Vinod 04 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 581 0 Hindi :: हिंदी
भाग 3: पहली आवाज़ गली में काला रेनकोट पड़ा था। आदमी गायब था। मोटरसाइकिल एक तरफ गिरी हुई थी, उसका पिछला पहिया अब भी धीरे-धीरे घूम रहा था। टंकी से पेट्रोल की पतली धार नाली में मिल रही थी। गली के दूसरे छोर पर दूध वाले की साइकिल खड़ी थी, पर दूध वाला नहीं था। आसपास के घरों के दरवाज़े बंद हो चुके थे। वही गली, जहाँ पाँच मिनट पहले सुबह की रसोई की महक थी, अब ऐसे चुप थी जैसे किसी ने पूरे कस्बे का गला दबा दिया हो। और उस गिरे हुए मोबाइल की स्क्रीन पर नाम चमक रहा था— **अर्चना अवस्थी** मीरा की माँ। कबीर ने खिड़की की फटी हुई जाली से बाहर झाँकते हुए धीरे से कहा, “मीरा… तेरी माँ का नाम है।” मीरा ने उसकी कलाई पकड़ ली। “बाहर मत जा।” “मोबाइल लेना पड़ेगा।” “नहीं।” “उसमें कॉल रिकॉर्ड, नंबर, कुछ तो होगा।” “और बाहर जो भी है, वो यही चाहता होगा कि हम मोबाइल लेने जाएँ।” कबीर ने पहली बार उसकी तरफ ऐसे देखा जैसे उसे मान गया हो। “सही कह रही है।” दोनों पीछे हटे। पुराने घर के कमरे में टूटा रेडियो मेज पर पड़ा था। रेडियो बंद था। उसमें बैटरी नहीं थी। फिर भी उसकी जाली के भीतर से अभी-अभी आवाज़ आई थी—वही आवाज़ जिसने कहा था, “अपनी माँ पर भरोसा मत करना।” मीरा की नज़र रेडियो पर अटक गई। “यह कैसे हुआ?” उसने फुसफुसाकर पूछा। कबीर ने रेडियो के तार को उठाया। तार पूरी तरह कटा हुआ था। उसने पीछे का ढक्कन खोला। खाली। कोई बैटरी नहीं। कोई छोटा डिवाइस नहीं। कोई ब्लूटूथ मॉड्यूल नहीं। बस धूल, जंग और पुरानी सर्किट प्लेट। “तकनीकी तौर पर,” कबीर ने सूखे गले से कहा, “यह नहीं हो सकता।” “और जो नहीं हो सकता, वही हो रहा है।” “मत बोल ऐसे। मैं डर में भी साइंस पकड़कर बैठा हूँ। तू भूत वाला एंगल मत खोल।” मीरा ने रेडियो को छूना चाहा, फिर हाथ पीछे खींच लिया। “अगर यह किसी तरह का ट्रांसमीटर है?” “हो सकता है। पुराने रेडियो की सर्किट को कोई रिसीवर की तरह इस्तेमाल कर रहा हो। लेकिन पावर कहाँ से आ रही है?” “शायद कहीं से इंडक्शन, छिपी बैटरी, कुछ?” कबीर ने उसे देखा। “तू खुद जानती है कि यह खींचतान वाला जवाब है।” कमरे में फिर सन्नाटा उतर आया। बाहर गली में गिरा मोबाइल अभी भी चमक रहा था। कॉल कट चुकी थी। स्क्रीन अब लॉक हो गई थी। पर काला रेनकोट वहीं पड़ा था। खाली। जैसे आदमी उसमें से वाष्प बनकर उड़ गया हो। मीरा ने अपनी जेब से फोन निकाला और माँ का नंबर मिलाया। पहली घंटी। दूसरी। तीसरी। फिर कॉल कट गया। स्क्रीन पर लिखा आया—**User Busy** मीरा की उँगलियाँ ठंडी पड़ गईं। कबीर ने पूछा, “क्या हुआ?” “माँ ने काट दिया।” “या कोई और उनके फोन से।” मीरा ने फिर कॉल लगाया। इस बार फोन स्विच्ड ऑफ था। कमरे की हवा भारी होने लगी। मीरा को लगा, हर दीवार उससे कुछ छिपा रही है। यह वही घर था जहाँ उसने बचपन में बुखार में माँ की गोद में सिर रखा था, जहाँ पापा ने उसे पहली बार कागज़ की नाव बनाकर दी थी, जहाँ आँगन में नीम की पत्तियाँ गिरती थीं। पर आज वही घर एक गवाही की तरह खड़ा था—चुप, मगर अपराध से भरा। “कबीर,” उसने कहा, “हमें आवाज़ 1 सुननी होगी। अभी।” कबीर ने आँखें बड़ी कीं। “अभी? यहाँ?” “हाँ।” “तू जानती है बाहर क्या पड़ा है?” “हाँ। और शायद जवाब इसी में है।” कबीर ने बालों में हाथ फेरा। “कैसेट प्लेयर कहाँ से लाऊँ अभी?” मीरा की नज़र कमरे के कोने में पड़ी पुरानी लकड़ी की अलमारी पर गई। वही अलमारी जिसे रेनकोट वाले के आदमी ने खोला था, पर शायद ठीक से देखा नहीं था। अलमारी का निचला हिस्सा बंद था। उस पर छोटा-सा जंग लगा ताला था। “यह खोला था उन्होंने?” “ऊपर वाला। नीचे नहीं।” मीरा ने माँ की चाभियों का गुच्छा निकाला। एक-एक चाबी लगाई। तीसरी चाबी नहीं लगी। चौथी आधी गई। पाँचवीं घुसी और घूम गई। ताला खुला। अलमारी के निचले हिस्से में पुराने अखबार, पीले पड़ चुके पोस्टकार्ड, कुछ टूटे खिलौने और एक काला टेप रिकॉर्डर रखा था। उस पर धूल की मोटी परत थी। ब्रांड का नाम मुश्किल से पढ़ा जा रहा था। मीरा ने उसे बाहर निकाला। उसके साथ एक छोटा पाउच भी था जिसमें चार बड़ी बैटरियाँ रखी थीं—पुरानी, लेकिन प्लास्टिक में सील। कबीर ने कहा, “तेरे पापा ने सच में पूरा सिस्टम बनाया हुआ था।” मीरा ने टेप रिकॉर्डर पर हाथ फेरा। धूल में उसकी उँगली से एक रेखा बन गई। उसे याद आया—एक रात पापा ने इसी रिकॉर्डर में उसकी आवाज़ रिकॉर्ड की थी। “टुनटुन रिपोर्टर, आज की सबसे बड़ी खबर क्या है?” और पाँच साल की मीरा ने कहा था, “माँ ने लौकी बनाई है, सब बचकर रहो।” पापा इतने हँसे थे कि रिकॉर्डिंग में उनकी हँसी काँप गई थी। मीरा ने आँखें झपकाईं। स्मृति को पीछे धकेला। कबीर बैटरियाँ लगा रहा था। उसने प्ले बटन दबाया। टेप रिकॉर्डर ने पहले कराह जैसी आवाज़ निकाली। फिर मोटर घूमी। कबीर ने कहा, “चल रहा है। शायद किस्मत अभी हमारी तरफ थोड़ी है।” मीरा ने बैग से **आवाज़ 1** वाली कैसेट निकाली। प्लास्टिक हटाते समय उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने कैसेट को रिकॉर्डर में रखा। ढक्कन बंद किया। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। बाहर गली में कोई आवाज़ नहीं थी। मीरा ने प्ले दबाया। पहले लंबी खरखराहट आई। टेप पुराना था। आवाज़ बीच-बीच में डूब रही थी। फिर धीरे-धीरे किसी कमरे का माहौल उभरा—पंखे की आवाज़, कागज़ों की सरसराहट, दूर कुत्तों का भौंकना। फिर अरविंद अवस्थी की आवाज़ आई। इस बार साफ़। युवा। थकी हुई, पर टूटी नहीं। “तारीख चौदह जुलाई दो हजार आठ। रात ग्यारह बजकर बयालीस मिनट। यह पहली रिकॉर्डिंग है। अगर मैं यह सब लिखकर छोड़ता हूँ तो कागज़ जलाए जा सकते हैं। अगर मैं लोगों से कहता हूँ तो लोग मुकर सकते हैं। आवाज़ शायद बच जाए। इसलिए आवाज़ रिकॉर्ड कर रहा हूँ।” मीरा की आँखों में आँसू भर आए, लेकिन उसने पलकों को झपकने नहीं दिया। उसे डर था कि अगर आँसू गिरे तो वह सुन नहीं पाएगी। टेप में पापा आगे बोले— “आज मुझे पूरा यकीन हो गया है कि ‘शांत कुआँ’ कोई अफवाह नहीं है। गाँवों से गायब हुए बच्चे, पोस्टमार्टम के बिना जारी मौत के प्रमाणपत्र, सरकारी जमीन का अचानक निजी ट्रस्ट को जाना, और चुनाव से पहले नकद चंदे की बाढ़—ये सब अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। एक ही धागे से बँधी हैं। और वह धागा मझगवाँ के पुराने पोस्ट ऑफिस से होकर जाता है।” कबीर ने धीरे से मीरा की तरफ देखा। पुराना पोस्ट ऑफिस। नीम का पेड़। आवाज़ें। टेप चलता रहा। “आज डाक विभाग के पुराने रिकॉर्ड में मुझे पाँच ऐसे मनीऑर्डर मिले हैं जो मरे हुए लोगों के नाम से भेजे गए। तीन नाम उन बच्चों के हैं जिनके परिवारों ने कहा था कि बच्चे शहर काम करने गए हैं। दो नाम उन लोगों के हैं जिनकी लाशें कभी मिली ही नहीं। फिर भी सरकारी कागज़ में उनकी मृत्यु दर्ज है। इस सिस्टम को कोई बहुत संगठित आदमी चला रहा है।” टेप में कुर्सी खिसकने की आवाज़ आई। शायद पापा उठे थे। फिर उनकी आवाज़ थोड़ा पास आई। “सबसे बड़ी बात—इन नामों की सूची अर्चना ने नहीं देखनी चाहिए। उसे जितना कम पता होगा, वह उतनी सुरक्षित रहेगी।” मीरा का दिल कस गया। माँ को नहीं पता था? या पापा उन्हें बचाना चाहते थे? टेप में अचानक हल्की दस्तक सुनाई दी। फिर पापा ने धीमे स्वर में कहा, “रुको।” कुछ सेकंड सन्नाटा। फिर एक और आवाज़ आई। बहुत धीमी। शायद कोई कमरे में आया था। “अरविंद भैया, जल्दी कीजिए। वे लोग चौपाल से निकल चुके हैं।” मीरा आगे झुक गई। “यह कौन है?” कबीर ने हाथ से चुप रहने का संकेत किया। टेप में पापा बोले, “नाम मत लो। रिकॉर्डिंग चल रही है।” दूसरी आवाज़ घबराई हुई थी। “मेरा नाम कहीं मत डालना। मेरे बच्चे हैं।” “नहीं डालूँगा। बस बताओ लड़की कहाँ है?” “कुएँ के पास।” “जिंदा?” “आज सुबह तक थी।” मीरा की गर्दन में ठंडा दर्द उठा। पापा की आवाज़ काँपी, “कौन-कौन था वहाँ?” दूसरी आवाज़ दब गई। “नाम मत पूछो। नाम लिया तो हम सब खत्म।” “मुझे नाम चाहिए।” “पहला नाम आप जानते हैं।” “राघवेंद्र सिंह?” टेप में लंबा सन्नाटा। कबीर ने तुरंत फुसफुसाया, “आर.एस.” डायरी में लिखा आर.एस. दूसरी आवाज़ ने बहुत धीरे कहा, “उनका नाम मत लीजिए। दीवार सुन लेगी।” “दीवार नहीं सुनती, आदमी सुनते हैं। और आदमी डरते हैं। मैं नहीं डरूँगा।” “आपको डरना चाहिए अरविंद भैया। आपकी छोटी बिटिया है।” यह सुनते ही मीरा के भीतर कुछ टूटने जैसा हुआ। पापा कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, “इसीलिए तो कर रहा हूँ।” टेप में अचानक बाहर से मोटरसाइकिलों की आवाज़ आई। वही गहरी, भारी आवाज़, जैसी आज पोस्ट ऑफिस पर आई थी। दूसरी आवाज़ फुसफुसाई, “वे आ गए।” रिकॉर्डिंग में अफरा-तफरी हुई। कागज़ उठे, कुर्सी गिरी, किसी ने खिड़की बंद की। फिर पापा की आवाज़ बहुत तेज़ और दबे डर से भरी आई— “अगर यह रिकॉर्डिंग किसी दिन मीरा तक पहुँचे, तो उसे बताना—शांत कुआँ पानी का कुआँ नहीं है। यह एक जगह नहीं, एक तरीका है। लोगों को गायब करने का तरीका। नाम मिटाने का तरीका। जिंदगी को कागज़ में मौत बना देने का तरीका।” एक धमाका हुआ। जैसे दरवाज़ा तोड़ा गया हो। फिर टेप में आवाज़ें उलझ गईं। “कागज़ कहाँ हैं?” “कौन-से कागज़?” “बहुत पत्रकार बन रहा था?” फिर थप्पड़ की आवाज़। मीरा ने आँखें बंद कर लीं। उसका हाथ रिकॉर्डर की तरफ गया, पर कबीर ने रोक लिया। “सुनना होगा।” रिकॉर्डिंग में पापा कराहे, फिर बोले, “तुम लोग बचोगे नहीं।” किसी आदमी की हँसी आई। भारी, अहंकारी। “हम बचने के लिए पैदा नहीं हुए अवस्थी जी। हम बचाने वाले हैं—सरकार बचाते हैं, कुर्सी बचाते हैं, चुनाव बचाते हैं। तुम क्या बचाओगे? अपना अखबार?” दूसरी आवाज़ ने कहा, “सर, बच्ची और औरत को छोड़ दीजिए।” सर। साहब। कौन था? भारी आवाज़ फिर बोली, “औरत अगर चुप रही तो जिएगी। बच्ची तो अभी कुछ समझती नहीं। असली दिक्कत यह आदमी है।” मीरा के कानों में खून दौड़ने लगा। टेप में पापा ने थूकते हुए कहा, “मेरे परिवार को छुआ तो—” एक और थप्पड़। भारी आवाज़ अब बिल्कुल पास थी। “परिवार? पत्रकार का परिवार नहीं होता, अवस्थी। पत्रकार का सिर्फ इस्तेमाल होता है। जब तक लिखता है, तब तक उपयोगी। जब सच लिखता है, तब बेकार।” फिर किसी ने कहा, “रिकॉर्डर बंद करो।” टेप में तेज़ खड़खड़ाहट आई। किसी ने शायद रिकॉर्डर उठाया। फिर आवाज़ दूर हो गई। मगर रिकॉर्डिंग बंद नहीं हुई। शायद रिकॉर्डर गिरकर किसी चीज़ के नीचे चला गया था। कुछ सेकंड बाद पापा की दबती हुई आवाज़ आई— “अर्चना को मत—” फिर धप्प। फिर सन्नाटा। टेप चलता रहा। सिर्फ कमरे की आवाज़ें। भारी साँसें। जूतों की आहट। कागज़ फटने की आवाज़। फिर किसी ने कहा— “आग लगा दो।” मीरा का हाथ कबीर की बाँह पर कस गया। फिर वही भारी आवाज़ बोली— “नहीं। आग बाद में। पहले इसे वहाँ ले चलो। अगर बोलना बंद नहीं किया, तो मरना भी काम नहीं आएगा।” दूसरे आदमी ने पूछा, “लाश?” भारी आवाज़ बोली, “लाश मिल जाएगी।” टेप में अचानक किसी और की चीख आई। बहुत दूर से। शायद किसी लड़की की। “नहीं! मुझे घर जाना है!” कबीर का चेहरा सख्त हो गया। मीरा ने फुसफुसाया, “यह वही लड़की होगी?” टेप में पापा की बहुत कमजोर आवाज़ आई— “कौन है?” किसी ने कहा, “चुप!” फिर रिकॉर्डिंग में घसीटने की आवाज़, दरवाज़ा बंद होने की आवाज़, और कुछ देर बाद सिर्फ पंखे की घरघराहट बची। टेप खत्म नहीं हुआ था, मगर आवाज़ें गायब थीं। मीरा ने रिकॉर्डर बंद कर दिया। कमरे में दोनों कुछ देर तक बैठे रहे। कहानी अब रहस्य नहीं रही थी। वह अपराध थी। एक ऐसा अपराध जिसका मुँह अठारह साल से बंद था और जिसकी पहली आवाज़ अभी-अभी खुली थी। कबीर ने धीरे से कहा, “तेरे पापा को उस रात मारा नहीं गया था। उठाकर ले गए थे।” मीरा ने सिर हिलाया। “और किसी और की लाश जलाई गई।” “शायद उसी लड़की की?” मीरा ने उसकी तरफ देखा। यह संभावना इतनी भयानक थी कि शब्द बनते ही कमरे में दुर्गंध जैसी फैल गई। “नहीं,” मीरा ने कहा, जैसे उस अंजान लड़की से माफी मांग रही हो। “शायद नहीं।” कबीर ने डायरी उठाई। “राघवेंद्र सिंह। नाम सुना है?” मीरा ने माथा सिकोड़कर सोचा। “मझगवाँ में एक नेता थे। बचपन में उनके पोस्टर देखे हैं। शायद विधायक?” कबीर ने अपना फोन निकाला, फिर रुक गया। “नेट ऑन करूँ?” “जोखिम है।” “जानना भी जरूरी है।” मीरा ने कहा, “एक मिनट।” वह कमरे से बाहर आँगन में गई और टूटी दीवार के पास खड़ी होकर गली में झाँका। काला रेनकोट अब भी पड़ा था। मगर मोबाइल गायब था। उसने कबीर को इशारा किया। कबीर ने भी देखा। “अभी तो था।” “किसी ने उठा लिया।” “हमने किसी को आते सुना भी नहीं।” मीरा पीछे हट गई। “यहाँ से निकलना होगा।” “साइबर कैफे?” “नहीं। वहाँ वे सोचेंगे हम जाएँगे। कोई ऐसी जगह जहाँ बाहर वालों को पता न हो।” “तेरा कोई रिश्तेदार?” “मझगवाँ में नहीं।” “डाकिया?” मीरा रुक गई। बूढ़ा डाकिया। वह पोस्ट ऑफिस में रह गया था। “उसे ढूँढ़ना होगा,” मीरा ने कहा। “या वह हमें ढूँढ़ रहा होगा।” तभी घर के भीतर कहीं फोन बजा। दोनों चौंके। यह मीरा का फोन नहीं था। कबीर का भी नहीं। आवाज़ कमरे के बाहर, माँ वाले पुराने कमरे से आ रही थी। एक पुरानी ट्रिंग-ट्रिंग। लैंडलाइन। मीरा को याद आया—घर में कभी काला लैंडलाइन फोन था। वह माँ वाले कमरे में रखा रहता था। कई साल पहले कनेक्शन कट गया था। शायद फोन भी टूट गया होगा। लेकिन घंटी बज रही थी। धीमी, पुरानी, काँपती हुई। ट्रिंग। ट्रिंग। ट्रिंग। कबीर ने कहा, “मत उठाना।” मीरा ने उसकी तरफ देखा। “अगर जवाब वहीं है?” “डरावनी फिल्मों में यही सोचकर लोग मरते हैं।” “हम वैसे भी सुरक्षित नहीं हैं।” वह माँ के कमरे में गई। कोने में पुरानी मेज पर सचमुच वही काला फोन रखा था। धूल से ढका हुआ। तार दीवार की सॉकेट में लगा था। सॉकेट टूटी हुई थी। फिर भी घंटी बज रही थी। ट्रिंग। ट्रिंग। मीरा ने रिसीवर उठाया। कानों में पहले सिर्फ स्टैटिक आई। फिर माँ की आवाज़। “मीरा?” मीरा का गुस्सा और डर एक साथ फट पड़ा। “आप कहाँ हैं?” “तू घर में है?” “आपको कैसे पता?” “मेरी बात ध्यान से सुन। वहाँ एक पुराना टेप रिकॉर्डर है। उसे मत चलाना।” मीरा चुप रही। माँ की साँस बदल गई। “तूने चला दिया?” “हाँ।” फोन के उस पार जैसे कोई कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। “हे भगवान…” “माँ, पापा को उस रात जिंदा ले जाया गया था। आपने मुझे क्यों नहीं बताया?” “क्योंकि मुझे भी पूरा सच बहुत देर से पता चला।” “झूठ। आपने सुबह कहा था आपने उन्हें जिंदा देखा।” “हाँ। देखा था। लेकिन उसके बाद क्या हुआ, नहीं पता था।” “और आपकी कॉल उस आदमी के मोबाइल पर क्यों थी?” “कौन-सा आदमी?” “जो मुझे लेने आया था। काला रेनकोट। उसके फोन पर आपका नाम था।” माँ चुप। “बोलिए!” माँ की आवाज़ और धीमी हो गई। “उस आदमी से दूर रहना।” “वह गायब हो गया।” “क्या?” “सिर्फ रेनकोट मिला। आदमी नहीं। और मोबाइल भी गायब।” माँ की साँसों में घबराहट साफ़ थी। “तू अभी घर से निकल। अभी। पीछे वाले रास्ते से। सड़क पर मत जाना। और डाकिये पर भी पूरा भरोसा मत करना।” मीरा का माथा ठंडा पड़ गया। “आपको डाकिये के बारे में कैसे पता?” “क्योंकि अठारह साल पहले वही हमें बचाकर ले गया था।” “तो फिर भरोसा क्यों नहीं?” माँ की आवाज़ टूटने लगी। “क्योंकि वही तेरे पिता को आखिरी बार ले गया था।” मीरा के हाथ से रिसीवर लगभग छूट गया। कमरे की दीवारें घूमने लगीं। उसने मेज पकड़ ली। “क्या मतलब?” “अरविंद घायल थे। गोली लगी थी। आग लग चुकी थी। पुलिस, गुंडे, सब घर के आसपास थे। डाकिया आया। उसने कहा कि वह अरविंद को छिपाकर सुरक्षित जगह ले जाएगा। मैंने… मैंने विश्वास किया। मैं तुझे लेकर भागी। उसने कहा था सुबह तक खबर देगा। फिर कभी नहीं आया।” मीरा ने आँखें बंद कर लीं। पोस्ट ऑफिस में बूढ़े डाकिये का चेहरा याद आया—सफेद कुर्ता, एक धुँधली आँख, और वह वाक्य—“मैं इंतज़ार कर रहा था कि आवाज़ तुझे यहाँ तक खींच लाए।” वह मददगार था? या जाल? माँ ने कहा, “मीरा, अब सुन। जो भी तुझसे तेरे पिता की आवाज़ में बात करे, उस पर विश्वास मत करना। अरविंद की असली आवाज़ सिर्फ रिकॉर्डिंग में है। लाइव में नहीं।” “आपको कैसे पता?” “क्योंकि…” माँ रुक गईं। “क्योंकि क्या?” माँ की आवाज़ अब फुसफुसाहट थी। “क्योंकि तेरे पिता की आवाज़ 2008 में ही छीन ली गई थी।” मीरा की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। “आवाज़ छीन ली गई मतलब?” “मैं फोन पर नहीं बता सकती। लाइन सुरक्षित नहीं है।” “यह लैंडलाइन तो सालों से बंद है!” “इसीलिए तो डर रही हूँ।” तभी लाइन में स्टैटिक बढ़ी। माँ की आवाज़ टूटने लगी। “मीरा… अगर डायरी मिली है तो नीला पन्ना ढूँढ़। नीला पन्ना। उसमें असली नाम है। और सुन—राघवेंद्र सिंह से भी बड़ा आदमी है इसमें। नाम…” आवाज़ कटने लगी। “माँ! कौन?” स्टैटिक। फिर एक बहुत भारी साँस। और उसके बाद एक पुरुष आवाज़ आई। धीमी, खुरदरी, और बिल्कुल अनजान। “बेटी को इतना सच मत खिलाओ, अर्चना। बच्ची का पेट खराब हो जाएगा।” मीरा जम गई। फोन के उस पार माँ की दबाई हुई चीख सुनाई दी। “माँ!” मीरा चिल्लाई। पुरुष आवाज़ हँसी। “मीरा अवस्थी। आखिर मिल ही गई तुम। तुम्हारे पिता भी ऐसे ही सवाल पूछते थे। फर्क बस इतना है कि वे अकेले थे। तुम भी अकेली हो जाओगी।” कबीर भागकर कमरे में आया। “कौन है?” मीरा ने रिसीवर कसकर पकड़ा। “मेरी माँ को हाथ लगाया तो—” “तो क्या? पॉडकास्ट बना दोगी? हैशटैग चलाओगी? बेटी, जिस देश में फाइलें गायब हो जाती हैं, वहाँ लोग क्या चीज़ हैं।” “तू कौन है?” “नाम सुनना है? अभी नहीं। नाम कहानी के बीच में नहीं बताते। नाम क्लाइमेक्स के लिए बचाकर रखते हैं।” यह आदमी खेल रहा था। सिर्फ धमका नहीं रहा था। कहानी को समझता था। मीरा को, उसके काम को, उसके डर को पढ़ रहा था। “माँ कहाँ हैं?” मीरा ने दाँत भींचकर पूछा। “फिलहाल जिंदा। आगे तुम्हारी समझदारी पर निर्भर।” कबीर ने धीरे से फुसफुसाया, “बात लंबी कर। मैं रिकॉर्ड करता हूँ।” उसने अपना फोन चालू कर दिया। मीरा ने रिसीवर कान से चिपकाए रखा। “तुम्हें क्या चाहिए?” “आवाज़ 1, डायरी और वह नीला पन्ना जो अभी तक तुम्हें मिला नहीं है।” “मेरे पास कुछ नहीं।” “झूठ बोलने में तुम अपनी माँ पर गई हो।” मीरा ने पहली बार जवाब नहीं दिया। पुरुष आवाज़ ने आगे कहा, “तुम्हें लगता है तुम्हारे पिता हीरो थे? नहीं। वे भी डरते थे। बहुत डरते थे। आखिरी रात तो रो भी रहे थे।” “चुप।” “क्यों? बेटी को पिता का सच नहीं सुनना चाहिए?” “मैंने रिकॉर्डिंग सुनी है।” “रिकॉर्डिंग?” वह हँसा। “पहली आवाज़ में आदमी खुद को बहादुर दिखाता है। आखिरी आवाज़ में सच निकलता है। आवाज़ 19 सुनी है न? वही असली है।” मीरा का दिमाग घूमने लगा। आवाज़ 19—जो उसे मिली थी—क्या पापा की थी? नकली? आधी असली, आधी छेड़छाड़? और अगर आवाज़ 19 असली थी तो उसे किसने भेजा? “तुमने आवाज़ 19 भेजी?” मीरा ने पूछा। “नहीं।” यह जवाब तुरंत आया। इतना तुरंत कि वह सच भी हो सकता था, झूठ भी। “तो किसने?” “यही तो मैं जानना चाहता हूँ।” मीरा और कबीर ने एक-दूसरे को देखा। पुरुष आवाज़ पहली बार सचमुच चिढ़ी हुई लगी। “किसी ने पुरानी कब्र खोली है। तुम आई हो, इसका मतलब वह आदमी अभी जिंदा है या उसके पास बहुत चालाक आदमी है। तुम मुझे वह आदमी ढूँढ़कर दोगी।” “क्यों दूँ?” “क्योंकि तुम्हारी माँ मेरे पास है।” फोन पर माँ की फिर हल्की आवाज़ आई—“मीरा… मत…” फिर शायद उनका मुँह दबा दिया गया। मीरा का खून खौल गया। “मैं पुलिस—” “कौन-सी? वही जिसमें डी.एन. अभी भी बैठा है?” डी.एन. डायरी का दूसरा अक्षर। कबीर ने तुरंत कागज़ पर लिखा—**D.N. = पुलिस?** पुरुष आवाज़ ने कहा, “दो घंटे। पुराना सिनेमा हॉल। अकेले। डायरी और कैसेट लेकर आना। लड़का साथ आया तो उसकी आवाज़ भी रिकॉर्ड कर लेंगे।” कबीर ने मुँह बनाकर फुसफुसाया, “मुझे क्यों घसीट रहा है?” मीरा ने पूछा, “सबूत कैसे दूँ कि माँ जिंदा हैं?” कुछ पल चुप्पी। फिर माँ की आवाज़ आई, बहुत कमजोर—“मीरा… नीला पन्ना… बक्से में नहीं… दीवार में नहीं… तेरे…” अचानक थप्पड़ की आवाज़। मीरा चीखी, “माँ!” पुरुष आवाज़ वापस आई। “दो घंटे।” लाइन कट गई। मीरा ने रिसीवर धीरे से रखा। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आँखों में अब आँसू नहीं थे। वहाँ कुछ और था—गर्म, तीखा, खतरनाक। कबीर ने रिकॉर्डिंग सेव की। “हमें जाना नहीं चाहिए।” “माँ उनके पास है।” “और उन्हें यही चाहिए कि तू जाए।” “तो विकल्प?” कबीर चुप हो गया। मीरा ने कमरे में तेजी से देखना शुरू किया। “माँ ने कहा नीला पन्ना। बक्से में नहीं, दीवार में नहीं, तेरे…” “तेरे क्या?” कबीर ने पूछा। “वह बोल नहीं पाईं।” “तेरे पास? तेरे घर? तेरे नाम?” “तेरे…” मीरा अचानक रुकी। उसका हाथ अपनी गर्दन पर गया। बचपन से वह एक चाँदी का छोटा लॉकेट पहनती थी। माँ ने कभी उतरने नहीं दिया। कहती थीं—“तेरे पापा की आखिरी निशानी है।” लॉकेट गोल था, बहुत साधारण। उसने कभी उसे खोलकर नहीं देखा था, क्योंकि वह खुलता ही नहीं था। या उसने कभी सच में कोशिश नहीं की थी। कबीर ने उसकी नज़र देखी। “लॉकेट?” मीरा ने उसे पकड़कर खींचा। चेन गर्दन से टूटते-टूटते बची। कबीर ने कहा, “रुक, धीरे।” उसने अपनी जेब से छोटा चाकू निकाला—एडिटिंग डेस्क वाला मल्टी-टूल। लॉकेट के किनारे पर हल्की-सी दरार थी, जो धूल और समय से छिप गई थी। कबीर ने नोक लगाई। लॉकेट नहीं खुला। “पुराना है। टूट सकता है।” “तोड़।” “यह तेरे पापा की निशानी है।” “और शायद माँ की जान भी।” कबीर ने दबाव बढ़ाया। क्लिक। लॉकेट खुल गया। अंदर काँच के पीछे कोई फोटो नहीं थी। एक बहुत पतला मोड़ा हुआ कागज़ था। रंग हल्का नीला। इतना छोटा कि जैसे किसी ने बड़े पन्ने का सिर्फ एक टुकड़ा बचाया हो। मीरा ने उसे सावधानी से खोला। उस पर पापा की लिखावट थी। शब्द छोटे, बहुत घने, लगभग काँपते हुए। **मीरा के लिए नहीं। अर्चना के लिए। अगर यह मीरा तक पहुँचा है तो हम दोनों असफल रहे।** मीरा का दिल धक से हुआ। नीचे लिखा था— **मुख्य नाम: देवव्रत नाथ। वर्तमान पद—तब जिला पुलिस अधीक्षक। कोड: डी.एन. राघवेंद्र सिंह सिर्फ राजनीतिक चेहरा है। असली रास्ता डी.एन. से होकर जाता है। परियोजना ‘शांत कुआँ’ में मृत घोषित बच्चों को नए नामों से बाहर भेजा जा रहा है। कुछ जिंदा हैं। कुछ नहीं। पोस्ट ऑफिस रिकॉर्ड में असली सूची छिपी है। डाकिया सूची जानता है। लेकिन वह पूरी तरह हमारा नहीं है। अगर मैं गायब हो जाऊँ, तो मीरा को कभी मझगवाँ मत लाना। क्योंकि सूची में उन्नीसवाँ नाम उसका है।** कमरे में सन्नाटा फट गया। मीरा की आँखें उस आखिरी लाइन पर अटक गईं। **सूची में उन्नीसवाँ नाम उसका है।** कबीर ने पन्ना पढ़ा, फिर उसकी तरफ देखा। “मीरा…” मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसके कानों में पापा की पहली रिकॉर्डिंग गूँज रही थी—“आवाज़ 19 सिर्फ मीरा के लिए।” उन्नीसवीं आवाज़। उन्नीसवाँ नाम। अचानक घर के बाहर किसी ने ताली बजाई। धीमी। एक। दो। तीन। मीरा और कबीर ने मुड़कर देखा। आँगन के टूटे दरवाज़े पर बूढ़ा डाकिया खड़ा था। उसकी सफेद धुँधली आँख शांत थी। दूसरी आँख सीधे नीले पन्ने पर टिकी थी। “आखिर मिल ही गया,” उसने कहा। कबीर ने सरिया उठा ली। “एक कदम और बढ़े तो—” डाकिया मुस्कुराया नहीं। बस बोला, “मार दोगे? अच्छा है। एक गवाह कम हो जाएगा।” मीरा ने पन्ना मुट्ठी में कस लिया। “आपने पापा को कहाँ ले गए थे?” बूढ़े ने गहरी साँस ली। “बचाने।” “माँ कहती हैं आप कभी वापस नहीं आए।” “क्योंकि मैं वापस आता तो तुम्हारी माँ मर जाती।” “और पापा?” बूढ़े की आँखों में पहली बार दर्द उभरा। “तुम्हारे पिता ने रास्ते में मुझसे कहा था—अगर मैं बच गया तो मीरा को सच बताऊँगा। अगर नहीं बचा, तो उसे जिंदगी देना, सच नहीं। मैंने वही किया।” “झूठ।” “हाँ,” बूढ़ा बोला, “झूठ। लेकिन कुछ झूठ बच्चों को जिंदा रखने के लिए बोले जाते हैं।” मीरा का गुस्सा अब काँप रहा था। “सूची में मेरा नाम क्यों था?” डाकिया ने आँगन के बाहर झाँका। “यहाँ नहीं। समय कम है। तुम्हारी माँ को उन्होंने सचमुच उठा लिया है। और जिस पुराने सिनेमा हॉल में उन्होंने बुलाया है, वह जगह नहीं, जाल है।” “हमें कैसे पता कि आप जाल नहीं?” डाकिया कुछ पल चुप रहा। फिर उसने अपने कुर्ते की जेब से एक छोटी कैसेट निकाली। उस पर लिखा था— **आवाज़ 2** “क्योंकि अगर मैं जाल होता,” उसने कहा, “तो यह अठारह साल तक अपनी छाती से लगाकर नहीं रखता।” मीरा ने कैसेट की तरफ देखा। “इसमें क्या है?” डाकिया की आवाज़ भर्रा गई। “तुम्हारे पिता की आखिरी साफ़ आवाज़। उसके बाद उनकी आवाज़ सचमुच छीन ली गई थी।” कबीर ने पूछा, “छीन ली गई मतलब?” डाकिया ने धीरे से जवाब दिया— “देवव्रत नाथ लोगों को मारता नहीं था। पहले उनसे उनका नाम छीनता था। फिर आवाज़। फिर कागज़ में उनकी मौत लिख देता था। और जब आदमी अपनी आवाज़ से भी साबित न कर सके कि वह जिंदा है… तब वह सच में मर जाता है।” मीरा की मुट्ठी में नीला पन्ना काँप रहा था। बाहर दूर कहीं सायरन बजा। डाकिया चौंका। “वे आ गए। अब फैसला करो। माँ को बचाना है, तो पहले यह समझना होगा कि वे तुम्हें क्यों चाहते हैं।” मीरा ने पूछा, “क्यों चाहते हैं?” डाकिया ने उसकी आँखों में देखा। “क्योंकि मीरा अवस्थी, तुम अरविंद अवस्थी की बेटी नहीं हो।” मीरा के पैरों के नीचे की जमीन जैसे पीछे हट गई। कबीर ने तेज़ स्वर में कहा, “क्या बकवास—” डाकिया ने उसकी बात काट दी। “सच बकवास जैसा ही लगता है पहली बार।” मीरा की आवाज़ मुश्किल से निकली। “फिर मैं कौन हूँ?” सायरन नज़दीक आ रहा था। डाकिया ने कहा— “तुम शांत कुआँ से निकली हुई इकलौती बची हुई बच्ची हो। और अरविंद अवस्थी ने तुम्हें चुराया नहीं था… बचाया था।” दरवाज़े के बाहर गाड़ियों के ब्रेक चीखे। किसी ने लाउडस्पीकर पर कहा— “घर घेर लिया गया है। मीरा अवस्थी, बाहर आ जाओ।” मीरा ने नीला पन्ना, कैसेट और अपनी टूटी हुई चेन को सीने से लगा लिया। अभी-अभी उसने अपने पिता को दूसरी बार खो दिया था। या शायद पहली बार सच में पाया था।