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Trishika Srivastava

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My Articles

बहुत कोशिश की मैंने ता'अल्लुक सुधारेने की मगर उसने तो कसम खाई थी बात बिगाड़ने की हज़ार मिन्नतें की मैंने उसने इक न मानी क्योंकि उसकी त read more >>
दिल में इस तरह तिरी याद आई सूने सहरा में गोया बहार आई कागज़ पे बयां कैसे करूँ ग़म-ए-हिज्र मिरी कलम में नहीं है इतनी रोशनई — त्रिशिका श read more >>
ग़रीबों को नहीं, ग़रीबी को दूर करते रहिए। जब तलक ज़िन्दगी है, सबकी मदद करते रहिए। इनकी ज़ुबान नहीं होती, मग़र ये दिल से दुआ देते हैं; आ� read more >>
ईमान बेच चुके हैं, न जाने किस लाचारी में खड़े हैं दो-चार, उस मक्कार की तरफ़दारी में जिधर मिले मुनाफ़ा , उधर ही ढुनक जाते हैं दो-चार बैंगन ऐस� read more >>
(1). मेरे किरदार पे उसकी ऊगली न उठी होती गर उसकी भी कोई बहन या बेटी होती (2). ख़ुद्दारी गवां कर ता'अल्लुक निभाना मुनासिब नहीं ख़ुद को इतना गि� read more >>
(1). हमारे दरमियाँ दीवार है क्या? तेरा मेरा मिलना दुश्वार है क्या? इक-इक साँस मुझे बोझ लगती है, तू भी मेरे बिना बे-क़रार है क्या? (2). कितने चे read more >>
उम्मीद मत रखिए किसी से दिलनवाज़ी की, खिदमत अब करते हैं लोग बस दिखावे की। बड़े अदब से पेश आते हैं दौलत वालों से, इज़्ज़त नहीं करते अब ल� read more >>
मैंने कितनी अदाएँ बदलीं, तुम्हे रिझाने की ख़ातिर। मैंने अधरों पे बंसी सजाई, तुम्हे लुभाने की ख़ातिर। न जाने क्यों दुनिया, सुन कर चली आत� read more >>
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