जीना इसी का नाम है.........😃😃 - Ved prakash

जीना इसी का नाम है.........😃😃     Ved prakash     कहानियाँ     हास्य-व्यंग     2021-09-22 10:22:18     जीना इसी का नाम है.........     14198        
जीना इसी का नाम है.........😃😃

जीना इसी का नाम है.........😃😃

मेघा एक सरकारी दफ्तर में टाइपिस्ट थी । उसके हाथों की उंगलियां जब कंप्यूटर के "की बोर्ड" पर नर्तन करते तो की बोर्ड की खट-खट की आवाज़ भी ऑफिस के दूसरे रंगीन मिजाज कर्मचारियों को किसी सुरीली धुन से कम नहीं लगती और वे सब इसके करीब बैठकर  मधुर ध्वनि का आनंद लेना चाहते।

यह उसके रूप सौंदर्य का चमत्कारिक प्रभाव था की बड़े साहब जो पहले कभी बिखरे बाल और मामूली कपड़ों में  नजर आते थे। पान की पिक से ऑफिस की दीवारों पर अपनी लाल पहचान बनाने में तनिक भी न शरमाते थे 
अब वह बदले बदले नजर आते है। शर्ट पैंट की जगह कोट पैंट टाई ने ले लिया था मुंह में पान की जगह अब इलाइची चबाते नज़र आते है।

मेघा को वह अक्सर अपने चेंबर में अकारण ही बुला लेते और घंटो बाते करते । बरसो बाद उन्हें अपने शादी न करने के फैसले पर उन्हें काफी पश्चाताप हो रहा था ।

पचास बर्ष की अवस्था में भी वह, मेघा के मधुर मुस्कान के तीरों से अपने ह्रदय को छलनी हुआ महसूस कर रहे थे। एक तरफ जहां उसके हृदय में प्रेम की लहरे हिलोरे मरती थी वही दूसरी तरफ ढलती उम्र के साथ सफेद होते बाल, नवयुवकों को उपहास उड़ाने का मौका भी दे देती थी। जिसे सुनकर उसके चहरे के हाव भाव एकदम से बदल जाते क्रोध ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ता उपहासकर्ता को वह तीखे स्वर में उत्तर देते "बुढ़ा होगा तेरा बाप"

इस कहानी का तीसरा मुख्य पात्र मोहन है जो सुंदर, सुशील अविवाहित युवक है वह भी उसी दफ्तर में एक टाइपिस्ट है। उसका टेबल मेघा के टेबल को स्पर्श करती हुई रखी थी एक भले सहकर्मी की भांति मोहन, मेघा को खूब सहयोग करता था मेघा को टाइप करने के लिए मिली ऑफिशियल लेटर्स में स्पेलिंग मिस्टेक को वह झट से खोज लेता और उसके संज्ञान में डाल देता । जिससे उसे टाइप करने में कोई त्रुटि नही होती और वह बिना त्रुटि के शुद्धतापूर्वक  टाइप कर पाती अपने बेहतर कार्य के कारण उच्च अधिकारियों से शाबाशी पाती थी ।

वह मोहन को सम्मान भरी नजरों से देखती थी और सदा ही उसे मोहन में एक अच्छे मित्र की छबि नजर आती थी ।

परंतु मोहन के मन में तो कुछ और ही चल रहा था
वह मेघा को पत्नी रूप में प्राप्त करने के सपने देखा करता था जब भी कभी बड़े साहब मेघा को अपने चेंबर में बुलाकर बाते करते तो उसे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था। कर तो कुछ सकता था नही इसलिए  वह मन ही मन उन्हे ढेर सारी सुंदर सुंदर गालियां देता । 

एक बार की बात है आफिस से छुटने के बाद बहुत तेज बारिश शुरू हो गई । मेघा के पास एक  प्यारी  रंगबिरंगी छतरी थी जिसे खोलकर वह घर जाने की तैयारी करने लगी । जबकि मोहन भींगते हुए सिर पर एक पुरानी फाइल रखकर जाने लगा  जिसे देखकर मेघा  बोली " मोहन जी मेरे छाते के अंदर आ जाइए इस तरह तो आप घर जाते जाते भीग जायेगे "

मोहन को लगा मानो मन की मुराद मिल गई हो वह झट से उसके छाते के अंदर आ गया। छतरी छोटी होने के वजह से कभी बारिश की फुहार मेघा को छूती तो कभी मोहन को, दोनो लगभग आधे आधे भीग रहे थे और जब कभी दोनो के गीले बदन कम जगह की वजह से टकरा जाते तो किसी शॉर्ट सर्किट से कम महसूस नहीं होता वह मन ही मन बेमौसम बारिश को लाख लाख धन्यवाद दे रहा था 

ऑफिस से कुछ दूरी पर एक चाय की दुकान थी मोहन, मेघा से साथ मिलकर एक एक कप चाय पीने की इच्छा जाहिर की जिसके लिए मेघा भी तैयार हो गई। दोनो दुकान के आगे लगे टीन के शेड के नीचे बेंचपर बैठ गए। मोहन चाय का ऑर्डर देने चला गया इधर मेघा बरसात के गिरते बूंदों के साथ खेलने लगी  बारिश को देख कर उसे अपने बचपन के दिन याद आ रहे थे की किस प्रकार वह मां के मना करने पर भी बरसात में भीगती रहती तभी मोहन ने उसे चाय का एक कप पकड़ाया फिर दोनो गरम गरम चाय का आनंद लेने लगे

तभी दुकान के सामने बड़े साहब  की सरकारी गाड़ी आकर रूकी । जिसे  देख कर मोहन की सारी खुशियां मानो उड़ गई उसे किसी दुर्भाग्य की आशंका सता रही थी

बड़े साहब, मेघा के नजदीक आकर  उसे जाकर गाड़ी में बैठने को कहा ताकि वह उसे उसके घर तक पहुंचा दे। मेघा भी खुश होकर गाड़ी के पास जाने लगी, जाते जाते वह अपना छाता मोहन को दे गई ताकि वह बिना भीगे अपने घर पहुंच सके

बड़े साहब मेघा को लेकर फुर्र हो चुके थे और मोहन के हाथ में था तो सिर्फ एक बेजान छाता उसे ऐसा लग रहा था जैसे किसी पूंजीपति ने एक बार फिर किसी गरीब की झोपडी की मजाक उड़ाई है 

तेज कदमों से जल्दी जल्दी वह अपने घर की तरफ बढ़े जा रहा था साथ ही साथ असमय बरसात को कोस भी रहा था बरसात से उसका शरीर  लगभग पूरा भींग गया था

घर पहुंच कर वह बस छाते को ही निहारे जा रहा था कभी वह छाते को सीने से लगा लेता तो कभी 
उससे बाते करता तो कभी रंग बिरंगे छाते के ऊपर शायरी कहता।आज सचमुच नींद उनकी आखों से कोसो दूर थी उसे बार बार वही पल याद आ रहा था जब उस छाते के अंदर मेघा के साथ आधे आधे भीग रहा था फिर न जाने कब नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया और वह सो गया। 

अगली सुबह उसका शरीर तेज बुखार से तप रहा था शायद रात का भीगना उसके शरीर को बिल्कुल 
भी रास नहीं आया था उसने फोन से ही मेडिकल लीव के लिए अर्जी लगा दी । स्वस्थ होने पर कुछ दिनों पश्चात् जब वह दफ्तर पहुंचा तो देखा मेघा की सीट खाली है एक स्टाफ से पूछने पर पता चला 
की मेघा की शादी  फिक्स हो गई है जिससे वह छुटी पर है मोहन के टेबल पर मेघा का शादी का कार्ड  रखा था और उसमे एक चिट्ठी भी थी। चिट्ठी में लिखा था
मोहन जी ,
मेरी शादी अचानक  फिक्स हो गई ।सब कुछ जल्दी जल्दी हो रहा है मेरी इच्छा थी की मैं आपके घर आकर शादी का निमंत्रण कार्ड आपके हाथ में दूं पर अफसोस समय की कमी के कारण मैं ऐसा न कर सकी आपसे अनुरोध है मेरी शादी में उपस्थित होकर मेरा और मेरे परिवार का मान बढ़ाए और इसके साथ साथ एक अनुरोध और है मेरे ऑफिस के कुछ काम पेंडिंग में पड़े है  मांगलिक कार्यों में व्यस्तता के कारण मैं उन कार्यों को करने में असमर्थ हूं कृपया आप उन कार्यों को पूरा करने की कृपा करे मै आपकी सदा आभारी रहूंगी

आपकी प्यारी सखी ,मेघा

खत पढ़कर मोहन बाबू सपनों की दुनिया से हकीकत के संसार में आ गए और लग गए उसके  पेंडिंग कामों को तन मन से पूरा करने में....

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