रघुवीर सिंह पंवार 10 Jul 2024 कविताएँ दुःखद किसान की दारुण दुःख भरी बात 50597 0 Hindi :: हिंदी
कविता रघुवीर सिंह पंवार धूप में तपता, धरती का लाल, हाथ में हल, आँखों में सवाल। हर बूँद पसीने की, बनती मोती, खेती करता, सजाता अपनी ओटी। बादल से बिनती, पानी बरसाओ, फसलें लहराएँ, खेत हरियालाओ। सुबह से शाम तक, मेहनत का साथी, कभी हँसता, कभी रोता, ये किसान राही। पत्नी की आँखों में, सपने अधूरे, बच्चों की हँसी, कभी कभी सूखे। फसलें जब लहराएँ, दिल में उमंग, पर जब बारिश ना हो, छाती में तंग। सरकारें आती, वादे सुनाती, लेकिन उसका दर्द, कौन समझ पाती? कर्ज के बोझ से, झुका है किसान, फिर भी बनाता, अनाज का गुमान। कभी-कभी सोचता, छोड़ दूँ ये राह, पर प्यार है धरती से, कैसे छोड़ूँ चाह? हर फसल में बसता, उसका सपना प्यारा, किसान का दिल, जैसे आसमान का तारा। धरती का बेटा, संघर्षों का साथी, हर मौसम में खड़ा, चाहे हो सर्दी या बरसाती। किसान की ये गाथा, न भूले कोई, उसके बिना दुनिया, भूखी ही रह जाए कोई।