने साँस रोकी। “फिर?” कबीर ने पूछा। “फिर बच्ची गायब हो गई।” “देवव्रत की अपनी बेटी?” “हाँ।” कबीर ने अविश्वास से हँसना चाहा, लेकिन आवाज़ नहीं निकली। “जिस आदमी पर बच्चों को गायब करने का शक था, उसकी अपनी बेटी गायब हो गई?” “यही सबसे बड़ा झूठ था,” डाकिये ने कहा। “और शायद सबसे बड़ा सच भी।” मीरा की आँखें काँच के पार रखे कागज़ पर चली गईं। “तो रिकॉर्डिंग में जो बच्ची बोल रही थी—वह देवव्रत की बेटी थी?” “शायद।” “शायद?” मीरा की आवाज़ अचानक ऊँची हो गई। “सब कुछ शायद? मेरा नाम शायद, मेरा पिता शायद, मेरी माँ शायद, मेरा बचपन शायद?” काँच की दीवार ने उसकी आवाज़ वापस उसके ही चेहरे पर फेंक दी। कबीर ने धीरे से उसका कंधा छुआ। “मीरा…” “मत बोल मेरा नाम,” मीरा ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा। कबीर का हाथ वहीं रुक गया। उसने पहली बार महसूस किया कि नाम सिर्फ शब्द नहीं होता। नाम वह जगह होता है जहाँ इंसान अपनी थकान रखता है। और अगर वह जगह भी किराये की निकले, तो आदमी बैठे कहाँ? डाकिया आगे बोला, “जिस रात अरविंद ने तुम्हें बचाया, उसी रात एक और बच्ची का रिकॉर्ड बदला गया था। पोस्ट ऑफिस के रजिस्टर में दो नाम थे—नयना और मीरा। दोनों के आगे मृत्यु का निशान लगना था। लेकिन अगले दिन रजिस्टर में सिर्फ एक नाम मृत दिखा। दूसरे नाम को किसी ने गायब कर दिया।” कबीर ने पूछा, “कौन-सा नाम?” डाकिया मीरा की तरफ देखता रहा। “मीरा,” उसने कहा। मीरा के कानों में फिर वही बच्ची की आवाज़ गूँजी—मेरा नाम मीरा है। “तो नयना मर गई?” मीरा ने पूछा। “कागज़ पर नहीं। कागज़ पर नयना जिंदा रही। मीरा गायब हो गई।” “और मैं?” डाकिये ने बहुत धीरे कहा, “अरविंद तुम्हें घर लाया। अर्चना ने तुम्हें गोद में लिया। तुम्हें नया नाम मिला—मीरा।” कबीर ने माथा पकड़ा। “रुको। मतलब जिस बच्ची का असली नाम शायद नयना था, उसे मीरा नाम दिया गया। और असली मीरा नाथ गायब हो गई?” “या बचाई गई,” डाकिये ने कहा। “किसने?” डाकिया चुप। मीरा ने काँच पर मुट्ठी मारी। “रिकॉर्डिंग रूम खोलना होगा।” कबीर ने तुरंत दरवाज़े की तरफ देखा। “लॉक अंदर से है।” “तोड़।” “काँच मोटा है।” “तोड़।” कबीर ने उसे देखा। वह समझ गया—यह आदेश नहीं था, विनती भी नहीं थी। यह उस लड़की की आखिरी बची हुई इच्छा थी जिसे अभी बताया गया था कि उसका नाम भी शायद उसका नहीं। कबीर ने सरिया उठाई और काँच के दरवाज़े के हैंडल पर मारी। धातु काँपी, लेकिन टूटी नहीं। उसने दूसरी बार पूरी ताकत से मारा। आवाज़ स्टूडियो में गूँज गई। तीसरी बार मारते ही लॉक के पास की लकड़ी फट गई। दरवाज़ा आधा खुला। कबीर ने धक्का दिया। दरवाज़ा चरमराया और खुल गया। रिकॉर्डिंग रूम में हवा बंद थी। फोम की दीवारों में सीलन की गंध थी। माइक्रोफोन अब भी स्टैंड पर लगा था, उसके ऊपर धूल जमी थी। कुर्सी पर रखा कागज़ हल्का-सा हिल रहा था, जबकि कमरे में हवा नहीं थी। मीरा ने कागज़ उठाया। लाल अक्षर सिर्फ ऊपर थे। नीचे पेंसिल से बहुत छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था। शायद जल्दबाज़ी में। शायद ऐसे कि काँच के बाहर से कोई पढ़ न सके। **पुराना पुल सच नहीं, चारा है। सिनेमा जाल है। माँ को बचाना है तो उस जगह जाओ जहाँ पहली बार तुम्हारी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी।** मीरा ने कागज़ कबीर को दिया। कबीर ने पढ़ा। “पहली बार तुम्हारी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी? मतलब तेरे घर का स्टडी रूम?” मीरा ने सिर हिलाया। “नहीं।” उसकी आँखें कमरे में घूमीं। पुराना माइक्रोफोन। काँच की दीवार। स्पीकर। टेप मशीन। “शायद यहीं,” उसने कहा। कबीर ने गहरी साँस ली। “तो हम अभी सही जगह पर हैं?” डाकिये ने सिर झुकाकर कहा, “अरविंद तुम्हें यहाँ एक बार लाया था। बहुत छोटी थीं तुम। वह कहता था—मेरी बेटी की आवाज़ दुनिया सुनेगी।” मीरा ने आँखें बंद कीं। कहीं बहुत अंदर से एक तस्वीर उभरी—रोशनी का छोटा-सा कमरा, सामने काला माइक्रोफोन, पापा की हँसी, और माँ का कहना—“बस करो अरविंद, बच्ची डर जाएगी।” क्या यह याद थी? या अभी-अभी बनाई हुई कल्पना? अब वह अपनी यादों पर भी भरोसा नहीं कर पा रही थी। कबीर कंसोल के पास गया। “रुको। अगर यहाँ पहली रिकॉर्डिंग हुई थी तो शायद आर्काइव में कुछ होगा। पुराने स्टेशन अक्सर प्रोग्राम लॉग रखते थे।” “लॉग?” मीरा ने पूछा। “कौन-सा कार्यक्रम कब रिकॉर्ड हुआ, किसने किया, टेप नंबर, नाम—सब।” डाकिये ने कहा, “रजिस्टर अलमारी में होगा। पहले डेस्क के नीचे रहता था।” कबीर ने कंट्रोल रूम की अलमारी खोली। अंदर पुरानी तारें, टूटा हेडफोन, कुछ रीलें और धूल से ढका एक मोटा रजिस्टर था। उसने रजिस्टर बाहर निकाला। धूल उड़ी। कवर पर लिखा था— **मझगवाँ लोकध्वनि केंद्र — रिकॉर्डिंग रजिस्टर 2005-2009** मीरा के हाथ अपने आप आगे बढ़े। उसने रजिस्टर खोला। पहले पन्ने पर कार्यक्रमों के नाम थे— “किसान सलाह”, “लोकगीत संध्या”, “स्वास्थ्य वार्ता”, “बच्चों की दुनिया”, “आपकी चिट्ठी, हमारी आवाज़।” कबीर ने पन्ने तेजी से पलटे। “जुलाई 2008 ढूँढ़।” मीरा ने उसकी उँगली रोक दी। “नहीं। उससे पहले।” “क्यों?” “अगर मेरी पहली आवाज़ यहाँ रिकॉर्ड हुई थी, तो वह 2008 से पहले होगी।” डाकिये ने चुपचाप कहा, “2003।” कबीर ने पन्ने पीछे पलटे। 2003 के पन्ने पीले और थोड़े फटे हुए थे। कई जगहों पर स्याही फैल गई थी। कुछ नाम काटे गए थे। फिर एक पन्ने पर कबीर की उँगली रुक गई। **तारीख: 17 अगस्त 2003** **कार्यक्रम: बच्चों की दुनिया — विशेष रिकॉर्डिंग** **बच्चे: स्थानीय विद्यालयों से** **अतिरिक्त आवाज़: मीरा / नयना — नाम पुष्टि बाकी** **रिकॉर्डिस्ट: शशांक त्रिपाठी** **उपस्थित: अरविंद अवस्थी, अर्चना अवस्थी, डी.एन.** कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया। “शशांक त्रिपाठी…” उसने धीरे से कहा। मीरा ने उसकी तरफ देखा। “कौन?” कबीर ने होंठ दबा लिए। “मेरे मामा।” कमरे में फिर नया सन्नाटा भर गया। “तुम्हारे मामा यहाँ रिकॉर्डिस्ट थे?” मीरा ने पूछा। “हाँ, लेकिन…” कबीर की आवाज़ बिखर गई। “उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि वे अरविंद अंकल को जानते थे। न डी.एन. को।” डाकिये ने कबीर को गौर से देखा। “तुम शशांक के भांजे हो?” कबीर ने कठोर स्वर में कहा, “हाँ। और अगर आप अभी बोलने वाले हैं कि मेरे मामा भी इसमें थे, तो पहले सबूत निकालिए।” डाकिया बोला नहीं। उसकी चुप्पी ही जवाब जैसी थी। कबीर ने रजिस्टर बंद कर दिया। “नहीं। ऐसा नहीं हो सकता।” मीरा ने धीरे से कहा, “कबीर…” “नहीं,” वह झल्ला उठा। “हर आदमी गद्दार नहीं निकल सकता। कहानी में भी लिमिट होती है।” “जिंदगी कहानी से ज्यादा बेरहम होती है,” डाकिये ने कहा। कबीर ने उसे घूरा। “आपको तो बोलना ही नहीं चाहिए। आप इतने झूठ छिपाकर बैठे थे कि अगर झूठों पर टैक्स लगे तो पूरा मझगवाँ आपके नाम गिरवी हो जाए।” डाकिये ने सिर झुका लिया। “ठीक कहते हो।” मीरा ने रजिस्टर फिर खोला। उसकी उँगली उस लाइन पर अटक गई— **मीरा / नयना — नाम पुष्टि बाकी** नाम पुष्टि बाकी। जैसे वह कोई बच्ची नहीं, खोया हुआ पार्सल थी। कबीर ने खुद को संभालते हुए कहा, “मेरे मामा का घर पास में है। वो अभी शहर से बाहर हैं, लेकिन घर में उनके पुराने बैकअप होंगे। अगर उन्होंने रिकॉर्डिंग की थी, तो शायद कॉपी रखी हो।” “हमें जाना होगा,” मीरा ने कहा। “अभी नहीं,” डाकिये ने तुरंत कहा। “देवव्रत को भी पता होगा कि शशांक के पास क्या था। उसका घर निगरानी में हो सकता है।” कबीर ने कटाक्ष किया, “तो क्या करें? यहीं बैठकर अगली भूतिया आवाज़ का इंतज़ार करें?” उसी समय कंसोल का एक पुराना फोन बजा। तीनों जम गए। फोन काला था, भारी, सरकारी दफ्तरों वाला। वह शायद वर्षों से इस्तेमाल नहीं हुआ था। फिर भी उसकी घंटी बहुत साफ़ थी। ट्रिंग। ट्रिंग। कबीर ने धीरे से कहा, “मुझे पुराने फोन से नफरत होने लगी है।” मीरा ने रिसीवर उठाया। इस बार उसने कुछ नहीं कहा। पहले सिर्फ साँस सुनाई दी। फिर एक औरत की दबाई हुई आवाज़ आई— “मीरा?” माँ। मीरा की आँखें तुरंत भर आईं। “माँ! आप कहाँ हैं?” “बोलना मत। बस सुन।” माँ की आवाज़ में दर्द था। जैसे होंठ कटे हों। जैसे हर शब्द कहीं से बचकर निकल रहा हो। “माँ, उन्होंने आपको—” “सुन!” अर्चना की आवाज़ पहली बार माँ नहीं, आदेश थी। “तेरा नाम चाहे जो हो, तू मेरी बेटी है। यह बात पहले समझ ले। बाकी सच बाद में।” मीरा के आँसू गाल पर उतर आए। वह बोलना चाहती थी, पर माँ ने कहा था सुन। और आज पहली बार उसे लगा कि शायद सुनना बोलने से ज्यादा मुश्किल है। अर्चना आगे बोलीं, “जो लोग तुझे नामों में उलझा रहे हैं, वे चाहते हैं कि तू अपने लोगों से कट जाए। नयना, मीरा, क्यू-19—ये सब उनके कागज़ के नाम हैं। मेरे लिए तू वही बच्ची है जो रात भर बुखार में मेरा आँचल पकड़कर सोती थी।” “माँ…” मीरा से रहा नहीं गया। लाइन में हल्की खड़खड़ाहट आई। शायद किसी ने फोन खींचने की कोशिश की। माँ जल्दी-जल्दी बोलने लगीं— “ध्यान से सुन। शशांक को ढूँढ़ना। वह डरपोक है, पर बुरा नहीं। उसने आवाज़ें नहीं बनाईं, सिर्फ रिकॉर्ड कीं। असली मशीन उसके पास थी। देवव्रत उसी मशीन से आवाज़ें बदलता था।” कबीर ने मीरा की तरफ देखा। उसके चेहरे पर राहत और डर साथ-साथ थे। माँ ने कहा, “और डाकिये पर आधा भरोसा करना।” डाकिये ने सिर झुका लिया, जैसे यह बात उसने सुन ली हो। “आधा क्यों?” मीरा ने पूछा। माँ की आवाज़ टूटने लगी। “क्योंकि उसने तेरे पिता को बचाया भी था… और खोया भी वही था।” “पापा जिंदा हैं?” मीरा ने बहुत धीरे पूछा। लाइन के उस पार कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर माँ ने कहा, “मुझे नहीं पता।” यह “नहीं पता” झूठ जैसा नहीं लगा। यह अठारह साल की थकान जैसा लगा। अचानक फोन पर किसी पुरुष की आवाज़ आई, दूर से—“बस। बहुत हो गया।” माँ ने तेजी से कहा, “लाल रिबन वाली बच्ची को ढूँढ़ना!” फिर थप्पड़ जैसी आवाज़ आई। मीरा चीखी, “माँ!” लाइन कट गई। मीरा ने रिसीवर पकड़े रखा। उसकी उँगलियाँ सफेद हो गई थीं। कबीर ने धीरे से रिसीवर उसके हाथ से लिया और रखा। “लाल रिबन वाली बच्ची।” मीरा की आँखें रजिस्टर पर गईं। “रिकॉर्डिंग में दो बच्चियाँ हो सकती हैं।” “एक नयना। एक मीरा नाथ।” “या एक मैं। एक देवव्रत की बेटी।” कबीर ने अपने मामा का नाम फिर देखा। “शशांक के पास जवाब होगा।” डाकिया बोला, “शशांक जवाब से ज्यादा डर रखता है। और डर आदमी को सच बोलने से पहले भागना सिखाता है।” “तो पकड़ लेंगे,” कबीर ने कहा। उसकी आवाज़ में पहली बार निजी चोट थी। “मामा हों या मंत्री, आज सबकी फैमिली डिस्काउंट बंद।” मीरा को हल्की-सी हँसी आ सकती थी, लेकिन गले में अटक गई। तभी रिकॉर्डिंग रूम के माइक्रोफोन पर लाल बत्ती जल उठी। छोटी-सी। गोल। खून जैसी। कबीर ने तुरंत कंसोल की तरफ देखा। “यह किसने ऑन किया?” कंसोल पर “ON AIR” का पीला बल्ब टिमटिमा रहा था। डाकिये की आँख फैल गई। “रेडियो प्रसारण चालू हो गया।” “क्या?” मीरा ने पूछा। कबीर ने तेजी से स्विच देखने शुरू किए। “यह सिस्टम बंद था। ट्रांसमीटर जुड़ा कैसे?” बाहर, दूर कहीं से हल्की आवाज़ आई। पहले लगा कोई लाउडस्पीकर है। फिर शब्द साफ़ हुए। वही बच्ची की आवाज़। “मेरा नाम नयना नहीं है…” कबीर खिड़की की तरफ भागा। बाहर कॉलेज के मैदान के पार एक पुराना पोल था जिस पर जंग लगा स्पीकर टँगा था। शायद कभी लोकध्वनि केंद्र के प्रसारण के लिए इस्तेमाल होता था। उससे आवाज़ आ रही थी। “मेरा नाम मीरा है…” कस्बे के दो-तीन लोग सड़क पर रुक गए थे। एक साइकिल वाला ऊपर देखने लगा। एक चायवाला दुकान से बाहर आया। दूर हॉस्टल की खिड़की खुली। कबीर ने घबराकर कहा, “यह आवाज़ बाहर जा रही है।” मीरा का दिल धड़क उठा। “बंद करो!” कबीर ने कंसोल के स्विच दबाए। कुछ नहीं हुआ। उसने मेन पावर बंद की। ट्यूबलाइट बुझ गई। फिर भी बाहर स्पीकर से आवाज़ आती रही। इस बार अरविंद अवस्थी की आवाज़— “रिकॉर्ड बंद करो। अर्चना आ रही है।” फिर वही बच्ची— “मेरा नाम मीरा है।” फिर स्टैटिक। फिर कोई नई आवाज़। एक आदमी की। बहुत युवा। बहुत डरी हुई। “सर, बच्ची देवव्रत साहब की है। इसे सूची में डालना ठीक नहीं होगा।” दूसरी भारी आवाज़ गरजी— “यही तो सबसे ठीक होगा। जो आदमी अपनी बेटी को नहीं बचा सका, वह दुनिया को क्या बचाएगा? और अगर देवव्रत हमारे साथ रहना चाहता है, तो पहले उसे अपना दुख निगलना होगा।” मीरा, कबीर और डाकिया तीनों सन्न रह गए। यह आवाज़ देवव्रत की नहीं थी। यह किसी और की थी। किसी ऐसे आदमी की जो देवव्रत से भी ऊपर था। बाहर स्पीकर से आवाज़ पूरे मैदान में फैल रही थी। “बच्ची का नाम बदलो। रिकॉर्ड में नयना डालो। असली नयना को…” फिर स्टैटिक। आवाज़ कट गई। कबीर ने कंसोल पर मुट्ठी मारी। “आगे क्यों नहीं?” डाकिया दीवार पकड़कर खड़ा था। “यह आवाज़… यह तो…” मीरा ने उसकी तरफ देखा। “किसकी?” डाकिया का चेहरा राख जैसा हो गया। “यह राघवेंद्र सिंह की आवाज़ नहीं है,” उसने कहा। “तो किसकी है?” डाकिया ने होंठ खोले, पर शब्द नहीं निकले। तभी बाहर मैदान में अचानक अफरा-तफरी हुई। दूर से एक सफेद स्कॉर्पियो गेट तोड़ती हुई अंदर आई। उसके पीछे दो बाइक। लोगों ने भागना शुरू कर दिया। चायवाले ने अपना स्टोव छोड़ दिया। साइकिल वाला साइकिल समेत गिरते-गिरते बचा। कबीर ने खिड़की से झाँका। “वे आ गए।” मीरा ने बैग उठाया। “पीछे का रास्ता?” डाकिया अब भी सदमे में था। कबीर ने उसे झकझोरा। “काका! पीछे का रास्ता?” डाकिया जैसे नींद से जागा। “रिकॉर्डिंग रूम के पीछे स्टोर है। वहाँ से छत। छत से कॉलेज की पुरानी लाइब्रेरी।” तीनों दौड़े। पीछे से दरवाज़े पर तेज़ चोट पड़ी। कोई चिल्लाया—“अंदर कौन है? प्रसारण बंद करो!” कबीर ने जाते-जाते रजिस्टर उठा लिया। मीरा ने कैसेट 2 और कागज़ बैग में ठूँस दिए। डाकिये ने माइक्रोफोन की तरफ एक आखिरी नज़र डाली। स्पीकर अब भी स्टैटिक उगल रहे थे। स्टोर रूम में अँधेरा था। पुराने पोस्टर, टूटे स्पीकर, तारों के गुच्छे और एक जंग लगी लोहे की सीढ़ी छत तक जाती थी। कबीर पहले चढ़ा, फिर मीरा, फिर डाकिया। ऊपर छत का ढक्कन अटका हुआ था। कबीर ने कंधे से धक्का दिया। ढक्कन खुला और तेज़ धूप भीतर गिर पड़ी। वे छत पर निकले। नीचे मुख्य दरवाज़ा टूटने की आवाज़ आई। “जल्दी,” कबीर ने कहा। छत से बगल वाली इमारत की छत पाँच फीट दूर थी। बीच में खाली जगह। नीचे कंक्रीट का फर्श। कबीर ने छलाँग लगाई। वह दूसरी तरफ गिरा, घुटना छिला, पर उठ गया। “आओ।” मीरा पीछे हटी। ऊँचाई ज्यादा नहीं थी, पर पैर जैसे जमीन से चिपक गए। पीछे सीढ़ी पर जूतों की आवाज़ आ रही थी। कबीर ने हाथ बढ़ाया। “देख मेरी तरफ। नीचे मत देख।” मीरा ने छलाँग लगाई। एक पल के लिए वह हवा में थी। उसे लगा—यही है उसकी जिंदगी। न जमीन उसकी, न नाम उसका, न अतीत उसका। बस बीच की हवा, जिसमें गिरने से पहले हाथ पकड़ना जरूरी है। कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया। दोनों धड़ाम से छत पर गिरे। डाकिया पीछे आया। बूढ़ा शरीर, काँपते पैर, लेकिन आँखों में एक अजीब जिद। उसने छड़ी फेंकी, फिर छलाँग लगाई। उसका पैर किनारे पर फिसला। मीरा और कबीर ने मिलकर उसका हाथ पकड़ा और उसे ऊपर खींच लिया। उसी पल पीछे वाली छत पर दो आदमी पहुँचे। “रुको!” कबीर ने डाकिये की छड़ी उठाई और कहा, “काका, आपकी एंट्री बहुत फिल्मी थी, लेकिन अब भागिए।” वे लाइब्रेरी की तरफ भागे। छतों के बीच पुराने सीमेंट के रास्ते थे। नीचे कॉलेज बंद पड़ा था। दीवारों पर छात्रसंघ चुनाव के पुराने नारे उखड़ रहे थे। एक जगह से नीचे उतरने की सीढ़ी मिली। वे भागते हुए नीचे आए और लाइब्रेरी के धूल भरे हॉल में छिप गए। लाइब्रेरी में पुराने रैक, दीमक लगी किताबें और टूटी खिड़कियाँ थीं। बाहर से पीछा करने वालों की आवाज़ें दूर थीं, पर खत्म नहीं हुई थीं। मीरा एक रैक के पीछे बैठ गई। उसकी साँस फूल रही थी। बैग उसके सीने से चिपका था। कबीर ने रजिस्टर खोला और जल्दी-जल्दी पन्ने देखने लगा। “लाल रिबन,” वह बड़बड़ाया। “कहीं तो होगा…” मीरा ने आँखें बंद कीं। माँ की आवाज़ गूँजी—लाल रिबन वाली बच्ची को ढूँढ़ना। लाल रिबन। उसके बचपन के एल्बम में वह कभी लाल रिबन नहीं पहनती थी। माँ हमेशा नीला क्लिप लगाती थीं। कहती थीं—“लाल रंग तुझ पर बहुत चुभता है।” क्यों? कबीर ने अचानक कहा, “मिल गया।” मीरा ने आँखें खोलीं। रजिस्टर के बीच एक फोटो दबा था। शायद किसी पन्ने में फँसकर बच गया था। फोटो पुरानी थी, किनारे से जली हुई। उसमें रेडियो स्टेशन का वही रिकॉर्डिंग रूम था। माइक्रोफोन के सामने दो छोटी बच्चियाँ खड़ी थीं। एक बच्ची ने नीली फ्रॉक पहनी थी। बालों में नीला क्लिप। दूसरी बच्ची ने सफेद फ्रॉक पहनी थी। बालों में लाल रिबन। दोनों के चेहरे धुंधले थे, पर एक बात साफ़ थी— दोनों लगभग एक जैसी दिखती थीं। मीरा ने फोटो काँपते हाथों से ली। फोटो के पीछे पेंसिल से लिखा था— **मीरा नाथ और नयना — टेस्ट रिकॉर्डिंग, 17 अगस्त 2003** **सिर्फ एक को बचाना संभव होगा।** नीचे अरविंद की लिखावट में एक और लाइन थी— **अर्चना ने गलत बच्ची उठा ली।** मीरा की साँस रुक गई। कबीर ने धीरे से कहा, “गलत बच्ची?” डाकिया, जो अभी तक दरवाज़े की ओर देख रहा था, धीरे-धीरे मुड़ा। उसकी आँखों में अब छिपाने की कोई जगह नहीं बची थी। मीरा ने फोटो उसकी तरफ बढ़ाई। “कौन-सी मैं हूँ?” डाकिया ने फोटो नहीं ली। बस देखा। बहुत देर तक। फिर उसने काँपती आवाज़ में कहा— “यही तो अरविंद आखिरी साँस तक जानना चाहता था।” बाहर से कदमों की आवाज़ लाइब्रेरी के पास आ रही थी। मीरा ने फोटो सीने से लगा ली। अब सवाल यह नहीं था कि वह नयना है या मीरा। सवाल यह था— जिस बच्ची को बचाने के लिए उसके पिता ने सब कुछ खोया, क्या वह सचमुच वही बच्ची थी?