Umendra nirala 15 Oct 2024 ग़ज़ल राजनितिक 38653 0 Hindi :: हिंदी
कुछ न होते हुए झूठे अरमान में है,
पर कटा परिंदा भी अब उड़ान मे है।
रहे शिकन माथे पर क़स रहे थे ताने,
जीत हुई निश्चय तो सारा जहान है।
गाँव के वो ढह रहे आशियाने,
बना रहे शहर में वो जर्ज़र मकान है।
हैरान है, सब तल्ख इस बात पे,
मुनासिब से कहीं ऊँची लगान है।
देखकर जो दिखा चेहरे का शोर,
छिपे चेहरे में जंगल सा सुनसान है।
सहमा रहा वह अपनों के तकरार में,
लोग समझते रहे उसमें अब भी थकान है।
नाविक जो धैर्य न खोये मझधार में,
तसव्वुर है कि, उसमें साहस का ऊँचा तूफान है।
विरासत कि बुलंदियों के पुल बांध रहे है,
फक़त ये है कि,ये खुद कि पहचान है।
(पहचान )
उमेन्द्र निराला