AJAY KUMAR JOSHI 13 Feb 2025 आलेख धार्मिक धार्मिक, अध्यात्मिक, आत्मानुभव, आत्मज्ञान,चेतना , कुण्डलिनी, 23230 0 Hindi :: हिंदी
कुण्डलिनी प्रकाश का दर्शन आज से लगभग 10 साल पहले की बात हे | अपनी ग्रेजुएशन पुण कर लेने के बाद में बैंक में कार्य करने लगा , इस हेतू में बूंदी में रूम लेके रहने लगा ये इलाका मेरे लिए नया था और उस समय मेरा विवाह भी नहीं हुआ था | आध्यात्म को जानने की ललक मेरी बचपन से ही रही शायद ये मेरे पूर्व जन्म के ही संस्कार थे, जो मुझे इस विषय की तरफ ज्यदा आकर्षित करते थे | उन्ही दिनों मन में ज्योतिष के प्रति लगाव बड़ा ज्योतिष की प्रारंभिक जानकारी में अपने नाना जी से सिख चूका था जैसे मुहर्त देखना ,जन्म अक्षर निकालना और कुंडली का निर्माण, तब कुंडली फलित की तरफ मेरा रुझान बड़ा इस इसलिए में किसी ज्योतिष बुक की तलाश में बुक शॉप पर गया लेकिन ज्योतिष की एसी कोई बुक मुझे नहीं मिली जो में खरीद सकू जो उपलब्ध थी उन में से अधिकतर बुक्स को में पहले ही पड़ चूका था, अचानक मेरी नजर कुण्डलनी जागरण नामक बुक पर पड़ी और मन में एसी प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई की में मात्र उस बुक को ही खरीद लू वेसे कुण्डलनी के बारे में मन्त्र शास्त्र नामक किताब में विस्तृत विवरण में पहले ही पड़ चूका था | फिर मेने वो बुक लखरीद ली और उसको एक रात में ही पूरा पड़ भी लिया | वेसे में जब भी कोई बुक अध्यात्म से सम्बंधित प्राप्त करता हु तो मन में उसके ज्ञान को लेने की इतनी ललक होती हे की उसी ललक के बल पर में एक बुक को एक ही दिन में पड़ लेता था | बुक को पड़ने के बाद मेने कुछ विधियों को अपने देनिक कर्म में शामिल कीया जिस में से कुछ योगासन कुछ मुद्राये थी | उन दिनों में सगुण को कम और निर्गुण को ज्यादा मानता था लेकिन फिर भी मेंरे दैनिक कर्म अधिकतर सगुन की पूजा से ही जुड़े थे वेसे सगुण और निर्गुण में कोई फर्क नहीं हे लेकिन इस को समझने में अध्यात्म के अन्दर काफी समय लगता हे | द्वेत और अद्व्येत क्या हे ये सब अध्यात्म के अन्दर रच बस जाने वाला जीव ही समझ सकता हे | मेरे पास बैंक से आ जाने के बाद काफी समय था में उसका पूर्ण उपयोग करना चाहता था में उसी बुक को रोज थोडा थोडा कर के पुनः पड़ने लगा और मेरे को नींद आना बंद हो गयी | मेने अपने मष्तिष्क को शांत करने के लिए रात को एक नियम बनाया पूजा स्थल के सामने आसन बिछा कर फिक्स रात 11 बजे उस पर बैठ जाया करता जब सारा माहोल कोलाहल रहित हो जाता उस समय एसी शांति रहती की यदि आल पिन भी गिरे तो उसकी आवाज आ सकती थी | बैठ जाने पर में अपने मष्तिष्क को किसी कल्पना या देवी देवता और किसी मन्त्र से नहीं जोड़ ता था बस मेरे को शांत बैठना था कोई क्रिया नहीं करनी थी| ये कर्म मेरा निरंतर चलता रहा में अपने मष्तिष्क को ओर दिनों की अपक्षा हर दिन तरो ताजा और पहले से कई ज्यादा शांत पाता और इससे मेरी बोलने की सुनने की शक्तिया भी प्रखर हो रही थी | साथ में सुबह के योगिक आसन और मुद्राए निरंतर अच्छा स्वास्थ्य उपलब्ध करवा रही थी | रात में ध्यान की इस क्रिया को 12:00 बजे तक फिक्स एक घंटे के लिए ही करता था | मुझे इतना अभ्यास हो चुका था की एक घंटा कब ख़त्म होने वाला हे ये मेरे को पहले ही आभास हो जाता था| ध्यान इतना जम चूका था की ध्यान से उठने की इच्छा तक नहीं होती लेकिन फिर भी में 1 घंटे में अपने ध्यान को भंग कर के बिस्तर पर चला जाता |इसी दोरान एक दिन रीड हड्डी के सहारे पतली सी चमक दार रेखा में कंपनं स्टार्ट हो गये मेरे को उसमे असीम आनंद की अनुभूति हुयी दो तिन दिन तक एसा ही आनंद आने लगा लेकिन में फिक्स एक घंटे में अपने ध्यान को ब्रेक कर लेता था | दो तिन दिन के बाद उस रात को भी ध्यान में अच्छा आनन्द आ रहा था | मेरे को आज उस चमक दार रेखा की चम्मक ओर ज्यादा बड़ी हुयी दिखाई दि, जो रेखा मेरी रीड की हड्डी के समांतर और लगभग मध्य में थी| उस समय उसमे अदित्य कम्पन्न चल रहे थे जब की में किसी भी मन्त्र का उचारण नहीं कर रहा था शायद मेरी कुण्डलिनी के जागरण का प्रोसेस स्टार्ट हो चूका था जिस को में समझ नहीं पाया क्योकि उसका प्रकाश उतरोतर बड़ता जा रहा था साथ में कंम्पन भी लेकिन मेरा एक घंटा पूर्ण हो चूका था| वो में अपने अभ्यास से जान चूका था | तो मेने अपना ध्यान भंग कर दिया और आसन से बिस्तर पर जोही आगे बड़ा अचानक से शरीर के चारो ओर चढ़ चढ़ की आवाज के साथ बिजली की तरंग सा प्रकाश दोड गया पुरे अंध्यारे कमरे में तीव्र प्रकाश फ़ैल गया जिससे मेरी आँखे चोंदिया गयी | में एक दम से डर सा गया मेरा सारा शरीर कम्पायमान हो रहा था वो एक क्षण मेरी जिंदगी का एसा था जिस की अनुभूति मेने पहली बार की थी | उसके बाद मेने अपने गुरु को ये घटना बताई उन्होंने कहा अब से एसे कोई प्रयास मत करना पता नहीं उन्होंने एसा क्यों कहा लेकिन आज भी में ये मानता हु की उस समय मेरा आसन से उठने का फैसला गलत था में कुण्डलनी के पुरे रहस्य को जान सकता था लेकिन इस साधना मार्ग में भय हमेशा बना रहता हे पता नहीं कब क्या हो उसका पता नहीं रहता | वेसे मेरा मन कुण्डलिनी सधना करने का नहीं था में तो मस्तिष्क को शांत करने के हिसाब से ही बैठ ता था लेकिन उन दिनों में कुण्डलिनी जागरण की बुक भी पड़ रहा था जिससे मेरी मस्तिष्क शांत करने की प्रक्रिया कब कुण्डलिनी जागरण की साधना में कन्वर्ट हुयी पता ही नहीं चला | एक साधक के जीवन में एसे कई अनुभव होते हे जिससे उसे अपने शरीर मन और अपनी शक्ति के बारे में सही सही अनुमान लगता हे जो की अध्यात्म के मार्ग पर चलने वाले के लिए आवश्यक हे | किस को ये घटना काल्पनिक और झूटी लग सकती हे लेकिन उस पल को में भूल नहीं सकता जो मेरी जिंदगी में दिव्य अनुभूति दे के गये | और भी मेरे जीवन के अदित्य अनुभव आप आगे की पोस्ट में पड़ पाएंगे .... धन्यवाद Ajay always - सत्य की खोज में