करते रहे हम शिकवा - SANTOSH KUMAR BARGORIA

करते रहे हम शिकवा     SANTOSH KUMAR BARGORIA     कहानियाँ     दुःखद     2022-07-03 22:49:45     इस कविता के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि अभी तक तो मैं खुद से ही बस शिकवा करता रहा पर इस दर्द को अब और नहीं छिपा पाया क्योंकि वह दर्द ऑखो के रास्ते ऑसू बनकर बह चली थी जिससे जवाने को मेरे दरे के बारे में पता चल गया ।     35108           

करते रहे हम शिकवा

करते रहे हम शिकवा, 
खुद से ही अपनी लेकिन ।
अफसोस जवाने से दर्द, 
हम और छिपा ना पाए ।।

अब तक छिपा रखा था, 
जिस दर्द को सीने पे ।
उस दर्द को संजोकर, 
हम और रख ना पाए ।।

छलक ही पड़ा वो दर्द, 
ऑखो के रास्ते फिर ।
होंठों पे लिए जैसे, 
उस दर्द की थी आहें ।।

कोई समझ सका ना
उस दर्द को मेरे ।
सुनकर वो हस रहे थे, 
ले मंद -मंद मुस्काने ।।

अपनो के बीच जैसे, 
असहाय हो चुका मैं।
बुनते रहे मेरे अपने, 
मुझ पर ही ताने बाने।।2।।

  🙏धन्यवाद 🙏

                                                               संतोष कुमार
बरगोरिया 
                                                            ---------------------------------
                                                               (साधारण
जनमानस) 

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