👉 अभी - अभी 👈 - Amit Kumar prasad

👉 अभी - अभी 👈     Amit Kumar prasad     कविताएँ     प्यार-महोब्बत     2022-05-24 23:25:25     This poem I am write on own love and this is the best wishesh for every one who wants some one from India and in India I hopes to my reader that he will be give love as before.     2426           

👉 अभी - अभी 👈

उठती है उम्मिदें दिल कि फल्क पर, 
चाहत के आश से कभी - कभी! 
है चाहत को दिप्त से भरी रौनकें, 
चंचलता से अभी - अभी!! 
                      दिल रो पड़ता है उम्मिदों के , 
                       राष्ट्रवाद कि आश लिए! 
                       कभी दिल को मन बहला देता है, 
                        मिठे - मिठे ऐहसास लिए!! 
चाहत के र्दद से जगी चेतना, 
मन तनमयता से जगी - जगी! 
है अचल साधना एकाग्र वतन का, 
मिली ज्ञान से अभी - अभी!! 
                       चाहत को संजों कर जगे कर्मठी, 
                       संघर्ष संजोता है चाहत! 
                        मन का हृदय का र्दद मात्र, 
                        चाहत पा कर होगा राहत!! 
राहत कि राह मे र्दद से लिप्टे,
चले राष्ट्र का प्रेम लिए! 
भारत मा से करता आश आशिकी, 
चाहत को भी मा का प्रेम मिले!! 
                कृष्ण कि भूमी है ये भारत, 
                जहां कण - कण मे प्रेम का धार मिले! 
                मिलता है धरा को प्रेम का सागर, 
                 रघुनंदन अवतार धरे!! 
होता है अमर यश महा कुंज मे, 
पुज रही प्राकृती कि छटां! 
कण - कण है उज्जवल प्रेम त्याग से, 
अमलित -  कवंलित है भारत मां!! 
                           गर अर्ध अर्थ है बना प्रेम, 
                          फिर क्यों इतना यलगार चले!
                          मन्द - मन्द चाहत हृदय मे, 
                          औंझों से विस्तार करे!! 
मिलता है साथ हृदय मीत्त का, 
उम्मिदों के कर्म से कभी - कभी!
र्दद को पल - पल नापा दिल ने, 
चाहत के राह पर अभी - अभी!! 
                  अभी - अभी, अभी - अभी.... 
आशाओं का है अमर धरोहर, 
कर्म ने आश को ताज़ दिया! 
संघर्षों पे चलकर कर्मवीर, 
आगे बढ़ - बढ़ के विकाश किया!! 
                     चाहत को अगर कर अमर धाम, 
                     भारत को मानवता परिणाम मिले! 
                     खिलकर मुस्काती ईश्क वतन पर, 
                     वतन ईश्क पे राज करे!! 
जलती है रौशनी गर्दिश कि चाह पर, 
उम्मिदों से कभी - कभी! 
हमने चाहत को किया सर्मप्ण,
कर्मों का अभीनंदन अभी -  अभी!! 

कवी - अमित कुमार प्रशाद
Poet :- Amit Kumar Prasad
       

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