आधे- अधूरे - Santosh kumar koli

आधे- अधूरे     Santosh kumar koli     कविताएँ     समाजिक     2021-09-22 10:55:04     आधे- अधूरे     5006        
आधे- अधूरे

कुछ भी महत्त्व नहीं है।
१ बिना तीर कमान का,
बिना गुण इंसान का।
बिना मौत जान का,
बिना भक्त भगवान् का।
बिना तृप्ति तर्पण का,
बिना मूरत के दर्पण का।
बिना धन कृपण का,
बिना भाव अर्पण का।
कुछ भी महत्त्व नहीं है,
कुछ भी महत्त्व नहीं है।
२ बिना तक़दीर नर का,
बिना शान सर का।
बिना लुगाई घर का,
बिना कमाई वर का।
बिना अधिकार पद का,
बिना माने हद का।
बिना उधार नगद का,
बिना मांग मदद का।
कुछ भी महत्त्व नहीं है,
कुछ भी महत्त्व नहीं है।
३ बिना मतलब आंट का,
बिना प्रभाव डांट का।
बिना हाड़े बाट का,
बिना मिले पाट का।
बिना तलवार म्यान का,
बिना एकाग्र ध्यान का।
बिना उतारे ज्ञान का,
बिना मजिस्ट्रेट बयान का।
कुछ भी महत्त्व नहीं है,
कुछ भी महत्त्व नहीं है।
४ बिना नीर दरिया का,
अपनों बिना दुनिया का।
बिना पैंदे की लुटिया का,
बिना प्यार हिया का।
बिना भरे कोश का,
बिना ज़ोर रोष का।
बिना जवानी जोश का,
बिना कविता संतोष का।
कुछ भी महत्त्व नहीं है,
कुछ भी महत्त्व नहीं है।


Related Articles

मृत्यु सुन्दरी
मृत्यु सुन्दरी

लोग कहते हैं बुलाने, से कभी आती नही आती है जब भी अचानक,क्यों बताती है नही।2 रूप तेरा कैसा है,कैसी निगाहें हैं तेरी है

खुशिया भी मन को भाती ना
खुशिया भी मन को भाती ना

खुशिया भी मन को भाती ना जब माँ की यादे आती ना जब माँ अजल में सुलाती थी वो बात भुलायी जाती ना खुशिया भी मन को भाती ना

आसुओं की जबानी
आसुओं की जबानी

जिसमे छुपी होती है हजारों कहानी आसुओं की जुबानी इस आंसू में छुपे होते है हजारों भावनाएं कभी ये खुशी के होते है त


Please login your account to post comment here!

© 2021 | All rights reserved by Sahity Live® | Powered by DishaLive Group