अतीत के झरोखे से - Mohan pathak

अतीत के झरोखे से     Mohan pathak     कहानियाँ     हास्य-व्यंग     2022-07-03 22:47:48     प्रेम बन्धन     24024           

अतीत के झरोखे से

  अतीत के झरोखे से( पहला भाग)       
परिषदीय परीक्षा के चलते पिछले दो तीन
दिन से घर पर ही थे। खाली थे,सोचा 
किताबों की  अलमारी व्यवस्थित कर दें।
इसी उद्देश्य से उठे और सारी किताबें
बिखेर दी। पूरा कमरा जैसे किसी कबाड़ी
की दुकान हो। ठीक करने की सोच ही रहे थे,
श्रीमती जी आ पहुंची। हम खुश हुए थोड़ी
मदद हो जाएगी। परन्तु अगले ही पल हमारी
खुशी जैसे अरबी के पत्ते पर टिका पानी
हल्के झोंके से लुढ़क जाता है, ऐसे ही
गायब हो गयी।श्रीमती जी का प्रवचन जो
शुरू हुआ तो हमारी सारी योजना पर पानी
फिर गया। जहाँ तो सोचा था अलमारी ठीक
करने के बहाने कोई पुरानी साहित्यिक
पत्रिका मिल जाये तो आनन्द लिया
जाय।आजकल पत्रिकाएं न तो खरीदी जाती है,
और न बाजार में दिखायी देती हैं।पहले
सरिता, चम्पक, मनोहर कहानियां, मुक्ता,
कादम्बिनी, वागर्थ, हंस, धर्मयुग,
इंडिया टुडे ,सारिका,अभिनव आदि आदि।
रेलवे स्टेशन से लेकर फुटपाथ पर नयी
पुरानी पत्रिकायें बेचने वाले दिख
जाते थे। आज मोबाइल इन्टरनेट ने लोगों
के पढ़ने के शौक को समाप्त कर दिया है।हम
भी अपना शौक पूरा करने न जाने कौन सी घड़ी
में बिना दिन सुझाये निकल पड़े थे।
श्रीमती जी के प्रवचन ने सिर मुड़ाते ओले
पड़ना मुहावरे का अर्थ समझा दिया।हमारी
भी पत्रिका पढ़ने की इच्छा ही मर गयी।         
   
  उधर श्रीमती जी का प्रवचन चालू था इधर
हम जल्दी जल्दी किताबों को समेटने में
लगे थे।उन्हीं किताबों के ढेर में कहीं
बहुमूल्य धन की तरह रखे नववर्ष तथा
दीवाली आदि के ग्रीटिंग कार्ड का एक बड़ा
सा पुलिन्दा मिल गया।उन्हें देखते ही
अतीत की याद आ गयी।जब नववर्ष, दीपावली
और शिक्षक दिवस जैसे अवसरों पर मिले
ढेरों ग्रीटिंग कार्ड जिन पर सूक्ति,
दोहा, कविता,और शायरी हिन्दी और
अंग्रेजी में लिखी हुआ करती थी। कितनी
प्रेरक,आकर्षक ज्ञानवर्धकऔर मनोरंजक
होती थी।उनमें देने वाले का प्यार,
सम्मान, समर्पण और अपनत्व होता था।
उन्हीं कार्डो में  विभिन्न अवसरों पर
बच्चों द्वारा हाथ से बने रंगीन कार्ड
सब मे बिल्कुल अलग ही नजर आ रहे थे। उन
कार्डो में बच्चों का प्यार सम्मान ही
नहीं बल्कि समर्पण था गुरु के उपकार के
प्रति।आजकल व्हाट्सएप के माध्यम से एक
छोटा सा किसी और के मैसेज को फारवर्ड कर
देने को हम अपने कर्तव्य को पूरा करना
कहते हैं। आज इसे फर्ज पूरा करना तो कह
सकते हैं किन्तु सच्चे अर्थ में रिश्ते
निभाना नहीं कहा जा सकता है। रिश्ते
निभाने में प्यार का तड़का, सादगी का रंग,
विश्वास की आंच, आत्मीयता का नमक
निःस्वार्थ का मसाला होना आवश्यक होता
है। हम अभी अपनी पुरानी रीति और आज की
मोबाइल संस्कृति की तुलना की उधेड़बुन
में लगे ही थे कि श्री पी0 के0 शर्मा जी आ
गए।बोले,अमा यार घर में क्या कर रहे
हो।छुट्टी है तो छुट्टी का मजा तो
लीजिये। आइये गुप्ता जी के यहाँ बैठकर
पीटी पार्टी करते हैं। हमने कहा, अमा
यार किट्टी पार्टी तो सुना था ये पीटी
पार्टी किस अबला का नाम है। बड़ी सहजता
से कहने लगे पकौड़ी चाय पार्टी। पी0 से
पकौड़ी और टी0 से tea। हम मुस्कराए बिना
नहीं रह पाए। श्रीमती जी के प्रवचन से
जो गंभीरता चेहरे पर छाई थी वह कुछ देर
के लिए दूर हो गयी। और सोचने लगे अपनी
भाषा हिन्दी जो भी खिला दो हजम कर जाती
है।अपना तो हाजमा ही इतना खराब है कि
पीटी पार्टी में कुछ खायें या न खायें
,श्रीमती जी का हाजमे को लेकर जो प्रवचन
शुरू हुआ अपना हाजमा ही हजम हो गया।
कहने लगी, नहीं भाई साहब  नहीं, इनका
हाजमा बड़ी मुश्किल से हम आजकल पटरी पर
ला पाए हैं।पकौड़ी खा कर ये रात भर जो पीं
पीं करते रहेंगे उससे इनका हाजमा तो
क्या हमारा आराम हराम हो जाएगा। अभी तो
इन्हें कमरा ठीक करना है। हम तो हाथ
लगाने से रहे। वैसे ही हमारा सर दुखा जा
रहा है। हमारी और कमरे की दशा देखकर
शर्मा जी तो चले गए। और हम किताबों को
देख देख कर अतीत में खोते जा रहे थे। जब
मोबाइल नहीं थे, इन्टरनेट नहीं था,और न
ही मित्रों से जुड़े रहने के लिए सोसियल
मीडिया था। तब मित्रों की धमा चौकड़ी
कहीं न कहीं हो जाया करती थी। न मोबाइल, न
व्हाट्सएप, और न कोई अन्य आज की तरह का
संचार साधन। ठीक समय पर सभी मित्र शहर
के मुख्य चौक पर मिलते। घंटों देश की
राजनीति, शिक्षा, समाज  अर्थव्यवस्था और
समसामयिक मुद्दों पर बहस होती। उस बहस
में न तो हार की खीझ होती थी और न जीत का
अहं। ऊँचनीच, छोटा बड़ा, का रत्ती भर भी
आभास नहीं होता था। यह आत्मीयता से
भरपूर मित्रता की मिसाल थी।बनावटीपन
का खोल उतार स्वच्छन्द वार्तालाप होता
था। आज तो बोलने से पहले सोचना होता है
आसपास किस वर्ग विशेष, जाति विशेष के
लोग हैं।यह सोचते ही बातें दिखावटी
बुरका ओढ़ लेती हैं। बुर्के में हम किसी
की आवाज तो सुन सकते हैं किन्तु उसकी
सुन्दरता के दर्शन का अनुभव नहीं कर
सकते, उसी प्रकार दिखावटी बुर्के की
बातों को सुन जरूर सकते हैं पर उन बातों
की आत्मीयता का अनुभव नहीं कर सकते हैं।
शायद इसीलिए आज चौपालों व चौराहों पर
मित्रमंडली का मिलन नहीं होता है।
रिश्तों को बचाने और उनमें आपसी समझ
बनाये रखने के लिए आज जितना ज्ञान
सोसियल मीडिया में बहाया जाता है, उसका
एक अंशमात्र भी अगर व्यवहार में लाया जा
रहा होता तो रिश्तों में निरन्तर बढ़ रही
खटास को मिठास में बदला जा सकता था। 
-------------जारी-----               

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