हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी - Shubhashini singh

हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी     Shubhashini singh     कहानियाँ     अन्य     2021-09-22 10:49:57     Google /Yahoo/Bing     9766        
हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी

       हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी

एक बार एक शहर में प्रतियोगिता हो रही थी।
वही शहर में रहने वाले कुछ लोग इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे थे।वही रास्ते से उमेश नाम का लड़का जा रहा था।
जो बहुत ही घमंडी किस्म का था, और घमंड भी क्यों न हो वो लंदन से पढ़ कर आया था।उसे देख ऐसा लगता मानो वो इस देश का है ही नहीं।
उसी शहर में रहने वाला एक अनुज नाम का लड़का था।
वो बहुत ही सीधा साधा था। अनुज और उमेश दोनों ही  दोस्त थे। उमेश हमेशा अनुज को अपने पढ़ाई का घमंड दिखता था। जिससे अनुज परेशान रहता था।अनुज  मध्यवर्गीय परिवार से था। बचपन में ही पिता का साया हट गया।और अनुज के ऊपर उसके परिवार की सारी ज़िम्मेदारी आ गई। वो चाह कर भी बाहर पढ़ने के लिए नहीं जा सकता था। अनुज एक मेहनती लड़का था। वो दिन रात मेहनत करके अपने परिवार का पालन पोषण करता था।और साथ ही साथ अपनी पढ़ाई भी पूरा किया। उमेश उसका बचपन का दोस्त था। बचपन में तो उमेश अनुज का साथ देता था।पर जैसे जैसे वो बड़ा हुआ।उसके अंदर अहंकार आ गया।
फिर भी अनुज उसकी बातो को दिल से नहीं लगता था। एक दिन वो दोनो साथ में घूमने जा रहे थे। उन्होंने देखा यहां प्रतियोगिता हो रही थी। दोनों ने सोचा कि क्यों न इस प्रतियोगिता में भाग लिया जाएं।अनुज ने उमेश से पूछा क्या तुम हिस्सा लेना चाहोगे। उमेश ने बोला हां क्यों नहीं आखिर मै लंदन में पढ़ा हूं मुझे यहां भला कौन हरा सकता है। अनुज हां बोलते हुए आगे बढ़ा जैसे ही दोनों वहां गए उन्होंने देखा कि यहां हिन्दी की प्रतियोगिता चल रही है अब इतने में उमेश बोला हिन्दी प्रतियोगिता भी कोई प्रतियोगिता है। जमाना बदल रहा है पर यहां के लोग नहीं बदल सकते। अभी भी वो अपनी घिसी पिटी हिन्दी पर ही टिके है। उन्हें पता होना चाहिए की हमारे लिए इंग्लिश कितनी जरूरी है। इतने पर ही अनुज ने उसको टोका और बोला तुमको इतनी ही इंग्लिश आती है।तो चलो आज देख ही लेते है की अब तुमको अपनी राष्ट्रभाषा कितनी आती है इतने पर उमेश बोला हा क्यों नहीं मै तो लंदन से पढ़ कर आया हूं यहां ऐसा कोई नहीं है जो मुझे हरा सकता।
अनुज उमेश की बात सुनकर मुस्कुराया और बोला चलो आज हम भी देख लेते है दोनों ही प्रतियोगिता में हिस्सा लिए। जब उमेश और अनुज को एक एक टॉपिक लिखने को दिया गया।तो वही उमेश की चहेरे की मुस्कान कही खो सी गई।क्योंकि वो अपनी भाषा ही भूल चुके थे। वो इस दुनियां की चकाचौध में इस तरह खो गए थे। कि उन्हें अपनी भाषा अपनी भारतीय होने का पहचान ही खोने लगे तब जाकर उमेश को ये एहसास हुआ कि वो कितना गलत था।
और उससे भी गलत उसकी सोच थी
और फिर दोनों ने इस प्रतियोगिता को पूरा किया।
इस प्रतियोगिता में जीत अनुज की हुईं। फिर अनुज ने आकर उमेश से बोला,क्या हुआ तुम तो लंदन से पढ़े हो और अपनी भाषा ही भूल गए।उमेश अनुज की बात सुनकर बहुत शर्मिंदा हुआ और तब जाकर उसे ये एहसाह हुआ। कि हम चाहे जहां भी रहे हम अपनी राष्ट्रभाषा कभी नहीं भूलनी चाहिए। हम जो है जैसे है हमें खुद को वैसा स्वीकर करना चाहिए। चाहे वो हमारी वेशभूषा हो या हमारी भाषा कभी अपनी भाषा बोलने या लिखने में शर्मिंदा नहीं होना चाहिए। ये हमारी पहचान हैं। और ये हमारी राष्ट्रभाषा है।
ना ही इंग्लिश बोलने से हम स्मार्ट कहलाएंगे और ना ही हिन्दी बोलने से हमरी बेइज्जती होगी। गर्व से बोलो हम भारतीय हैं। और हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी है।फिर देखो सारी दुनियां तुम्हारे सामने झुक ना जाए तो कहना।


                                                               सुभाषिनी सिंह 

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