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आवाज़ नंबर 19 (भाग:4) This post in Under Review

Vinod 04 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 516 0 Hindi :: हिंदी

भाग 4: घेराबंदी

“तुम शांत कुआँ से निकली हुई इकलौती बची हुई बच्ची हो।”

डाकिये के ये शब्द कमरे में नहीं गिरे, मीरा के भीतर गिरे।

और भीतर जो कुछ भी अब तक बचा था—पिता की याद, माँ पर भरोसा, अपने नाम की जमीन, बचपन की तस्वीरें—सब जैसे एक साथ दरक गया।

बाहर पुलिस की गाड़ियों के ब्रेक चीख रहे थे। घर की टूटी खिड़कियों से लाल-नीली बत्तियों की चमक भीतर आ रही थी। धूल भरे कमरे की दीवारें हर चमक पर अलग रंग ले रही थीं—कभी लाल, कभी नीली, कभी वैसी सफेद जैसी अस्पताल के कॉरिडोर में होती है, जहाँ लोग सच सुनने से पहले ही बूढ़े हो जाते हैं।

लाउडस्पीकर पर आवाज़ फिर आई—

“मीरा अवस्थी, घर से बाहर आ जाइए। आपके खिलाफ सरकारी जाँच में बाधा डालने, चोरी और हिंसक गतिविधि का संदेह है। बाहर आ जाइए।”

कबीर ने धीरे से कहा, “वाह। आधे घंटे में तू पीड़ित से अपराधी बन गई। सिस्टम की स्पीड देख।”

मीरा ने उसकी बात सुनी, पर जवाब नहीं दिया। उसकी आँखें डाकिये पर थीं।

“मैं अरविंद अवस्थी की बेटी नहीं हूँ?” उसकी आवाज़ फुसफुसाहट से भी हल्की थी।

डाकिये ने जवाब देने से पहले बाहर देखा। “बिटिया, अभी—”

“नहीं।” मीरा ने नीला पन्ना मुट्ठी में कस लिया। “अभी। इसी वक्त। वरना मैं बाहर जाकर सबको दे दूँगी—कैसेट, डायरी, पन्ना, सब।”

कबीर ने तुरंत उसकी तरफ देखा। “अरे पागल—”

मीरा ने उसे हाथ से रोक दिया। उसकी आँखें डाकिये से हट नहीं रही थीं।

डाकिये का चेहरा कठोर हो गया। वह कुछ पल चुप रहा। फिर उसने छड़ी पर झुके-झुके कहा, “रिश्ते खून से नहीं, जोखिम से बनते हैं। अरविंद ने तुम्हें अपनी जान पर खेलकर बचाया था। जिसने बच्चे को मौत की सूची से निकालकर अपनी गोद में लिया, वही बाप होता है।”

“लेकिन सच?”

“सच ये है कि 2003 में मझगवाँ और आसपास के सात गाँवों से कुछ बच्चे गायब हुए। कोई बोला—मामा के यहाँ गए। कोई बोला—शहर में काम पर। कोई बोला—बुखार से मर गए। कागज़ पर सबका हिसाब बना दिया गया। लेकिन असल में…”

वह रुका।

बाहर से दरवाज़े पर किसी ने लात मारी। टूटी हुई चौखट काँपी।

“दरवाज़ा खोलो!”

कबीर ने सरिया उठा ली। “हमारे पास कितना टाइम है?”

डाकिये ने कहा, “दो मिनट भी नहीं।”

मीरा ने डाकिये की बाँह पकड़ ली। “असल में क्या?”

डाकिये की बची हुई आँख में अठारह साल पुराने अंधेरे की परछाईं उतर आई।

“असल में उन बच्चों को नए नामों से बेच दिया गया। कुछ को शहरों में। कुछ को बॉर्डर के पार। कुछ को उन लोगों ने अपने ‘प्रोजेक्ट’ में रख लिया—जहाँ बच्चों को कागज़ पर मारकर, फिर दूसरे नाम से जिंदा कर दिया जाता था।”

कबीर का गला सूख गया। “ये मानव तस्करी थी?”

“उससे भी गंदा,” डाकिये ने कहा। “तस्कर बच्चे बेचता है। ये लोग पहचान बेचते थे। बच्चा किसका है, कहाँ जन्मा, कब मरा, कब जिंदा हुआ—सब कागज़ से तय करते थे। सरकारी मुहर से। पुलिस की रिपोर्ट से। पोस्ट ऑफिस के रिकॉर्ड से। स्कूल के प्रमाणपत्र से। अस्पताल के कागज़ से।”

मीरा का सिर घूमने लगा। “तो मैं?”

“तुम्हें एक कुएँ के पास पाया गया था। सचमुच के कुएँ के पास। तुम तब शायद दो साल की थीं। नाम नहीं बता पाती थीं। बस एक शब्द बोलती थीं—‘मी…मी…’ अरविंद ने तुम्हारा नाम मीरा रखा।”

मीरा ने दीवार पकड़ ली।

उसे बचपन में माँ की कही एक बात याद आई—“तू बहुत रोती थी जब आई थी।”

जब आई थी?

माँ अक्सर कहती थीं—“जब तू आई थी तब घर में जैसे दीया जल गया था।” मीरा ने हमेशा समझा था, जन्म की बात है। शायद हर माँ ऐसे ही बोलती है।

पर “आई थी” सचमुच आई थी।

कहीं से।

किसी अंधेरे से।

किसी सूची से।

बाहर फिर लाउडस्पीकर गूँजा—

“आखिरी चेतावनी। दरवाज़ा न खोलने पर बल प्रयोग किया जाएगा।”

कबीर खिड़की की दरार से बाहर झाँक रहा था। “कम से कम छह लोग हैं। दो पुलिस की वर्दी में। बाकी सिविल कपड़ों में। एक सफेद स्कॉर्पियो भी है। नंबर प्लेट पर कीचड़ लगा है।”

डाकिया एकदम सतर्क हो गया। “स्कॉर्पियो?”

“हाँ।”

“उसमें देवव्रत नाथ हो सकता है।”

मीरा ने नाम दोहराया—“देवव्रत नाथ।”

नीले पन्ने वाला नाम। डी.एन.। तब जिला पुलिस अधीक्षक। अब शायद कोई और बड़ा आदमी। या पद से बाहर होकर भी पद से बड़ा।

मीरा ने धीमे स्वर में पूछा, “वही जिसने पापा की आवाज़ छीन ली?”

डाकिये ने उसकी तरफ देखा। “उसके पास आवाज़ों का पूरा कोठार था। लोगों के बयान, धमकियाँ, चीखें, कबूलनामे। वह आवाज़ों से आदमी बनाता भी था, मिटाता भी था।”

कबीर ने चिढ़कर कहा, “ये आदमी पुलिस अफसर था या रावण?”

“रावण विद्वान था,” डाकिये ने सूखे स्वर में कहा। “ये सिर्फ चालाक था।”

बाहर तीसरी बार दरवाज़े पर जोरदार चोट पड़ी। इस बार लकड़ी फट गई।

“पीछे से रास्ता है?” कबीर ने पूछा।

डाकिये ने सिर हिलाया। “है, पर वह रास्ता अब सिर्फ नाम का है। पुराने नाले तक जाता है। बहुत संकरा। पुलिस को पता नहीं होगा, पर अगर रेनकोट वाले ने बताया हो तो…”

“रेनकोट वाला गायब है,” कबीर बोला।

डाकिये की आँखें सिकुड़ गईं। “वह गायब नहीं होता। वह गायब कर दिया जाता है। फर्क समझो।”

मीरा ने बैग उठाया। डायरी, कैसेट 1, कैसेट 2, नीला पन्ना, लिफाफा—सब उसमें डाला। फिर उसने टूटे लॉकेट की चेन जेब में रखी।

“माँ उनके पास है,” उसने कहा। “मैं भाग नहीं सकती।”

डाकिये ने आगे बढ़कर उसका रास्ता रोका। “भागना और बचना अलग बात है। अभी बाहर गई तो माँ भी नहीं बचेगी, तुम भी नहीं।”

“तो क्या करूँ? यहाँ छिपकर सुनती रहूँ कि वे माँ को मार दें?”

“वे तुरंत नहीं मारेंगे।” डाकिये की आवाज़ में अजीब-सी निश्चितता थी।

“आपको कैसे पता?”

“क्योंकि उन्हें तुम चाहिए। और तुमसे पहले उन्हें यह जानना है कि आवाज़ 19 किसने भेजी।”

कबीर ने कहा, “वही बात फोन वाले आदमी ने भी कही थी।”

“क्योंकि यह बात सच है।” डाकिया धीरे से बोला। “आवाज़ 19 उन सबके लिए खतरा है। उसमें कुछ ऐसा है जो आवाज़ 1 से 18 में नहीं।”

“क्या?” मीरा ने पूछा।

डाकिये ने पल भर आँखें झुका लीं। “मैंने आवाज़ 19 कभी नहीं सुनी।”

“झूठ।”

“सच। मेरे पास 1 से 18 तक अलग-अलग समय पर आईं। 19 अरविंद ने खुद रखी थी। कहा था—यह सिर्फ मीरा के लिए है। अगर वह जिंदा रही, तो एक दिन उसे पता चलेगा कि वह कौन है।”

मीरा को लगा, उसके सीने में कोई पुरानी गाँठ खुल रही है और हर धागे से दर्द टपक रहा है।

बाहर दरवाज़ा टूट गया।

पहली लकड़ी की पट्टी अंदर गिरी।

“अब भावुकता बाद में,” कबीर बोला। “निकास?”

डाकिये ने माँ वाले कमरे की तरफ इशारा किया। “खाट हटाओ। नीचे फर्श में पटिया है।”

तीनों तेजी से उस कमरे में पहुँचे। वहाँ पुरानी लकड़ी की खाट दीवार से टिकाकर रखी थी। कबीर ने खाट खींची। नीचे फर्श पर धूल जमा थी, पर बीच में एक चौकोर पत्थर थोड़ा अलग रंग का था। डाकिये ने छड़ी की नोक से किनारा खुरचा।

बाहर से भारी जूतों की आवाज़ आई।

“अंदर जाओ!” किसी ने चिल्लाया।

कबीर और डाकिया मिलकर पत्थर उठाने लगे। पत्थर भारी था। मीरा ने भी हाथ लगाया। उसकी हथेली पर सूखी मिट्टी और खुरचे हुए घाव का खून मिल गया।

पत्थर उठा।

नीचे अँधेरा था।

एक संकरा गड्ढा। उसमें सीढ़ियाँ नहीं थीं, सिर्फ ईंटों की उभरी पकड़ें थीं। नीचे से सीलन और बदबू आ रही थी।

कबीर पीछे हट गया। “ये रास्ता है या कब्र?”

“अभी दोनों काम करेगा,” डाकिये ने कहा। “चलो।”

बाहर कमरे में पुलिस घुस चुकी थी। किसी ने चिल्लाया—“इधर! आवाज़ आई थी।”

मीरा नीचे उतरने लगी। ईंटें गीली थीं। पैर फिसल रहा था। कबीर ऊपर खड़ा बैग पकड़े रहा, फिर उसे नीचे दिया। डाकिया सबसे आखिर में उतरा। उसने ऊपर से पत्थर खींचकर आधा बंद कर दिया। पूरी तरह बंद करता तो शायद वे अँधेरे में घुट जाते।

ऊपर से कदमों की आवाज़ कमरे में आई।

किसी ने कहा, “यहाँ कोई था। खाट हिली हुई है।”

दूसरी आवाज़ आई, “फर्श देखो।”

मीरा ने साँस रोक ली।

उसके चेहरे से कुछ इंच ऊपर पत्थर की दरार थी। उस दरार से धूल उसके बालों पर गिर रही थी।

कबीर उसके ठीक पीछे था। उसका हाथ दीवार पर था। डाकिया नीचे साँस रोके खड़ा था।

ऊपर किसी ने खाट को लात मारी। लकड़ी घसीटी गई।

“कुछ नहीं है,” एक आदमी बोला।

“फर्श थपथपाओ।”

मीरा का दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा ऊपर वाले सुन लेंगे।

तभी घर के बाहर से एक भारी, गहरी आवाज़ आई—

“रुको।”

सारी आवाज़ें थम गईं।

मीरा ने उस आवाज़ को पहली बार सुना था, फिर भी उसके भीतर कहीं वह आवाज़ पहचानी-सी लगी। शायद रिकॉर्डिंग की भारी आवाज़? वही जिसने कहा था—“हम सरकार बचाते हैं, कुर्सी बचाते हैं, चुनाव बचाते हैं।”

ऊपर वाले कमरे में सन्नाटा हो गया।

किसी ने आदर से कहा, “सर।”

सर।

साहब।

डी.एन.

मीरा की उँगलियाँ दीवार में धँस गईं।

वह आदमी धीरे-धीरे कमरे में आया। उसके जूतों की आवाज़ नापी हुई थी। उम्र ने शायद उसके कदम धीमे कर दिए थे, पर अधिकार अभी भी हर कदम से टपक रहा था।

उसने कहा, “बच्ची को डराओ मत। वह यहीं है।”

कबीर ने मीरा की तरफ देखा। उसकी आँखों में साफ़ लिखा था—ये आदमी पागल है या बहुत होशियार।

ऊपर आदमी ने फिर कहा, “मीरा अवस्थी… या जो भी तुम्हारा असली नाम था… बाहर आ जाओ। तुम्हारी माँ को मैंने अभी तक सिर्फ इसलिए जिंदा रखा है क्योंकि तुम समझदार लगती हो।”

मीरा की साँस अटक गई।

डाकिये ने नीचे बहुत धीरे से सिर हिलाया—नहीं।

ऊपर आदमी हँसा नहीं, पर उसके स्वर में मुस्कान थी।

“तुम सोच रही हो मैं कौन हूँ। नाम सुना होगा—देवव्रत नाथ। तुम्हारे पिता की डायरी में होगा। नीले पन्ने में भी। तुम्हारे पिता बहुत सावधान आदमी थे, लेकिन भावुक थे। भावुक लोग हमेशा कोई न कोई निशानी छोड़ देते हैं।”

मीरा ने अपने बैग को सीने से चिपका लिया।

देवव्रत नाथ आगे बोला, “अरविंद अवस्थी को मैंने बहुत समझाया था। पत्रकार थे, पत्रकारिता करते। सड़क का गड्ढा, राशन की चोरी, स्कूल की छत—इन सब पर लिखते। लेकिन नहीं। उन्हें बच्चों की चिंता हो गई। बच्चों की चिंता करने वाले लोग राजनीति नहीं समझते।”

कबीर के चेहरे पर घृणा थी।

ऊपर देवव्रत नाथ ने धीरे से चलते हुए कहा, “तुम्हारे साथ भी एक समस्या है, मीरा। तुम कहानी बनाती हो। आवाज़ों को जोड़ती हो। लोगों को सुनाती हो। और यह नई दुनिया पुरानी दुनिया से ज्यादा खतरनाक है। हमारे समय में अखबार जलाना पड़ता था। अब एक फाइल लाखों फोन में पहुँच जाती है।”

वह रुका।

शायद उसने वही टेप रिकॉर्डर देखा होगा।

“आवाज़ 1 तुमने सुन ली,” उसने कहा। “अच्छा है। शुरुआत जान गई। लेकिन कहानी की शुरुआत हमेशा सच नहीं होती। आदमी अपनी पहली रिकॉर्डिंग में खुद को नायक बनाता है। आखिरी में टूटता है। आवाज़ 18 में तुम्हारे पिता टूट गए थे।”

डाकिये की जबड़ा कस गया।

मीरा ने पहली बार उसके चेहरे पर अपराधबोध देखा।

ऊपर देवव्रत नाथ ने कहा, “आवाज़ 19 किसने भेजी, यह मुझे भी नहीं पता। और यही मुझे परेशान कर रहा है। अरविंद मर गया। डाकिया बूढ़ा हो गया। अर्चना चुप रही। राघवेंद्र सिंह राजनीति में गया और फिर बीमारी से आधा आदमी बचा। पर आवाज़ 19 बाहर आई। किसने निकाली?”

उसने अचानक आवाज़ ऊँची की—

“कौन है तुम्हारे साथ, मीरा?”

पत्थर के नीचे खड़ी मीरा को लगा वह आदमी सीधे उसी की आँखों में देख रहा है।

एक पुलिसवाला बोला, “सर, पीछे का रास्ता चेक कर लें?”

देवव्रत नाथ ने जवाब नहीं दिया। फिर धीमे से बोला, “नहीं। अभी नहीं। उसे जाने दो।”

तीनों नीचे एक साथ चौंके।

देवव्रत नाथ बोला, “भागेगी तो वहीं जाएगी जहाँ हमें जाना है। पुराने सिनेमा में नहीं आएगी। वह समझदार है। माँ को बचाने के लिए पहले खुद को बचाएगी। और जब बेटी माँ को बचाने निकलेगी, तब माँ बोलती है। अर्चना बहुत साल से चुप है। अब उसका बोलना जरूरी है।”

उसके कदम कमरे से बाहर चले गए।

फिर लाउडस्पीकर पर आवाज़ आई—“घर खाली मिला। आसपास तलाशी लो।”

कुछ ही पलों बाद बाहर की हलचल दूर होने लगी। गाड़ियों के इंजन स्टार्ट हुए। एक-एक करके आवाज़ें पीछे हट गईं।

पर कोई भी नीचे हिला नहीं।

कबीर ने फुसफुसाकर कहा, “वह हमें छोड़कर गया?”

डाकिये ने कहा, “शिकार को भागने देना भी शिकारी का तरीका है।”

मीरा ने दाँत भींचे। “तो हम शिकार नहीं बनेंगे।”

कुछ देर बाद डाकिये ने पत्थर को थोड़ा और खिसकाया। ऊपर की हल्की रोशनी भीतर उतरी। उसने कान लगाकर सुना। फिर बोला, “चलो। अभी नहीं निकले तो नाले में पानी भर जाएगा।”

वे नीचे सुरंग जैसे रास्ते में बढ़े। रास्ता इतना संकरा था कि सीधा चलना मुश्किल था। ईंटों की दीवारों पर काई लगी थी। ऊपर कहीं-कहीं से पानी टपक रहा था। हर बूँद अँधेरे में बड़ी सुनाई देती थी। मीरा आगे थी, हाथ में कबीर का फोन जिसकी टॉर्च झिलमिला रही थी। उसके पीछे कबीर, और सबसे पीछे डाकिया।

“यह रास्ता कब बना?” कबीर ने धीरे से पूछा।

डाकिये ने कहा, “अंग्रेजों के जमाने का नाला था। बाद में लोगों ने बंद कर दिया। अरविंद ने इसे साफ़ कराया था।”

“क्यों?”

“उसे हमेशा भागने के रास्ते चाहिए होते थे। पत्रकार का घर था।”

मीरा को पापा की डायरी वाली लाइन याद आई—अगर मीरा कभी लौटे।

क्या पापा सच में जानते थे कि एक दिन वह इस घर में लौटेगी? क्या उन्होंने हर चीज़ पहले से रख छोड़ी थी? या वे बस डर के कारण संभावनाओं की दीवारें बना रहे थे?

सुरंग में चलते हुए मीरा ने पूछा, “मेरा असली नाम पता है आपको?”

डाकिया चुप रहा।

“बोलिए।”

“नहीं पता।”

“झूठ बोल रहे हैं?”

“इस बार नहीं।”

“किस गाँव से लाई गई थी मैं?”

“सूची में गाँव का नाम नहीं था। सिर्फ कोड था—क्यू-19।”

क्यू-19।

आवाज़ 19।

उन्नीसवाँ नाम।

मीरा को लगा जैसे कोई अदृश्य नंबर उसके माथे पर लिखा हो। वह कोई नाम नहीं, एक केस फाइल थी। एक कोड। एक “माल”। एक पहचान जिसे किसी ने मिटाकर दूसरी बना दी।

“क्या मेरे असली माँ-बाप…” वह वाक्य पूरा नहीं कर पाई।

डाकिये ने बहुत धीमे कहा, “पता नहीं। पर अगर वे जिंदा हैं, तो अठारह साल से तुम्हें मृत समझते होंगे। और अगर मृत हैं… तो तुम्हें जिंदा रखने वाले अरविंद ही थे।”

मीरा की आँखें भर आईं।

अब पिता खोने का शोक भी उलझ गया था। क्या वह शोक झूठा था? नहीं। वह आदमी जिसने उसे गोद में लिया, जिसने उसे टुनटुन रिपोर्टर कहा, जिसने उसके लिए आवाज़ें छोड़ीं—वह पिता था। खून चाहे किसी और का हो, आवाज़ उसी की थी।

और अब वही आवाज़ टुकड़ों में दबी पड़ी थी।

सुरंग अचानक दो हिस्सों में बँट गई।

डाकिये ने दाईं तरफ इशारा किया। “बाएँ रास्ता नाले में खुलता है। दाएँ पुरानी अनाज मंडी के पीछे।”

कबीर ने पूछा, “कौन-सा सुरक्षित?”

“कोई नहीं।”

“उम्मीद थी यही जवाब मिलेगा।”

वे दाईं तरफ मुड़े। रास्ता थोड़ा ऊपर चढ़ने लगा। हवा में अब गेहूँ की बासी गंध आने लगी। कुछ कदम बाद ऊपर लोहे की जाली दिखी। डाकिये ने धक्का दिया। जाली नहीं हिली।

कबीर ने सरिया लगाई। “ये काम आया आखिर।”

तीनों ने मिलकर जाली उठाई। ऊपर धूल भरा छोटा गोदाम था। बोरे सड़ चुके थे। दीवार के छेद से बाहर मंडी का पिछला हिस्सा दिख रहा था। दोपहर की धूप तेज़ हो चुकी थी। दुनिया को कुछ पता नहीं था कि जमीन के नीचे से तीन लोग अपनी पहचान बचाकर निकले हैं।

मीरा ने जैसे ही बाहर कदम रखा, उसका फोन वाइब्रेट हुआ।

स्क्रीन पर एक अनजान नंबर से मैसेज था।

**आवाज़ 2 मत सुनना। डाकिया तुम्हें पूरा सच नहीं बताएगा।**

मीरा ने फोन कबीर को दिखाया।

कबीर ने माथा पकड़ा। “अब कौन है ये? हमारी कहानी में व्हाट्सऐप वाला भूत भी आ गया?”

दूसरा मैसेज आया।

**अगर माँ को बचाना है तो सिनेमा हॉल मत जाना। नदी के पुराने पुल पर आओ। अकेले।**

तीसरा मैसेज तुरंत आया।

**तुम्हारा असली नाम मीरा नहीं है।**

मीरा की उँगलियाँ स्क्रीन पर जम गईं।

चौथा मैसेज आया—

**तुम्हारा नाम नयना है।**

दुनिया कुछ सेकंड के लिए आवाज़हीन हो गई।

नयना।

नाम अजनबी था। फिर भी जैसे बहुत दूर किसी कमरे में कोई बच्ची उस नाम पर मुड़ी हो।

मीरा ने गहरी साँस ली। “किसने भेजा?”

कबीर ने नंबर देखा। “इंटरनेट नंबर है। ट्रेस करना मुश्किल होगा।”

डाकिया मैसेज पढ़कर बहुत देर तक चुप रहा।

मीरा ने उसकी चुप्पी पकड़ ली। “आप इस नाम को जानते हैं।”

डाकिये ने आँखें फेर लीं।

“बोलिए!”

वह धीरे से बोला, “सूची में एक बच्ची थी। नयना। उम्र—लगभग दो साल। स्थिति—मृत घोषित। कोड—क्यू-19।”

मीरा के हाथ से फोन छूटते-छूटते बचा।

कबीर ने कहा, “तो मैसेज भेजने वाला सच जानता है।”

“या ऐसा चाहता है कि हम यही सोचें,” डाकिये ने कहा।

मीरा ने तुरंत जवाब टाइप किया—

**तुम कौन हो?**

कुछ सेकंड बाद जवाब आया—

**वह जिसे अरविंद ने दूसरी बार बचाया था।**

मीरा ने डाकिये की तरफ देखा। “दूसरी बार?”

डाकिया पीला पड़ गया।

कबीर ने पूछा, “क्या मतलब?”

डाकिया कुछ बोल पाता, उससे पहले फोन पर एक ऑडियो फाइल आई।

फाइल का नाम था—

**VOICE_18_अधूरा.wav**

मीरा ने स्क्रीन को घूरा।

आवाज़ 18।

जिसके बारे में देवव्रत नाथ ने कहा था—उसमें अरविंद टूट गए थे।

कबीर ने कहा, “डाउनलोड मत कर।”

मीरा ने पूछा, “क्यों?”

“क्योंकि यह ट्रैप हो सकता है। मैलवेयर, लोकेशन पिंग, कुछ भी।”

डाकिये ने काँपती आवाज़ में कहा, “आवाज़ 18… मेरे पास नहीं है।”

मीरा ने उसकी तरफ देखा। “लेकिन आपने कहा था 1 से 18 आपके पास थीं।”

डाकिया चुप।

कबीर ने धीरे से सरिया नीचे कर दी। “काका… अब अगर झूठ बोला न, तो पुलिस से पहले हमसे पाला पड़ेगा।”

डाकिये ने अपनी धुँधली आँख बंद की। जैसे अतीत को भीतर से खींच रहा हो।

“मेरे पास 1 से 17 थीं,” उसने कहा। “18 मैंने खो दी।”

“कैसे?” मीरा ने पूछा।

“नहीं खोई,” डाकिया बोला। “मुझसे छीन ली गई।”

“किसने?”

उसने बहुत धीमे कहा—

“अर्चना ने।”

मीरा पीछे हट गई।

“माँ ने?”

“हाँ।” डाकिये की आवाज़ भारी हो गई। “तुम्हारी माँ ने आवाज़ 18 मुझसे छीन ली थी। कहा था—अगर मीरा ने यह सुनी, तो वह अरविंद से नफरत करेगी। और मैं… मैं उसे रोक नहीं पाया।”

मीरा का सिर चकराने लगा।

हर जवाब माँ को थोड़ा और अंधेरे में धकेल रहा था। लेकिन क्या माँ सच में दोषी थीं? या उन्होंने भी किसी बड़ी भयावह बात से उसे बचाया?

फोन फिर वाइब्रेट हुआ।

**आवाज़ 18 सुनो। फिर तय करना किस पर भरोसा करना है।**

कबीर ने कहा, “मीरा, प्लीज। अभी नहीं।”

मीरा ने फोन बंद कर दिया।

“नहीं सुनूँगी अभी,” उसने कहा। “जब तक माँ मेरे सामने नहीं होती।”

डाकिये ने राहत की साँस ली, लेकिन मीरा ने उसकी तरफ उँगली उठाई।

“और आप। अब एक भी झूठ नहीं। आवाज़ 2 सुननी है। पर आपके घर पर नहीं। मेरे घर पर नहीं। कहीं ऐसी जगह जहाँ ये लोग सोचें भी नहीं।”

कबीर ने धीरे से कहा, “एक जगह है।”

“कहाँ?”

“मझगवाँ सामुदायिक रेडियो स्टेशन।”

मीरा ने उसे देखा। “यहाँ रेडियो स्टेशन है?”

“था। मामा बताया करते थे। पाँच साल चला। फिर फंड बंद। अब वहाँ कोई नहीं जाता। साउंड-प्रूफ रूम, पुराना प्लेबैक सिस्टम, रिकॉर्डिंग कंसोल—सब शायद धूल खा रहा होगा।”

डाकिये ने चौंककर कबीर की तरफ देखा। “तुम्हें उस जगह का पता कैसे?”

“मामा वहाँ टेक्नीशियन थे।”

डाकिये का चेहरा और गंभीर हो गया। “वहाँ अरविंद भी गया था। आखिरी बार।”

मीरा ने तुरंत पूछा, “क्यों?”

“आवाज़ 19 रिकॉर्ड करने।”

तीनों फिर चुप।

दूर से मंडी के बाहर पुलिस जीप का सायरन सुनाई दिया। समय खत्म हो रहा था।

मीरा ने बैग कंधे पर डाला। “चलो।”

वे मंडी के पीछे से निकलकर संकरी गलियों में घुसे। कबीर आगे रास्ता देखता, मीरा बीच में, डाकिया पीछे। दो बार उन्हें पुलिस की गाड़ी से बचने के लिए बंद दुकानों की आड़ लेनी पड़ी। एक जगह एक बूढ़ी औरत ने मीरा को पहचानने की कोशिश की—“अरे, ये तो अर्चना की…” पर कबीर ने तुरंत हँसते हुए कहा, “नहीं अम्मा, वेब सीरीज शूट है,” और मीरा को आगे खींच लिया।

कस्बा छोटा था, पर अफवाहें उससे भी छोटी गलियों से गुजरती थीं। शायद अब तक खबर फैल चुकी थी—अर्चना अवस्थी की लड़की लौटी है। पुराना घर टूटा है। पुलिस आई थी। कोई कैसेट का मामला है।

सामुदायिक रेडियो स्टेशन कस्बे के पुराने कॉलेज के पीछे था। एक मंजिला इमारत। दीवार पर फीका पड़ा बोर्ड—

**मझगवाँ लोकध्वनि केंद्र — आपकी आवाज़, आपका गाँव**

बोर्ड पर “आवाज़” शब्द पर चिड़ियों ने घोंसला बना रखा था।

कबीर ने ताला देखा। “पुराना है।”

डाकिये ने जेब से चाबी निकाली।

कबीर ने आँखें सिकोड़कर पूछा, “आपके पास इस जगह की चाबी क्यों है?”

डाकिये ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा, “क्योंकि अरविंद ने दी थी।”

दरवाज़ा खुला।

अंदर धूल, तार, टूटी कुर्सियाँ और पुराने माइक्रोफोन की गंध थी। छोटा रिसेप्शन, फिर काँच के पीछे रिकॉर्डिंग रूम। अंदर फोम की दीवारें उखड़ रही थीं। कंसोल पर धूल की मोटी परत थी, लेकिन उपकरण अभी भी जगह पर थे।

मीरा धीरे-धीरे अंदर गई।

उसे आवाज़ों की जगहें हमेशा पवित्र लगती थीं। स्टूडियो खाली हो, फिर भी उसमें बोले गए शब्दों की परछाई रह जाती है। यहाँ भी कुछ था। जैसे कोई अभी भी माइक्रोफोन के सामने बैठा साँस रोककर इंतज़ार कर रहा हो।

कबीर ने बिजली का मेन स्विच खोजा। दो-तीन कोशिशों के बाद ट्यूबलाइट झपकी। फिर आधी रोशनी जल गई। कंसोल पर लाल बत्ती एक पल को चमकी, फिर बुझ गई।

“पुराना सिस्टम है,” कबीर बोला। “पर चल सकता है।”

डाकिये ने कैसेट 2 मीरा को दी।

मीरा ने उसे हाथ में लिया। यह कैसेट बाकी से अलग थी। उस पर लिखावट पापा की नहीं, डाकिये की थी।

**आवाज़ 2 — रात के बाद**

कबीर ने टेप डेक साफ़ किया। कैसेट डाली। हेडफोन निकाले। मीरा ने सिर हिलाया। “नहीं। स्पीकर पर। सब सुनेंगे।”

डाकिये की आँखें झुक गईं।

कबीर ने प्ले दबाया।

पहले लंबी खरखराहट।

फिर एक कराह।

मीरा की साँस अटक गई।

यह पापा की आवाज़ थी। लेकिन आवाज़ 1 वाली मजबूत आवाज़ नहीं। यह घायल आदमी की आवाज़ थी। जैसे हर शब्द पसलियों के बीच से खून लेकर निकल रहा हो।

“तारीख… पता नहीं। शायद पंद्रह जुलाई… रात… या सुबह… मुझे नहीं पता। अगर आवाज़ साफ़ नहीं आ रही तो… गला…”

खाँसी। लंबी। दर्दनाक।

फिर डाकिये की युवा आवाज़ आई। “अरविंद, मत बोलो। खून फिर बहने लगेगा।”

पापा बोले, “रिकॉर्ड करना जरूरी है।”

“पहले जिंदा रहना जरूरी है।”

“जिंदा रहकर क्या करूँगा अगर बोल नहीं पाया?”

मीरा की आँखें भर आईं।

टेप में पापा ने बहुत धीमे कहा, “अर्चना… मीरा…”

फिर कुछ देर सन्नाटा।

डाकिये की आवाज़ आई, “मैं उन्हें सुरक्षित निकाल लाया हूँ। बच्ची सो रही थी। अर्चना रो रही थी, पर जिंदा हैं दोनों।”

पापा की साँस तेज़ हो गई। “उसे मझगवाँ से दूर ले जाना।”

“ले जाऊँगा।”

“मीरा को… कभी वापस मत आने देना।”

मीरा ने अपनी उँगलियाँ कस लीं।

फिर पापा ने कहा—

“मीरा… मेरी बेटी नहीं है।”

कमरे में जैसे सब आवाज़ें रुक गईं।

कबीर ने मीरा की तरफ देखा। डाकिया आँखें बंद किए खड़ा था।

टेप में पापा आगे बोले—

“अगर यह सुनकर कोई समझे कि मैंने उसे कम प्यार किया… तो वह मूर्ख है। वह मेरी साँस है। मेरी आवाज़ है। लेकिन सच छिपाकर प्यार बचता नहीं। कभी न कभी सच लौटता है।”

मीरा की आँख से एक आँसू गिरा।

पापा की आवाज़ टूट रही थी, पर हर शब्द उसके भीतर उतर रहा था।

“उस बच्ची का नाम नयना था… शायद। कुएँ के पास जब मिली तो सिर्फ ‘नै…नै…’ बोल रही थी। अर्चना ने कहा—हम इसे कैसे रखेंगे? मैंने कहा—जैसे भगवान ने भेजा है। लेकिन भगवान ने नहीं भेजा था। उसे शैतानों से खींचकर लाना पड़ा था।”

टेप में दूर से ट्रेन की आवाज़ आई। शायद वे किसी सुनसान जगह, किसी पुराने कमरे या स्टेशन के पास छिपे थे।

पापा बोले, “नयना को मैंने मीरा बनाया। यह अपराध नहीं था। लेकिन उसका नाम मिटाकर उसे बचाना… शायद आधा अपराध था। पूरा सच कभी बताना होगा।”

डाकिये की आवाज़ आई, “अभी नहीं।”

“नहीं। अभी नहीं। जब तक देवव्रत जिंदा है, नहीं।”

कबीर ने धीरे से कहा, “तो देवव्रत तब भी उन्हें पता था।”

टेप आगे चला।

“डाकिया,” पापा ने कहा, “अगर मैं बच गया तो आवाज़ें पूरी करूँगा। अगर नहीं बचा… तो इन्हें छिपा देना। आवाज़ 19 मैं खुद बनाऊँगा। वह मीरा के लिए होगी। उसमें सब बताऊँगा—नयना कौन थी, उसके असली माँ-बाप कौन थे, और देवव्रत की असली कमजोरी क्या है।”

मीरा आगे झुक गई।

देवव्रत की कमजोरी?

टेप में डाकिये ने पूछा, “क्या कमजोरी?”

पापा की आवाज़ इतनी धीमी हो गई कि कबीर को वॉल्यूम बढ़ाना पड़ा।

“उसकी बेटी।”

तीनों ने एक-दूसरे को देखा।

पापा बोले—

“देवव्रत नाथ की अपनी बेटी… उन बच्चों में थी।”

टेप अचानक रुक गया।

नहीं—रुका नहीं। किसी ने उसी जगह काट दिया था।

कबीर ने प्लेयर रोका। कैसेट निकालकर देखी। टेप बीच से चिपका हुआ था। जैसे कभी फटा हो और फिर जोड़ा गया हो।

“आगे है?” मीरा ने पूछा।

कबीर ने कैसेट घुमाई। “है, पर कट है। मैं मैनुअली आगे कर सकता हूँ।”

“कर।”

“टेप टूट सकती है।”

“कर।”

कबीर ने बहुत सावधानी से पेन से रील घुमाई। फिर कैसेट वापस डाली। प्ले दबाया।

खरखराहट।

फिर आवाज़ आई, पर अब माहौल अलग था। जैसे वही रिकॉर्डिंग कुछ देर बाद फिर शुरू हुई हो।

डाकिये की आवाज़ थी। घबराई हुई।

“अरविंद! आँखें खोलो। अरविंद!”

फिर पापा की बहुत कमजोर साँस।

“आवाज़… बचाना…”

“हाँ, बचा लूँगा। तुम चुप रहो।”

“अगर वह लड़की…”

“कौन लड़की?”

पापा ने शायद कुछ कहा, लेकिन शब्द साफ़ नहीं आए।

कबीर ने वॉल्यूम बढ़ाया।

आवाज़ टूटी हुई थी—

“…देवव्रत की बेटी नहीं… उसकी…”

और फिर अचानक टेप में तेज़ चीख जैसी आवाज़ आई। कंसोल के स्पीकर काँप गए। मीरा ने कान बंद कर लिए। रोशनी झपकने लगी।

टेप अपने आप बंद हो गया।

स्टूडियो में अंधेरा छा गया।

कुछ सेकंड बाद आपातकालीन लाल बल्ब जल उठा।

काँच के उस पार, रिकॉर्डिंग रूम में, जहाँ अभी तक कोई नहीं था, माइक्रोफोन के सामने एक कुर्सी रखी थी।

और उस कुर्सी पर एक सफेद कागज़ रखा था।

कबीर ने काँपते हुए कहा, “यह कागज़ पहले नहीं था।”

मीरा धीरे-धीरे काँच वाले दरवाज़े तक गई। दरवाज़ा अंदर से बंद था।

“चाबी?” उसने पूछा।

डाकिये ने सिर हिलाया। “मेरे पास नहीं।”

मीरा ने काँच से कागज़ पढ़ने की कोशिश की। उस पर बड़े अक्षरों में लिखा था—

**नयना को सच चाहिए तो पहले मीरा को मारना होगा।**

नीचे लाल रंग से एक नाम लिखा था—

**देवव्रत की बेटी — जीवित।**

और सबसे नीचे—

**आवाज़ 19 झूठ नहीं है। वह अधूरा सच है।**

तभी स्टूडियो के पुराने स्पीकर अपने आप चालू हो गए।

एक बच्ची की आवाज़ गूँजी।

बहुत छोटी। बहुत डरी हुई।

“मेरा नाम नयना नहीं है…”

मीरा के हाथ काँच पर जम गए।

बच्ची की आवाज़ फिर आई—

“मेरा नाम मीरा है।”

और फिर एक आदमी की आवाज़—अरविंद अवस्थी की—फुसफुसाई—

“रिकॉर्ड बंद करो। अर्चना आ रही है।”

लाल बल्ब बुझ गया।

स्टूडियो फिर अंधेरे में डूब गया।

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