Vinod 04 Jul 2026 कहानियाँ अन्य #AwaazNumber19 #HindiAudioStory #HindiHorrorStory #SuspenseThriller #MysteryStory #HindiKahani #HorrorKahani #ThrillerStory #AudioSeries #CrimeMystery #PsychologicalThriller #DarawaniKahani 2512 0 Hindi :: हिंदी
भाग 2: नीम के नीचे दबा पहला झूठ “इनके साथ आ जाओ, मेरी बच्ची।” आवाज़ फोन के स्पीकर से निकलकर पुराने पोस्ट ऑफिस की टूटी दीवारों से टकराई और मीरा के भीतर किसी बंद कमरे का दरवाज़ा खोल गई। वह हिली नहीं। उसके सामने काले रेनकोट वाला आदमी खड़ा था। बारिश बंद हो चुकी थी, फिर भी उसके कंधों से पानी की बूँदें टपक रही थीं। शायद वह सचमुच बारिश में भीगा था। या शायद यह उसकी आदत थी—हर मौसम में ऐसा दिखना जैसे किसी अपराध-स्थल से लौटकर आया हो। उसके पीछे तीन आदमी और थे। एक की गर्दन पर भगवा गमछा था, एक ने हरी चेक शर्ट पहनी थी, और तीसरा लगातार मोबाइल से मीरा की तस्वीर मिलाकर देख रहा था। जैसे वह इंसान नहीं, कोई पार्सल हो जिसे सही पते पर पहुँचाना है। मीरा ने फोन की तरफ देखा। “पापा?” उसके होंठ काँपे। उधर कुछ सेकंड सन्नाटा रहा। फिर आवाज़ आई, “बात मान लो, मीरा। अभी सवाल मत पूछो।” यह वही आवाज़ थी। वही ठहराव। वही हल्की-सी थकान। जैसे कोई आदमी बहुत दूर से बोल रहा हो, पर अपने दर्द को पास से छिपा रहा हो। मीरा ने आँखें बंद कीं। दिल ने कहा—भागकर फोन छीन ले। पूछ ले कि अठारह साल कहाँ थे। क्यों नहीं आए। माँ को क्यों रोने दिया। उसे हर फादर्स डे पर खाली कार्ड क्यों बनाना पड़ा। दिमाग ने कहा—जो आवाज़ अठारह साल बाद अचानक लौटे, उस पर भरोसा करना मूर्खता है। डाकिया बूढ़ा, जो अब तक उसके बगल में खड़ा था, बहुत धीरे से बोला, “आवाज़ पर भरोसा मत करना।” रेनकोट वाले ने उसकी तरफ देखा। “काका, आपकी उम्र हो गई है। बीच में बोलना ठीक नहीं।” “उम्र हुई है,” बूढ़े ने छड़ी पर हाथ कसते हुए कहा, “अंधा नहीं हुआ अभी।” रेनकोट वाला मुस्कुराया। “एक आँख तो गई।” बूढ़े ने सीधा जवाब दिया, “दूसरी में तुम सबके बाप का डर अभी भी दिखता है।” हवा ठंडी हो गई। मीरा ने पहली बार समझा कि यह बूढ़ा आदमी सिर्फ कोई डाकिया नहीं था। उसकी झुकी हुई पीठ के भीतर कोई पुराना तूफान छिपा था। फोन पर आवाज़ फिर आई, “मीरा, समय नहीं है। तुम्हें समझ नहीं आ रहा। इनके साथ चली जाओ।” मीरा की आँखें फोन पर टिक गईं। उसने धीरे से पूछा, “अगर आप मेरे पिता हैं… तो मुझे बचपन में क्या कहते थे?” रेनकोट वाला थोड़ा सतर्क हुआ। मोबाइल उसके हाथ में था, पर उसकी उँगलियाँ अब स्क्रीन के पास कस गई थीं। फोन के उस पार कुछ खड़खड़ाहट हुई। फिर आवाज़ आई, “छोटी रेडियो।” मीरा की साँस रुक गई। उस शब्द ने उसे पाँच साल की उम्र में पहुँचा दिया—मिट्टी के आँगन में बैठी छोटी बच्ची, हाथ में खिलौना माइक, और पापा हँसते हुए कहते—“मेरी छोटी रेडियो, दुनिया की सारी खबरें सुनाती है।” लेकिन उस याद के साथ एक और बात आई। एक छोटी-सी बात। पापा उसे “छोटी रेडियो” सिर्फ तब कहते थे जब माँ आसपास होती थीं। जब वे अकेले होते, तो एक दूसरा नाम लेते थे। बहुत निजी। बहुत बचकाना। इतना निजी कि मीरा ने वह नाम किसी को कभी नहीं बताया था। माँ को भी शायद याद न हो। मीरा ने फोन की तरफ देखते हुए कहा, “गलत।” रेनकोट वाले की मुस्कान हल्की-सी टूटी। फोन पर चुप्पी। मीरा ने आगे कहा, “वो मुझे अकेले में ‘टुनटुन रिपोर्टर’ कहते थे। छोटी रेडियो सबको पता था।” बूढ़े डाकिये की बची हुई आँख चमक उठी। फोन के स्पीकर से अचानक खरखराहट आई। फिर आवाज़ बदली नहीं, लेकिन उसका लहजा बदल गया। जैसे किसी ने किसी पुराने चेहरे पर नई नकली मुस्कान चिपका दी हो। “तुम बहुत सवाल पूछती हो।” मीरा पीछे हट गई। रेनकोट वाला तुरंत आगे बढ़ा। “चलो, ड्रामा बहुत हो गया।” “दूर रहो,” मीरा ने कहा। आवाज़ काँप रही थी, पर शब्द साफ़ थे। “मैडम, हमें भी शौक नहीं है सुबह-सुबह पुराना पोस्ट ऑफिस घूमने का। आराम से चलिए। बात हो जाएगी।” “किससे?” “जिसे आप ढूँढ़ रही हैं।” “और अगर मैं नहीं चली?” रेनकोट वाला उसके इतना पास आया कि मीरा को उसके कपड़ों से गीली मिट्टी और सस्ती सिगरेट की गंध आई। “तो हम कह देंगे कि आप चली थीं। फर्क क्या पड़ेगा?” उसने मीरा की कलाई पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया। उसी पल बूढ़े डाकिये की छड़ी हवा में घूमी और रेनकोट वाले की कलाई पर पड़ी। आवाज़ बहुत तेज़ नहीं थी, पर आदमी दर्द से चिल्ला उठा। मोबाइल उसके हाथ से छूटकर मिट्टी में गिरा। बाकी तीन आदमी झपटे। “भाग!” बूढ़ा चीखा। मीरा ने कुछ नहीं सोचा। बैग कसकर पकड़ा और पोस्ट ऑफिस के बरामदे की तरफ भागी। पीछे से कदमों की आवाज़, गालियाँ, और किसी के गिरने की धप्प सुनाई दी। उसने मुड़कर देखने की गलती नहीं की। बरामदे के पीछे सचमुच दीवार टूटी थी। ईंटों के बीच से एक संकरी गली दिख रही थी। मीरा ने बैग पहले फेंका, फिर खुद चढ़ी। एक ईंट ढीली हुई और उसका पैर फिसला। हथेली खुरच गई। घुटना दीवार से टकराया। दर्द उठा, पर डर उससे तेज़ था। वह दूसरी तरफ गिरी, कीचड़ में हाथ धँस गया। पीछे से आवाज़ आई— “पकड़ो उसे!” मीरा उठी और गली में दौड़ी। मझगवाँ की गलियाँ वैसी ही थीं—तंग, टेढ़ी, अचानक खुलती हुई, अचानक बंद होती हुई। कहीं गाय बँधी थी, कहीं टूटी बाल्टी पड़ी थी, कहीं सुबह की रसोई से प्याज़ तड़के की गंध आ रही थी। पर आज हर दरवाज़ा उसे आँख जैसा लग रहा था। हर खिड़की जैसे उसे देख रही थी। वह एक मोड़ पर मुड़ी, फिर दूसरे पर। पीछे से मोटरसाइकिल स्टार्ट होने की आवाज़ आई। उसने दाँत भींचे। फोन जेब में वाइब्रेट कर रहा था। शायद कबीर। शायद माँ। शायद वही नकली पापा। वह दौड़ते-दौड़ते एक छोटे मंदिर के पास पहुँची। मंदिर के बाहर फूल-माला की दुकान अभी खुली ही थी। दुकानदार ने उसे कीचड़ में लथपथ देखकर चौंककर पूछा, “अरे बिटिया, गिर गईं क्या?” मीरा ने जवाब नहीं दिया। उसकी नज़र सड़क पर खड़ी अपनी कार पर थी। पोस्ट ऑफिस से थोड़ी दूर, उसी तरफ। पर अब कार तक जाना खतरा था। वहाँ वे लोग पहुँच चुके होंगे। तभी उसकी जेब में फोन बजना बंद हुआ और तुरंत फिर बजा। इस बार उसने उठाया। “कहाँ है तू?” कबीर की आवाज़ फट रही थी। “पीछे पड़े हैं।” “कौन?” “पता नहीं। चार आदमी। एक रेनकोट वाला। आवाज़ नकली थी। पापा की आवाज़ क्लोन कर रहे हैं शायद।” “मैंने बोला था अकेले मत जा!” “अब डाँट मत।” “लोकेशन भेज। अभी।” “फोन ट्रैक हो सकता है।” “वाह! अब अक्ल आ रही है?” मीरा ने मंदिर के पीछे छाया में खड़े होकर साँस संभाली। “तू कहाँ है?” “मैं अभी आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर हूँ। तेरे पीछे निकला था। दो घंटे लगेंगे।” “दो घंटे में तो ये लोग मुझे बेचकर बिल बना देंगे।” “कोई पब्लिक जगह जा। पुलिस स्टेशन जा।” मीरा हँसी। वह हँसी अपने आप निकली, कड़वी और थकी हुई। “माँ ने कहा था पुलिस शामिल थी।” कबीर चुप। फिर बोला, “ठीक है। पुराने घर जा सकती है?” मीरा ने आँखें बंद कीं। पुराने घर का रास्ता उसे याद था। बचपन के घर भूलते नहीं, चाहे शहर बदल जाए, नाम बदल जाए, किरायेदार बदल जाएँ। उनके दरवाज़े दिमाग में वैसे ही खड़े रहते हैं। “शायद।” “वहीं जा। पर सीधा मत जाना। दो गलियाँ काटकर। और सुन—फोन की लोकेशन बंद कर, नेट बंद कर, पर कॉल मत काट। जेब में रख। मैं सुनता रहूँगा।” “तू दो घंटे दूर बैठकर क्या करेगा?” “डर बाँटूँगा। अभी मेरे पास यही सुविधा है।” मीरा के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आई, मगर अगले ही पल मोटरसाइकिल की आवाज़ पास आई। उसने फोन जेब में डाला और मंदिर के पीछे वाली गली में घुस गई। पुराना घर बाज़ार से हटकर था। कभी उस गली में सिर्फ पाँच मकान थे। अब वहाँ दस दुकानें, दो क्लिनिक, एक कोचिंग सेंटर और बीच में फँसा उनका पुराना मकान था। नीली पुताई उतर चुकी थी। लोहे का गेट बदल गया था, पर खिड़की वही थी—जिसमें बचपन में मीरा चेहरा चिपकाकर बारिश देखती थी। दरवाज़े पर ताला लगा था। मीरा ने माँ की जंग लगी चाबी निकाली। हाथ काँप रहे थे। पहली चाबी नहीं लगी। दूसरी भी नहीं। तीसरी आधी घुसी और अटक गई। पीछे गली में किसी के कदमों की आवाज़ आई। उसने पसीने से भीगी हथेली कुर्ते पर पोंछी। चाबी फिर घुमाई। क्लिक। ताला खुल गया। वह अंदर घुसी और दरवाज़ा भीतर से बंद कर लिया। घर में अंधेरा था। मिट्टी, सीलन और पुराने लकड़ी के फर्नीचर की गंध थी। जैसे समय ने यहाँ साँस लेना छोड़ दिया हो। सामने छोटा-सा आँगन था। बीच में सूखा तुलसी चौरा। दीवार पर कीलों के निशान, जहाँ कभी कैलेंडर और भगवान की तस्वीरें लगी होंगी। फर्श पर धूल जमी थी, लेकिन कुछ जगहों पर धूल टूटी हुई थी। कोई पहले भी यहाँ आया था। हाल ही में। मीरा की साँस फिर तेज़ हो गई। जेब से कबीर की धीमी आवाज़ आई, “कहाँ पहुँची?” उसने फोन निकाला। “घर में हूँ।” “सेफ?” “पता नहीं।” “दरवाज़ा बंद?” “हाँ।” “अंदर कोई है?” मीरा ने चारों ओर देखा। घर शांत था। पर शांत जगहों में सबसे ज्यादा आवाज़ें छिपी होती हैं। “देखती हूँ।” “मत देख! पहले कोई भारी चीज़ उठा।” मीरा को कोने में लोहे की पुरानी सरिया दिखी। शायद छत की मरम्मत से बची होगी। उसने उठाई। फिर धीरे-धीरे कमरे की तरफ बढ़ी। पहला कमरा खाली था। पुराने अखबारों का ढेर, टूटी कुर्सी, बंद अलमारी। दूसरा कमरा माँ का रहा होगा। दीवार पर हल्के गुलाबी रंग के निशान थे। कोने में एक पुराना आईना था जिसकी सतह काली पड़ चुकी थी। मीरा ने खुद को उसमें देखा—धूल, खून की पतली लकीर, डर और जिद का मिलाजुला चेहरा। तीसरे कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। यही पापा का कमरा था। बचपन में माँ इसे “स्टडी” कहती थीं। पापा इसे “न्यूज़रूम” कहते थे। मीरा को याद था, वह छोटी मेज, काले रंग का टाइपराइटर, दीवार पर नक्शा, और कोने में रेडियो रखा रहता था। रात को पापा देर तक काम करते, और मीरा दरवाज़े से झाँककर पूछती—“ब्रेकिंग न्यूज़ क्या है?” पापा कहते—“ब्रेकिंग न्यूज़ यह है कि टुनटुन रिपोर्टर सोएगी नहीं तो कल स्कूल में पिटेगी।” कमरा अब लगभग खाली था। पर पूरी तरह नहीं। मेज अब भी थी। टेढ़ी, धूल भरी, पर वही। उसके ऊपर एक टूटा रेडियो रखा था। दीवार पर नक्शे की जगह एक बड़ा आयताकार दाग था। जैसे किसी ने कुछ उतारा हो। खिड़की आधी खुली थी, और उसके नीचे धूल पर जूते के निशान थे। मीरा नीचे झुकी। जूते के निशान बड़े थे। ताज़ा। मिट्टी अब भी गीली थी। तभी घर के बाहर मोटरसाइकिल रुकी। मीरा का शरीर बर्फ हो गया। कबीर ने फोन में फुसफुसाया, “क्या हुआ?” “वे आ गए।” “कितने?” “श्श्श।” बाहर से किसी ने दरवाज़े पर हल्का धक्का दिया। फिर आवाज़ आई— “मैडम? पता है आप अंदर हैं। आराम से दरवाज़ा खोलिए।” रेनकोट वाला। मीरा ने कमरे का दरवाज़ा धीरे से बंद किया। चारों ओर देखा। छिपने की जगह? अलमारी? नहीं। खिड़की? बाहर छोटी गली थी। पर लोहे की ग्रिल लगी थी। दरवाज़े पर इस बार जोर से धक्का पड़ा। “देखिए, हमें बुरा बनने का शौक नहीं है। कैसेट दे दीजिए, आप जाइए।” कैसेट। तो उन्हें पता था। मीरा ने बैग से कैसेट निकाली। पुरानी, काली, प्लास्टिक में लिपटी। उस पर “आवाज़ 1” लिखा था। कबीर फोन में बोला, “मीरा, सुन। कैसेट की फोटो भेज सकती है?” “नेट बंद है।” “ठीक। उसे छिपा। अभी।” मीरा की नज़र टूटे रेडियो पर गई। रेडियो भारी था। पीछे बैटरी का ढक्कन आधा टूटा हुआ था। उसने कैसेट को प्लास्टिक सहित रेडियो के अंदर की खाली जगह में ठूँस दिया और रेडियो वापस रख दिया। दरवाज़े पर तीसरा धक्का पड़ा। लकड़ी चरमराई। मीरा ने सरिया पकड़ी और कमरे के पीछे बनी छोटी कोठरी में घुस गई। वहाँ पुराने बक्से रखे थे। छत नीचे थी। हवा में धूल तैर रही थी। उसने दरवाज़ा अंदर से थोड़ा खुला छोड़ा, ताकि बाहर देख सके। मुख्य दरवाज़ा टूटने की आवाज़ आई। फिर भारी कदम। “ढूँढ़ो,” रेनकोट वाला बोला। “ऊपर भी देखना। पुराना घर है, तहखाना-वहखाना कुछ भी हो सकता है।” एक आदमी बोला, “साहब ने कहा था लड़की को चोट नहीं लगनी चाहिए।” रेनकोट वाला हँसा। “साहब ने यह भी कहा था कि कैसेट नहीं खोनी चाहिए। दोनों काम हमेशा साथ नहीं होते।” साहब। कौन साहब? मीरा ने साँस रोक ली। दो आदमी पापा के कमरे में घुसे। एक ने मेज पर हाथ मारा। धूल उड़ी। वह खाँसा। “कुछ नहीं है।” दूसरे ने अलमारी खोली। लकड़ी चटखी। सामान गिरा। “पुराना कबाड़।” रेनकोट वाला धीरे-धीरे कमरे में आया। उसके जूतों की आवाज़ अलग थी—भारी, नापी हुई। वह मेज के पास रुका। मीरा की नज़र दरवाज़े की पतली दरार से उस पर थी। उसने टूटे रेडियो को देखा। एक पल। दो पल। फिर उसने रेडियो उठाया। मीरा की उँगलियाँ सरिया पर कस गईं। रेनकोट वाले ने रेडियो उलटा-पलटा। पीछे का टूटा ढक्कन उसकी तरफ था। अगर उसने उँगली अंदर डाली तो कैसेट मिल जाएगी। तभी बाहर से एक लड़के की आवाज़ आई— “ओए! किसका घर तोड़ रहे हो?” सब चौंक गए। मीरा ने दरार से देखा। कमरे के बाहर आँगन में कोई खड़ा था। कबीर। साँस फूलती हुई। बाल बिखरे हुए। काली टी-शर्ट पर पसीने और धूल के निशान। हाथ में मोबाइल, जैसे वह किसी न्यूज चैनल की लाइव रिपोर्टिंग कर रहा हो। रेनकोट वाला बाहर निकला। “तू कौन?” कबीर ने मोबाइल सीधा उसके चेहरे पर कर दिया। “लाइव हूँ भाई। पूरा मझगवाँ देख रहा है। चार गुंडे एक लड़की के पुराने घर में घुसकर सामान तोड़ रहे हैं। बोलो, नाम क्या है?” रेनकोट वाला एक सेकंड को ठिठका। बाकी आदमी भी। कबीर ने आवाज़ और ऊँची की, “अरे आवाज़ नहीं आ रही? जनता जानना चाहती है।” रेनकोट वाले ने धीरे से कहा, “मोबाइल नीचे कर।” “क्यों? चेहरे पर कॉपीराइट है क्या?” “नीचे कर, वरना—” “वरना क्या? मारोगे? लाइव में मारो। वायरल हो जाएगा। तुम लोग लोकल हो न? कल तक तुम्हारे घरवाले भी कहेंगे—बेटा अच्छा कर रहा है, बस कैमरे पर मत आया कर।” एक आदमी कबीर की तरफ बढ़ा। कबीर पीछे हटने के बजाय और पास आ गया। “हाँ आओ। क्लोज़-अप लेता हूँ।” मीरा समझ गई—कबीर ब्लफ कर रहा था। शायद लाइव नहीं था। शायद नेटवर्क भी नहीं। लेकिन उन आदमियों को यह नहीं पता था। रेनकोट वाले ने कुछ सोचा। फिर रेडियो मेज पर रख दिया। “चलो,” उसने कहा। “साहब—” चेक शर्ट वाला बोला। रेनकोट वाले ने उसे घूरा। “चलो।” वे एक-एक करके बाहर निकले। जाते-जाते रेनकोट वाला कबीर के पास रुका। “हीरो बनने की बीमारी है?” कबीर ने मुस्कुराकर कहा, “पुरानी है। इलाज महंगा है।” रेनकोट वाला उसके कान के पास झुककर बोला, “लड़की को बचा ले आज। कहानी लंबी है। अगली बार एपिसोड तुम्हारे नाम का होगा।” कबीर की मुस्कान जमी रही, पर आँखों में डर तैर गया। मोटरसाइकिलें स्टार्ट हुईं। आवाज़ दूर जाती गई। कुछ सेकंड तक घर में कोई नहीं बोला। फिर कोठरी का दरवाज़ा खुला और मीरा बाहर आई। कबीर ने उसे देखा। “तू ठीक है?” मीरा ने कुछ नहीं कहा। बस आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया। कबीर ने पहले तो अजीब-सा हाथ हवा में रखा, फिर धीरे से उसकी पीठ थपथपाई। “ठीक है। ठीक है। रोना है तो रो ले। पर जल्दी। क्योंकि मुझे भी डर लग रहा है और मैं पहले रोना चाहता हूँ।” मीरा हल्का-सा हँसी, फिर अलग हुई। “तू दो घंटे दूर था।” “मैंने झूठ बोला था।” “क्या?” “मैं मझगवाँ पहुँच चुका था जब तेरा कॉल आया। तुझे डर लगे तो मैं रास्ते में हूँ वाला सस्पेंस रखा।” “तू पागल है?” “हाँ। और तू? तू तो नोएडा से अकेली भूतिया कैसेट लेने आ गई। हम दोनों की मानसिक स्थिति पर डॉक्यूमेंट्री बन सकती है।” मीरा ने मेज पर रखा रेडियो उठाया और अंदर से कैसेट निकाली। कबीर ने उसे देखकर सीटी बजाई। “ओहो। विंटेज डरावना सबूत।” “इसे सुनना होगा।” “कहाँ? यहाँ? जहाँ अभी गुंडे दरवाज़ा तोड़कर गए हैं?” “तो कहाँ?” कबीर ने आँगन से बाहर झाँका। “मेरे मामा का पुराना साइबर कैफे है। बंद पड़ा है। वहाँ कंप्यूटर, इंटरनेट, और सबसे जरूरी—दरवाज़े पर दो ताले हैं।” “कैसेट चलाने की मशीन?” “मामा के पास सब है। वो आदमी आज भी मानता है कि सीडी पेन ड्राइव से ज्यादा सुरक्षित होती है।” मीरा ने बैग उठाया। “चल।” “रुक।” कबीर ने टूटा दरवाज़ा देखा। “पहले यहाँ से कुछ और देखते हैं। तूने कहा था पापा का कमरा था न?” मीरा ने सिर हिलाया। कबीर ने कमरे को ध्यान से देखा। वह वैसे तो मज़ाकिया था, पर काम के वक्त उसकी आँखें बदल जाती थीं। वह छोटी-छोटी चीज़ें पकड़ता था—कौन-सी धूल ताज़ा टूटी, कौन-सा तार नया है, किस फाइल का नाम अजीब है। उसने मेज के नीचे झुककर देखा। फिर दीवार के दाग के पास गया, जहाँ कभी नक्शा रहा होगा। उँगली से दाग के किनारे पर हाथ फेरा। “यहाँ कुछ लगा था,” उसने कहा। “नक्शा।” “नक्शे के पीछे?” “मुझे नहीं पता। मैं तब बच्ची थी।” कबीर ने दीवार थपथपाई। एक जगह आवाज़ खोखली आई। मीरा ने सरिया उठाई। कबीर ने उसकी तरफ देखा। “वाह। थ्रिलर मोड ऑन।” दोनों ने मिलकर दीवार के उस हिस्से को कुरेदा। प्लास्टर पुराना था, जल्दी टूटने लगा। भीतर से ईंटों के बीच एक पतली धातु की प्लेट दिखी। कबीर ने सरिया अटकाकर उसे बाहर निकाला। वह एक छोटा डिब्बा था। दीवार के अंदर छिपा हुआ। मीरा के हाथ फिर काँपे। कबीर ने धीरे से कहा, “यह घर तो खजाना निकला।” डिब्बे में एक पुरानी फोटो, कुछ कागज़ और एक छोटी डायरी थी। डायरी के कवर पर पापा की लिखावट में लिखा था— **अगर मीरा कभी लौटे।** मीरा ने डायरी को ऐसे छुआ जैसे वह किसी जीवित चीज़ को छू रही हो। पहले पन्ने पर सिर्फ एक लाइन थी— **मेरी टुनटुन रिपोर्टर, अगर तुम यह पढ़ रही हो, तो समझो मैंने तुम्हें सच तक पहुँचाने में बहुत देर कर दी।** मीरा की आँखों से आँसू गिरकर पन्ने पर फैल गए। कबीर ने कुछ नहीं कहा। उसने बस आँगन की तरफ पीठ कर ली, जैसे उसे पढ़ने के लिए अकेलापन दे रहा हो। मीरा ने दूसरा पन्ना पलटा। **तारीख: 13 जुलाई 2008** **स्थान: मझगवाँ** **विषय: परियोजना ‘शांत कुआँ’** नीचे लिखा था— **यह सिर्फ अवैध जमीन घोटाला नहीं है। यह बच्चों के गायब होने, फर्जी मौतों और चुनावी फंडिंग से जुड़ा है। मैं जिन नामों को लिख रहा हूँ, उनमें से कोई भी नाम अगर बाहर गया तो मेरे परिवार की जान जाएगी। पर अगर नहीं गया, तो सैकड़ों परिवारों की जान जा सकती है।** मीरा ने पढ़ना रोक दिया। बच्चे गायब होने? फर्जी मौतें? चुनावी फंडिंग? कबीर पास आया। “क्या लिखा है?” मीरा ने डायरी उसकी तरफ बढ़ाई। कबीर ने पढ़ा और उसका चेहरा पहली बार सचमुच पीला पड़ गया। “ये तो बहुत बड़ा मामला है,” उसने कहा। “पापा पत्रकार थे। शायद इसी पर काम कर रहे थे।” “और आग?” “शायद उन्हें चुप कराने के लिए।” कबीर ने धीरे से कहा, “या गायब करने के लिए।” मीरा ने उसे देखा। बाहर दूर कहीं मंदिर की घंटी बज रही थी। किसी घर में प्रेशर कुकर की सीटी आई। सामान्य जीवन अपनी पूरी बेशर्मी से चलता रहा, जबकि इस कमरे में अठारह साल पुराना सच साँस लेने लगा था। मीरा ने डायरी के अगले पन्ने पलटे। कई जगह नाम काटे गए थे। कुछ जगहों पर सिर्फ अक्षर थे— **आर.एस.** **डी.एन.** **मंत्री जी से संपर्क — पुष्टि बाकी** **पोस्ट ऑफिस रिकॉर्ड — सबसे अहम** **आवाज़ें 1 से 18 सुरक्षित करनी हैं। 19 सिर्फ मीरा के लिए।** मीरा का गला सूख गया। “उन्हें पता था कि 19 मेरे लिए होगी।” कबीर ने कहा, “मतलब उन्होंने सब पहले से प्लान किया था।” “लेकिन 19 तो मुझे किसी और ने भेजी।” “या पापा ने किसी के भरोसे छोड़ी थी।” “या जिसने उन्हें खत्म किया, उसने अब खेल शुरू किया है।” कबीर ने खिड़की से बाहर देखा। “हमें यहाँ से निकलना होगा।” मीरा ने डायरी, फोटो और कागज़ बैग में डाले। पर तभी डायरी के बीच से एक छोटा कागज़ गिरा। वह किसी पुराने सरकारी फॉर्म का टुकड़ा था। उस पर पापा की जल्दबाज़ी भरी लिखावट थी— **डाकिया भरोसेमंद है। लेकिन पूरी बात उसे भी नहीं बतानी। अगर मैं न लौटूँ तो मीरा को आवाज़ 1 से शुरू करना। आवाज़ 19 सुनने के बाद कोई उसके पीछे आएगा। वह असली नहीं होगा।** मीरा ने कागज़ कबीर को दिखाया। कबीर ने पढ़ा और फुसफुसाया, “तेरे पापा को पता था कि कोई उनकी आवाज़ इस्तेमाल करेगा?” “2008 में वॉइस क्लोनिंग ऐसी नहीं थी।” “तो फिर?” मीरा ने जवाब नहीं दिया। क्योंकि उसी समय घर के पुराने रेडियो से आवाज़ आई। दोनों जम गए। रेडियो बंद था। उसमें बैटरी नहीं थी। तार टूटा हुआ था। फिर भी उसकी टूटी जाली के भीतर से खरखराहट उठ रही थी। कबीर ने पीछे हटते हुए कहा, “ये मैंने नहीं किया।” रेडियो में स्टैटिक बढ़ा। फिर किसी बहुत दूर की, बहुत दबाई हुई आवाज़ ने कहा— “मीरा…” मीरा की उँगलियाँ बर्फ हो गईं। कबीर ने फुसफुसाया, “यह कैसे—” आवाज़ फिर आई। इस बार साफ़। “घर से बाहर मत निकलना। दरवाज़े पर जो लोग गए हैं… वे वापस नहीं आएँगे।” मीरा ने काँपते हुए पूछा, “कौन बोल रहा है?” कुछ पल चुप्पी रही। फिर जवाब आया— “वही, जिसे तुम्हारी माँ ने अठारह साल पहले मरवा दिया था।” मीरा की साँस रुक गई। कबीर ने सरिया उठा ली। आवाज़ ने बहुत धीरे कहा— “और मीरा… अपनी माँ पर भरोसा मत करना।” उसी पल बाहर गली से चीख सुनाई दी। एक आदमी की। फिर दूसरी। फिर मोटरसाइकिल के गिरने की आवाज़। कबीर खिड़की की तरफ भागा, पर मीरा ने उसका हाथ पकड़ लिया। “मत देख।” पर कबीर ने फिर भी परदे की फटी हुई दरार से बाहर झाँका। गली में वही काला रेनकोट पड़ा था। आदमी नहीं। सिर्फ रेनकोट। उसके पास मोबाइल गिरा था, जिसकी स्क्रीन पर एक लाइव कॉल अब भी चल रही थी। कबीर ने बहुत धीरे कहा, “मीरा…” “क्या?” “कॉल पर नाम दिख रहा है।” “किसका?” कबीर ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर डर नहीं था। उससे भी बुरी चीज़ थी—पहचान। “तुम्हारी माँ का।”