Dr.sandeep kumar 16 Jul 2026 आलेख समाजिक #दलित#अंबेडकर#, दलित चिंतन 426 0 Hindi :: हिंदी
इतिहास में दलित प्रारंभ में समाज सुधार हेतु धार्मिक आंदोलन, भक्ति आंदोलन चलाए गए,जिनमें संत दादू ,चोखा मेला ,रैदास ,तुकाराम, कबीर दास आदि प्रमुख रहे ।जिन्होंने ईश्वर भक्ति के माध्यम से और भक्ति गीतों द्वारा समाज को समता का सन्देश दिया।वर्ण व्यवस्था और पाखंडों पर करारी चोट की । क्योंकि वह समय शिक्षित वर्ग का नहीं था । शिक्षा का प्रचार-प्रसार भी नहीं हुआ था।इसलिए संत जनता को जगाने के लिए गीतों और भजनों का सहारा लिया करते थे, किंतु उससे समाज में, उसकी सोच में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ । फिर समाज सुधार हेतु अन्य विशिष्ट लोग आगे आए जैसे ज्योतिबा फूले, बिरसा मुंडा ,सावित्रीबाई फूले ,स्वामी पेरियार आदि । इस आंदोलन को गति तब मिली जब यह आंदोलन डॉक्टर अंबेडकर के नेतृत्व में चला । और ऐसा कहने में कोई अतिशयोक्ति न होगी कि एक तरफ डॉ आंबेडकर को रखा जाए और दूसरी तरफ दलित समाज के अन्य संत और सुधारकों को तो डॉक्टर अंबेडकर का पक्ष ही भारी रहेगा। आखिर ऐसा क्यों हुआ,?सवर्णों द्वारा अवर्णों के ऊपर इतने क्रूर अत्याचार क्यों किए गए? यदि अवर्ण भी उसी समाज का हिस्सा थे जिसके सवर्ण ,तो उनके साथ यह भेदभाव क्यों? यहां आकर यह विचारधारा बलवती होती है कि जैसा कि डॉक्टर अंबेडकर ने ऐतिहासिक तथ्यों का अनुसंधान किया और खोजा कि सवर्ण कहे जाने वाले लोग बाहर से आए थे । और यहां के मूल निवासियों को युद्ध में परास्त करके अपना दास बना लिया और स्वयं शासक बन बैठे । और धर्म और परंपरा संस्कृति, अपने धार्मिक स्थान आदि में कोई भी स्थान उन्हें नहीं दिया गया । उनको सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर दिया गया । अंततः यह लोग गांव के बाहर बहिष्कृत जाति के रूप में रहने लगे । कुछ लोग युद्ध में हार जाने के बाद जंगलों में जान बचा कर भाग गए,कालांतर में वही लोग आदिवासी कहे जाने लगे। डॉ आंबेडकर के अनुसंधान से यह भी ज्ञात होता है कि जिन लोगों ने सवर्णों से समझौता कर लिया । और उनकी सेवा करना स्वीकार कर लिया । सवर्णों ने उनको समाज में अपने सेवक के रूप में रहने दिया । जिनको आज पिछड़े वर्ग के नाम से जाना जाता है । और जो लोग झुक नहीं वे हाशिए पर आ गए । और वर्षों तक उस हाशिये पर बहिष्कृत होकर पड़े रहे। और उन को गुलाम बनाने के लिए उनके इतिहास उनकी संस्कृति उनका धर्म सभी कुछ नष्ट कर दिया गया ; ताकि वे कभी अपना इतिहास ना जान सके और जो अपना इतिहास नहीं जानता वह अपना भविष्य नहीं बना सकता । हम इतिहास में दो प्राचीन सभ्यताएं पढ़ते हैं- मोहनजोदड़ो और हड़प्पा संस्कृति जो प्राचीन काल की अति विकसित नगरीय सभ्यता थी, उसके नष्ट होने के दो कारण अक्सर बताए जाते हैं या तो वे किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा के शिकार हुए जैसे भूकंप या बाढ़ यह दूसरी संभावना है कि बाहर से आए बर्बर लोगों ने उनकी सभ्यता को नष्ट किया। वास्तव में हड़प्पा सभ्यता बासी ही यहां के मूल निवासी लोग थे,जो हार जाने के कारण गुलाम बना लिए गए और उस समय आर्यों द्वारा जिन शास्त्रों की रचना हुई उन्होंने उसमें चतुर्थ वर्ण भी बनाया । जिसको उन्होंने शूद्र कहा और इस वर्ण में उन्हीं मूल निवासियों को रखा गया। इस व्यवस्था को ईश्वर कृत बताकर विधाता का नियम बताया गया जो अटल है और बदला नहीं जा सकता । मूलनिवासी वर्ग टूट चुका था, विद्रोह करने की शक्ति उसने बची नहीं थी,और सदियों तक वह इस गुलामी के संताप को सहता रहा। उत्तर वैदिक काल में आडंबर बाद और पाखंड के विरोध में श्रमण परंपरा विकसित हुई - जैन और बौद्ध । जिन्होंने इस आडंबरवाद और मानवीय समानता का डटकर विरोध किया।विशेष रुप से बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध ने,जो उस समय की वर्ण व्यवस्था के हिसाब से क्षत्रिय कुल के राजकुमार थे । संन्यस्त होकर ज्ञान प्राप्ति के उपरांत उसकी दीक्षा समाज के सभी वर्गों को देना स्वीकार किया । उन्होंने मानवीय गरिमा को महत्ता प्रदान की और ब्राह्मणों की वर्ण व्यवस्था जो कि भ्रष्ट हो चुकी थी उसे नकार दिया। बुद्ध भारतीय समाज में समता का संदेश देने वाले पहले व्यक्ति थे । उन्होंने अपने धम्म का मार्ग सभी के लिए खोल दिया । उनके लिए शूद्र और ब्राह्मण,राजा और रंक में कोई भेद नहीं था । बुद्ध से प्रभावित होकर दबे कुचले और उपेक्षित लोग उनकी शरण में आने लगे और गौतम बुद्ध उन सबको समान रूप से अपनाते चले गए । यहां तक कि अनेक ब्राह्मण, बुद्ध और उनके धम्म से प्रभावित हुए और हजारों ब्राह्मण बुद्ध के द्वारा दीक्षित हुए। धीरे-धीरे वर्ण व्यवस्था खंडित होने लगी और उनके बंधन ढीले पड़ने लगे। हजारों वर्षों के बाद उपेक्षित लोगों को मानवीयता का बोध होने लगा। उन्हें ऐसा धम्म मिला जो अन्य व्यक्ति की तरह उन्हें भी समान समझता था। कहना ना होगा उस समय सभी शूद्र कहे जाने वाले लोग हाशिए पर पड़े हुए लोग बौद्ध धर्म में दीक्षित हुए होंगे और बुद्ध को अपने मुक्तिदाता के रूप में देख रहे होंगे । वैदिक धर्म के बंधन ढीले पड़ने लगे और देश में बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा । इसलिए कहा गया कि आज के जितने शूद्र हैं वास्तव में बे सब प्राचीन बौद्ध थे। उसके पश्चात जब अशोक सम्राट बने और बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार देश विदेशों में किया तब बौद्ध धर्म देश की सीमाओं से बाहर निकला और पूरा एशिया बौद्धमय हो गया। स्पष्ट है कि जब सम्राट अशोक बौद्ध धर्म की शरण में गए तो उस समय की शासन व्यवस्था भी उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर संचालित रही होगी और स्त्री-पुरुष ,ब्राह्मण -शूद्र ,सभी को समानता का अधिकार रहा होगा। वर्ण व्यवस्था भी छिन्न-भिन्न हो गई होगी। वह समय भारत में स्वर्ण काल कहलाया होगा । और फिर अंतिम बौद्ध सम्राट बृहद्रथ के समय तक स्थिति यथावत रही होगी । जब तक कि पुष्यमित्र शुंग द्वारा बृहद्रथ की हत्या करके सिंहासन पर कब्जा ना कर लिया गया। पुष्यमित्र शुंग बृहद्रथ का ब्राह्मण सेनापति था,जो कि ऐसे अवसर की खोज में था जिससे बृहद्रथ की हत्या कर सिंहासन पर बैठ सकें। और फिर से ब्राह्मण साम्राज्य स्थापित कर सकें। जब उसे ऐसा अवसर मिला तो उसने ऐसा ही किया । सिंहासन पर बैठते ही उसने तमाम बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करवाई और अनेक भिक्षु जान बचाकर देश छोड़कर भाग गए । धीरे-धीरे तमाम बोद्ध विहारों को तोड़ दिया गया। वर्ण व्यवस्था और भी सख्त रूप से लागू कर दी गई । फिर से मनुस्मृति के अनुसार शासन होने लगा और उपेक्षित लोग फिर से अपनी दयनीय स्थिति में आ गए और भारत देश फिर से अधोगति की ओर जाने लगा। मराठा साम्राज्य से भी निम्न जाति के लोगों की स्थिति में सुधार हुआ;किंतु उनके शासन का अवसान होते ही जब फिर सिंहासन पेशवाओं के हाथों में आया जो कि ब्राह्मण थे फिर से इतिहास अपने आप को दोहराने लगा। इतिहास साक्षी है इस बात का कि जब-जब सत्ता की बागडोर ब्राह्मणों के हाथों में आई,तब तक शूद्रों पर अत्याचार हुए और भ्रष्ट हो चुकी वर्ण व्यवस्था और मनुस्मृति को पुनः पुनः लागू किया गया है।और बहुजन समाज की स्थिति बद से बदतर होती गई।पेशवाओं का शासनकाल एक ऐसा ही समय था।जब उन शासकों का जोर पूरे शबाब पर था । और शूद्रों पर अनाचार भी पूरे शबाब पर था। यही वह समय था जब शूद्रों के गले में हांडी और पीठ पर झाड़ू बंधवा दी गई थी। उन्हें सार्वजनिक सड़कों पर चलने की मनाही थी। ब्राह्मणों का वह शासनकाल भारत में शूद्रों के लिए इतिहास का एक काला अध्याय है। मध्य काल में जब मुगलों का शासन स्थापित हुआ,सब मुस्लिम समुदाय के लोगों ने शूद्रों की तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।बल्कि उसमें जो उच्च स्तरीय जातियां थी उन्होंने भी निम्न जाति के साथ वही व्यवहार किया जो हिंदू करते रहे थे। इस प्रकार से उनसे कोई आशा नहीं की जा सकती थी, जिससे शूद्रों की स्थिति में सुधार हो । इसलिए मध्यकाल में उनकी स्थिति जस की तस बनी रही। भारत में बहुजन पिछड़े समाज के लिए ठोस कदम उठाने वालों में डॉ आंबेडकर ही प्रथम और अंतिम सशक्त व्यक्ति थे। उन्होंने सबसे पहला वार भारतीय वर्ण व्यवस्था पर किया,उन्होंने विश्व के अन्य देशों की सामाजिक व्यवस्था का गहन अध्ययन किया । इसी अध्ययन के दौरान उन्होंने कार्ल मार्क्स का साम्यवाद का भी अध्ययन किया और आगे चलकर जो उनका झुकाव बौद्ध धर्म की ओर हुआ तो उन्होंने कार्ल मार्क्स और बुद्ध की तुलना करते हुए एक भाषण दिया जिसका शीर्षक था "बुद्ध और कार्ल मार्क्स" बुद्ध ने भारतीय समाज और धार्मिक व्यवस्था में समता की बात कही और कार्ल मार्क्स ने भी साम्यवाद के सिद्धांत का प्रचार प्रसार समाज में किया ।जिससे आगे चलकर जर्मन रूस और फ्रांस में पूंजीवादी व्यवस्था धराशाई हुई। लेकिन फिर भी कुछ सामाजिक सिद्धांतों की बात छोड़ दें तो कार्ल मार्क्स और बुद्ध में वास्तव में कोई समानता नहीं है । दोनों का आधार पृथक है कार्ल मार्क्स सामाजिक व्यवस्था के लिए लड़ रहा हैऔर बुद्ध की पृष्ठभूमि मूल रूप से आध्यात्मिक है। मेरे देखे तो कार्ल मार्क्स और डॉक्टर अंबेडकर में काफी समता हो सकती है। इसलिए इस लेख में अब हम कार्ल मार्क्स का साम्यवाद और डॉक्टर अंबेडकर का साम्यवाद का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे और देखेंगे कि कहां पर दोनों में समानताएं हैं और कहां पर आ समानताएं डॉक्टर अंबेडकर का दर्शन:- डॉक्टर अंबेडकर का दृष्टिकोण हिंदू वर्ण व्यवस्था के प्रति विद्रोही दर्शन के रूप में उभरा।उन्होंने देखा कि भारतीय समाज में वर्ण व्यवस्था का मकड़जाल भयानक रूप में फैला हुआ है । जिसके कारण शूद्र कहे जाने वाली निम्न जातियों का जीवन नारकीय बना हुआ है । डॉ आंबेडकर क्योंकि इसी समाज से आते हैं और वर्ण व्यवस्था के भुक्तभोगी थे,तो इससे पीड़ित समाज का दुख-दर्द भली प्रकार समझते थे । इसलिए उन्होंने इस व्यवस्था का खुलकर विरोध किया,आंदोलन किए, लोगों में जागरूकता के कार्यक्रम चलाएं । इसी चतुरवर्णीय व्यवस्था से प्रारंभ के तीनों वर्णों को कोई परेशानी नहीं थी; इसलिए उनमें से किसी ने भी इस व्यवस्था का कभी विरोध नहीं किया बल्कि इस भ्रष्ट व्यवस्था को ईश्वर कृत घोषित कर दिया गया । शुद्र वर्ण की शिक्षा दीक्षा सम्मान और संपत्ति के अधिकार छीन ले गए । और वे सदियों तक इस अंधकार में तड़पते रहे । ऐसे में डॉक्टर अंबेडकर ने अपने समाज के लोगों को इस नरक से निकालना अपना मानवीय कर्तव्य समझा । और ब्राह्मणों की इस व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े हुए । इसी क्रम में आंबेडकर ने सभी धर्मों और सभी सामाजिक व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कोई व्यवस्था ईश्वर कृत नहीं होती बल्कि सारी सामाजिक व्यवस्थाएं मानवीय कृत ही होती हैं । इसलिए वे शाश्वत नहीं हैं बल्कि उनमें परिवर्तन किया जा सकता है । क्योंकि अंबेडकर का झुकाव बौद्ध धर्म की तरफ था भले ही उन्होंने काफी वर्षों बाद वह धर्म सार्वजनिक रूप से ग्रहण किया हो; किंतु वे काफी पहले ही बुद्ध के बताए मानवीय धर्म पर चल पड़े,इसलिए उनके दर्शन के मूल सिद्धांत बौद्ध धर्म से ही प्रभावित हैं । वर्ण व्यवस्था को समाप्त करके एक समतामूलक समाज की स्थापना करना चाहते थे । जहां वर्ण के आधार पर आदमी आदमी में भेद ना हो ,ऊंच-नीच ना हो। सभी को समान मानवीय अधिकार मिलें । इसलिए उनके दर्शन के 3 मौलिक सिद्धांत है- समता ,स्वतंत्रता और भ्रातत्व। इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर वे समाज की नींव रखना चाहते थे। वे जातिवाद के भी घोर विरोधी थे । उनके अनुसार जातियों ने समाज के बीच में ऐसी दीवारें खड़ी कर दी हैं,जो उन्हें कभी आपस में मिलने नहीं देती । उनका कहना था कि आज अस्पृश्यता दलित के यहां भोजन करने से नहीं बल्कि रिश्ता बनाने से दूर होगी ।डॉक्टर अंबेडकर अंतरजातीय विवाह कराने के इच्छुक थे,जिससे समाज में जातियों की बेड़ियां ढीली पड़ सकें। उन्होंने स्वयं अपने जीवन में अपना दूसरा विवाह अंतर्जातीय किया । उनका कहना था कि जाति और वर्ण समाज में आर्थिक शोषण का आधार हैं । जो वर्ण या जाति जितनी ऊंची है वह उतना ही अमीर है और जो जाति जितनी निम्न है वह उतनी गरीब है। इसलिए इस वर्ण व्यवस्था के साथ ही अर्थशास्त्र भी समानांतर रूप से चलता है । डॉक्टर अंबेडकर एक समाज सुधारक के साथ ही राजनीतिज्ञ ,कानून वेत्ता भी थे,लेकिन फिर भी धर्म को व्यक्ति और समाज के लिए आवश्यक समझते थे। धर्म ही व्यक्ति को नैतिकता तथा चारित्रिक आधार देता है । व्यक्ति को सामाजिक और आर्थिक मूल्यों के साथ-साथ आध्यात्मिक मूल्यों की भी आवश्यकता होती है। इसलिए डॉक्टर अंबेडकर बुद्ध की शरण में आए,इससे उनको अपने पक्ष को मजबूत करने एवं एक नवीन दार्शनिक विचारधारा का ऐसा पक्ष रखने में आसानी हुई जो पूर्णतया मानववादी था । बौद्ध धर्म में जाति एवं वर्ण का पूर्णतया अभाव था । वह दर्शन ,ईश्वर -आत्मा, स्वर्ग -नरक संबंधी तमाम कपोल कल्पनाओं से दूर था । डॉ आंबेडकर जैसे समाज की रचना चाहते थे उसके बीज उन्हें बुद्ध के दर्शन में मिले । बौद्ध धर्म एवं दर्शन के मूल सिद्धांतों डॉक्टर अंबेडकर ने समकालीन बनाते हुए आधुनिक भारत में दलितों के उत्थान में प्रयोग किए तथा भारतीय संविधान का निर्माण भी इन्हीं सिद्धांतों के आधार पर हुआ।