मैं फिलीस्तीन हूँ सियासत मे जलता हूँ - मारूफ आलम

मैं फिलीस्तीन हूँ सियासत मे जलता हूँ     मारूफ आलम     शायरी     राजनितिक     2021-09-22 11:31:56     # political shayari# social poetry# najm#नज्म     166        
मैं फिलीस्तीन हूँ सियासत मे जलता हूँ

जालिमों की हिरासत मे जलता हूँ
अपने घर,अपनी रियासत मे जलता हूँ
तुम मुझे पहचानते हो ऐ दुनियाँ जहाँ वालो
मैं फिलीस्तीन हूँ सियासत मे जलता हूँ
मैने मूसा से ईसा का जमाना देखा है
मैंने कई सल्तनतों का आना जाना देखा है
मगर इतिहास गवाह है कभी भी 
इजराइल नही था मैं
मैं आज भी फिलीस्तीन हूँ और कल भी
फिलीस्तीन था मैं
मेरे भाईयों मे मुझको लेकर इख्तेलाफ बहुत हैं
मेरे अपने ही मेरे खिलाफ बहुत हैं
अपने बुजुर्गों की विरासत मै जलता हू
मै फिलीस्तीन हूँ सियासत मै जलता हूँ
हर सदी मे अपने लाखों लोगों को खोता हूँ
मैं बारूदों से जख्मी होकर सदी दर सदी रोता हूँ
मेरा फैसला ना जाने क्यों नही होता
मैं कमजोर हूँ शायद यूँ नही होता
दम घुटता है सदियों से हिरासत मे जलता हूँ
मैं फिलीस्तीन हूँ सियासत मे जलता हूँ
मारुफ आलम







    

Related Articles

रूबरू ए जिंदगी
रूबरू ए जिंदगी

चेहरे से कहां पता चलता है कौन कैसा है, सब उसी का नाम लेते हैं जिसके पास पैसा है......

हमें तो आदत है गम में रहने की
हमें तो आदत है गम में रहने की

हमें तो आदत है गमों में रहने की, रोते हुए भी मुस्कुराने की।

मैं प्रेम में पागल था
मैं प्रेम में पागल था

मैं प्रेम में पागल था नादान था लाचार था इस जीवन में क्या होगा कौन जानता है ? इस रहस्य से अनजान था ; हुआ तो सूरज की


Please login your account to post comment here!

© 2021 | All rights reserved by Sahity Live® | Powered by DishaLive Group