समाजिक रचनाएँ

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बातों ही बातों मे बात कजा हो जाऐगी
बातों ही बातों मे बात कजा हो जाऐगी

बातों ही बातों मे बात कजा हो जाएगी नींद मारी जाएगी रात कजा हो जाएगी ये कैसा धरम है ये कैसे लोग हैं जिनकी अछूतों के

नमन मेरी मातृभाषा
नमन मेरी मातृभाषा

नमन मेरी मातृभाषा नमन उस भाषा को जो हमें संस्कार देती है नमन मेरी हिन्दी को जो भावों को स

नौका पार लगाए कौन
नौका पार लगाए कौन

नौका पार लगाए कौन प्रश्न पूछते प्रश्न खड़े हैं उत्तर साधे बैठे मौन । भँवरों के हैं नाविक सारे नौका पार लगाए कौन ?

बेटियां
बेटियां

बहुत खुश होता है ऊपरवाला तब गोद में आती हैं बेटियां युग कितने भी बदले आज भी लक्ष्मी ही कहलाती हैं बेटियां जिम्मे

आज
आज

अब झूठे आरोपों से कोई सीता वनवास नहीं सहेगी भरी सभा में कोई द्रौपदी अब अपमान नहीं सहेगी कोई भी मेरा अब प्रेम में

एकलव्य
एकलव्य

धनुष था मेरे बाणों का दर्पण चमत्कारी वैभव भुजाओं में निषाद पुत्र का अंश सवेरा चला था स्वर्ण बहारों में नादान अ

अरमाँ
अरमाँ

बिखरे बिखरे पड़े हैं मेरी आँखों में मेरे अधूरे से अरमाँ। और ये पङे पङे मेरी आखों में ही नित रोते हैं। और जब ये बिखर

जिन्दगी एक सफर है सुहाना
जिन्दगी एक सफर है सुहाना

मौत का खौफ ना कर, बिना रुके सफर कर। कभी भी दुनिया की प्रवाह ना कर, बस अपने सपनों को सकार कर। यहां आए हो किसलिए? खूब_खा

अगर हाथों में आई तेरी नाकामी
अगर हाथों में आई तेरी नाकामी

अगर हाथों में आई तेरी नाकामी तो यह मत समझ तू काबिल नहीं, ये तेरे सब्र की इम्तहान है समझ मंजिल पाना है तुझे प्रयत्न क

अगर हाथों में आई तेरी नाकामी
अगर हाथों में आई तेरी नाकामी

अगर हाथों में आई तेरी नाकामी तो यह मत समझ तू काबिल नहीं ये तेरे सब्र की इम्तहान है समझ, मंजिल पाना है तुझे प्रयत्न क

रंक को राजा
रंक को राजा

दिल के झरोखे में एक ख्वाब सजा रखा था, खिल उठे चेहरे पे एक नूर सजा रखा था, समानों के झुरमुट में रंक को राजा बना रखा था,

मेरे मुस्कुराने में
मेरे मुस्कुराने में

वफ़ा तो बहुत की मैंने, इस जमाने में, मगर किसी ने भी नहीं रखें, ख्याल मेरे मुस्कुराने में।

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