अदाएं - कुछ यूं की मुझे हैरत की - संदीप कुमार सिंह

अदाएं - कुछ यूं की मुझे हैरत की     संदीप कुमार सिंह     कविताएँ     समाजिक     2021-09-22 11:17:02     मेरी कविता पाठकों के लिए प्रेरणा से भरपूर और जीवन की सच्चाई से रूबरू कराता रहेगा।     11731        
अदाएं - कुछ यूं की मुझे हैरत की

कुछ यूं की मुझे हैरत की,
दुनिया ने परेशान ऐसा कर दिया,
की ऐसी शानदार परेशानी उठाने को,
मन बार_बार बेकरार सा हो जाता है।
 यूं राह चलते उस अजनबी,
लड़की की कातिल अदाएं,
मुझे बार_बार झकझोड़ सी रही थी।

कुछ यूं कहिए,
उसकी बेमिसाल सूरत के साथ,
उसका चलना मोरनी सा,
अटखेलियां करती, निगाहें,
मुझ पर मासूम सा प्यार लुटाती,
राहों में चलती रही_चलती रही।

मैं यूं ही बेखबर,
उसकी प्यार और मासूमियत,
में खोया उसे प्यार भड़ी निगाहों,
से देखते_देखते मचलता रहा,
उस हसीन लम्हों में मुस्कुराता रहा,
प्यार भड़ी गीत गाता रहा ।

निगाहें ने निगाह से बात कर ली,
दिल ने दिल से प्यार कर ली,
फिर वो अपने प्यार की झीनी,
फुहार छोड़ चली गई,
में वैसे ही उसे जाते निहारता रहा।
                         चिंटू भैया

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