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लोकतंत्र की रक्षा में प्रतिरोध की भूमिका This post in Under Review

Ajay kumar suraj 21 Jul 2026 आलेख देश-प्रेम #लोकतंत्र_की_रक्षा_में_प्रतिरोध_की_भूमिका 271 0 Hindi :: हिंदी

लोकतंत्र की रक्षा में प्रतिरोध की भूमिका

✍️ अजय कुमार सूरज की कलम से

"मायने यह नहीं रखता कि तुम युद्ध जीते या हारे, मायने यह रखता है कि तुम अन्याय के विरुद्ध अंतिम साँस तक डटकर खड़े रहे। इतिहास विजेताओं से अधिक उन लोगों को याद रखता है जिन्होंने सच और न्याय का साथ नहीं छोड़ा।"

लोकतंत्र केवल एक शासन व्यवस्था नहीं, बल्कि एक नैतिक और संवैधानिक संस्कृति है। इसकी सफलता केवल नियमित चुनावों से नहीं मापी जा सकती, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि नागरिक कितनी स्वतंत्रता के साथ अपनी बात कह सकते हैं, सत्ता से प्रश्न पूछ सकते हैं और बिना भय के असहमति व्यक्त कर सकते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी जनता होती है, और जनता की सबसे बड़ी शक्ति उसका संविधान तथा उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

भारत का संविधान नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा के साथ जीने का अधिकार देता है। यही कारण है कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करना राष्ट्र-विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का हिस्सा माना जाता है। सत्ता चाहे किसी भी राजनीतिक दल के हाथ में हो, उससे जवाबदेही की अपेक्षा करना नागरिक का अधिकार और कर्तव्य दोनों है।

हाल के वर्षों में शासन की कार्यशैली को लेकर देश में व्यापक बहस हुई है। विपक्षी दलों, अनेक सामाजिक संगठनों, पत्रकारों और नागरिक अधिकार समूहों ने समय-समय पर यह चिंता व्यक्त की है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति के अधिकार पर दबाव बढ़ा है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार इन आरोपों को अस्वीकार करते हुए यह कहती रही है कि उसके सभी कदम संविधान, कानून और राष्ट्रीय हित के अनुरूप हैं। इन परस्पर विरोधी दावों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ कितनी स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी बनी रहती हैं।

इसी संदर्भ में पुलिस और प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में पुलिस का दायित्व किसी राजनीतिक दल, सरकार या नेता की नहीं, बल्कि संविधान और कानून की सेवा करना है। जब किसी समाज में यह धारणा बनने लगे कि कानून का प्रयोग निष्पक्षता के बजाय राजनीतिक प्रभाव में हो रहा है, तब लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर पड़ने लगता है। हालाँकि यह भी उतना ही आवश्यक है कि पूरे पुलिस बल या प्रशासनिक तंत्र पर एक समान आरोप न लगाए जाएँ। देश में हजारों अधिकारी ऐसे हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी, निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध रहकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। इसलिए संस्थाओं की आलोचना का उद्देश्य उन्हें कमजोर करना नहीं, बल्कि उन्हें अधिक उत्तरदायी और निष्पक्ष बनाना होना चाहिए।

भारतीय साहित्य ने हमेशा सत्ता के अहंकार पर प्रश्न उठाने और जनता की आवाज़ बनने का कार्य किया है। जनकवि दुष्यंत कुमार ने अपनी प्रसिद्ध पंक्तियों में लिखा था—

«"सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मेरा मक़सद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।"»

यह केवल एक कविता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतना का घोष है। यह बताती है कि विरोध का उद्देश्य व्यवस्था को तोड़ना नहीं, बल्कि उसे अधिक न्यायपूर्ण और संवेदनशील बनाना है।

इसी प्रकार बाबा नागार्जुन ने आपातकाल के दौर में सत्ता से बेखौफ प्रश्न पूछे। उनकी चर्चित कविता "इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको?" भारतीय साहित्य में इस बात का प्रमाण है कि कवि का दायित्व सत्ता का गुणगान करना नहीं, बल्कि जनता के विवेक को जगाए रखना है। लोकतंत्र में साहित्य, पत्रकारिता और नागरिक समाज तभी सार्थक होते हैं जब वे सत्ता और समाज—दोनों से प्रश्न पूछने का साहस रखें।

इतिहास यह भी सिखाता है कि किसी भी लोकतंत्र का पतन एक दिन में नहीं होता। संस्थाओं की स्वायत्तता में धीरे-धीरे आई कमी, आलोचना के प्रति असहिष्णुता, सार्वजनिक संवाद का कमजोर होना और नागरिकों में भय का वातावरण—ये सभी संकेत लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी हो सकते हैं। इसलिए लोकतंत्र की रक्षा केवल न्यायपालिका, संसद या चुनाव आयोग की जिम्मेदारी नहीं है; यह प्रत्येक नागरिक की साझा जिम्मेदारी है।

आज आवश्यकता किसी व्यक्ति-पूजा या दल-पूजा की नहीं, बल्कि संविधान-पूजा की है। सरकारें बदलती रहती हैं, राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, लेकिन संविधान और लोकतांत्रिक मूल्य स्थायी रहने चाहिए। यदि नागरिक प्रश्न पूछना छोड़ दें, यदि मीडिया निष्पक्षता खो दे, यदि संस्थाएँ अपने संवैधानिक दायित्व से विचलित हो जाएँ, तो लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप कमजोर पड़ जाता है।

अंततः इतिहास यह नहीं पूछेगा कि आप किस दल के समर्थक थे। इतिहास यह देखेगा कि जब न्याय, स्वतंत्रता और संविधान की रक्षा का प्रश्न उठा, तब आपकी भूमिका क्या थी। क्या आपने भय के कारण मौन धारण कर लिया, या लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहकर सत्य, न्याय और संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में अपनी आवाज़ उठाई?

लोकतंत्र का भविष्य उन नागरिकों के हाथों में सुरक्षित रहता है जो असहमति को राष्ट्र-विरोध नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का आवश्यक तत्व मानते हैं। सत्ता का सम्मान आवश्यक है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है संविधान का सम्मान। क्योंकि अंततः किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत उसकी सरकार नहीं, बल्कि उसका जागरूक नागरिक होता है।

"याद रखिए—सत्ता का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी जवाबदेही है, और नागरिक का सबसे बड़ा धर्म है कि वह अन्याय के विरुद्ध संवैधानिक और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज़ उठाए। यही लोकतंत्र की आत्मा है, यही भारत के संविधान की भावना है।"

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