खेल है - Vipin Bansal

खेल है     Vipin Bansal     कविताएँ     राजनितिक     2021-09-22 09:49:00     #खेल है #राजनीति     6559        
खेल है

ज़मीन पर यह चलते हैं ! 
आसमानी बातें करते हैं !! 
अल्फाज़ो में रखते दम हैं ! 
बेशक नंग हैं !! 
देश की शान हैं ! 
चाहे कितने ही बदनाम हैं !! 
खुद्दारी की देते मिशाल हैं ! 
कोडियों में बिकते इनके ईमान हैं !! 
बुजदिली के ढेर हैं ! 
घर के यह शेर हैं !! 
यह कागजी हेर - फेर है ! 
बस नस्लों का यह खेल है !!

राजनीति दलदल है ! 
ये दलदल ही तो मखमल है !! 
यह सेवा संस्थान है ! 
यहाँ बिकता हर सामान है !! 
सत्यता, योग्यता सब बेकार है ! 
परिवारों की ही भरमार है !! 
लिख रही है लेखनि ! 
दिल में मेरे मलाल है !! 
सत्यता योग्यता का बस ढोल है ! 
गीदड़ो की नस्लें ही शेर हैं !! 
यह कागज़ी हेर-फेर है ! 
बस नस्लों का यह खेल है !!

डाको को कहते यहाँ घोटाला है ! 
डाकूओं का ही बोलबाला है !! 
कर्मों का कालापन ! 
सफेद वस्त्रों ने ढ़क डाला है !! 
जेल में भी कहाँ लगा ! 
इनके कर्मों पर ताला है !! 
जेल तो घर है ! 
ऑफिस में लगा ताला है !! 
चोर पुलिस का खेल है ! 
ये कैसा मेल है !! 
यह कागजी हेर - फेर है !
बस नस्लों का यह खेल है !! 

    विपिन बंसल

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