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ग़ज़ल
Sare aaina juda rha koi
सरे आईना जुदा रहा कोई,पसे आईना छुपा रहा कोई अपने अकल ऐ तसब्बुर मे,सारी उमर खुदा रहा कोई जहन से मिट गया मेरे मगर,दिल पे कही गुदा रहा कोई
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अपनी सदाकत के अरकान नही मरने दिए
अपनी सदाकत के अरकान नही मरने दिए जमीन मे मिल गये अरमान नही मरने दिए अपने अंदर के जलजलों को रवां दवां रखा अपने ख्यालातों के तूफान नही
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एक पागल लड़की
तेरे इश्क़ में एक पागल लड़की, तेरा ख्वाब लिये बैठी हैं। तुम कहीं और जा रहे हो, वो तुम्हारे इंतेज़ार में नैन भीगोयें बैठी हैं।।
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कौन करे इस मसले मे बात हमारे मन की
कौन करे इस मसले मे बात हमारे मन की न दिन हमारे मन का न रात हमारे मन की कुछ नही था ऐसा,सोच रखा था जैसा,ना मेघ हमारे मन के न बरसात हमारे मन क
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हक दोस्ती का अदा रिश्तों की तरह कर
हक दोस्ती का अदा रिश्तों की तरह कर तू इबादत कर तो फरिश्तों की तरह कर एकमुश्त ना चुका ये कर्ज मुहब्बतों का थोड़ा थोड़ा अदा,किश्तों की �
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उसे देखकर आखिर क्यों मचल जाता
उसे देखकर आखिर क्यों मचल जाता जब वो नही बदला मैं क्यों बदल जाता वो चराग होकर भी जल न सका कभी मैं दियासलाई होकर क्यों जल जाता तेरी बेम�
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पंसद नही हैं अगर तो भुला दे हमको
पंसद नही हैं अगर तो भुला दे हमको या मौत की गहरी नींद सुला दे हमको माजूर हैं,भूखे भी,हमें तरकीबें न सुझा खाना खिला या जहर पिला दे हमको �
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तूने जो कही थी मन मे वो बात दबी है अबतक
तूने जो कही थी मन मे वो बात दबी है अबतक दिन के उजालों के पांव तले रात दबी है अबतक अछूतों से मतलब की वो बात तो हंसकर करते हैं कुंठित जहन म
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रोने के दिन वापस आ गए क्या
रोने के दिन वापस आ गए क्या खुशियों पे अंधकार छा गए क्या जंगल जंगल किसको ढूंढ रहे हो ये जंगल तुमको भी भा गए क्या उत्पात मचाने वाले बे�
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उजालों से अंधेरों मे बदल गए लोग
उजालों से अंधेरों मे बदल गए लोग फितरत के मुताबिक ढल गए लोग सुलगते शोलों के मानिंद थे कमजर्फ थोड़ी हवा लगी और जल गए लोग मैदाने जंग मे �
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तेरे खावों ख्यालों की दुनियाँ हूँ मैं
तेरे खावों ख्यालों की दुनियाँ हूँ मैं शाम है तू,उजालों की दुनियाँ हूँ मैं जबाब मयस्सर हों तो आना कभी अनगिनत सवालों की दुनियाँ हूँ मै�
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वो कोई दरवेश या कलंदर है तो मैं क्या करूँ
जितना बाहर उतना अंदर है तो मैं क्या करूँ वो अगर दरिया या समंदर है तो मैं क्या करूँ अपने मिज़ाज का मैं भी अड़ियल फकीर हूँ अपने मिज़ाज क
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