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नियति

Vipin Bansal 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक #नियति 51271 0 Hindi :: हिंदी

नियति का न कोंई तोड़ ! 
नियति जब खोले पोल !! 
हवस की गठरी भर नहीं पाए ! 
कर्म की लेखी मिट नहीं पाए !! 
कर्म के जैसे बीज लगाए ! 
फूट के वो ही बाहर आए !! 
कुदरत का न इसमें रोल ! 
तेरे कर्मों का ही मोल !! 
वक्त ए तराजू की है तोल ! 
इसमे न है कोंई झोल !! 
नियति का न कोंई तोड़ ! 
नियति जब खोले पोल !! 

सौंदर्य प्रकृति का हमने बिगाड़ा ! 
गंगा जल में जहर है डाला !! 
नदियों का आकार घटाया ! 
वनों को हमने बौना बनाया !! 
कुदरत का किया उपहास ! 
अपने कर्मों की है मार !! 
कुदरत का न इसमें दोष ! 
हमने खो दिए अपने होश !! 
हमारे गुनाह रहे हैं बोल ! 
अब तो अपनी आँखे खोल !! 
नियति का न कोंई तोड़ ! 
नियति जब खोले पोल !!

      विपिन बंसल 

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