राजेश - Rajesh

राजेश     Rajesh     कहानियाँ     धार्मिक     2021-09-22 11:04:25     “माँ, कहानी सुनाओ ना |” माँ     61409     5.0/5 (1)    
राजेश

*अहिल्या *

“माँ, कहानी सुनाओ ना |” 

“अरे...सो जा , बहुत रात हो गई | सबेरे तुझे स्कूल भी जाना है |” 

“स्कूल ? ओह ! कल रविवार है ! माँ, तुमको कुछ भी याद नहीं रहता ! ना मुझे कल पढाई की चिंता है और ना ही होमवर्क की ! तुम्हारे पास कहानी का खजाना है | रामायण, महाभारत, पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों में तुम हमेशा डूबी रहती हो | जल्दी से एक बढिया कहानी सुनाओ |”

“ बड़ा हठी है | कहानी सुने बिना तू सोयेगा नहीं ! ठीक है, अब  ध्यान लगा कर सुन ,

......प्राचीन काल की बात है, गौतम ऋषि न्याय दर्शन के महान विद्वान थे | मिथिला के ब्रह्मपुरी में उनका घर था | उस समय मिथिला के राजा ‘जनक’ , स्वयं एक प्रकांड विद्वान तथा बीतरागी थे | इसलिए तो गौतम को जनक ने अपना कुलगुरु बनाया था | 

गौतम की पत्नी का नाम था ‘अहिल्या’ और पुत्र का नाम ‘सदानंद’ था | अहिल्या सुन्दर, व्यवहार कुशल और कर्मठ महिला थीं | दोनों पति-पत्नी सुखपूर्वक जीवन यापन कर रहे थे | गौतम की उत्कट इच्छा थी कि वह न्याय दर्शन की एक विद्यापीठ की स्थापना करें | जिसमें देश-विदेश के बच्चे आकर विद्या अध्ययन का लाभ उठा सके | अहिल्या की भी यही इच्छा थी... कि उसके पति का विद्यापीठ स्थापित हो जाय | और ऐसा ही हुआ | कुछ वर्षों बाद विद्यापीठ की स्थापना हुई | 

एकदिन उस विद्यापीठ का उद्घाटन समारोह हो रहा था | राजा जनक और देवताओं के राजा, इन्द्र भी उसमें पधारे | अनेक गणमान्य लोगों के बीच वह समारोह सम्मानित हो रहा था | | अतिथिगण के ठहरने और खाने का भी उत्तम प्रबंध था | समारोह सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ |

रात हो गई थी | सभी लोग भोजन करने के बाद सोने चले गये | गौतम और अहिल्या भी थककर विश्राम करने लगें | लेकिन, देवराज इन्द्र को चैन नहीं था | देवता होने के उपरांत भी ... वो कामुक विचार के थे | अहिल्या की सुंदरता और निश्छलता को देखकर वह मोहित हो गये | इसी मोहपाश में फंसकर... उन्होंने मेहमानवाजी का नाजायज फायदा उठाने का निश्चय किया और उसी रात्रि में इन्द्र ने छल पूर्वक अहिल्या का शीलहरण कर लिया | 

बात,जंगल की आग की तरह फ़ैल गई और चारोंओर हल्ला मच गया | इसी बीच देवराज इन्द्र रातों-रात वहाँ से भाग निकले | लेकिन भागते-भागते उन्होंने उल्टे अहिल्या पर झूठा लांक्षण लगा दिया कि अहिल्या की सहमति से उसने ऐसा करने का साहस किया | 

चूँकि, देवराज इन्द्र सर्व शक्तिमान थे, इसलिए उनसे प्रतिवाद और प्रतिरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं हुई | यहाँ तक कि राजा जनक भी कुछ नहीं कर सके ! सब कुछ जानकर भी वो अनजान बने रहे ! ‘ 

“माँ, यह तो सरासर गलत हुआ ! धर्म की आड़ में गलत काम का बढाबा ?! सरासर अन्याय है | ऐसे धर्मात्मा या न्य्याविद कहलाने से क्या फायदा, जो विरोध न कर सके ! उनलोगों को खुलकर विरोध करना चाहिए था | न्यायपीठ के अंदर अन्याय हो रहा हो ...और सभी गणमान्य चुप रहें ! ये कदापि उचित नहीं | “ किशोर वय बेटा झुंझलाकर बोला |

“अरे बेटा, आगे तो सुन | फिर तुझे सब सही से समझ में आ जाएगा |” 

माँ फिर से बेटे को कहानी सुनाने लगी |उसकी चेहरे पर एक अलग ही आभा झलक रही थी | शांत भाव से वह कहने लगी “गौतम और अहिल्या के सपने पर कुठाराघात हो गया ! अहिल्या के कथित धर्म भ्रष्टता के कारण ... गौतम समाज की नजरों में अब इस लायक नहीं समझे जाने लगे कि वह विद्यापीठ का नेतृत्व कर सके | इसलिय गौतम को अहिल्या का साथ देना, तत्कालीन समाज की नजरों में भीषण दोष माना जाने लगा ! 

अहिल्या उदास रहने लगी ! उसको अपना जीवन अब व्यर्थ लगने लगा ! उन्हें यह बात बहुत अधिक कचोटती थी कि उसके ही कारण, गौतम का न्यायपीठ बनाने और उसे स्थापित करने का सपना चूरचूर हो गया | 

बेटा, ये सारे विचार अहिल्या की पतिव्रता और कर्तव्य निष्ठा के परिचायक हैं | अब, तू गौतम ऋषि के बारे में सुन | इतना होने के बावजूद भी ...गौतम, अपनी पत्नी अहिल्या को निष्कलंक तथा निर्दोष समझते रहे | इसलिए सामाजिक बहिष्कार और प्रताड़ना के बाबजूद, गौतम ने अहिल्या का साथ देने का निश्चय किया और देवराज इन्द्र को उनके अपराध की सजा देने हेतु वो दृढ़प्रतिज्ञ हो गए | 

इस बात की जानकारी होते ही अहिल्या वेचैन हो गई |तब जाकर अहिल्या ने निश्चय किया कि वह पति तथा पुत्र को सदा के लिए अपने से दूर, मिथिला की राजधानी भेज देगी| तथा स्वयं, वह तपस्या में लीन हो जायेगी | जिससे विद्यापीठ स्थापित होने में कोई सामाजिक अड़चन नहीं आएगी | तब जाकर विद्यापीठ का नेतृत्व करना गौतम के लिए संभव हो जायेगा और साथ-साथ उनके पुत्र की शिक्षा-दीक्षा भी पूरी हो जायेगी | अहिल्या ने ऐसा करने का प्रण ले लिया |

उसने विद्यापीठ और परिवार की शांति के लिए अपने शेष जीवन को तपस्या में व्यतीत करना उचित समझा | गौतम इस बात का पुरजोर विरोध करते रहे | अहिल्या से बारबार मनुहार करते रहे.. हमदोनों को इसतरह छोड़कर..तुम मत जाओ | 

पर, गौतम के लाख विरोध करने के बाबजूद, अहिल्या ने इस बात...................

‘गौतम राजधानी में विद्यापीठ का नेतृत्व करते हुए संचालन करेंगे और अहिल्या अकेले परित्यक्ता की तरह जीवन यापन करते हुए तपस्या करेगी ‘ 

.................को गौतम से आखिर मना ही लिया | अहिल्या के दलील के आगे गौतम नतमस्तक हो गये | एक स्त्री जब कुछ ठान लेती है तो वह करके ही दिखाती है | अहिल्या परित्यक्ता की तरह समाज से अलग-थलग, शिलावत होकर अकेली भगवद भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत करने लगी |

इधर गौतम ऋषि , मिथिला की राजधानी में न्यायविद्यापीठ का सञ्चालन करने लगे | उनके विद्यापीठ के प्रताप का डंका सम्पूर्ण भारत में बजने लगा | विद्वत परिषद् की बैठक में गौतम ने यह निर्णय किया कि अब से मिथिला में देवराज इन्द्र की पूजा नहीं होगी | उस समय मिथिला का ही व्यवहार सम्पूर्ण भारत में मान्य था | देवराज इन्द्र की पूजा सम्पूर्ण भारत में बंद हो गयी | भारत के सनातन धर्म में देवराज इन्द्र इस प्रकार बहिष्कृत हो गए | 

अहिल्या के साथ किये गए अपराध के लिए देवराज इन्द्र को गौतम ने यह भीषण सजा दिलवाई | 

इधर दिन, सप्ताह, महीने, बर्ष बीतते गए | अहिल्या को कुछ भी भान नहीं होता था | वह अपनी तपस्या और दिनचर्या में लीन होकर स्थितप्रज्ञ, पत्थर सामान हो गयी थी | 

दीर्घ काल के बाद, राम..जब अपने भाई लक्ष्मण के साथ गुरु विश्वामित्र के निर्देशन में मिथिला जा रहे थे, तब अपने गुरु द्वारा अहिल्या के दुखद वृतांत को सुनकर राम उनके आश्रम में गए | अहिल्या का पैर छूकर उन्होंने आशीर्वाद लिया तथा उनके हाथ से जल लेकर श्रीराम ने पान किया | 

भारत का सर्वश्रेष्ठ सूर्यवंशी महाप्रतापी राजा ‘दशरथ’ का ज्येष्ठ पुत्र ‘ श्रीराम’.... श्रेष्ठ्तम धनुर्धर तथा अनेक राक्षसों का संघारक.... ने अहिल्या को सम्मान और स्वीकार्यता प्रदान किया | इसतरह अहिल्या की तपस्या सफल हुई और राम के प्रयास से अहिल्या को अपने एकाकी जीवन से त्राण मिला | पति गौतम और पुत्र सदानंद के साथ फिर से रहने लगी | “

इतना कहते-कहते, माँ की आँखें नम हो गईं | उसने अपने बांहों में जकड़कर बेटे को छाती से लगा लिया और बुदबुदाई , “बेटा,जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, वहीँ देवता का वास होता है | 

बेटा , माँ के दैदीप्यमान चेहरे को अचरज भरी नजरों से निहारने लगा...जैसे सामने साक्षात दुर्गा-माँ खड़ी हों | 
“  आज मैं अच्छी तरह से समझ पाया कि नारी को ‘शक्ति स्वरूपा’ क्यों कहा जाता है !”  बुदबुदाते हुए नन्हे शिशु की भांति माँ के छाती से बेटा  लिपट गया |

माँ की आँखों से अब झर- झर अमृत रस बरसने लगीं । 
राजेश 
मनोज 

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राजेश     Rajesh     कहानियाँ     दुःखद     2021-09-22 11:04:25     शादी फिर प्रेम, या प्रेम फिर शादी     61409     5.0/5 (1)    
राजेश

सुंदर सी प्यारी सी नैना अपने हृदय कमल में सपनों का संसार  संजोए थी।
 नैना का जन्म मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था, पर  परिवार में सबकी लाडली थी। उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति होती थी। उसने अपनी शिक्षा भी अच्छे से पूर्ण की ,और सपनों के राजकुमार की कल्पना करने लगी।
 उसकी बड़ी भाभी कभी-कभी उससे मजाक में पूछती कि दीदी पहले शादी फिर प्रेम या पहले प्रेम फिर  शादी।
 प्यारी सी बिमला सकुचा कर बोलती, जो भी हो, फिर बोलती पहले शादी फिर प्रेम, फिर भाभी से बोलती की शादी और प्रेम साथ-साथ हो जाए तो कितना अच्छा हो।
 प्यारी सी बिमला  के लिए एक रिश्ता आया, बहुत बड़े जमींदार परिवार में लड़का बैरिस्टर नवीन । 
नवीन के पिताजी को बिमला भी गई और बिमला का विवाह राजु  से हो गया।
 सपनों को  संजोए हुए अपने पति के हवेली नुमा घर में उसका प्रवेश हुआ। राजु बहुत पढ़े-लिखे, लेकिन उनका स्वभाव बहुत ही जड़ और संवेदनाओं  से रहित था।
 पत्नी उनके लिए सिर्फ भोग्या थी। विवाह की प्रथम रात्रि को ही उनके कठोर स्वभाव की झलक बिमला को मिल गई। बिमला  को इत्र बहुत पसंद था लेकिन उन्होंने उस इत्र की शीशी को फेंक दिया। चादर पर गुलाब के फूल बिखरे हुए थे ,उनको एक ही क्षण में झटक दिया, और बिमला को उसी दिन ढेर सारी हिदायत दे दी, जैसे कि इस परिवार की परंपरा है कि तुम्हें खिड़की के पास खड़े नहीं होना है ,ताक झांक नहीं करना है, मेरे अध्ययन कक्ष में भी बगैर आज्ञा के प्रवेश नहीं करना है। प्यारी सी बिमला  कुछ समझ ही नहीं पाई, यह कैसी शादी है ,जहां पर प्यार का दूर-दूर तक पता नहीं है। उसका कोमल मन टूट सा गया। पति ने बिमला  को मात्र शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम बना लिया ।घड़ी के कांटे की तरह हर काम समय पर चाहिए था। उसके मन को, उसकी भावनाओं को, उसके हृदय की कोमलता, को कभी पढ़ने की कोशिश ही नहीं की।बिमला  सोचती थी, चांदनी रात में प्रिय पतिदेव के साथ बैठकर तारों को निहारु,  बगीचे में पौधों को प्यार से देखें ,लेकिन उसके सपने अपने पति के अनुशासन में, उनके स्वभाव की कठोरता में न जाने कब पिघल गए।
 हंसती खेलती नैना कब उदासी के आवरण में ढक गई, पता ही नहीं चला जब मायके में आई तो भाभी ने बोला, बिमला  तुम्हें क्या हो गया तुम तो कितनी हंसती खिलखिलाती थी, कितना श्रृंगार करती थी, और अब तुम्हारे चेहरे पर उदासी कैसी ?
 वह कहने लगी, भाभी क्या बताऊं? यह कैसी शादी, जहां पर प्यार का नामोनिशान नहीं है, मात्र आर्थिक, सामाजिक स्वतंत्रता,  बड़ी हवेली, बड़ी गाड़ी, नौकर चाकर इनसे अगर जीवन की खुशियां मिलती, तो मुझे ऐसी खुशियां नहीं चाहिए।
 मुझे तो चाहिए अपने पति का प्यारा सा साथ, प्यार से भरा हुआ संसार जहां मेरे हृदय को पढ़ा जा सके ,
 मेरी कल्पनाओं को साकार रूप मिल सके।
 उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे परिवार के सब लोग समझ भी गए ,लेकिन हमारे देश की परंपरा विवाह को बहुत- मजबूत बंधन मानती है, और शादी को तोड़ना कहीं से भी आसान नहीं होता है।
 सभी समझते हैं ,शादी समझौते की नींव पर टिकी रहती है।
 बिमला  भी यही समझने लगी ,और शादी को एक समझौता मानकर अपने जीवन का निर्वाह करने लगी।
 सोचने लगी कैसी विडंबना है? नारी के मन को पति क्यों नहीं जान पाते?
 क्यों  उसे मात्र भोग्या समझते हैं, कभी-कभी ह्रदय में ख्याल आता कि हर माता-पिता जैसे लड़के का पारिवारिक स्टेटस देखते हैं, संपन्नता देखते हैं, शिक्षा देखते हैं, रंग, रुप ,कद, काठी देखते हैं, वैसे ही उस लड़के के हृदय को भी पढ़ा जाना चाहिए ।
उसके हृदय में भावनाएं हैं कि नहीं, वह नारी के मन को थोड़ा समझता है कि नहीं, ऐसी मन में उठापटक चलती रहती। यह भी समझने लगी कि अगर हर नारी जीवन में समझौते को ना माने तो किसी की गृहस्थी भी ना चले ,और पहली बार ससुराल आने के बाद , कोई भी लड़की दूसरी बार आना ना चाहे।
 समय गुजरता रहा, वह गर्भवती हुई, तब भी पति का व्यवहार एक मशीनी व्यवहार था। अस्पताल जाते समय भी वह सोच रही थी कि इस कठिन समय में तो उसके पति उसके साथ होते पर उन्होंने तो मात्र अच्छे हॉस्पिटल और डॉक्टरों के व्यवस्था करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली।
 समय गुजरता रहा, बिमला  के विवाह को 4 साल हो गए जब शादी की सालगिरह आई, तब बिमला अच्छे से श्रृंगार कर अपने पति के अध्ययन कक्ष में गई, अपने श्रृंगार को दिखाना चाहती थी। अपने पति के मन को पढ़ना चाहती थी। लेकिन पति के पास इन सब चीजों की फुर्सत नहीं थी, वह तो समझते थे कि नारी को अनुशासन के माध्यम से ही कैद रखा जा सकता है।
 नवीन के एक दोस्त अजय उनसे मिलने आए, और उन्होंने पूछा कि कैसे चल रही है तुम्हारी गृहस्थी, नवीन के मन में तो नारी के प्रति बहुत सारा जहर भरा हुआ था। सो वही बात कही, अजय ने उन्हें समझाया कि नारी मात्र भोग्या नहीं है, उसके अपने सपने हैं, उसकी अपनी स्वतंत्रता है ,उसके अपने विचार हैं, हमें एक दूसरे के विचारों का सम्मान करना चाहिए। यह जीवन की गाड़ी को चलाने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है।राजु बहुत कठोर थे फिर भी उनके हृदय में कुछ सोचने को मजबूर हो गया।
बिमला कठोर अनुशासन और संवेदनहीन पति के साथ रहते-रहते थक गई, और उसने अपने मायके जाने की सोची और अपने नन्हे से पुत्र को लेकर जाने लगी ।
पाषाण ह्रदय नवीन के हृदय में प्रेम का संचार हुआ, अपनी पुरानी बातों को याद करके पश्चाताप करने लगे ।उन्होंने कब-कब बिमला  का  हृदय दुखाया इस बात को याद करने लगे, और बिमला के पास आकर उससे माफी मांगने लगे। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। बिमला  तो प्रेम की प्यासी थी, तुरंत उसने माफ कर दिया, और अपने पति की बाहों में सिमट गई ।आज उसे शादी और प्रेम दोनों मिले, और वह ईश्वर को धन्यवाद देने लगी।
 राजेश  

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राजेश     Rajesh     कहानियाँ     बाल-साहित्य     2021-09-22 11:04:25         61409     5.0/5 (1)    
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“बहन मिल गयी ”
राजेश 


एक लड़का था । उसका नाम मनिष था। वह अपने माँ बाप का इकलौता बच्चा था। जब वह लगभग तीन साल का था तो एक दिन रोए जा रहा था, उसकी मम्मी उसे पुचकार रहीं थी। मगर वह चुप होने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसके पापा बिजु ने उससे पूछा, “क्या बात है बेटा”? उसने कहा, “पापा, पापा मुझे एक बहन ला कर दो। मेरे सभी दोस्तों के पास एक बहन है। उनकी बहनें उनके साथ खेलती हैं, मैं अकेला ही रहता हूं। मेरी बर्थडे पर भी कोई बहन मुझे टीका नहीं लगाती और न कोई राखी ही बांधती है। मेरे दोस्त अपनी बहन को गिफ्ट देते हैं। मैं यह सब नहीं कर पाता”। उसके पापा को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहें और क्या करें। उसने किसी तरह मनिष  को चुप कराया।

रात में सोते समय बिजु  ने अपनी पत्नी सरला से पूछा, “देखो आज मनिष कितना रो रहा था और बहन के लिए जिद कर रहा था । ऐसे में हमें क्या करना चाहिए”? सरला ने कहा, “उसकी बात तो ठीक है लेकिन आज के इस महंगाई के जमाने में एक बच्चे का पालन करना कितना मुश्किल होता है, स्कूलों की फीस महंगी हो गई है, एक ही बच्चे को पढ़ा- लिखा कर बड़ा करना कितना कठिन हो गया है। हम कैसे दो बच्चों का खर्च उठाएंगे? तुम अकेले कमाते हो। मैं जानती हूँ कि तुम ओवरटाइम करके किसी तरह घर का खर्च चला रहे हो”। फिर उसने कहा,” जाने दो मनिष  अभी बच्चा है, समझ जाएगा और कुछ दिनों में वह सब भूल जाएगा”। इतना कहकर दोनों पति-पत्नी सो गए। 

सुबह मनिष  फिर वही जिद करने लगा कि मैं स्कूल नहीं जाऊंगा। मुझे अपनी बहन के साथ ही स्कूल जाना है। इसी तरह सौरव अक्सर बहन की मांग करता था । उसे देख कर उसके पापा बिजु  ने एक दिन इरादा किया कि चलो हम एक बार कोशिश करते हैं कि उन्हें एक और बच्चा पैदा हो जाए। वे सरला को भी राजी करना चाहते थे । मगर सरला ने फिर प्रश्न किया कि इसकी क्या गारंटी है कि हम जो बच्चा पैदा करेंगे वह एक लड़की ही होगी। अपने भारत में तो पहले से इसका पता भी नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि हमारे फिर से लड़का ही हो जाए। ऐसे में तो हम बेवजह फंस जाएंगे। इसलिए हमें कोई रिस्क नहीं लेना है। हमारे एक ही लड़का अच्छा है।

उसके बाद सौरव अपनी पढ़ाई में लग गया था और फिर उसने बहन की मांग करना बंद कर दिया था। पढ़ाई में वह अच्छा था इसलिए उसका चयन यू एस ए के किसी विश्व विद्यालय में हो गया था। वह पढ़ाई के लिए यूएसए चला गया और वहां पढ़ाई पूरी करके एक अच्छी नौकरी करने लगा था। उसने बहुत सारा पैसा कमा लिया था । जब मनिष  एस ए से लौट कर आया तो उसके मम्मी-पापा ने उसकी शादी का प्रस्ताव रखा। सौरव ने उन्हें टाल दिया कि अभी कुछ दिन मुझे शादी नहीं करनी है।

लगभग एक महीने बाद एक दिन सौरव एक लड़की के साथ अपने घर आया और अपनी मम्मी – पापा से कहा कि यह लड़की अर्चना है जो अब इसी घर में रहेगी।

उसके मम्मी- पापा हैरान थे मनिष   ने क्या कर डाला । वैसे तो लड़की बहुत सुंदर थी। उन्होंने कहा कि मनिष , तुम्हें हमें बताना चाहिए था, हम तुम्हारी शादी इसी लड़की से करा देते। तब तुम इसे घर लेकर आते। बड़ी धूमधाम के साथ हम बरात लेकर जाते और इसे विदा कराकर लाते। अब लोग क्या कहेंगे? 

मनिष  ने उन्हें बीच में रोकते हुए कहा , “आप लोग गलत समझ रहे हैं। मैंने इससे कोई शादी - वादी नहीं की है , बल्कि यह मेरी बहन है। आप दोनों मेरी शादी कराना चाहते हैं मगर मैं चाहता था कि शादी से पहले मेरी एक बहन हो । इसीलिए मैं इसे बहन बना कर लाया हूँ। फिर सौरव बोला कि मैं हमेशा एक बहन के लिए तरसता रहा हूं। आपसे भी बहुत दफे जिद करता था कि मुझे बहन ला कर दो। दुर्भाग्य से मुझे सगी बहन नहीं मिल सकी इसलिए जब मैं अमेरिका से लौटा और आपने शादी की बात काही तो मेरे मन में एक बहन के साथ बरात ले जाने की इच्छा हुई और मैं उसकी तलाश में लग गया।

अपना ओर  आपका 
         राजेश  कसवाॅ

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राजेश     Rajesh     कहानियाँ     देश-प्रेम     2021-09-22 11:04:25     बेताल बोला, “मैं एक शर्त पर चलूँगा। अगर तू रास्ते में बोलेगा तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।”     61409     5.0/5 (2)    
राजेश

प्रारम्भ की कहानी

बहुत पुरानी बात है। धारा नगरी में गंधर्वसेना नाम का एक राजा राज करते थे। उसके चार रानियाँ थीं। उनके छ: लड़के थे जो सब-के-सब बड़े ही चतुर और बलवान थे। संयोग से एक दिन राजा की मृत्यु हो गई और उनकी जगह उनका बड़ा बेटा शंख गद्दी पर बैठा। उसने कुछ दिन राज किया, लेकिन छोटे भाई विक्रम ने उसे मार डाला और स्वयं राजा बन बैठा। उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता गया और वह सारे जम्बूद्वीप का राजा बन बैठा। एक दिन उसके मन में आया कि उसे घूमकर सैर करनी चाहिए और जिन देशों के नाम उसने सुने हैं, उन्हें देखना चाहिए। सो वह गद्दी अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर, योगी बन कर, राज्य से निकल पड़ा।

उस नगर में एक ब्राह्मण तपस्या करता था। एक दिन देवता ने प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया और कहा कि इसे जो भी खायेगा, वह अमर हो जायेगा। ब्रह्मण ने वह फल लाकर अपनी पत्नी को दिया और देवता की बात भी बता दी। ब्राह्मणी बोली, “हम अमर होकर क्या करेंगे? हमेशा भीख माँगते रहेंगें। इससे तो मरना ही अच्छा है। तुम इस फल को ले जाकर राजा को दे आओ और बदले में कुछ धन ले आओ।”

यह सुनकर ब्राह्मण फल लेकर राजा भर्तृहरि के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। भर्तृहरि ने फल ले लिया और ब्राह्मण को एक लाख रुपये देकर विदा कर दिया। भर्तृहरि अपनी एक रानी को बहुत चाहता था। उसने महल में जाकर वह फल उसी को दे दिया। रानी की मित्रता शहर-कोतवाल से थी। उसने वह फल कोतवाल को दे दिया। कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था। वह उस फल को उस वेश्या को दे आया। वेश्या ने सोचा कि यह फल तो राजा को खाना चाहिए। वह उसे लेकर राजा भर्तृहरि के पास गई और उसे दे दिया। भर्तृहरि ने उसे बहुत-सा धन दिया; लेकिन जब उसने फल को अच्छी तरह से देखा तो पहचान लिया। उसे बड़ी चोट लगी, पर उसने किसी से कुछ कहा नहीं। उसने महल में जाकर रानी से पूछा कि तुमने उस फल का क्या किया। रानी ने कहा, “मैंने उसे खा लिया।” राजा ने वह फल निकालकर दिखा दिया। रानी घबरा गयी और उसने सारी बात सच-सच कह दी। भर्तृहरि ने पता लगाया तो उसे पूरी बात ठीक-ठीक मालूम हो गयी। वह बहुत दु:खी हुआ। उसने सोचा, यह दुनिया माया-जाल है। इसमें अपना कोई नहीं। वह फल लेकर बाहर आया और उसे धुलवाकर स्वयं खा लिया। फिर राजपाट छोड, योगी का भेस बना, जंगल में तपस्या करने चला गया। भर्तृहरि के जंगल में चले जाने से विक्रम की गद्दी सूनी हो गयी। जब राजा इन्द्र को यह समाचार मिला तो उन्होंने एक देव को धारा नगरी की रखवाली के लिए भेज दिया। वह रात-दिन वहीं रहने लगा।

भर्तृहरि के राजपाट छोड़कर वन में चले जाने की बात विक्रम को मालूम हुई तो वह लौटकर अपने देश में आया। आधी रात का समय था। जब वह नगर में घुसने लगा तो देव ने उसे रोका। राजा ने कहा, “मैं विक्रम हूँ। यह मेरा राज है। तुम रोकने वाले कौन होते होते?”

देव बोला, “मुझे राजा इन्द्र ने इस नगर की चौकसी के लिए भेजा है। तुम सच्चे राजा विक्रम हो तो आओ, पहले मुझसे लड़ो।”

दोनों में लड़ाई हुई। राजा ने ज़रा-सी देर में देव को पछाड़ दिया। तब देव बोला, “हे राजन्! तुमने मुझे हरा दिया। मैं तुम्हें जीवन-दान देता हूँ।”

इसके बाद देव ने कहा, “राजन्, एक नगर और एक नक्षत्र में तुम तीन आदमी पैदा हुए थे। तुमने राजा के घर में जन्म लिया, दूसरे ने तेली के और तीसरे ने कुम्हार के। तुम यहाँ का राज करते हो, तेली पाताल का राज करता था। कुम्हार ने योग साधकर तेली को मारकर शम्शान में पिशाच बना सिरस के पेड़ से लटका दिया है। अब वह तुम्हें मारने की फिराक में है। उससे सावधान रहना।”

इतना कहकर देव चला गया और राजा महल में आ गया। राजा को वापस आया देख सबको बड़ी खुशी हुई। नगर में आनन्द मनाया गया। राजा फिर राज करने लगा।

एक दिन की बात है कि शान्तिशील नाम का एक योगी राजा के पास दरबार में आया और उसे एक फल देकर चला गया। राजा को आशंका हुई कि देव ने जिस आदमी को बताया था, कहीं यह वही तो नहीं है! यह सोच उसने फल नहीं खाया, भण्डारी को दे दिया। योगी आता और राजा को एक फल दे जाता।

संयोग से एक दिन राजा अपना अस्तबल देखने गया था। योगी वहीं पहुँच और फल राजा के हाथ में दे दिया। राजा ने उसे उछाला तो वह हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़ा। उसी समय एक बन्दर ने झपटकर उसे उठा लिया और तोड़ डाला। उसमें से एक लाल निकला, जिसकी चमक से सबकी आँखें चौंधिया गयीं। राजा को बड़ा अचरज हुआ। उसने योगी से पूछा, “आप यह लाल मुझे रोज़ क्यों दे जाते हैं?”

योगी ने जवाब दिया, “महाराज! राजा, गुरु, ज्योतिषी, वैद्य और बेटी, इनके घर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए।”

राजा ने भण्डारी को बुलाकर पीछे के सब फल मँगवाये। तुड़वाने पर सबमें से एक-एक लाल निकला। इतने लाल देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ। उसने जौहरी को बुलवाकर उनका मूल्य पूछा। जौहरी बोला, “महाराज, ये लाल इतने कीमती हैं कि इनका मोल करोड़ों रुपयों में भी नहीं आँका जा सकता। एक-एक लाल एक-एक राज्य के बराबर है।”

यह सुनकर राजा योगी का हाथ पकड़कर गद्दी पर ले गया। बोला, “योगीराज, आप सुनी हुई बुरी बातें, दूसरों के सामने नहीं कही जातीं।”

राजा उसे अकेले में ले गया। वहाँ जाकर योगी ने कहा, “महाराज, बात यह है कि गोदावरी नदी के किनारे मसान में मैं एक मंत्र सिद्ध कर रहा हूँ। उसके सिद्ध हो जाने पर मेरा मनोरथ पूरा हो जायेगा। तुम एक रात मेरे पास रहोगे तो मंत्र सिद्ध हो जायेगा। एक दिन रात को हथियार बाँधकर तुम अकेले मेरे पास आ जाना।”

राजा ने कहा “अच्छी बात है।”

इसके उपरान्त योगी दिन और समय बताकर अपने मठ में चला गया।

वह दिन आने पर राजा अकेला वहाँ पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, “यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर मसान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा लटका है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा वहाँ से चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन राजा हिम्मत से आगे बढ़ता गया। जब वह मसान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे किर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

राजा ने नीचे आकर पूछा, “तू कौन है?”

राजा का इतना कहना था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा। राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी वह मुर्दा फिर पेड़ पर जा लटका। राजा फिर चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे का बगल में दबा, नीचे आया। बोला, “बता, तू कौन है?”

मुर्दा चुप रहा।

तब राजा ने उसे एक चादर में बाँधा और योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है?”

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “मैं एक शर्त पर चलूँगा। अगर तू रास्ते में बोलेगा तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।”

राजा ने उसकी बात मान ली। फिर बेताल बोला, “ पण्डित, चतुर और ज्ञानी, इनके दिन अच्छी-अच्छी बातों में बीतते हैं, जबकि मूर्खों के दिन कलह और नींद में। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”

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